Monday, 29 June 2026

It is for general information that 
I, FAJAL ENTIHAJ KHAN son of ENTIHAJ MEHMUD KHAN, R/o Tellang Mohalla, Ward No. 2, Chamorshi, Tahsil Chamorshi, Gadchiroli, Maharashtra-442603, 
declare that name of mine, my father and my mother has been wrongly written as FAJALKHAN ENTIHAJKHA KHAN, ENTIHAJKHA KHAN and RUKSANA in my Class 10th Marksheet, Diploma Marksheet & Certificate, Graduation Marksheet & Certificate (Degree), School and College Leaving Certificate; name of mine has been wrongly written as FAJALKHAN ENTIHAJKHA KHAN in my Aadhaar Card No. 254509513511; name of my mother has been wrongly written as FARIDA in my Birth Certificate. The actual name of mine, my father and my mother are FAJAL ENTIHAJ KHAN, ENTIHAJ MEHMUD KHAN and RUKSHANA ENTIHAJ KHAN, which may be amended accordingly.

It is certified that I have complied with other legal requirements in this connection.

FAJAL ENTIHAJ KHAN

[Signature]


Notice of Name Change

It is for general information that
I, Ramhet Gautam (DOB 09.01.1980), son of Shri Mulayam Singh and Smt. Leelavati—resident of Village Gujarra, Post Parasari, District Datia, Madhya Pradesh, India (PIN Code: 475671)
declare that name of mine
—hereby state the following: My name is recorded as "Ramhet Ahirwar" (son of Shri Mulayam Singh) in the marksheets of my 10th standard (Year 1997, MP Board, Roll No. 10402167) and 12th standard (Year 1999, MP Board, Roll No. 21500897) examinations. However, my name is recorded as "Ramhet Goutam" in the marksheet for my B.A. degree (Year 2002, Jiwaji University Gwalior, Roll No. 31123), which is incorrect. In contrast, my name is recorded as "Ramhet Gautam" (son of Shri Mulayam Singh) in my Aadhaar Card (No. 843384207750) and all other official documents; this is the correct name. Currently, I am known by the name "Ramhet Gautam." The aforementioned names refer to the same individual—namely, myself (the deponent). To attest to the veracity of this fact, an affidavit (Serial No. 1264, dated 29.06.2026) is hereby submitted. Please take note.
Notary: Advocate Ajay Patel
Sincerely, Ramhet Gautam
Notary: Advocate Ajay Patel

Sunday, 28 June 2026

हरिजन

रामचरितमानस के अनुसार हरिजन का आशय ब्राह्मणों से है। प्रमाण के लिए देखें गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित रामचरितमानस के उत्तर काण्ड का दोहा 105 (क) जिसमें काकभुशुण्डी कहते हैं कि-
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह।
हरिजन द्विज देंखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह।।

द्विज = ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य 
हरिजन = हरि(विष्णु)जन(भक्त/सेवक)
'हर कहुँ हरि सेवक' के अनुसार शिव भी हरिजन हैं।
इस प्रकार हरिजन द्विज का तात्सर्य हुआ ऐसा द्विज जो विष्णुभक्ति में सर्वश्रेष्ठ हो।जो कि वर्ण-व्यवस्था का शीर्ष वर्ण ही है।
अतः बुरा न मानकर उन्हें समझाएं कि आप सही जगह उच्चारण करें।

Monday, 22 June 2026

गद्य

भूमिका

संस्कृत गद्य साहित्य का उ‌द्भव और विकास : संसार का सर्वाधिक प्राचीनतम साहित्य संस्कृत साहित्य ही माना जाता है। सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्‌मय दो रूपों में उपलब्ध होता है- गद्य तथा पद्य । इन दोनों में से प्राचीनता के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। कुछ विद्वान ऋग्वेद में उपलब्ध संवाद सूक्तों और यजुर्वेद के गद्य-खण्डों के आधार पर गद्य को ही प्राचीनतम मानते हैं, जबकि कुछ समीक्षक साहित्य का विकास पद्म के रूप में ही मानते हैं। क्योंकि विश्व-साहित्य का प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद पद्य के रूप में ही उपलब्ध है। भाषा-शास्त्र के अनुसार भी भाषा की उत्पत्ति संगीत पर आधारित होने के कारण यह स्पष्ट किया गया है कि मानव की संगीतात्मक अभिरुचि के कारण उसकी स्वाभाविक भाषा संगीतमय थी, जिसके फलस्वरूप भाषा का विकास पद्य के रूप में हुआ।

 

अतः विविध मतों की समालोचनाओं के आधार पर यही सही प्रतीत होता है कि पद्यात्मक वाणी मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति होने से ही समीक्षकों के द्वारा "गद्य कवीनां निकर्ष वदन्ति" अर्थात् गद्य ही कवियों की विद्वत्ता की कसौटी है, इस सिद्धान्त की उ‌द्भावना हुई। गद्य में सामासिक पदावली का प्राधान्य तथा ओज गुण की स्थिति ही इसका प्राणप्रद धर्म है। दण्डी ने भी काव्यादर्श में कहा है- "ओजः समासभूयस्त्वमेतद् गद्यस्य जीवितम्" संस्कृत-गद्य की वर्णन शैली अलंकृत है। प्रायः श्रेष्ठ गद्यकारों ने अपने गद्य लेखन में पाण्डित्य प्रदर्शन को ही प्रमुख आधार बनाया है, उसमें समासबाहुल्य व पदलालित्य आदि की बहुतायत देखने को मिलती है।

 

संस्कृत गद्य-साहित्य का उद्गम :

 

संस्कृत गद्य-साहित्य की परम्परा प्राचीनतम है, जिसका उदाहरण हमें कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में प्राप्त होता है। इसी वेद की काठक और मैत्रेयी संहिताओं में भी गद्य की मात्रा अधिक है। अथर्ववेद का छठा भाग तो पूर्णतया गद्यात्मक ही है। इसके बाद ब्राह्मण तथा आरण्यक ग्रन्थों की रचना भी गद्य में ही हुई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वैदिक साहित्य में गद्य का व्यापक प्रयोग होने के कारण गद्य का उद्गम वैदिककाल में ही हुआ है।

 

संस्कृत-गद्य का विकास :

सम्पूर्ण गद्य-साहित्य को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) वैदिक गद्य-साहित्य, (2) पौराणिक एवं शास्त्रीय गद्य-साहित्य तथा (3) लौकिक संस्कृत गद्य-साहित्य।

वैदिक गद्य-साहित्य- वैदिक साहित्य के गद्य से तात्पर्य है वह गद्य जो वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों एवं छहों वेदोगों में प्रयुक्त हुआ है। सम्प्रति उपलब्ध वैदिक गद्य यजुर्वेद में स्पष्टतया परिलक्षित होता है। यजुर्वेद में प्रयुक्त विभिन्न स्तुतियों का गद्य सानुप्रास व कवित्वपूर्ण है। जैसे कि "पश्येम शरदः शतम्, जीवेम शरदः शतम्, शृणुयाम शरदः शतम्" इत्यादि।

 

वैदिक गद्य प्रायः सहज, सरल तथा बोलचाल की भाषा का गद्य है। इसमें '', '', 'वै' आदि अव्यय वाक्यालंकार के रूप में प्रयुक्त हैं, जिसमें रोचकता तथा सुन्दरता का समावेश हो जाता है। उपमा तथा रूपक जैसे अलंकारों का भी सुन्दर संयोजन देखने को मिलता है।

वेदों के बाद ब्राह्मण-ग्रन्थों में गद्य का प्रयोग खुलकर किया गया है। इनमें यज्ञ-प्रक्रिया सम्बन्धी व्याख्या प्रस्तुत करने वाला गद्य क्लिष्ट तथा अस्पष्ट है। परवर्ती वैदिक साहित्य में क्लिष्ट गद्य का प्रयोग होने लगा था। यह गद्य पाणिनि-व्याकरण के नियमों से सर्वथा रहित है, फिर भी शुद्ध व परिमार्जित रूप में प्रयुक्त है। इसके बाद गद्य का विकास आरण्यकों एवं उपनिषदों में पूर्णतया दिखाई देता है। सभी आरण्यक गद्य में ही विरचित हैं। उपनिषद्-साहित्य का गद्य पूर्व साहित्य की अपेक्षा अधिक परिष्कृत है।

पौराणिक एवं शास्त्रीय गद्य वैदिक साहित्य के गद्य के बाद पौराणिक एवं शास्त्रीय गद्य विकसित हुआ जो कि अत्यन्त प्रौढ़, समास बहुल तथा गाढ़बन्धयुक्त दिखाई देता है। इस गद्य में अलंकारों का चमत्कार साहित्यिकता को प्रकट करता है। श्रीम‌द्भागवत और विष्णुपुराण का गद्य इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

शास्त्रीय गद्य में तत्त्वज्ञान से सम्बन्धित ग्रन्थों को ग्रहण किया जाता है। इसमें महर्षि पतंजलि का महाभाष्य प्राचीनतम ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ का गद्य अत्यन्त प्रांजल, प्रशस्त एवं अभिव्यञ्जनाशील है, जिसकी रमणीयता कथोपकथन शैली में अभिव्यक्त हुई है। अन्य शास्त्रीय गद्यकारों में शबर स्वामी, शङ्कराचार्य तथा जयन्त भट्ट का स्थान भी प्रमुख है। शंकराचार्य के भाष्यों में प्रौढ़ तथा प्राञ्जल गद्य के दर्शन होते हैं, जो माधुर्य तथा प्रसाद गुण से विभूषित है। इसी कारण उसमें साहित्यिकता स्पष्टतया परिलक्षित होती है। इसी प्रकार जयन्त भट्ट द्वारा रचित 'न्यायमंजरी' का गद्य भी सुन्दर, सरस एवं ग्राञ्जल है।

लौकिक संस्कृत गद्य का अभ्युदय संस्कृत गद्य साहित्य का चरम विकास लौकिक गद्य के रूप में हुआ है। इसका सर्वप्रथम परिष्कृत रूप दण्डीसुबन्धु तथा बाणभट्ट की रचनाओं में प्राप्त होता है। इन महाकवियों के द्वारा विरचित गद्य-काव्यों में गद्य का चरमोत्कर्ष स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। संस्कृत गद्य में कथाओं का उदय ईसा से लगभग 400 वर्ष पूर्व हो चुका था। वार्तिककार कात्यायन ने आख्यायिकाओं का बहुवचन में प्रयोग कर उनकी बहुलता की ओर संकेत किया है। महाभाष्यकार पतञ्जलि (200 ई0पू0) ने तो 'वासवदत्ता', 'सुमनोत्तरा', तथा 'भैमरथी' आदि रचनाओं का नामतः उल्लेख किया है-

"अधिकृत्य कृते ग्रन्थे", "बहुलं लुग्वक्तव्यः वासवदत्ता सुमनोत्तरा न च भवति भैमरथी"। इन्हीं गद्य काव्यों के नामों का उल्लेख काशिका में भी प्राप्त होता है किन्तु ये अनुपलब्ध हैं। कुछ शिलालेखों से संस्कृत-गद्य-साहित्य के विकसित रूप का उल्लेख भी मिलता है। इनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध रुद्रदामन् का गिरनार शिलालेख है, जिसकी भाषा सरल, प्रवाहयुक्त तथा आलंकारिक है। इन सभी तथ्यों से स्पष्ट होता है कि गद्य का उद्भव तथा विकास महाकवि दण्डी, सुबन्धु व बाण से कई शताब्दियों पूर्व में हो चुका था, किन्तु वे प्राचीन ग्रन्थ सम्प्रति दुर्भाग्यवश प्राप्त नहीं हैं।

संस्कृत गद्य-काव्य का समृद्ध युग- उपलब्ध संस्कृत गद्य-साहित्य के अनुसार संस्कृत के गद्य-काव्यों का समृद्ध युग महाकवि दण्डी, सुबन्धु तथा बाण भट्ट युग माना जाता है। इनकी उत्कृष्ट गद्य-रचनाओं से संस्कृत गद्य-काव्य की चरम उन्नति व समृद्धि हुई है। इनका योगदान संस्कृत गद्य-काव्य में अविस्मरणीय है।

दण्डी - संस्कृत गद्यकाव्य के प्रमुख व अग्रणी महाकवि दण्डी भारवि के प्रपौत्र थे। ये विदर्भ के निवासी थे, तथा नरसिंह वर्मा प्रथम के राज्याश्रित थे। दण्डी का स्थिति काल 700 ई0 के लगभग माना जाता है। 'त्रयो दण्डिप्रबन्धाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः' के अनुसार दण्डी के तीन ग्रन्थों का पता चलता है। इनमें 'काव्यादर्श' तथा 'दशकुमारचरित' को सभी एकमत से दण्डी की ही रचनाएँ मानते हैं, किन्तु तीसरी रचना 'अवन्तिसुन्दरीकथा' के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। इसका विश्लेषण करने व प्रकाश में आने के बाद इसे दण्डी द्वारा ही रचित माना जाता है।

'काव्यादर्श' अलंकारशास्त्र का अनुपम ग्रन्थ है। 'दशकुमारचरित' में दस राजकुमारों व मन्त्री-पुत्रों के पर्यटन तथा साहसिक कार्यों का हृदयग्राही वर्णन है। 'अवन्तिसुन्दरीकथा' में अवन्ती देश की राजकुमारी अवन्तीसुन्दरी की कथा चित्रित की गई है।

दण्डी की काव्य-शैली पाञ्चाली रीति से सुसज्जित है। अर्थ की स्पष्टता, रस की स्पष्ट अभिव्यक्ति, कल्पना की सजीवता तथा शब्दगत लालित्य दण्डी की शैली की विशिष्टता है। उनका पदलालित्य तो अतीव दर्शनीय है, तथा सुललित एवं सुन्दर गद्य लिखने में दण्डी निष्णात हैं। इसी लिए समीक्षकों ने कहा है- "दण्डिनः

पदलालित्यम्।" डा0 कीध ने उनकी मुख्य विशेषता उनका चरित्र-चित्रण माना है। दण्डी की काव्यात्मक विशेषताओं के कारण ही कुछ आलोचक उन्हें वाल्मीकि और व्यास के बाद तीसरा कवि मानते हैं।

सुबन्धु- अलंकृत शैली के गद्य लेखकों में सुबन्धु का स्थान महत्वपूर्ण है। उनके स्थितिकाल के विषय में विभिन्न आलोचकों में मतभेद दिखाई देता है। कुछ इन्हें दण्डी से भी पूर्ववर्ती मानते हैं तथा कुछ समालोचक पश्चाद्वर्ती। बाण भट्ट की कादम्बरी में सुबन्धु प्रणीत वासवदत्ता का उल्लेख होने के कारण इन्हें बाण से पूर्ववर्ती माना जाता है। अधिकांश विद्वान् इनका स्थितिकाल छठी शताब्दी का अन्तिम भाग निर्धारित करते हैं।

सुबन्ध द्वारा रचित एकमात्र गद्य-रचना 'वासवदत्ता' है, जो उनके यश को प्रसारित करती है। इस ग्रन्थ में वासवदत्ता व कन्दर्पकेतु की प्रणय कथा है, जिसका कथानक तो अत्यन्त स्वल्प है किन्तु वर्णन प्रचुर मात्रा में है। अलंकृत शैली में लिखे गये इस ग्रन्थ में मुख्यतः कवि का ध्येय पाण्डित्य-प्रदर्शन करना ही है। सुबन्धु ने गौडी रीति का प्रयोग किया है। श्लेष तो इनके प्रत्येक पद में समाया हुआ है। श्लेषयुक्त शैली के बारे में स्वयं सुबन्धु ने कहा है कि-

