Tuesday, 3 February 2026

भारतीय इतिहास में भारतीय ज्ञान परम्परा

आक्रामकता के आघात 
स्थापत्य
3500 साईट्स
कम्बोडिया मंदिर
भवन बनाने वाला, अछूत हो गया।
हड़पन ईंट
ईंट बनाने वाला अछूत हो गया
1920-24 हड़प्पा खोज
एलोरा कैलाश नाथ मंदिर
जल प्रबंधन 
धीवर पिछड़ गया
दुर्जन तालाब चन्द्र गुप्त मौर्य 
रानी की बाव-
धातु विज्ञान 1600 वर्षों से टोपरा पिलर
गणित वैदिक 
लिपिकार 
तर्क करने पर विधर्म हो गया।
ज्योतिषीय 
गुरुत्वाकर्षण भास्कराचार्य सिद्धांत -
चिकित्सा विज्ञान - जच्चा बच्चा मरते रहे।
भारत प्लास्टिक सर्जरी-
नाक कटने का मिथक-
Ag. 1794
कांगड़ा काननाक सर्जरी 
ऐतरेय उपनिषद्
दिशा जानने की क्षमता भागवत् में
प्रकृति और ब्रह्मांड 
चेहरे पर..
 गर्दो मलाल है।
सोमनाथ हमले पर मंत्र फेल क्यों हो गये?
सूर्पनखा की नाक क्यों नहीं जुड़ सकी?





Monday, 2 February 2026

भारतीय ज्ञान परम्परा में मुक्ति

अंग्रेजगये
मैकाले गया, 
अब क्यों ढो रहे?

6+3 दर्शन 
अप्रासंगिक से आगे बढ़ना
इन्द्रपूजा 
राम की एकपत्नी 
बुद्ध का सत्ता त्याग
उपनयन संस्कार की व्यवस्था

सा विद्या या विमुक्तये 
विष्णुपुराण (प्रथम स्कन्ध, अध्याय 19, श्लोक 41) 
​भारतीय इतिहास में मुक्ति
विद्यया प्राप्यते तेजः

ॐ ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। 
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1

यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥6

मेवाड़ के प्रसिद्ध शासक राणा सांगा(संग्राम सिंह) 1482ई. 1528ई.
बेटे-7सिंह-  भोजराज, कर्ण, रत्न, कर्ण, विक्रमादित्य, उदय, पर्वत,  कृष्ण 
 सबसे बड़े पुत्र भोजराज सिंह सिसोदिया(1495-1526) की पत्नी मीराबाई थीं।
भोजराज और मीराबाई का विवाह मेवाड़(चित्तौड़गढ़) में हुआ था, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया था।  मीराबाई के सांसारिक पति भोजराज, वास्तविक पति के रूप में भगवान कृष्ण को ही मानती थीं। 

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।

जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई,
तात मात भ्रात बंधु, आपणो न कोई।

राणाजी थें ज़हर दियौ म्हे जाणी।
जैसे कंचन दहत अगिन में निकसत बारह बाणी।

लोक लाज कुल काण जगत की दई बहाय जसपाणी॥
अपने घर का परदा कर ले मैं अबला बौराणी।

तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे गरक गयो सनकाणी॥
सब संतन पर तन मन वारों चरण कँवल लपटाणी।

मीरा को प्रभु राखि लई है दासी अपणी जाणी॥

मीराबाई के देवर विक्रमादित्य (राणा) ने जहर का प्याला भेजा था, जो उन्हें मारना चाहते थे क्योंकि वे मीराबाई की कृष्ण भक्ति और उनके ससुराल वालों के प्रति अनादर को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे; हालाँकि, मीराबाई ने उसे हंसकर पी लिया और भगवान श्री कृष्ण की कृपा से उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ, और वे उस विष को प्रसाद मानकर पी गईं।


"गुरु मिल्या रैदास जी 
दीनी ज्ञान की गुटकी, 
चोट लगी निजनाम हरी की 
महारे हिवरे खटकी"

मीरा के पति की मृत्यु 'रण मुक्ति'
मीरा की मुक्ति  'तरण मुक्ति'
मीरा के गुरु की मुक्ति 'आचरण मुक्ति'

"ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। 
छोट-बड़ो सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।" 

बेगम पुरा शहर कौ नांउ, दुखू अंदोह नहीं तिहिं ठांउ।
नां तसवीस खिराजु न मालु, खउफु न खता न तरसु जवालु॥

न हि वेरेन वेरानि..


अब मोहि खूद वतन गह पाई, ऊंहा खैरि सदा मेरे भाई।
काइमु दाइमु सदा पातसाही, दोम न सेम एक सो आही॥

आबादानु सदा मसहूर, ऊँहा गनी बसहि मामूर।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै, महरम महल न कौ अटकावै।

कहि रैदास खलास चमारा, जो हम सहरी सु मीत हमारा॥

आक्रामकता के आघात 
स्थापत्य
3500 साईट्स
कम्बोडिया मंदिर
भवन बनाने वाला, अछूत हो गया।
हड़पन ईंट
ईंट बनाने वाला अछूत हो गया
1920-24 हड़