"प्रत्यक्षरश्लेषमयप्रपञ्चविन्यासवैदग्ध्यनिधिप्रबन्धम्" इत्यादि।

श्लेष के अतिरिक्त विरोधाभास, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों की भी इसमें प्रचुरता है। दीर्घ-समासों से गुम्फित उनकी रचना-शैली में प्रसाद और माधुर्य का सर्वथा अभाव तथा कृत्रिमता व क्लिष्टता का ही आडम्बर दिखाई देता है। वर्णन-वैचित्र्य के कारण ही सुबन्धु ने संस्कृत-गद्यकारों में अपना विशिष्ट स्थान बनाते हुए विशेष ख्याति अर्जित की है।

बाणभट्ट - संस्कृत गद्य-सम्राट् महाकवि बाणभट्ट हर्षवर्धन के आश्रित थे। हर्ष का राज्यकाल 606 ई0 से 648 ई0 माना जाता है। अतः बाण का भी समय सप्तम शताब्दी का पूर्वार्द्ध सिद्ध होता है। बाण की पाँच रचनाएं प्रसिद्ध हैं- हर्षचरित, कादम्बरी, पार्वती परिणय, चण्डीशतक तथा मुकुटताडित। इनके ग्रन्थों में गद्य के विविध रूप देखने को मिलते हैं, समासों की अल्पता, दीर्घता तथा न्यूनता से युक्त त्रिविध शैली से युक्त काव्यों में प्रमुखतया पाञ्चाली रीति का प्रयोग किया गया है। कादम्बरी तो गद्य-काव्यों में सर्वश्रेष्ठ तथा विद्वानों के लिए आदर्शमय व पठनीय है। इसमें अर्थानुरूप शब्दों का प्रयोग किया गया है तथा ओजगुण से मण्डित समास-बाहुल्य है। उपमा तथा उत्प्रेक्षा अलंकारों का चमत्कार इसकी कीर्ति-कौमुदी को द्विगुणित कर देता है। महाकवि बाण की दृष्टि प्रकृति के विकट और रम्य दोनों रूपों पर पड़ी है। बाण के वैशिष्ट्य को प्रकट करते हुए डा0 कीथ ने कहा है कि "बाण ने एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया है, जिसकी प्रशंसा करना तो सरल है पर उसका सफलतापूर्वक अनुसरण करना कठिन है। वास्तव में परवर्ती ऐसी कोई रचना हमारे सम्मुख नहीं है जो क्षणभर के लिए भी उसकी रचनाओं के समक्ष रखी जा सके ।"

परवर्ती संस्कृत गद्य काव्यकार- महाकवि बाण के बाद प्रमुख गद्यकारों में धनपाल कवि का नाम प्रमुखता से गिना जाता है, जिनका सुप्रसिद्ध गद्य-काव्य 'तिलकमञ्जरी' है। इसमें तत्कालीन कलाओं का सुन्दर वर्णन किया गया है। 'गद्यचिन्तामणि' के रचयिता वादीभसिंह भी धनपाल के ही समकालीन माने जाते हैं। इस गद्य-काव्य में कथानक व भाषा की दृष्टि से बाण का अनुकरण किया गया है। वामनभट्ट ने 'वेम-भूपालचरित' गद्य-काव्य में हर्षचरित का अनुकरण किया है। यह आख्यायिका ग्रन्थ है।

आधुनिक युग के प्रमुख गद्यकारों में पं0 अम्बिकादत्त व्यास का स्थान प्रमुख है। इनके द्वारा रचित 'शिवराजविजय' आधुनिक संस्कृत गद्य-काव्य का अनुपम उदाहरण है। व्यासजी का गद्य दण्डी, बाण तथा सुबन्धु तीनों से ही प्रभावित है। इनके अतिरिक्त 'प्रबन्धमञ्जरी' गद्य-काव्य के लेखक पं0 हृषीकेश शास्त्री भी प्रमुख गद्यकार हैं। अन्य गद्यकारों में पं0 क्षमाराव, श्रीनिवासाचार्य, श्रीमती राजम्मा, आदि प्रसिद्ध हैं। संस्कृत निबन्धकारों में पं0 गिरिधर चतुर्वेदी का नाम अग्रणी है। उन्होंने संस्कृत-गद्य में समीक्षात्मक प्रवृत्ति को आश्रय देकर अनेक आलोचनात्मक निबन्ध लिखे हैं। इसी प्रकार डा0 रेवाप्रसाद द्विवेदी का नाम भी आलोचनात्मक निबन्धकार के रूप में प्रसिद्ध है।

वर्तमान युग में संस्कृत-गद्य के प्रचार-प्रसार में संस्कृत की विविध पत्र-पत्रिकाओं का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। इनमें भारतवाणी (पूना), शारदा (बम्बई), भवितव्यम् (नागपुर), संस्कृत रत्नाकर (दिल्ली), संस्कृत पत्रिका (मैसूर), भारती तथा स्वर-मंगला (जयपुर) आदि प्रमुख हैं। इन विविध पत्रिकाओं में आधुनिक संस्कृत लेखकों के विभिन्न विषयों पर समालोचनात्मक, मौलिक महत्त्वपूर्ण लेख प्रकाशित होते हैं, जो जन-जन तक संस्कृत का प्रचार करने में विशिष्ट भूमिका प्रदान करते हैं।

उपयुक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि संस्कृत गद्य-साहित्य का विकास वैदिक काल से लेकर बाण, दण्डी तथा सुबन्धु तक चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो चुका था। परवर्तीकाल में विदेशियों के आगमन के कारण संस्कृत गद्य का प्रायः अभाव रहा। बीसवीं शताब्दी में पुनः संस्कृत-गद्य की रचना प्रारम्भ हुई जो अनवरत प्रवाहित है, किन्तु आज गद्य-काव्यों की अपेक्षा संस्कृत-गद्य की रचना पत्र-पत्रिकाओं एवं लघुकाय निबन्धों के रूप में ही सीमित है जो समाज की जीवन-झांकी को प्रस्तुत करने में पूर्णतया समर्थ नहीं है। इसका प्रमुख कारण परिवर्तित परिवेश तथा राजनैतिक, भाषात्मक एवं सांस्कृतिक स्थितियाँ हैं।

गद्य-साहित्य की प्रमुखतया दो धाराएँ उपलब्ध होती हैं- (1) कथा या आख्यान साहित्य (नीतिपरक कथा साहित्य) तथा (2) गद्यकाव्य की विधाएँ (काव्यपरक कथा साहित्य)।

नीतिपरक कथा साहित्य- भारतीय एवं पाश्चात्य समीक्षकों के अनुसार विश्व में 'कथा-साहित्य' का उद्भव भारत में ही हुआ। इनकी मौलिकता, रचना-नैपुण्य एवं विश्वव्यापक प्रभाव के कारण वह आज भी अद्वितीय माना जाता है। कथा-साहित्य के इन आख्यानों में शुद्ध काल्पनिक जगत् का चित्रण किया गया है। इनमें कहीं उत्सुकता व्याप्त है, तो कहीं कौतूहल मिलता है। किसी स्थान पर घटना-वैचित्र्य के दर्शन होते हैं तो किसी स्थान पर हास्य व विनोद की छटा है। गम्भीर व मानवीय उपदेशों का भी अभाव नहीं है और न ही नीति तत्त्व की कमी। इनमें सरस काव्य की मधुर झलक है। संस्कृत कथा अथवा आख्यान साहित्य को दो भागों में विभक्त किया गया है- (क) नीति कथाएँ और (ख) लोक कथाएँ।

नीति-कथाएँ- नीति-कथाओं में उपदेशात्मक प्रवृत्ति का मनोरंजनकारी परिपाक प्रकट हुआ है। नीति-कथाओं का मुख्य उद्देश्य सरल, सरस तथा रोचक कथाओं के माध्यम से त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) की बातों का उपदेश देना है, जिसमें सदाचार, नैतिकता राजनैतिक व व्यावहारिक ज्ञान भी सम्मिलित हो जाता है।

नीति-कथाएँ एक ओर नीतिशास्त्र का ज्ञान कराती हैं, तो दूसरी ओर संस्कृत भाषा की सरल एवं रोचक शैली का आदर्श भी उपस्थित करती हैं। इन कथाओं की प्रमुख विशेषता यह है कि उनमें एक प्रधान कथा के अन्तर्गत कई गौण कथाओं का समावेश होता है। नीति-ग्रन्थों में पंचतन्त्र तथा हितोपदेश प्रमुख व विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं।

पंचतन्त्र - यह संस्कृत नीति कथा-साहत्य का महत्त्वपूर्ण एवं प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसमें अत्यन्त उपादेय कथाओं का संकलन है, जो शिक्षाप्रद व मनोहर भी है। इसकी शैली अत्यन्त आकर्षक है। छठी शताब्दी में बादशाह नौशेरवा के आदेश से 'बुरजोई' नामक हकीम ने पहलवी भाषा में इसका अनुवाद किया था। विश्व की अन्य अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। संस्कृत-ज्ञान के साथ-साथ राजनीति की शिक्षा देने के उद्देश्य से ही पंचतन्त्र की रचना हुई।

इसके लेखक विष्णु शर्मा हैं, जिन्होंने इस ग्रन्थ की प्रस्तावना में इसका उद्देश्य राजकुमारों को नीतिशास्त्र में निपुण बनाना बताया है। इसमें पाँच तन्त्र अर्थात् अध्याय हैं जो मित्रभेद, मित्रलाभ, सन्धि-विग्रह, लब्धप्रणाश तथा अपरीक्षित कारक नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें राजनीति, सदाचार और लोक-व्यवहार के प्रमुख विषयों पर पशु व पक्षी परस्पर बातचीत करते हैं। इनका गद्य अत्यन्त सरल व सुबोध है। इसमें संकलित पद्य महाभारत आदि ग्रन्थों से उधृत किये गये हैं। 'बाइबल' के बाद संसार की सर्वाधिक प्रचलित पुस्तक 'पंचतन्त्र' ही है।

हितोपदेश- यह पंचतन्त्र का ही एक लघु संस्करण है। इसके रचयिता पण्डित नारायण हैं, जो बंगाल के राजा धवलचन्द्र के आश्रित थे। इस ग्रन्थ की एक पाण्डुलिपि 1373 ई0 की प्राप्त होती है। ग्रन्थकार ने इस ग्रन्थ के लेखन का आधार 'पंचतन्त्र' को ही स्वीकार किया था। इसकी भाषा 'पंचतन्त्र' से भी सरल है। इसमें तियालीस कथाएँ ही मिलती हैं, जिनमें से पच्चीस कथाएँ पंचतन्त्र से उधृत की गई हैं, केवल भाषा भिन्न है। 'हितोपदेश' चार परिच्छदों में विभक्त है- मित्रलाभ, सुहृद्भद, विग्रह और सन्धि। इनमें से प्रथम दोनों तन्त्रों का आधार पंचतन्त्र है। इस ग्रन्थ में पद्मों का बाहुल्य है। इसका उद्देश्य भी नीति-तत्त्वों का सरलता से परिज्ञान कराना ही है।

(ख) लोक कथाएँ- संस्कृत साहित्य में उपदेशात्मक नीतिकथाओं के अतिरिक्त मनोरञ्जनात्मक लोक कथाओं का अस्तित्व पाया जाता है। 'वृहत्कथा' लोक कथाओं का प्राचीनतम संग्रह है, जो गुणाढ्य नामक कवि के द्वारा लिखा गया था। व्यूलर के अनुसार 'वृहत्कथा' प्रथम अथवा द्वितीय शताब्दी की रचना है। इस ग्रन्थ के दो तमिल संस्करण प्राप्त हैं। इसके अतिरिक्त 'वेतालपंचविंशतिका', 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' तथा 'शुकसप्तति' भी मनोरंजक कहानियों के संग्रह हैं, जो बहुत लोकप्रिय हैं। अन्य प्रसिद्ध कथा-संग्रहों में पन्द्रहवीं शताब्दी में कवि विद्यापति ने 'पुरुष-परीक्षा' की रचना की, जिसमें 44 नैतिक तथा राजनीतिक कहानियाँ हैं। शिवदास द्वारा रचित 'कथार्णव' नामक कथा-ग्रन्थ में चोरों व मूखों से सम्बन्धित 35 रोचक कथायें हैं। बल्लालसेन कृत 'भोजप्रबन्ध' में संस्कृत महाकवियों की अनेक रोचक दन्त-कथाएँ दी गई हैं। बौद्धों के कथा-संग्रह 'अवदान' नाम से प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार 'वीरचरित, माधवानल कथा, प्रबन्धचिन्तामणि, आदि कथाएँ परिगणनीय हैं।

इस प्रकार संस्कृत कथा-साहित्य का विश्व में व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ, जिसके कारण वे कथाएँ विश्व-साहित्य की एक प्रमुख अंग के रूप में प्रतिष्ठित हो गईं। इनकी विचित्रता को देखकर एक आलोचक ने कहा है कि "भारतीय आख्यान जितने विचित्र हैं, उससे कहीं अधिक विचित्र आर्य आख्यान साहित्य की विश्वविजय की कथा है।" निःसन्देह यह कथन यथार्थ में सत्य है तथा भारतीय संस्कृत-गद्य के आख्यान-साहित्य की विशिष्टता एवं व्यापकता को पुष्ट करता है।

काव्यपरक कथा-साहित्य - काव्यपरक गद्य-साहित्य को प्रमुखतया चार भागों में विभक्त किया जा सकता है- 1. कथा, 2. आख्यायिका 3. लघुकथा तथा 4. उपन्यास।

1. कथा - गद्य-काव्य की विधाओं में कथा का विशिष्ट स्थान है। कथा के स्वरूप का विवेचन करते हुए दण्डी ने कहा है कि कथा कवि-कल्पित होती है, तथा इसमें वक्ता स्वयं नायक अथवा अन्य कोई रहता है। कथा में कन्या हरण

संग्राम, सूर्योदय, चन्द्रोदय, विप्रलम्भ आदि विषयों का वर्णन किया जाता है एवं लेखक अभिप्राय विशेष के कारण कुछ विशिष्ट पदों का प्रयोग करता है जिनके माध् यम से कथा का मूल उद्देश्य भी व्यक्त होता है।

संस्कृत कथा-साहित्य में बाण की 'कादम्बरी' सर्वोत्कृष्ट रचना है। इस ग्रन्थ की मूल कथा का बीज गुणाढ्य की 'वृहत्कथा' से लिया गया है। कवि ने अपनी प्रतिभा से उसे एक नवीन मौलिक स्वरूप प्रदान किया है। प्रारम्भ से अन्त तक इसमें कुतूहल व रोचकता समायी हुई है। इसके सभी पात्र सजीव हैं तथा उनका चरित्र-चित्रण भी बाण ने विशद रूप से किया है। इस चरित्र चित्रण में कवि का अप्रतिम कल्पना वैभव, वर्णन की पटुता और मानव मनोवृत्तियों के मार्मिक निरीक्षण की चतुरता प्रकट हुई है।

2. आख्यायिका आख्यायिका को गद्य-काव्य का एक अंग माना गया है। दण्डी के अनुसार आख्यायिका ऐतिहासिक इतिवृत्त पर अवलम्बित होती है, तथा इसमें नायक स्वयं वक्ता होता है। आख्यायिका का विभाजन उच्छ्‌वासों (अध्याय) में किया जाता है, तथा उसमें वक्त्र एवं अपरवक्त्र छन्द के पद्मों का समावेश रहता है। आख्यायिका को एक तरह से आत्मकथा भी कह सकते हैं। इसमें सूर्योदय आदि का वर्णन नहीं रहता है।

महाकवि बाण द्वारा रचित 'हर्षचरित' एक आख्यायिका है जिसे स्वयं बाण ने स्वीकार किया है तथा यह रचना आख्यायिका के लक्षणों का संग्रह कही जा सकती है। इसमें आठ उच्छ्‌वास हैं। प्रथम तीन उच्छ्‌वासों में बाण की आत्म-कथा वर्णित है तथा शेष में सम्राट् हर्ष का जीवन-चरित्र वर्णित है। नाट्य-सौन्दर्य की दृष्टि से भी यह विशिष्ट कृति है। इसमें बाण की अद्भुत वर्णन शक्ति का परिचय स्थान-स्थान पर मिलता है।

3. लघुकथा - संस्कृत साहित्य में आधुनिक लघुकथाओं के समान किसी प्राचीन साहित्यिक रचना का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है, न ही इसका पृथक् से कोई लक्षण किया गया है। कथा का लक्षण करते हुए कहा गया है कि "कथायां सरस वस्तुगद्यद्यैरेव विनिर्मितम्।" अर्थात् कथा उस गद्य काव्य को कहते हैं जिसमें गद्य के अन्तर्गत ही सरस वस्तु का निर्माण हो। अतः ऐसी सरस वस्तु का गद्य में निर्माण लघुकथाओं के माध्यम से ही होना उचित प्रतीत होता है। नीति सम्बन्धी आख्यान-साहित्य लघु-कथाओं का ही संग्रह है। पंचतन्त्र, हितोपदेश, वेतालपंचविंशतिका आदि ग्रन्थों में जो लघु-कथाएँ हैं वे बहुत ही रोचक, उपदेशात्मक तथा सरस हैं।

लघु-कथा के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वानों ने विभिन्न विचार व्यक्त किये हैं। उनके अनुसार कहानी में वस्तु, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, वातावरण, उद्देश्य और शैली ये छः तत्त्व होते हैं तथा उन्हीं के माध्यम से कहानी का मर्म प्रकट होता

है। कथा-तत्त्वों के बीज वैदिककालीन साहित्य ब्राह्मण, आरण्यक आदि से आधुनिक युग तक निरन्तर विकसित होते रहे हैं तथा कथा-साहित्य प्रत्येक युग की परिस्थितियों के अनुकूल है।

आधुनिक संस्कृत गद्यकारों में पै0 क्षमाराव का विशेष स्थान है, जिनके द्वारा रचित 'कथामुक्तावली' प्रसिद्ध ग्रन्थ है। उन्नीसवीं शताब्दी का प्रारम्भिक व अन्तिम दशक संस्कृत लघुकथाओं के विकास का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। 1898 ई0 से 1910 ई0 तक की अवधि में संस्कृत लघु-कथाओं से सम्बद्ध नौ संग्रह प्रकाशित हुये हैं। पे0 अम्बिकादत्त व्यास के 'रत्नाष्टक' में हास्य एवं उपदेशात्मक आठ कहानियाँ संकलित हैं।

4. उपन्यास - अर्वाचीन संस्कृत गद्य-साहित्य की विविध धाराओं में उपन्यास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह संस्कृत की पूर्णतया नवीन काव्य-विधा है। संस्कृत के उपन्यासों में 'शिवराजविजय' की गणना सर्वप्रथम की जाती है, इसकी रचना पं0 अम्बिकादत्त व्यास ने 1870 ई0 में की थी। यह उनकी मौलिक कृति है। इसी रचना से संस्कृत में उपन्यास साहित्य के लेखन का सूत्रपात हुआ। 'महाराष्ट्र जीवन प्रभात' नामक बंगला कृति का अनुवाद कृष्ण मोहनलाल जौहरी ने अंग्रेजी में 'शिवाजी' के नाम से किया था। बंगाली उपन्यासकार बंकिम बाबू के प्रायः सभी उपन्यास संस्कृत में अनूदित हो चुके हैं। विधुशेखर द्वारा रवीन्द्रनाथ टैगोर के 'जयपराजयम्' का अनुवाद किया गया था। इसके अतिरिक्त भी अन्य कई लेखकों ने विभिन्न उपन्यासों का संस्कृत में अनुवाद किया तथा कुछ ने अन्य विधाओं को उपन्यास के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्नीसवीं शताब्दी में रामायण, महाभारत तथा पुराणों पर आधारित उपन्यासों की भी रचना हुई है। इनमें लक्ष्मण सूरि का 'रामायण-संग्रह', 'भीष्मविजयम्' तथा 'महाभारतसंग्राम' उपन्यास प्रसिद्ध हैं। पौराणिक उपन्यासकारों में शंकरलाल माहेश्वर का नाम अग्रणी है। उनके द्वारा लिखित 'अनसूयाभ्युदयम्', 'भगवतीभाग्योदयः', 'चन्द्रप्रभाचरितम्' एवं 'महेश्वरप्राणप्रिया' हृदयावर्जक उपन्यास हैं। ऐतिहासिक घटनाओं से युक्त तथा सामाजिक उपन्यासों की भी रचना इसी युग में हुई है।

पंडित अम्बिकादत्त व्यास का स्थितिकाल एवं कृतियाँ :

संस्कृत वाङ्मय के प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास 'शिवराजविजय' के रचयिता पं0 अम्बिकादत्त व्यास का जन्म द्वितीय काशी के रूप में विश्रुत जयपुर नगर में चैत्र मास में नवरात्र की शुक्ला अष्टमी सन् 1858 में हुआ। इनका परिवार पाराशर गोत्रीय था तथा पहले जयपुर से ग्यारह मील पूर्व दिशा में 'रावत जी का धला' के समीप मानपुर ग्राम में रहता था। इनके पिता का नाम पं0 दुर्गादत्त व्यास था, जो कुशल कथावाचक थे। इनके प्रपितामह राजाराम काशी में ही रहते थे, जिनकी विद्वत्ता से सम्पूर्ण विद्वत्-समुदाय नतमस्तक था। अतः अपने पूर्वजों के समान ही पं0 अम्बिकादत्त को विद्वत्ता के संस्कार जन्म से ही प्राप्त थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही सम्पन्न हुई। इन्हें व्याख्यान देने का अच्छा ज्ञान था, जिसके फलस्वरूप ये व्यास कहे जाने लगे। बाल्यावस्था में ही इन्हें काव्यस्फुरण हो गया था, जो पिता के सान्निध्य में श्लोक-रचना के अभ्यासवश परिपुष्ट हो गया था। अतः भारतेन्दु मण्डली ने इन्हें 'सुकवि' पद से विभूषित किया था। व्यासजी बचपन में ही इतने कुशल बुद्धि से सम्पन्न हो चुके थे कि एक घड़ी अर्थात् चौबीस मिनटों में ही सौ श्लोंकों की रचना कर लेते थे। अतः इन्हें 'घटिका- शतकी' या स्मृति प्रबुद्धतावश 'शतावधानी' भी कहा जाता था।

पे0 अम्बिकादत्त के जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आये, विभिन विघ्नों का इन्हें सामना करना पड़ा। सन् 1874 में इनकी माता का तथा उसके छः वर्ष बाद ही पिता का देहावसान हो गया। अग्रज गणेशदत्त सदा मनोमालिन्य रखते थे, अनुज गौरीशंकर के द्वारा ही इनका पालन-पोषण किया जाने लगा, किन्तु दुर्भाग्यवश उसका भी अठारह वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। इसके कुछ समय बाद अभिन्न मित्र, सहायक, पथ-प्रदर्शक और शुभचिन्तक भारतेन्दु हरिशचन्द्र दिवङ्गत हो गये। इन सम्पूर्ण विपत्तियों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्षरत रहते हुए भी उनका अध् ययन, अध्यापन तथा लेखन-कार्य सतत चलता रहा। इन्होंने सन् 1880 में गवर्नमेन्ट संस्कृत कॉलेज से साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद मधुवनी (दरभंगा) संस्कृत पाठशाला में, तत्पश्चात् 1886' में मुजफ्फरपुर संस्कृत विद्यालय में, 1887में भागलपुर जिला स्कूल में तथा 1896 में छपरा जिला स्कूल में कार्य करते हुए जीवन के अन्तिम काल में सन् 1899 में पटना कालेज में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए, किन्तु उदर रोग से ग्रस्त होने के कारण 19 नवम्बर, सन् 1900 को ये स्वर्ग सिधार गये।

इस तरह बयालीस वर्ष की अल्पायु में ही इन्होंने गुणात्मक और संख्यात्मक दोनों दृष्टियों से प्रचुर साहित्य गद्य, पद्य, अनुवाद आदि विविध विधाओं और काव्यशास्त्र, दर्शनशास्त्र, खेलकूद, कौतुक आदि विषयों में लिखकर सरस्वती की समाराधना की। ज्योतिष, संगीत, वैद्यक, गणित, रेखागणित, इतिहास, साङ्गवेद, पुराण, सांख्य, तर्क, दर्शन, रत्नविज्ञान आदि के विस्तृत अध्ययन तथा संस्कृत, हिन्दी, बंगला और अंग्रेजी आदि भाषाओं के ज्ञान ने इन्हें बहुत विद्वत्ता प्रदान की, जो इनकी रचनाओं में स्पष्टतः परिलक्षित होती है।

व्यासजी की लगभग 80 रचनाओं में 'शिवराजविजय' (उपन्यास), 'सामवतम्' (नाटक), 'गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम्', 'अबोधनिवारण' तथा 'बिहारी विहार' (हिन्दी काव्य) प्रमुख हैं। 22 वर्ष की अवस्था में लिखा गया व्यासजी का 'सामवतम्' नाटक भाषा, भाव और वर्ण्य की दृष्टि से काफी प्रशस्य है। उसके विषय में डॉ0 भगवानदास का कथन है कि "श्री अम्बिकादत्त व्यासजी का रचा 'सामवतम्' नामक नाटक दो बार पढ़ा। 'पुराणमित्येव हि साधु सर्वम्' ऐसा मानने वाले सज्जन प्रायः मेरे मत पर हंसेंगे, तो भी मेरा मत यही है कि कालिदास रचित 'शाकुन्तल' से किसी बात में कम नहीं है।"

व्यासजी की कीर्ति-वैजयन्ती को गगनचुम्बी बनाने वाला आधुनिक प्रवाहमयी शैली में लिखित ऐतिहासिक उपन्यास 'शिवराजविजय' सर्वश्रेष्ठ कृति है। संस्कृत गद्य-साहित्य में 'शिवराजविजय' का प्रमुख स्थान है। बाण, दण्डी और सुबन्धु के बाद व्यास जी का ही नाम आता है। यद्यपि अन्य बहुत से गद्यकार हुए हैं किन्तु साहित्यिक उत्कृष्टता, बौद्धिक प्रतिभा और सामाजिक आकलनों के वैशिष्ट्य के कारण व्यास जी का स्थान प्रमुख गद्यकारों में आदरपूर्वक गिना जाता है और इन्हें 'अभिनव बाण' कहा जाता है।

शिवराजविजय - यह एक ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसकी कथा इतिहास

प्रसिद्ध है, किन्तु व्यासजी ने अपनी प्रतिभा और कल्पना के द्वारा इसे उच्च कोटि की साहित्यिकता प्रदान की है। यह उपन्यास व्यासजी की प्रतिभा का चूडान्त निदर्शन है। सतत पराधीनता एवं दासता के उस युग में व्यासजी ने संस्कृत साहित्य में उपन्यास नामक नई विधा में लिखकर भावी पीढ़ी के लेखकों के सामने उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में अपनी कृति प्रस्तुत की है। नूतन प्रयोग के साथ-साथ ऐतिहासिक उपन्यास जैसी जटिल और लोकप्रिय विधा के रूप में शिवाजी का चरित्र प्रस्तुत कर व्यासजी ने गद्य-साहित्यकारों में उच्च स्थान प्राप्त किया है। 'शिवराजविजय' में कथावस्तु की संघटना प्राच्य तथा पाश्चात्य शिल्प के समन्वय से की गई है। यद्यपि इसमें कथानक की दो स्वतन्त्र धाराएँ समानान्तर रूप से प्रवाहित होती हैं- एक के नायक शिवाजी हैं तो दूसरी के नायक रघुवीरसिंह, ऐसा होते हुए भी वे दोनों एक-दूसरे की पूरक हैं। एक का महत्त्व दूसरे से उ‌द्भासित होता है। अतः दोनों धाराएँ अन्योन्याश्रित हैं। कथा में इतना प्रवाह तथा सम्प्रेषणीयता है कि पाठक की आकांक्षा उत्तरोत्तर वृद्धिगत होती जाती है। इसमें महाराष्ट्र के परमवीर तथा महान् देशभक्त शिवाजी की मुगल शासकों पर सतत विजय का वर्णन है। इसका समग्र कथानक तीन विरामों में विभक्त है, जिसमें प्रत्येक विराम में चार निश्वास हैं।

'शिवराजविजय' में इतिहास और कल्पना, आदर्श और यथार्थ तथा अनुभव एवं कल्पना का सुन्दर समन्वय है। इसके सभी पात्र अपने चरित्र निर्वाह में पूरी तरह खरे उतरते हैं। शिवाजी तथा उनके सभी साथी वीर, सच्चरित्र, देश- प्रेमी एवं धर्मप्रेमी हैं। अन्य अफजल खां, शाइस्तखां आदि पात्र भी अपनी स्वाभाविकता और यथार्थता का निर्वाह करते हैं। उसमें न कहीं अतिशयता है और न कहीं न्यूनता अथवा अस्पष्टता।

व्यासजी का 'शिवराजविजय' वीररस प्रधान उपन्यास है तथा शृङ्गार आदि अन्य रसों की सृष्टि भी अंग रूप में यथास्थान हुई है। यह उपन्यास अलंकारों के अनावश्यक भार से बोझिल नहीं है, केवल अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि स्वाभाविक रूप से आने वाले अलंकारों से ही अलंकृत है। इसकी शैली अत्यन्त सरल, सरस, परिष्कृत तथा प्रवाहमयी है। भाषा की सरलता और भाव की उत्कृष्टता का समन्वय ही कवि की प्रमुख विशेषता है। यह हृदयग्राही तथा भावों से ओत-प्रोत है। भाषा तथा भाव दोनों ही दृष्टि से 'शिवराः। विजय' एक उत्तम कोटि का गद्य-काव्य कहा जा सकता है। इसमें प्रतिभा की प्रौढ़ता, कल्पना की सूक्ष्मता, अनुभव की गहनता, अभिव्यक्ति की स्पष्टता, भावों की यथार्थता और रमणीयता, पदावलियों की मधुरता, कथानक की प्रवाहमयता, आदर्श की स्थापना, शिव की भावना और सुन्दर की कामना निहित है। उपन्यास की दृष्टि से भी कथानक, पात्र, घटना आदि सभी तत्त्वों से यह परिपूर्ण है तथा 'गद्य कवीनी निकर्ष वदन्ति' की कसौटी पर खरा उतरता है। इस प्रकार 'शिवराज विजय' व्यासजी की नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा का अद्भुत चमत्कार है।

'शिवराजविजय' का काव्य-शिल्प :

भाषा-शैली- मनोगत भावों को सहृदय संवेद्य बनाने का प्रमुख साधन भाषा को हो माना जाता है तथा भाषा की क्रमबद्धता या रचना-विधान को ही शैली भी कहा जाता है। अतः भावों को मूर्त रूप प्रदान करने का प्रमुख व सहज साधन 'शैली' है। अर्थ यदि काव्य की आत्मा है तो शब्द या शैली काव्य का शरीर। काव्य की ग्राहकता व मनोभावों की मनोहरता, स्थिरता तथा सूक्ष्मता शैली पर ही निर्भर है। दण्डी ने अपने काव्यादर्श में कहा है कि "अस्त्यनेको गिरां मार्गः सूक्ष्मभेदपरस्परम्" अर्थात् वाणी के सूक्ष्म भेद होने से उसके कई मार्ग (शैली) हैं। डा0 श्यामसुन्दर दास के मतानुसार किसी कवि अथवा लेखक की शब्द-योजना, वाक्यांशों का प्रयोग, उसकी बनावट और ध्वनि आदि का नाम शैली है।

ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के आधार पर आजकल विद्वानों ने मार्ग (शैली) को चार प्रकार का माना है। किन्तु इसके बाद इन्हें शैली न कहकर रीतियाँ कहा जाने लगा है। विभिन्न काव्य-लक्षणकारों ने प्रमुखतया चार रीतियों का वर्णन किया है-

(1) वैदर्भी, (2) गौडी, (3) पाञ्चाली एवं (4) लाटी।

(1) कोमल वर्षों और असमासा अथवा अल्पसमासा, माधुर्यपूर्ण रचना वैदर्भी रीति है।

(2) महाप्राण-घोषवर्णा, ओजगुण सम्पन्ना तथा समास-बहुला रचना गौडी रीति है।

(3) वैदर्भी और गौडी रीतियों का सम्मिश्रण ही पाञ्चाली रीति है।

(4) वैदर्भी और पाञ्चाली के सम्मिश्रण को लाटी रीति कहते हैं।

'शिवराजविजय' की भाषा सरल, स्पष्ट, सुबोध तथा भावानुकूल है। वर्ण्यविषयों के अनुकूल शब्द-योजना इसकी प्रमुख विशेषता है। व्यासजी ने उचित शब्दावलियों का प्रयोग, अर्थपूर्ण वाक्य-विन्यास तथा अवसर के अनुकूल कोमल तथा कठोर वर्षों का सुन्दरता से प्रयोग किया है।

'शिवराजविजय' में अवसरानुकूल दीर्घ तथा लघु समासयुक्त पदावलियों का प्रयोग किया गया है। इसमें व्यासजी ने पाञ्चाली रीति का आश्रय लिया है।

उदाहरणार्थ दीर्घसमासयुक्त पदावली यथा -

"इतस्तु स्वतन्त्रयवनकुल-भुज्यमान-विजयपुराधीश-प्रेषितः पुण्यनगरस्य समीपे एव प्रक्षालित-गण्डशैल-मण्डलायाः निर्झरवारिधारापूरपूरितप्रबलप्रवाहायाः, पश्चिमपारावारप्रान्तंप्रसूतगिरिग्रामगुहागर्भनिर्गतायाः -इत्यादि।

लघुसमासयुक्त पदावली भी भावपूर्ण और मार्मिक है। उसमें अभिव्यक्ति की स्पष्टता और सूक्ष्मता दृष्टिगोचर होती है। जैसे- "एष भगवान् मणिराकाशमण्डलस्य, चक्रवर्ती खेचरचक्रस्य, कुण्डलमाखलदिशः, दीपको ब्रह्माण्डभागस्य, प्रेयान् पुण्डरीकपटलस्य, शोकविमोकः कोकलोकस्य" इत्यादि।

कहीं-कहीं समास रहित सुन्दर पदावलियों का प्रयोग भी अत्यन्त हृद्य है-"बटुरसौ आकृत्या सुन्दरः, वर्णेन गौरः, जटाभिर्ब्रह्मचारी, वयसा षोडशवर्षवर्षीयः। "

भावानुकूल भाषा का प्रयोग करने में भी व्यासजी सिद्धहस्त हैं। जिस प्रकार के कोमल अथवा कठोर भावों की अभिव्यक्ति करनी होती है, उसके अनुकूल ही भाषा का संयोजन करते हैं। प्रकृति-चित्रण में शान्त, स्निग्ध तथा नीरव-निशा का वर्णन जैसे -

"धीरसमीरस्पर्शन मन्दमन्दमान्दोल्यमानासु व्रततिषु, समुदिते यामिनी- कामिनीचन्दनविन्दौ इव इन्दौ, कौमुदीकपटेन सुधाधारामिव वर्षति गगने-इत्यादि। भावों की सरल एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त भाषा-कौशल भी दर्शनीय है-

"क्वचिद् हरिद्रा हरिद्रा, लशुने लशुनम्, मरिचं मरिचम्, चुक्रं चुक्रम्, वितुन्नकं वितुन्नकम् श्रृंगवेरं श्रृगवेरम्, रामठ रामठम्, मत्स्यण्डी मत्स्यण्डी--इत्यादि।

इस प्रकार 'शिवराजविजय' के विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसमें भाषा व शैली का प्रयोग भावानुसार ही किया गया है। भावात्मक शैली का सुन्दर एवं समुचित प्रयोग इस काव्य के शिल्प-सौन्दर्य को प्रकट करता है। 'शिवराजविजय' में नवीनतम शब्दों का भी प्रयोग हुआ है, इन्होंने माघ की कमी को भी अपने वाग्वैभव से पूर्णता प्रदान की है। यत्र-तत्र व्याकरणिक शब्दों का भी प्रयोग उनकी विद्वत्ता की ओर संकेत करता है। सन्नन्त, यङ्लुङन्त शब्दों का भी प्रयोग प्राप्त होता है। हिन्दी व उर्दू की कहावतों का तथा मुहावरों का संस्कृत रूपान्तर भी उनकी भाषा को सहज, आकर्षक, सजीव व प्रभावशाली बनाता है। अतः व्यासजी की भाषा-शैली उनके काव्य को उत्कृष्टता प्रदान करने में पूर्णतः सक्षम है।

अलंकार सौन्दर्य काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्वों को अलंकार कहते हैं। जिस प्रकार आभूषणों से नारी का सौन्दर्य बढ़ जाता है उसी प्रकार उपमादि अलंकारों के प्रयोग से काव्य का चमत्कार एवं हृदय-संवेद्यता बढ़ जाती है। अलंकारों से रहित रमणी व काव्य दोनों ही चित्ताकर्षक नहीं हो पाते हैं। अलंकारों की महत्ता को देखकर ही कुछ आलंकारिकों ने अलंकार को काव्य की आत्मा का धर्म माना है। अतः निःसन्देह काव्य में अलंकारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनके बिना काव्य पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाता है।

पे0 अम्बिकादत्त व्यास ने भी अपनी प्रौढ़ प्रतिभा के द्वारा इस कृति को एक रमणी की भाँति अलंकारों से सुसज्जित किया है। यह रचना बाण के समान अलंङ्कार के भार से बोझिल नहीं है, अपितु 'विरलालङ्कार विभूषिता लावण्यमयी तन्वंगी' के समान है। उन्होंने शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों का सावसर प्रयोग किया है। शब्दालंकार अनुप्रास का प्रयोग तो सर्वत्र साग्रह किया गया है। यह उनका प्रिय अलंकार है। इन्होंने कठोर से कठोर और मधुर से मधुर भाव की अभिव्यक्ति अनुप्रासमयी शब्द रचना से की है। जैसे-

(1) सामान्य वर्णन में अनुप्रास- "यत्र प्रान्तप्ररूढां प‌द्मावलीं परिमर्दयन्ती पद्मव द्रवीभूता पयः पूरः प्रवाहपरम्पराभिः पद्मा प्रवहति।"

(2) कठोर भावाभिव्यक्ति में "अस्ति कश्चन धैर्यधारिधुरन्धरैः

धर्मोद्धारधौरेयेः, सोत्साहसाहसर्चचच्चन्द्रहासैः सुशक्तिसुशक्तिभिः, सद्यश्छिन्नपरिपन्थिगलगलच्छोणित:--"1

(3) कोमल भावाभिव्यक्ति में "मधुवि धुरयत्, मरन्दं मन्दयत्,

कलकाकली कलनपूजितं कोकिलकुलकूजितम्--।

कहीं-कहीं यमक अलंकार का भी प्रयोग किया गया है- कालः।" "विलक्षणोऽयं भगवान् सकलकलाकलापकलनः सकलकालनः करालः

अर्थालंकारों में उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, दीपक, स्वभावोक्ति, विरोधाभास तथा अप्रस्तुतप्रशंसा का प्रमुखतया से प्रयोग किया गया है। उपमा और उत्प्रेक्षा की माला प्रस्तुत करने में पं0 व्यास सिद्धहस्त हैं। मालोत्प्रेक्षा का चमत्कार यथा-

"गगनसागरमीने इव, मनोमनोज्ञहंसे इव, विरहिनिकृन्तने रौप्यकुन्तप्रान्ते इव, पुण्डरीकाक्षपलीकरपुण्डरीकपत्रे इव, शारदाभ्रसारे इव, सप्तसप्तिसप्तिपादच्युते राजतखुरत्रे इव, मनोहरतामहिलाललाटे इव, कन्दर्पकीर्तिलताङ्कुरे इव---" इत्यादि है-

इसी प्रकार उपमा अलंकार का सौन्दर्य भी 'शिवराजविजय' में दर्शनीय "सेये वर्णन सुवर्ण, कलरवेण पुस्कोकिलान्, केशै रोलम्बकदम्बान्, ललाटेन कलाधरकलो लोचनाभ्यां खञ्जनान्, अधरेण बन्धुजीवं, हासेन ज्योत्स्नाम्"

विरोधाभास कवि का प्रिय अलङ्कार है। इसके प्रयोग में उन पर बाण का प्रभाव दिखलाई देता है। शिवाजी के वर्णन में विरोधाभास का सौन्दर्य द्रष्टव्य है "खर्वामप्यखर्वपरिक्रमाम्, श्याममपि यशः समूहश्वेतीकृतत्रिभुवनाम्, कुशासना श्रयामपि सुशासनाश्रयाम्, पठनपाठनादिपरिश्रमानभिज्ञामपि नीति -निष्णाताम्----।

इसी प्रकार चित्तौड़गढ़ की अङ्गनाओं के वैशिष्ट्य वर्णन में श्लेषयुक्त विरोधाभास का प्रयोग अत्यन्त सुन्दरता से किया गया है-

"क्षत्रियकुलाङ्गनाः कमला इव कमलाः, शारदा इव विशारदा, अनसूया इवानुसूयाः, यशोदा इव यशोदाः, सत्या इव सत्याः, रुक्मिण्य इव रुक्मिण्यः, सुवर्णा इव सुवर्णाः, सत्य इव सत्य:----।"

इसी तरह अन्य अलंकारों का भी चमत्कार यथा-स्थान देखा जा सकता है। डा0 भगवानदास ने 'शिवराजविजय' की तुलना कादम्बरी से करते हुए कहा है कि- "जहाँ 'वासवदत्ता' और 'कादम्बरी' के शब्दों की अरण्यानी में बेचारा अर्थ-पथिक सर्वथा भूल-भटक कर खो जाता है, उसका पता ही नहीं लगता, वहाँ 'शिवराजविजय' के सुललित उद्यान में उसकी सहज अलंकृत शैली में पाठक का मन खूब रमता है। कादम्बरी के शब्दों की विकट अरण्यानी की तरह 'शिवराजविजय' के शब्द - संसार

को देखकर उसका मन घबरा नहीं उठता, अपितु उसमें प्रविष्ट होकर उसके आनन्द को लेने के लिए उत्सुकता से जाग उठता है।"

संक्षेप में हम यही कह सकते हैं कि पं0 अम्बिकादत्त ने अलंङ्कारों का प्रयोग अपन काव्य को सजाने के लिए ही किया है, जो पाठकों के हृदयों को सहसैव आकर्षित कर लेता है।

रस-योजना - रस को काव्य की आत्मा माना गया है। रस के बिना काव्य निष्प्राण है, उसका कोई महत्त्व नहीं, यहाँ तक कि रस-विहीन रचना को काव्य की संज्ञा भी नहीं दी जाती है। इसीलिए विश्वनाथ का कथन है "वाक्यं रसात्मकं काव्यम् ।" काव्य का प्रधान रस वीर अथवा शृङ्गार होता है, अन्य रसों का प्रयोग अङ्गरूप में किया जाता है।

'शिवराजविजय' में प्रधान रस 'वीर' है। अन्य रसों का प्रयोग यथा-स्थान अङ्ग रूप में किया गया है। मुख्यतः वीररस का आस्वादन चित्ताकर्षक है। शिवाजी के शौर्य वर्णन में वीररस की अनुभूति स्पष्टतया होती है। गौरसिंह अफजल खां से कहता है-

" को नामापरः शिववीरात् ? स एव राजनीतौ निष्णातः, स एव सैन्धवारोहविद्यासिन्धुः, स एव चन्द्रहासचालने चतुरः, स एव मल्लविद्यामर्मज्ञ, स एवं बाणविद्या वारिधिः, स एव वीरवारवरः पुरुषपौरपपरीक्षकः" इत्यादि।

इसके अतिरिक्त अन्य स्थलों पर भी वीर रस का चमत्कार द्रष्टव्य है- "आगत एष शिववीर इति भ्रमेणापि सम्भाव्य अस्य विरोधिषु केचन मूर्च्छिताः निपतन्ति, अन्ये विस्मृतशास्त्रास्त्राः पलायन्ते, इतरे महात्रासाकुञ्चितोदरा विशिधिलवाससो नग्ना भवन्ति इत्यादि ।

शिवराजविंजय में कहीं-कहीं अवसरानुकूल शृङ्गार रस का भी चित्रण दिखाई देता है। व्यासजी ने शृङ्गार का वर्णन अत्यन्त शिष्ट और सात्त्विक रूप में किया है, उसमें मादकता अथवा उन्माद या उच्छृङ्खलता बिल्कुल भी नहीं दिखलाई देती है-

"सा चावलोक्य तमेव पूर्वावलोकिते युवानम् ताताज्ञया बलादिव प्रेरिता ग्रीवां नमयन्ती आत्मनाऽऽत्मन्येव निविशमाना स्वपादाग्रमेवालोकयन्ती---।"

पुनश्च सा अञ्चलकोण कटिकच्छप्रान्ते आयोज्य, हस्ताभ्यां मालिकां विस्तार्य नतकन्धरस्य रघुवीरसिंहस्य ग्रीवायर्या चिक्षेप इषत्कम्पितगात्रयष्टिश्च शनैर्यथा निववृत्ते। "

यत्र-तत्र करुण रस का भी हृदयग्राही चित्रण किया गया है -"माता च तव ततोऽपि पूर्वमेव कथवशेषा संवृत्ता, यमलौ भ्रातरौ च तव द्वादशवर्षदेशीयावेव आखेट व्यसनिनौ महार्हभूषणभूषितौ तुरगावरुह्य वनं गतौ दस्युभिरपहृतौ इति न श्रूयते तयोर्वार्ताऽपि, त्वं तु मम यजमानस्य पुत्रीति स्वपुत्रीव मयैव सह नीता वर्द्धयसे च।"

शिवराजविजय में वात्सल्य रस का भी चित्रण कुछ स्थानों पर किया गया है, जो अतीव हृदयग्राही है। गौरसिंह तथा श्यामसिंह डाकुओं द्वारा अपहृत अपनी बहिन के विषय में सोचते हैं-

"हन्त! हत भाग्या सा बालिका, या अस्मिन्नेव वयसि पितृभ्यां परित्यक्ता,

अवयवोरपि अदर्शनेन क्रन्दनैः कण्ठं कदर्थयति। "

इसके अतिरिक्त देवशर्मा व सौवर्णी आदि ब्रह्मचारि गुरु व रामसिंह के मिलन में वात्सल्य रस का चित्रण हुआ है। इसी तरह हास्य आदि रसों का भी अवसरानुकूल सुन्दर चित्रण किया गया है। रस योजना की दृष्टि से व्यासजी सिद्धहस्त लेखक प्रतीत होते हैं, मुख्यत वीर रस का वर्णन तो अत्युत्तम किया है।

काव्य-अभिव्यञ्जनाः

वस्तु एवं प्रकृति चित्रण काव्य में शिल्प-सौन्दर्य की अपेक्षा चित्ताकर्षक भावों को अभिव्यञ्जना ही अभिव्यञ्जना का विशेष महत्त्व होता है। काव्य के वैशिष्ट्य को प्रकट करता है तथा वही सफल काव्य भी माना जाता है। कवि की प्रतिभा भी काव्य में प्रयुक्त वस्तु, भाव अथवा दृश्यों के द्वारा ही प्रकट होती है, वह जितनी कुशलता से इनका वर्णन करता है वह काव्य उतना ही लोकप्रिय व विद्वत्ता को व्यक्त करने वाला होता है। दृश्यों अथवा भावों एवं वस्तु-घटना का याथातथ्येन वर्णन करने में व्यासजी अत्यन्त प्रतिभावान हैं। उन्होंने 'शिवराजविजय' में जो भावाभिव्यक्ति, वस्तु-संघटना एवं प्रकृति-चित्रण किया है उससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा का पता चलता है। प्रकृति चित्रण प्रायः सभी काव्यों में पाया जाता है, किन्तु यथार्थ रूप से प्रकृति के कोमल स्वरूप का इसमें चित्रण किया गया है।

प्रकृति के मनोरम दृश्यों के चित्रण में सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्रोदय, चन्द्रास्त तथा रात्रि आदि का वर्णन इसमें कवि की कुशल बुद्धि का परिचायक है। अस्ताचल की ओर जाते हुए सूर्य का वर्णन इस दृष्टि से द्रष्टव्य है-

"जगतः प्रभाजालमाकृष्य, कमलानि समुद्रम, कोकान् सशोकीकृत्य, सकलचराचरचक्षुः सञ्चारशक्तिं शिथिलीकृत्य, कुण्डलेनेव निजमण्डलेन पश्चिमाशां भूषयन् वारुणीसेवनेनेव माब्जिष्ठमाञ्जिमरञ्जितः अनवरत।"

आश्रम की रमणीयता को चित्रित करते हुए लेखक कहता है कि- "कदलीदलकुञ्जायितस्य एतत्कुटीरस्य समन्तात् पुष्पवाटिका, पूर्वतः परमपवित्रपानीयं परस्सहस्रपुण्डरीकपटलपरिलसितं पतत्रिकूलंकूजितपूजितं पयः-पूरपूरितं सर आसीत्, दक्षिणतश्चैको निर्झरझर्झरध्वनिध्वनितदिगन्तरः" इत्यादि।

रात्रि की नीरवता का स्वाभाविक वर्णन करते हुए तथा नीरव निशा का यथार्थ चित्रण करते हुए व्यासजी कहते हैं कि-

"धीरसमीरस्पर्शन मन्दमन्दमान्दोल्पमानासु व्रततिषु, समुदिते यामिनी -कामिनीचन्दनविन्दौ इव इन्दौ, कौमुदीकपटेन सुधाधारामिव वर्षति गगने-1"

प्रकृति के भयानक रूप के चित्रण में झञ्झावात का व्यासजी ने इतनी कुशलता से चित्रण किया है कि उससे आंधी की वास्तविकता नेत्रों के सामने प्रकट हो जाती है। जैसे-

"तावदकस्मादुत्थितो महान् झञ्झावातः, एकः सायं समयप्रयुक्तः स्वभाववृत्तोऽन्धकारः, स च द्विगुणितो मेघमालाभिः झञ्झावातोद्धृतैः रेणुभिः शीर्णपत्रैः कुसुमपरागैः शुष्कपुष्पैश्च पुनरेष द्वैगुण्यं प्राप्तःपरितः सहडहडाशब्दं दोधूयमानानां परस्सहस्रवृक्षाणां, वाताघातसंजातपाषाणपातानां प्रपातानाम्, महान्धतमसेन ग्रस्यमान इव सत्वानां क्रन्दनस्य च भयानकेन स्वनेन कवलीकृतमिव गगनतलम्। "

इसके अतिरिक्त वस्तु-वर्णन में भी व्यासजी की प्रतिभा प्रकट होती है। किसी भी स्थान का वर्णन इस प्रकार से किया है कि वह दृश्य नेत्रों के सम्मुख उपस्थित हो जाता है तथा पाठक यह अनुभव करने लगता है कि वह उसी स्थान पर खड़ा होकर साक्षात् देख रहा है। जैसे कि पूर्वी बङ्गाल का दृश्य दर्शाते हुए कवि कहता है कि-

"पूर्वबङ्गमपि सम्यगवालुलोकदेष जनः। यत्र प्रान्तप्ररूढां पझावलीं परिमर्दयन्ती पद्मव द्रवीभूता पयः पूरप्रवाहपरम्पराभिः प‌द्मा प्रवहति। यत्र ब्रह्मपुत्र इव शत्रुसेनानाशनकुशलो ब्रह्मदेशं विभजन् ब्रह्मपुत्रो नाम नदो भूभागं क्षालयति।"

सुन्दर व मनोहर सरोवर के तट पर बैठे हुए विधिपूर्वक पूजन करने वाले ऋषिजनों का अत्यन्त हृदयस्पर्शी चित्रण करते हुए व्यासजी ने लिखा है कि- "तत्र वरटाभिरमुगम्यमानानी राजहंसानी पक्षतिकण्डूतिकषणचञ्चल -चञ्चुपुटानी मल्लिकाक्षाणर्णा, लक्ष्मणाकण्ठस्पर्शहर्षवर्षप्रफुल्लाङ्गरुहार्णा सारसार्ता, भ्रम‌द्धमरझङ्कारभारविद्रावितनिद्राणौ कारण्डवानी च।"

इस प्रकार 'शिवराजविजय' में पे0 अम्बिकादत्त ने जिस भी वस्तु अथवा दृश्य का चित्रण किया है वह यथार्थ, रमणीय तथा हृदयहारी है। उस प्रत्येक चित्रित दृश्य या वस्तु के चित्रण को पढ़कर मन-मुग्ध हो जाता है तथा वह वस्तु नेत्रों के सामने साक्षात् उपस्थित-सी हो जाती है। प्रकृति-चित्रण तथा वस्तु-चित्रण दोनों में ही उनकी प्रौढ़ प्रतिभा व निपुणता के दर्शन होते हैं

सामाजिक-चित्रण 'साहित्य समाज का दर्पण होता है' इस कथन की कसौटी पर 'शिवंराजविजय' उपन्यास खरा उतरता है। इससे पूर्ववर्ती गद्य रचनाएँ या तो चरित्र प्रधान हैं अथवा दृश्य प्रधान। समाज का चित्रण उनमें बहुत कम मात्रा में प्राप्त है। यही एकमात्र ऐसा उपन्यास है जिसमें तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों और चरित्रों को कुशलतापूर्वक चित्रित किया गया है।

'शिवराजविजय' में मुगलकालीन समाज का यथार्थ व सुन्दर चित्रण किया गया है। तत्कालीन राजा अकर्मण्य, विलासी तथा विद्वेषी थे। मुगलशासक हिन्दुओं पर अत्याचार करते थे, सभी हिन्दू उनसे भयभीत थे। उनका धर्मपरिवर्तन करके अथवा भयभीत करके उन्हें मुसलमान बनाया जा रहा था। मुगलों का साम्राज्य धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। सम्पूर्ण भारत में मुसलमानों के द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार किये जा रहे थे। कन्याओं का अपहरण, मन्दिरों तथा मूर्तियों का विध्वंस, पवित्र धर्मग्रन्थों का विनाश, धनिकों के धन का अपहरण आदि प्रपीड़न बढ़ता ही जा रहा था। ऐसा करना मुसलमान अपना कर्त्तव्य मानते थे। इन अत्याचारों का सामना ' करने से हिन्दू राजा दूर भागने लगे थे तथा मुगल शासकों की दासता को अंगीकार करके उनकी चापलूसी करते थे, ऐसे गुलाम हिन्दू राजा उनकी कृपा पर जीवित थे।

इस प्रकार से पीड़ित एवं मुगलों से आक्रान्त भारत की विषम परिस्थिति में महाराष्ट्र के शासक वीर शिवाजी ने अपने देश-प्रेम, शौर्य, पराक्रम तथा सदाचरण के द्वारा हिन्दू जनता तथा हिन्दुत्व की रक्षा एवं समाप्ति की ओर जा रहे हिन्दुओं के शौर्य को पुनः जागृत किया। शिवाजी ने हिन्दु जनता के अन्दर देशभक्ति, राष्ट्रभक्ति, आत्मविश्वास, स्वाभिमान, स्वधर्मानुराग एवं मातृभूमि की सेवा-भाव का सञ्चार किया।

लिखा है-उपन्यासकार ने हिन्दुओं पर मुगलों के अत्याचारों का वर्णण करते हुए

"क्वचिद् दारा अपहियते, क्वचिद् धनानि लुण्ठ्यन्ते, क्वचिदार्तनादाः, क्वचिद्ररुधिरधाराः, क्वचिदग्निदाहः, क्वचिद्‌गृहनिपातः श्रूयते अवलोक्यते च परितः। "

उस समय मुसलमान शासक इतने मदान्वित और विलासी प्रवृत्ति के हो चुके थे कि अफजल खां भी वीर शिवाजी जैसे शक्ति सम्पन्न व परम योद्धा राजा को पराजित करने की प्रतिज्ञा करके आने पर भी हमेशा भोग विलास और नशे में चूर रहता था। उसकी इस विलासिता का वर्णन इस शब्दावलि में किया गया है-"सप्रौढिविजयपुराधीशमहासभायां प्रतिज्ञाय समायातोऽपि शिवप्रतापञ्च विदन्नपि अद्य नृत्यम्, अद्य गानम्, अद्य लास्यम्, अद्य मद्यम् इति स्वच्छन्दैरुच्छ ङ्खलाचरणैर्दिनानि गमयति। "

इसी दुष्प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप अफजल खो गर्वपूर्वक गायक (गौरसिंह) के समक्ष ही अपनी गुप्त योजना (शिवाजी को धोखे से पकड़ने) की घोषणा स्पष्ट रूप से कर देता है, जिसका पता शिवाजी को चल जाता है और वे उसे सन्धि के बहाने बुलाकर मार डालते हैं। इसी तरह तात्कालीन मुगलशासकों में भी उसी वृत्ति का संचार हो रहा था जिसके कारण हिन्दू राजाओं की पराजय हुई थी। उस समय हिन्दू राजाओं में परस्पर द्वेष, ईर्ष्या, वैर आदि भाव बढ़े हुए थे तथा भोग-विलासों में लिप्त होकर अपनी सम्पत्तियों को नष्ट कर चुके थे। मिथ्या प्रशंसा करने वाले चाटुकारों को ही अपना हितैषी समझते थे, सभी स्वार्थी हो गये थे। भारत के हिन्दू राजाओं की इस प्रकार की दुर्दशा का यथार्थ चित्रण किया गया है- "शनैः शनैः पारस्परिक विरोध-विशिथिलीकृत-स्नेहबन्धनेषु राजसु भामिनी -भूभङ्ग-भूरिभाव-प्रभाव-पराभूतवैभवेषु भटेषु, स्वार्थचिन्तासन्तानवितानैकतानेषु अमात्यवर्गेषु प्रशंसामात्रप्रियेषु प्रभुषु। "

तत्कालीन समाज में जब अधिकांश हिन्दू राजा मुगलों के आधीन हो चुके थे, उस समय महाराष्ट्र केसरी क्षत्रपति वीर शिवाजी उनके अपवादस्वरूप थे, वे किसी भी प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों में लिप्त नहीं थे अपितु एक सच्चे देशभक्त, शौर्य-सम्पन्न, पराक्रमी, राजनीति में निपुण एवं कुशल प्रशासक थे। उन्होंने अपनी व्यूहरचना, ओजस्विता एवं धीरता के बल पर मुगलों को पराजित करते हुए उन पर विजय प्राप्त की। उनकी गुप्तचर प्रणाली अत्यन्त सुदृढ़ थी। 'शिवराजविजय' में उनके गुप्तचर गौरसिंह द्वारा अपनी गुप्तचरीय व्यूहरचना का चित्रण करते हुए कहा गया है-

"भगवन्! सर्व सुसिद्धम्, प्रतिगव्यूत्यन्तरालमङ्गीकृतसनातन -धर्मरक्षामहाव्रतानां धारितमुनिवेषाणां वीरवराणामाश्रमाः सन्ति। प्रत्याश्रमञ्च वलीकेषु गोपयित्वा स्थापिताः परश्शताः खड्‌गाः, पटलेषु तिरोभाविता शक्तयः कुशपुञ्जान्तः---।"

उपन्यासकार ने शिवाजी के सुदृढ़ राजनीति-कौशल का चित्रण करते हुए बताया है कि वे श्रेष्ठ गुप्तचरों के द्वारा मुगलशासकों के षड्यन्त्रों का पूर्णतया पता लगा लेते थे। इसका प्रमुख कारण था कि शिवाजी के गुप्तचर स्वामिभक्त, देशभक्त तथा कर्त्तव्यनिष्ठ थे। वे किसी भी प्रलोभन अथवा भय के आगे नहीं झुकते थे। शिवाजी भी सदैव योग्य और विश्वस्त व्यक्ति को गुप्तचर के रूप में नियुक्त करते थे। गुप्तचर की निपुणता, कार्यक्षमता, विश्वसनीयता और गम्भीरता आदि गुणों की परीक्षा लेने के बाद ही तत्कालीन राजा उन्हें गुप्त रहस्यों को बताते थे तथा गुप्त सन्देश के कार्य में नियुक्त करते थे। राजा की सफलता अथवा असफलता उसकी गुप्तचर प्रणाली पर ही निर्भर रहती है। व्यासजी ने अपनी कृति में वर्णन किया है कि तोरण दुर्ग का अध्यक्ष शिवाजी के गुप्तचर की परीक्षा लेकर ही उसे रहस्य की बात बताने को तत्पर होता है-

"नैतेषु विषयेषु कदापि सतन्द्रोऽवतिष्ठते महाराजः, स सदा योग्यमेव जर्न पदेषु नियुनक्ति, नूने बालोऽप्येषोऽबालहृदयोऽस्ति, तदस्मै कथयिष्याम्याखिलं वृत्तान्तम्----।"

इसी प्रकार शिवाजी के गुप्तचरों द्वारा भी पूर्ण कर्त्तव्यनिष्ठा से अपने कार्य का निर्वहन किया जाता था, उनकी स्वामिभक्ति, निर्लोभता, निर्भयता आदि से सम्पन्न गुप्तचर के आचरण का जो चित्रण किया गया है, वह द्रष्टव्य है-

"सन्यासिन् ! सन्यासिन् !! बहूक्तम्, विरम न वयं दौवारिक ब्रह्मणोप्याज्ञां प्रतीक्षामहे। किन्तु यो वैदिकधर्मरक्षाव्रतीतस्यैव महाराज शिववीरस्याज्ञां वयं शिरसावहामः।"

व्यासजी ने शिवाजी के शौर्य, देश-प्रेम, स्वाभिमान का भी सुन्दर चित्रण किया है। उनके हृदय में मुगल शासकों से प्रतिशोध लेने की प्रबल भावना थी-

"ये अस्मादिष्टदेवमूर्ती भङ्क्त्वा मन्दिराणि समुन्मूल्य यदि चाहमाहवे । म्रियेय, बध्येय, ताडयेय वा तदैव धन्योऽहम् धन्यो च मम पितरौ।"

इस तरह 'शिवराजविजय' उपन्यास में तत्कालीन भारत की सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों का सम्यक् चित्रण किया गया है।

धार्मिक चित्रण व्यासजी धर्मपरायण व्यक्ति थे तथा उनके काव्य के चरित्र-नायक वीर शिवाजी भी पूर्णतः धर्माश्रित थे। अतः व्यासजी ने 'शिवराजविजय' में धार्मिक भावना से ओत-प्रोत चित्रण किया है। विविध दृश्यों में धार्मिक परिवेश को यथार्थ रूप से दर्शाया गया है। इसके अतिरिक्त भारतीय संस्कृति के मान्य देव सूर्य भगवान्, चन्द्रदेव, आदि का चित्रण धर्ममय है, तथा विविध तपोवनों के चित्रण में, शिवाजी आदि पात्रों में धर्म की भावना का सुन्दर चित्रण किया गया है। काव्य के आरम्भ में ही सूर्य की महिमा तथा स्वरूप का सुन्दर वर्णन करते हुए व्यासजी ने धार्मिकता का परिचय दिया है।

"अरुण एष प्रकाशः पूर्वस्यां मरीचिमालिनः। एष भगवान् मणिराकाशमण्डलस्य, चक्रवर्ती खेचरचक्रस्यः, कुण्डलमाखण्डलदिशः, दीपको ब्रह्माण्डभाण्डस्यइत्यादि।

इसके अतिरिक्त गुरुकुल, ब्रह्मचारी के स्वरूप का तथा उनके कार्यों का, महामुनि योगिराज का जो चित्रण किया गया है, वह धार्मिक भावना का अभिव्यञ्जक है। लेखक ने प्राचीन धार्मिक विचारधाराओं को बहुत ही सुन्दरता से स्थापित किया है। उन्होंने इस संसार के संचालन में, प्राणियों के व्यवहार में तथा अन्य सभी कार्यों में ईश्वर की सत्ता को ही माना है, उसी की इच्छा से सभी कार्य होते हैं। मनुष्य को संकट में विचलित न होकर धैर्य व संयम से अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करना चाहिए।

योगिराज ने ईश्वर की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि-इत्यादि। "विलक्षणोऽयं भगवान् सकलकलाकलापकलनः सकलकालनः----"

इसके अतिरिक्त साधुओं और संन्यासियों के प्रति सम्मान की भावना भी चित्रित की गई है। जैसे कि-

"कथमस्मान् संन्यासिनोऽपि कठोरभाषणैस्तिरस्करोषि ?"

'शिवराजविजय' में हनुमानजी की महिमा का तथा उनके प्रति श्रद्धा का भी विशेष वर्णन किया गया है। लेखक का विश्वास था कि मुगलों के अत्याचारों का विनाश करने के लिए हनुमानजी ही सहायता कर सकते हैं। सभी देवी-देवताओं में हनुमान की ही पूजा विशेष रूप से प्रचलित थी, क्योंकि वे दुष्टों का संहार करने व बल-बुद्धि के दाता हैं। हनुमानजी के एक मन्दिर का व्यासजी ने वर्णन किया है जो शिवाजी के गुप्तचरों तथा सैनिकों की शरण-स्थली थी। वहीं से मुगलों के अत्याचारों को रोकने के लिए तथा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए गुप्तचर कार्य करते थे। उस मन्दिर में स्थित हनुमानजी की एक विशाल मूर्ति का वर्णन करते हुए कवि ने लिखा है कि-

"ततोऽवलोक्य तां वज्रेणेव निर्मितां, साकारामिव वीरताम् गदामुद्यम्य दुष्टदलदलनार्थमुच्छलन्तीमिव केशरिकिशोरमूर्तिम्--" इत्यादि।

शिवाजी के सैनिक गुप्तरूप से मुगलों पर आक्रमण करते थे, वे मन्दिरों में पुजारी और संन्यासी के वेश में निवास करते थे, जो कि शस्त्र-विद्या में निपुण, बुद्धिमान् और राजनीति में पारंगत होते थे। मन्दिरों, आश्रमों और कुटीरों में असीम शस्त्रास्त्र गुप्त रखे जाते थे। देवी-देवताओं में अखण्ड विश्वास था। हनुमानजी सब कुछ ठीक कर देंगे, यह आश्वासन देते हुए मन्दिराध्यक्ष असहायों और पीड़ितों को शरण देते थे- "हनुमान् सर्वं साधयिष्यति, मा स्म चिन्ता सन्तान-वितानैरात्मानं---।"

अन्य स्थलों पर भी व्यासजी ने मन्दिरों, धर्म-ग्रन्थों आदि के महत्त्व तथा उनकी रक्षा के लिए देशभक्तों के हृदय में उत्पन्न धार्मिक भावना का चित्रण किया है। 'शिवराजविजय' के नायक शिवाजी का तो परम लक्ष्य ही हिन्दू धर्म को मुगलों से बचाना था तथा उसकी स्थापना करके हिन्दुओं के मन में अपने धर्म के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाने की प्रेरणा देना था।

इस प्रकार 'शिवराजविजय' में धार्मिक भावना का स्वाभाविक व तत्कालीन समाज की आवश्यकता के अनुसार सुन्दरता से चित्रण किया गया है।

चरित्र-चित्रण उपन्यास का विशिष्ट स्थान उसमें वर्णित चरित्र-चित्रण के द्वारा ही निर्धारित होता है। प्रत्येक पात्र का चरित्र-चित्रण स्पष्ट रूप से चित्रित होना चाहिए। कवि की प्रतिभा भी इसी से प्रकट होती है कि उसने अपने काव्य के पात्रों का चरित्र कितनी सफलता से उभारा है। व्यासजी ने 'शिवराजविजय' में सभी पात्रों के चरित्र को सफलतापूर्वक चित्रित किया है। जो पात्र जिस रूप में वर्णित है अथवा जिस परिवेश का है उसका उसी के अनुरूप चरित्र-चित्रण किया गया है। उनके सभी पात्र जीवन्त एवं प्रभावी है। सभी पात्रों का स्वाभाविक एवं यथार्थ चित्रण किया गया है। व्यासजी ने किसी भी पात्र के चित्रण में कृत्रिमता का पुट नहीं दिया है, अपितु वास्तविकता तथा स्वाभाविकता का ही आश्रय लिया है। महाराष्ट्र केसरी वीर शिवाजी, रघुवीर सिंह, गौरसिंह, अफजल खां, ब्रह्मचारिगुरु, योगिराज आदि सभी पात्रों में जो जैसा है उसका वैसा ही चित्रण किया गया है।

व्यासजी ने वीर शिवाजी को एक सच्चे देशभक्त, स्वधर्म रक्षक, राजनीति में निपुण तथा भारतीय संस्कृति एवं आदशों के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित किया है, जो यथार्थ एवं स्वाभाविकता से युक्त है। शिवाजी हमेशा अपने सनातन धर्म की रक्षा के लिए तत्पर रहे, इसके लिए वे अपने प्राणों की भी बाजी लगाने से नहीं चूकते थे। उनका शौर्य, पराक्रम एवं वीरता अद्भुत थी। शत्रु उनकी वीरता से भयभीत रहते थे। शिवाजी की वीरता का आतंक इतना था कि विरोधी लोग भ्रमवश भी उनके नाम का स्मरण करके अत्यन्त भयभीत हो जाते थे। शिवाजी के इस महान् आतंक का चित्रण करते हुए व्यासजी ने लिखा है कि-

"कथं वा आगत एष शिववीरः इति भ्रमेणापि सम्भाव्य अस्य विरोधिषु केचन मूर्च्छिता निपतन्ति, अन्ये विस्मृतशस्त्रास्त्राः पलायन्ते, इतरे महात्रासा -कुञ्चितोदरा विशिथिलवाससो नग्ना भवन्ति, अपरे च शुष्कमुखा जीवन याचन्ते।"

शिवाजी देशप्रेमी व स्वाभिमानी थे। देश की रक्षा के लिए प्राणपण से हमेशा सन्नद्ध रहते थे, उनकी इस भावना का सुन्दर चित्रण किया गया है-

"शिववीरः- भारतवर्षीया यूयम्, तत्रापि महोच्चकुलजाताः, अस्ति चेदं भारतवर्षम् भवति च स्वाभाविक एवानुरागः सर्वस्यापि स्वदेशे, पवित्रतमश्च यौष्माकीणः सनातनो धर्मः, तमेते जाल्मा समूलमुच्छिन्दन्ति, अस्ति च 'प्राणाः यान्तु न च धर्मः" इत्यार्याणां दृढः सिद्धान्तः।"

इसी प्रकार मुगल सेनापति अफजल खां का चरित्र भी तत्कालीन मुगलों के समान विलासी, अदूरदर्शी, आत्मश्लाघी तथा राजनीति के कौशल से रहित रूप में चित्रित किया गया है। उसके चरित्र का स्वाभाविक तथा रोचक ढंग से वर्णन किया गया है। वह भोग-विलास में मदमस्त होता हुआ नशे के वशीभूत अपनी गुप्त योजना को भी सार्वजनिक रूप से घोषित कर देता है-

"इति कथयति तानरङ्गे, अभिमान-परवशः स स्वसहचरान् सम्बोध्य पुनरादिशत्- भो-भो योद्धारः ! सूर्योदयात् प्रागेव भवन्तः पञ्चापि सहस्राणि सादिनां दशापि च सहस्राणि पत्तीनां सज्जीकृत्य युद्धाय तिष्ठत । गोपीनाथ -पण्डितद्वाराऽऽहूतोऽस्ति मया शिववराकः। तद् यदि विश्वस्य स समागच्छेत्, ततस्तु बद्ध्वा जीवन्तं नेष्यामः, अन्यथा तु सदुर्गमेनं धूलीकरिष्यामः।"

इस गुप्तयोजना को कहते हुए वह अपनी अदूरदर्शिता को ही प्रकट करता है, जिसके फलस्वरूप शिवाजी उसे धोखे से बुलाकर मार डालते हैं। व्यासजी द्वारा अफजल खां के सैनिकों की कायरता, भयाकुलता तथा अत्याचारों का भी तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति के अनुसार ही सुन्दरता से चित्रण किया गया है। यथा-"वयं बलिनः, आस्माकीना महती सेना, तथाऽपि न जानीमः किमिति कम्पत इव क्षुभ्यतीव च हृदयम्। यवनानां पराजयो भविष्यति अफजलखानो विनङ्ख्यति न विद्यः को जपतीव कर्णे, लिखतीव सम्मुखे, क्षिपतीव चान्तःकरणे।"

शिवाजी के सबसे प्रिय व विश्वासपात्र गुप्तचर गौरसिंह का चरित्र-चित्रण भी अत्यन्त रमणीयता व स्वाभाविकता से किया गया है। उसका चित्रण अत्यधिक प्रशंसनीय व अद्वितीय है। गौरसिंह एक श्रेष्ठ योद्धा, राजनीति में निपुण, परमवीर, कुशल गुप्तचर, वेषादि परिवर्तन में चतुर तथा कर्त्तव्यनिष्ठ, स्वामिभक्त एवं सतत सजग दिखाई देती है। स्थान-स्थान पर उसकी प्रतिभा व वीरता प्रकट होती है। वह अपहृत बालिका कां यवनों के चंगुल से छुडाता है, बड़ी चतुरता से शिवाजी के द्वारपाल की परीक्षा लेता है एवं पटुतापूर्वक अफजल खां के शिविर में पहुंचकर षड्यन्त्र का पता चलाता है तथा वहीं शिवाजी की प्रशंसा करके उनके मन में भय भी उत्पन्न कर आता है। गौरसिंह की रणनीति अत्यन्त गुप्त व निपुणता से रची गई थी। उसने दो-दो कोस की दूरी पर आश्रमों में ब्रह्मचारियों के रूप में, मन्दिरों में पुजारियों के रूप में अपने कुशल योद्धाओं को रखा हुआ था तथा उनके माध्यम से औरङ्गजेब व उसके सेनापति की प्रत्येक गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर लेता था। यह उसकी राजनीतिक बुद्धिमत्ता का ही परिचायक है।

'शिवराजविजय' में अन्य पात्रों का भी चरित्र-चित्रण उनके अनुरूप सुन्दरता व स्वाभाविकता से किया गया है। प्रत्येक पात्र का चरित्र स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। व्यासजी की प्रौढ प्रतिभा से सभी पात्रों का चरित्र जीवन्त हो उठा है। उनके वर्णन में न कहीं न्यूनता है, न कहीं अधिकता, न ही कृत्रिमता, अपितु सर्वत्र स्वाभाविकता का ही समावेश दिखलाई देता है।

इस तरह 'शिवराजविजय' उपन्यास चरित्र चित्रण की दृष्टि से तथा विषय-वस्तु के शिल्प सौन्दर्य आदि से संस्कृत साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इस कृति में तात्कालीन समाज व शिवाजी के कार्यों का यथार्थ निरूपण हुआ है। ऐतिहासिक कथानक पर आधारित यह उपन्यास अपनी विशेषताओं के कारण उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँच गया है। 'शिवराजविजय' भारतीय संस्कृति, गौरव एवं संस्कृत भाषा के वैशिष्ट्य तथा कवि के उत्कृष्ट कवित्व का प्रतीक है। संस्कृत गद्य-काव्य के क्षेत्र में इस प्रकार का ग्रन्थ अनुपम है, यह 'गद्य कवीनां निकर्ष वदन्ति' कथन की कसौटी पर खरा उतरता है तथा स्वाभाविकता से सर्वोपरि रचना के वैशिष्ट्य को प्राप्त है।

शिवराजविजय की कथावस्तुः पं0 अम्बिकादत्त व्यास ने 'शिवराजविजय' उपन्यास की कथावस्तु को तीन विरामों में विभक्त किया है। प्रत्येक विराम में चार निःश्वास (अध्याय) हैं। इसकी कथा इस प्रकार है- भारतदेश के दक्षिण क्षेत्र में मुगलशासकों का आधिपत्य हो चुका था तथा उनके द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार किये जा रहे थे। इससे खिन्न होकर महाराष्ट्राधीश्वर शिवाजी ने मुगलों से देश को स्वतन्त्र कराने के लिए संघर्ष प्रारम्भ किया। उस समय दो-दो कोस पर आश्रम बने हुए थे, जिनमें कुशल योद्धा गुप्तचर के रूप में ब्रह्मचारियों के वेष में रहते थे, जो निरन्तर मुसलमानों की गतिविधियों की जानकारी रखते थे। शिवाजी की कुशल रणनीति के फलस्वरूप उनकी निरन्तर विजयों से उद्विग्न होकर बीजापुर-दरबार ने उनसे युद्ध करने के लिए तथा शिवाजी को बन्धक बनाकर लाने हेतु अफजलखां को भेजा। उस समय वीर शिवाजी प्रतापदुर्ग में निवास कर रहे थे। अफजलखां ने भी वहीं भीमा नदी के तट पर अपना शिविर डाल दिया। वह निरन्तर भोग-विलास तथा मदिरा पान में मदमस्त रहता था। उसे अपनी विशाल सेना का घमण्ड था। एक यवन गुप्तचर बीजापुर दरबार का पत्र ले जा रहा था, जिसमें शिवाजी को धोखे से जीवित पकड़कर ले जाने का सन्देश था। मार्ग में उस यवन ने अपनी स्वाभाविक दुष्प्रवृत्ति के अनुसार एक ब्राह्मण कन्या का अपहरण कर लिया, किन्तु वह कन्या एक आश्रम के अध्यक्ष ब्रह्मचारि गुरु के शिष्यों गौरसिंह और श्यामसिंह द्वारा बचा ली गई तथा वह यवन गौरसिंह के हाथों मारा गया। उसकी जेब से उन्हें वह पत्र प्राप्त हुआ। उन्होंने उस पत्र को ले जाकर शिवाजी को दे दिया।

तत्पश्चात् शिवाजी ने उस षड्यन्त्र को जानकर स्वयं ही धोखे से अफजल खां को बुलाकर मार डालने की योजना बनाई। तदनुसार शिवाजी ने पं0 गोपीनाथ को बीजापुर दरबार में सन्धि-प्रस्ताव के साथ भेजा, जिसमें उन्होंने सन्धि हेतु प्रताप दुर्ग के समीप अफजल खां को बुलाया। शिवाजी ने उसे फँसाने के पूरे प्रबन्ध किये। इधर गौरसिंह भी गायक के वेश में अफजलखां के शिविर में पहुँचकर उनके षड्यन्त्रों का पता लगा आता है। शिवाजी ने जंगल में तथा अफजल खां के शिविर के चारों ओर अपनी सेना को छिपा दिया। प्रातः काल अफजल खां शिवाजी से मिलने आता है। शिवाजी अपनी कूटयोजना के अनुसार अपने कपड़ों के अन्दर कवच तथा हाथों में बाघनख नाम्स का हथियार पहन कर गये। परस्पर आलिंगन करने पर शिवाजी अफजल खां के कन्धों और गर्दन को फाड़कर पटक देते हैं तथा उनकी सेना भी योजनानुसार मुसलमानों की सेना पर आक्रमण करके उन्हें मारकर भगा देती है।

इसके बाद गौरसिंह द्वारा जिस कन्या की रक्षा की गई थी, उसके संरक्षक एक ब्राह्मण थे। उसके आने पर रहस्योद्घाटन होता है कि वह कन्या और कोई नहीं अपितु गौरसिंह और श्यामसिंह की बहिन सौवर्णी है तथा वह वृद्ध ब्राह्मण उनके पुरोहित देव शर्मा है। तत्पश्चात् ब्रह्मचारि-गुरु के अनुरोध पर गौरसिंह अपना वृत्तान्त सुनाता है। वह कहता है कि हम दोनों उदयपुर के जागीदार खड्गसिंह के पुत्र हैं, माता-पिता की मृत्यु के बाद तीनों भाई-बहिन पुरोहित देव शर्मा की संरक्षता में रहने लगे। एक बार शिकार खेलने गए हुए हम दोनों भाई लुटेरों के द्वारा पकड़े गये। किसी प्रकार वहाँ से घोड़ों पर चढ़कर भाग निकले। उसके बाद एक हनुमान मन्दिर के अध् यक्ष की सहायता से महाराष्ट्र पहुँचे, जहां भीमा नदी के किनारे उनकी शिवाजी से भेंट हुई और इस आश्रम में रहने लगे।

गौरसिंह की कथा के बाद आगे की घटना का चित्रण करते हुए उपन्यासकार ने लिखा कि शाइस्तखां का पूना पर अधिकार हो जाता है तथा वहीं शिवाजी के महलों में रहने लगता है। शिवाजी उससे प्रतिशोध लेने की योजना बनाते हैं। वे सिंह दुर्ग में अपना एक सन्देश देकर रघुवीरसिंह को तोरण दुर्ग के अध्यक्ष के पास भेजते हैं। कवि ने रघुवीरसिंह की कर्त्तव्यपरायणता का तथा विपत्तियों से न घबराने का सुन्दर चित्रण किया है। वह भयंकर झंझावात से एवं विकट मार्ग से जाता हुआ अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होता है तथा सभी संकटों का सामना करते हुए तोरण दुर्ग पहुँचकर शिवाजी का सन्देश दुर्गाध्यक्ष को देता है। दुर्गाध्यक्ष की आज्ञा से रघुवीरसिंह हनुमान् मन्दिर में ठहरता है। उसी मन्दिर में देव शर्मा सौवर्णी को साथ लेकर रहते थे। मन्दिर की वाटिका में सौवर्णी के मधुर गान को सुनकर रघुवीरसिंह का हृदय उससे अनुराग करने लगता है। शिवाजी की आज्ञानुसार वह शाइस्ताखां के साथ होने वाले युद्ध का भविष्य पूछने के लिए देव शर्मा के पास जाता है। देव शर्मा सौवर्णी के द्वारा उसे एक मोदक खिला कर गले में एक माला डलवाता है तथा प्रातः काल आकर रात्रि में देखे गये स्वप्न का वृत्तान्त सुनाने के लिए कहता है। प्रातःकाल रघुवीरसिंह दुर्गाध्यक्ष से शिवाजी के सन्देश का प्रत्युत्तर लेकर देव शर्मा के पास जाता है तथा रात्रि में देखे हुए स्वप्न का वृत्तान्त सुनाता है। देव शर्मा उस स्वप्न का फल बताता है कि यवनों के साथ युद्ध में शिवाजी की विजय होगी तथा आर्यों के साथ युद्ध में पराजय। इस वृत्तान्त को जानकर रघुवीरसिंह वाटिका में जाता है, जहाँ उसकी पुनः सौवर्णी से भेंट होती है। दोनों एक-दूसरे पर आसक्त हो जाते हैं। तत्पश्चात् रघुवीरसिंह हनुमान् जी का प्रसाद लेकर सिंह दुर्ग की ओर चल पड़ता है।

इधर शिवाजी पण्डित का वेश बनाकर माल्यश्रीक के साथ शाइस्ताखां के निवास में जाते हैं तथा गुप्त रूप से वहाँ का निरीक्षण कर लेते हैं। आते समय सन्देह के कारण पीछा करते हुए चाँद खाँ को शिवाजी मार डालते हैं। इसके बाद शिवाजी यशवन्त सिंह को पूना से दूर रहने के लिए अनुरोध कर स्वयं कुछ चुने हुए श्रेष्ठ साथियों के साथ बारात के बहाने पूना में प्रविष्ट हो जाते हैं और शाइस्ताखां के निवास पर आक्रमण कर देते हैं। रघुवीरसिंह चाँद खाँ तथा शाइस्ताखाँ के पुत्र को मार डालता है। इधर किसी तरह शाइस्ता खाँ घायल होकर खिड़की से कूद कर भाग जाता है तथा रघुवीरसिंह औरंगजेब की पुत्री रोशनआरा को गिरफ्तार कर लेता है।

इस घटना के वर्णन के बाद उपन्यास में कथानक को आगे बढ़ाते हुए वर्णित किया गया है कि एक दिन ब्रह्मचारि-गुरु गौरसिंह के समक्ष अपना तथा अपने पुत्र वीरेन्द्रसिंह का पूर्व वृत्तान्त सुनाता है। उधर रघुवीरसिंह की प्रेयसी सौवर्णी क्रूरसिंह द्वारा किये जाने वाले अपमान की बात बताती है। उसी समय संयोगवश क्रूरसिंह की नियुक्ति अन्यत्र हो जाने से वह संकट दूर हो जाता है।

इसके बाद औरंगजेब की पुत्री रोशनआरा द्वारा शिवाजी के प्रति प्रकट किए गये प्रेम का चित्रण किया गया है। वह शिवाजी के गुणों पर मोहित हो जाती है, किन्तु, शिवाजी उससे स्पष्ट रूप से कह देते हैं कि वे उसके पिता द्वारा दिये जाने पर ही उसे स्वीकार कर सकते हैं। इसी बीच जयसिंह सेना सहित आक्रमण कर देता है। शिवाजी उसके हृदय में हिन्दुत्व की भावना उत्पन्न करने का बहुत प्रयत्न करते हैं किन्तु असफल रहने पर तथा अन्य कुछ कारणों से मुगलों की कुछ शर्तें मानकर उनके साथ सन्धि करने के लिए विवश हो जाते हैं। इसी सन्धि के अनुसार वे रोशनआरा तथा मुअज्जम को वापस कर देते हैं।

तत्पश्चात् शिवाजी रघुवीरसिंह की सहायता से बीजापुर पर आक्रमण करके विजय प्राप्त करते हैं। रहमत खां को जीवित पकड़ लिया जाता है किन्तु रहमत खां और क्रूरसिंह कूटचाल से रघुवीरसिंह को राजद्रोही बताते हैं, जिसके कारण शिवाजी उसे अपने राज्य से निष्कासित कर देते हैं। बाद में असलियत का पता चलता है कि वास्तव में क्रूरसिंह ही राजद्रोही है, रघुवीरसिंह नहीं। इससे शिवाजी को बहुत पश्चात्ताप होता है।

इधर अपमानित रघुवीरसिंह राघव स्वामी का वेश धारण कर अपनी स्वामिभक्ति का परिचय देता हुआ शिवाजी का उपकार करता रहता है तथा अवसर पाकर सौवर्णी का अपहरण करने की इच्छा करने वाले क्रूरसिंह का वध कर देता है। तत्पश्चात् जयसिंह की सन्धि के अनुसार शिवाजी औरंगजेब के दरबार में उपस्थित होते हैं। मार्ग में राघव स्वामी शिवाजी को जाने से रोकने का बहुत प्रयास करता है किन्तु शिवाजी उसकी बात नहीं मानते हैं और औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हो जाते हैं। अपनी कुटिल योजना के अनुसार औरंगजेब शिवाजी को नजरबन्द कर देता है और उनके मकान के चारों ओर पहरा लगवा देता है, किन्तु अपनी योजना के अनुसार तथा रघुवीरसिंह की सहायता से वहाँ से अपने साथियों सहित शिवाजी भाग निकलते हैं। जब शिवाजी को यह पता चला कि यह राघव स्वामी रघुवीरसिंह ही है तब वे रघुवीरसिंह से अपने दुर्व्यहार के लिए क्षमा-याचना करते हैं।

तत्पश्चात् रघुवीरसिंह शिवाजी के साथ ही वापस लौट आता है। शिवाजी उसकी कर्त्तव्यनिष्ठा, देश-भक्ति व स्वामिभक्ति से प्रसन्न होकर उसे मण्डलेश्वर पद प्रदान करते हैं। उसका विवाह सौवर्णी के साथ हो जाता है तथा उनके विवाह में स्वयं महाराज शिवाजी सम्मिलित होकर उनको आशीर्वाद देते हैं। उधर गुप्तचरों द्वारा सूचना प्राप्त होती है कि सन्धि में मुगलों को दिये गये सभी किले जीत लिये गये हैं।

तत्पश्चात् शिवजी सतारा नगरी को राजधानी बनाकर राज्य करने लगते हैं और धीरे-धीरे पराक्रम व बुद्धि-बल से उनका सम्पूर्ण महाराष्ट्र पर अधिकार हो जाता है। वे औरंगजेब द्वारा भेजे गये सेनापति मोहब्बत खां को भगा देते हैं।

इस तरह व्यासजी ने शिवाजी के संघर्षमय जीवनकाल की कथावस्तु को पूर्णतया तथा सुन्दरता से गुम्फित किया है। इसमें उनके जीवन की लगभग सभी प्रमुख घटनाओं का समावेश किया गया है।

शिवराजविजय की ऐतिहासिकताः

आधुनिक समालोचकों की दृष्टि में 'शिवराजविजय' एक ऐतिहासिक उपन्यास है। इस रचना में इतिहास और उपन्यास दोनों का सुन्दर मिश्रण हुआ है। इसमें ऐतिहासिक कथानक को लेकर कवि-कल्पना का भी समाहार किया गया है। ध्वन्यालोक में कहा गया है-

"यदितिहासादिषु कथासु रसवतीषु विविधासु सतीष्वपि यत्तत्र विभावाद्यौचित्यवत्कथाशरीरं तदेव ग्राह्यं नेतरत्।"

इस कथन के अनुसार ऐतिहासिक तत्वों के साथ कवि-कल्पना का उचित समावेश काव्यानन्द अर्थात् रस का अभिव्यञ्जक होता है। 'शिवराजविजय' में यह विशेषता प्रधानतया दिखाई देती है। इसी कारण इसे ऐतिहासिक उपन्यास कहा जाता है।

'शिवराजविजय' के कथानक के ऐतिहासिक स्रोत कोई भी रचनाकार अपने पूर्ववर्ती रचनाकार से प्रेरणा लेता है अथवा उपलब्ध साहित्य से सामग्री अथवा कथासूत्र ग्रहण करता है। व्यासजी के समय तक मराठा इतिहास से सम्बन्धित प्रामाणिक पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ दी मरहट्टाज' थी तथा शिवाजी के जीवनवृत्त पर आधारित बंगला भाषा में दो रचनारे 'महाराष्ट्र जीवन प्रभात' तथा 'अंगुरीय विनिमय' प्रकाशित हो चुकी थीं। इसमें दोनों रचनाओं में शिवाजी का कथानक किंवदन्तियों के अनुरूप है, ऐतिहासिकता नहीं। अतः 'शिवराजविजय' पर इन दोनों रचनाओं का प्रभाव नगण्य है। 'शिवराजविजय' में समाविष्ट ऐतिहासाकि घटनाओं के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि व्यासजी ने 'हिस्ट्री आफ दी मरहट्टाज' पुस्तक का ही आश्रय लेकर तथा तद्नुसार कथानक लेकर 'शिवराजविजय' की रचना की है। इसमें मुख्यतः निम्नलिखित ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश किया गया है-

1. शिवाजी और अफजल खाँ का संघर्ष।

2. शिवाजी द्वारा शाइस्ताखाँ के पूना स्थित निवास पर आक्रमण करना।

3. भूषण कवि का शिवाजी के आश्रित रहना

4 शिवाजी द्वारा शाहजादा मुअज्जम को कैद करना तथा औरंगजेब की पुत्री रोशनआरा द्वारा शिवाजी के प्रति प्रकट प्रेम-प्रसंग।

5. शिवाजी की सूरत नगर पर विजय प्राप्त करना।

शिवाजी और जयसिंह का संघर्ष तथा सन्धि ।

7शिवाजी की औरंगजेब के दरबार में उपस्थिति।

शिवाजी का महाराष्ट्र वापस आना तथा परवर्ती घटनाएँ।

ये सभी घटनाएँ इतिहास प्रसिद्ध हैं, इतिहास का विवेचन करने से इन घटनाओं की पुष्टि होती है। केवल कुछ अन्तर अवश्य है जो कि काव्य-रचना के अनूकूल कवि ने उसमें कल्पना का पुट दिया है। इससे इसकी ऐतिहासिकता नष्ट नहीं हुई है, अपितु पुष्ट ही होती है। संक्षेप में इन बिन्दुओं का विवेचन इस प्रकार है-

1. शिवाजी और अफजलखां का संघर्घ शिवराजविजय के द्वितीय निःश्वास का कथानक इस प्रसंग पर आधारित है। बीजापुर के अधिपति के आदेश पर अफजलखां शिवाजी को पकड़ने के लिए जाता है, वह धोखे से शिवाजी को पकड़ना चाहता है किन्तु उसके षड्यन्त्र का पता शिवाजी को चल जाता है। वे गौरसिंह को तानरंग गायक के वेश में अफजलखां के शिविर में उस रहस्य की पुष्टि के लिए भेजते हैं। बीजापुर दरबार गोपीनाथ पण्डित को अपनी कूट योजना के अनुसार दूत बनाकर शिवाजी के पास भेजता है। अफजलखां व शिवाजी की भेंट प्रतापदुर्ग के समीप होती है जहाँ शिवाजी अपने छुपे हुए अस्त्रों से उसको मार डालते हैं। यह एक ऐतिहासिक घटना है। इसका उल्लेख सभी इतिहासकारों ने किया है।

2. शिवाजी द्वारा शाइस्ताखों ने पूना स्थित निवास पर आक्रमण करना - 'शिवराजविजय' में पञ्चम से सप्तम निःश्वास तक शाइस्ताखां का पूना पर अधिकार, चाकनदुर्ग पर आक्रमण कर उसे हस्तगत करना तथा शिवाजी द्वारा उसके निवास स्थान पर आक्रमण करने का वर्णन किया गया है। यह घटना-वर्णन ग्रान्ट डफ के इतिहास से बहुत अधिक मिलता है, व्यासजी ने इस प्रसंग को अपनी कल्पना के साथ उपस्थित किया है, जिसमें उसमें रोचकता आ गई है।

3. भूषण कवि का शिवाजी के आश्रय में रहना - 'शिवराजविजय' के पञ्चम निःश्वास में भूषण कवि द्वारा दिल्ली की आश्रयता का परित्याग कर शिवाजी के आश्रय में आने का वर्णन है। यद्यपि कुछ इतिहासकारों ने इन दोनों के समकालीन होने पर सन्देह प्रकट किया है, परन्तु 'शिवराजभूषण' तथा कुछ ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार उनका समकालीन होना सिद्ध होता है।

4. शिवाजी द्वारा शाहजादा मुअज्जम को कैद करना तथा रोशनआरा का प्रसंग - 'शिवराजविजय' के अष्टम तथा नवम निःश्वास में औरंगजेब के पुत्र शाहजादा मुअज्जम (मायाजिह्न) तथा उसकी बहन रोशनआरा (रसनारी) का प्रसंग समाविष्ट है। शिवाजी के प्रति प्रकट प्रेम-प्रसंग को भी यहाँ चित्रित किया गया है, किन्तु ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में यह सत्य सिद्ध नहीं होता है। व्यासजी ने इन प्रसंगों को सम्भवतः नायक शिवजी की उदात्त भावना को प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से अपनाया है। ये दोनों पात्र अवश्य ही इतिहास प्रसिद्ध हैं, केवल इस घटना की पुष्टि नहीं होती है।

5. शिवाजी की सूरतनगर पर विजय प्राप्त करना- 'शिवराजविजय' के अष्टम निश्वास में शिवाजी के सेनापित द्वारा सूरतनगर पर विजय प्राप्त करने का संकेतात्मक वर्णन है किन्तु ये प्रसंग इतिहास के अनुरूप नहीं हैं। 'शिवाजी एण्ड हिज टाइम्स' पुस्तक के अनुसार सूरतनगर पर स्वयं शिवाजी ने सन् 1664 ई0 में आक्रमण किया था न कि अनके सेनापति ने। शिवाजी ने पुनः सूरत पर आक्रमण करके खूब लूट-पाट मचायी थी, ऐसा सभी इतिहासकार प्रमाणित करते हैं, व्यासजी ने इस ऐतिहासिक तथ्य में परिवर्तन किया है।

6. शिवाजी और जयसिंह का संघर्ष तथा सन्धि- 'शिवराजविजय' के नवम निश्वास में महाराजा जयसिंह के आगमन का वर्णन है। मन्दिर पुरोहित देव शर्मा द्वारा दी गई सलाह के अनुसार शिवाजी उससे सन्धि करने के लिए माल्यश्रीक, भूषण कवि और वृद्ध पुरोहित को भेजते हैं। वे आकर जयसिंह द्वारा बताई गई कुछ शर्तों को मानने पर ही सन्धि करने की बात बताते हैं। उस सन्धि में ये शर्तें थीं-

1. शिवाजी औरंगजेब की कर- प्रदत्ता स्वीकार करें।

2. मुगलों से छीने गये सारे किले वापिस करें।

3. बीजापुर के साथ युद्ध में मुगलों की सहायता करें।

4. रोशनआरा की खोजकर मुगलों को सुपुर्व करें।

5. शाहजादा मुअज्जम की खोजकर मुगलों को सुपुर्द करें।

उक्त पाँच शतों में अन्तिम दो शर्तें कवि-कल्पना से प्रसूत हैं, क्योंकि इनका इतिहास से मेल नहीं खाता है, बाकी शिवाजी व जयसिंह की सन्धि वाली घटना ऐतिहासिक तथ्य के अनुरूप ही है। इसके अतिरिक्त 'शिवराजविजय' के दशम निश्वास में शिवाजी महाराज जयसिंह के विश्वास दिलाये जाने पर औरंगजेब से मिलने के लिए दिल्ली जाते हैं, इस घटना का वर्णन भी इतिहास के अनुकूल ही है।

7. शिवाजी की औरंगजेब के दरबार में उपस्थिति 'शिवराजविजय' के दशम निश्वास के अनुसार महाराज जयसिंह के वचनों से आश्वस्त होकर शिवाजी पाँच सौ घुड़सवारों और हजार पदातियों के साथ दिल्ली के दरबार में उपस्थित होते हैं। इसका उल्लेख ग्रान्ट डफ के इतिहास ग्रन्थ में भी किया गया है। कुछ इतिहासकारों ने शिवाजी का दिल्ली न जाना लिखकर आगरा में औरंगजेब से भेंट किये जाने का वर्णन किया है। शिवाजी की औरंगजेब के दरबार में उपस्थिति तथा औरंगजेब द्वारा उन्हें कैद किए जाने की घटना तो ऐतिहासिक है, केवल शिवराजविजय में वर्णित स्थान, समय तथा सहायकों आदि में अन्तर पाया जाता है। कुछ ऐतिहासिक घटनाओं को छोड़ दिया गया है तो कुछ की नवीन कल्पना की है।

8. शिवाजी का महाराष्ट्र वापस आना तथा परवर्ती घटनाएँ-'शिवराजविजय' के ग्यारहवें तथा बारहवें निश्वास में शिवाजी का दिल्ली से महाराष्ट्र लौटने का वर्णन हुआ है। इसमें शिवाजी को सर्वप्रथम प्रतापदुर्ग में पहुँचना बतलाया गया है, जबकि इतिहास में शिवाजी को गुप्त वेश में सर्वप्रथम रायगढ़ पहुँच कर प्रकट होना बताया गया है। इसी तरह शिवाजी द्वारा मुगलों को पूर्व में दिये गये सभी तेईस जिलों को पुनः जीत लिए जाने की घटना की पुष्टि कुछ ही इतिहासकार । करते हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने तीन वर्षों तक पुरन्दर सन्धि का पालन किया, उसके बाद युद्ध करके सभी किलों को जीत लिया। इसी तरह जयसिंह की कारुणिक मृत्यु, मोहब्बत खां को मराठों द्वारा हराया जाना आदि ऐतिहासिक घटनाओं का 'शिवराजविजय' में वर्णन किया गया है, किन्तु उन घटनाओं के वर्णन में स्थान, कालादि का अन्तर पाया जाता है।

इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यासजी ने 'शिवराजविजय' में ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश अपनी अभिरुचि के अनुरूप किया है, साथ ही उन्होंने इस बात का भी ध्यान अवश्य ही रखा है कि यथासम्भव ऐतिहासिक सत्य की रक्षा हो सके। उन्होंने ऐतिहासकि तत्त्वों और काव्य-कला का समन्वय कर राष्ट्रीय। और जातीय गौरव की भावनाओं को उद्‌द्बुद्ध करने का प्रयास किया है तथा तत्कालीन युग की समस्याओं का समाधान कर प्रेरणादायी सन्देश दिया है। सभी समालोचनाओं तथा विवेचनों से यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि शिवराजबिजय एक ऐतिहासिक उपन्यास है और इसमें ऐतिहासिकता का कलात्मक निर्वाह हुआ है। यह उपन्यास संस्कृत-साहित्य की अमूल्य निधि है तथा इसी से संस्कृत-उपन्यासों का श्रीगणेश हुआ है, यह भी सत्य है।

शिवराजविजय की औपन्यासिकता :

संस्कृत-साहित्य की गद्य-परम्परा में 'शिवराजविजय' से पूर्व उपन्यास का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। यह एक नवीन तथा आधुनिक काव्य-विधा है, अतः उसी दृष्टि से इसकी औपन्यासिकता को सिद्ध करने के लिए उपन्यास के छः तत्वों के आधार पर समालोचना की जा सकती है- कथानक, संवाद, रचना-शैली, चरित्र-चित्रण, देशकाल तथा उद्देश्य । संक्षेप में इन्हीं तत्वों के आधार पर 'शिवराजविजय' की समीक्षा प्रस्तुत है-

कथानक - उपन्यास का आधार स्तम्भ कथानक ही होता है। बाकी तत्त्व कथानक पर ही आश्रित होते हैं। 'शिवराजविजय' का कथानक प्रसिद्ध तथा हिन्दू-समाज के मानसपटल पर प्रभाव छोड़ने वाला ग्रहण किया गया है। शिवाजी देश, जाति एवं हिन्दू-धर्म के उद्धारक के रूप में प्रतिष्ठित थे। व्यासजी ने शिवाजी के ऐतिहासिक कथानक को अपनी प्रौढ प्रतिभा से सुन्दरतापूर्वक उपस्थित किया है। अन्य प्रासंगिक कथाओं को भी बहुत ही निपुणता के साथ प्रस्तुत किया है। साथ ही उन्होंने यथार्थता एवं स्वाभाविकता का पर्याप्त समावेश किया है, यही इनके उपन्यास की प्रमुख विशेषता है। कथानक की साकांक्षता एवं सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से भी 'शिवराजविजय' एक सर्वश्रेष्ठ उपन्यास सिद्ध होता है।

देशकाल - ग्रन्थ में वर्णित घटनाएँ, पात्रों की क्रियाय तथा संवाद आदि स्थान विशेष तथा देश में घटित होता है जिसे काव्य में 'देशकाल' कहा जाता है। ऐतिहासिक उपन्यासों में देशकाल की अपेक्षा तद्युगीन सांस्कृतिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि के चित्रण का महत्त्व अधिक होता है। व्यासजी ने इसका निर्वाहन पूर्णतया किया है। उन्होंने देशकाल के वर्णन में मध्यम मार्ग का आश्रय लेते हुए उसका अपेक्षित चित्रण किया है तथा तात्कालीन सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को पर्याप्त स्थान दिया है। इस दृष्टि से भी इसकी औपन्यासिकता का महत्त्व स्वतः प्रकट हो जाता है।

पात्र - पात्रों की दृष्टि से 'शिवराजविजय' में व्यासजी ने सभी पात्रों को प्रतिनिधि पात्र के रूप में चित्रित किया है। शिवाजी, गौरसिंह, रघुवीरसिंह तथा अन्य साथी देश-प्रेम, जाति-प्रेम एवं धर्म-प्रेम से युक्त हैं। इन सभी में व्यासजी ने हिन्दुत्व की भावना को चित्रित किया है। इसके अलावा मुगलशासकों को भी उसी वर्ग के प्रतिनिधि पात्रों के रूप में प्रस्तुत किया है, वे हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले, दम्भी, अन्यायी और विश्वासघाती के रूप में वर्णित हैं। व्यासजी ने पात्रों के चरित्र में उनकी स्वाभाविकता को पूर्णतया प्रकट किया है, तथा प्राचीन परम्पराओं की उपेक्षा करके ऐतिहासिक उपन्यास के अनुरूप ही पात्र योजना की है।

रचना शैली 'शिवराजविजय' में वैदर्भी रीति का आश्रय लेकर दीर्घ समासों से उपन्यास को क्लिष्ट नहीं बनाया गया है तथा न ही अनावश्यक अलंकारों के पाण्डित्य-प्रदर्शन से बोझिल बनाया गया है, अपितु अनुप्रास, उपमादि के स्वाभाविक प्रयोग से रमणीयता प्रदान की गई है। विभिन्न भावनात्मक घटनाओं के नाटकीय दृश्य उपस्थित किये गये हैं। इसकी रचना-शैली पाठक के मन को सहसैव आकर्षित करती है, यह इस उपन्यास की प्रमुख विशेषता है।

संवाद-योजना प्राचीन गद्यकाव्यों में संवाद-योजना का महत्त्व नहीं था, केवल वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया जाता था। इससे प्रत्येक पात्र का चरित्र स्पष्ट रूप से उभर नहीं पाता था किन्तु आधुनिक युग में उपन्यास आदि में संवाद-योजना को विशेष महत्व दिया जाता है। हडसन के कथनानुसार संवाद उपन्यास के सर्वाधिक आनन्ददायी तत्वों में से एक है। इस क्षेत्र में व्यासजी पूर्णतया सफल रहे हैं। 'शिवराजविजय' की संवाद-योजना नाटकीय एवं प्रभावशाली है। सभी पात्रों के संवादों में तद्नुरूपता, स्वाभाविकता तथा रोचकता है।

उद्देश्य - "प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते" इस उक्ति के अनुसार बिना प्रयोजन अथवा बिना उद्देश्य के कोई भी व्यक्ति कार्य में प्रवृत्त नहीं होता है, अतः काव्य-रचना जैसे महान् कार्य का भी उद्देश्य युक्त होना स्वाभाविक है। प्राचीन काव्यलक्षणकारों ने काव्य रचना के यशः प्राप्ति, धन की प्राप्ति, व्यवहार ज्ञान, दुःख विनाश, आनन्दानुभूति तथा उपदेश- ये छः उद्देश्य माने हैं। इन्हीं उद्देश्यों की दृष्टि से व्यासजी ने 'शिवराजविजय' उपन्यास की रचना में कुछ नवीनता प्रकट की है। उक्त प्राचीन उद्देश्यों के अतिरिक्त स्वदेश गौरव, देश-प्रेम, जाति-धर्म की प्रतिष्ठा तथा इनसे जनमानस को आप्लावित करना उनका मुख्य लक्ष्य था, साथ ही उनका यह भी लक्ष्य था कि संस्कृत साहित्य में नवीन, मनोरम तथा चमत्कारपूर्ण मागों का आधान किया जाय। व्यासजी अपनी कुशाग्र बुद्धि व लेखन- कौशल से 'शिवराजविजय' में इन उद्देश्यों की पूर्ति करने में पूर्णतः सफल रहे हैं।

इस तरह उक्त तत्त्वों के आधार पर समीक्षा करने से निर्विवाद रूप से 'शिवराजविजय' की औपन्यासिकता सिद्ध हो जाती है। संस्कृत साहित्य की यह एक मौलिक, विशिष्ट एवं महनीय रचना है।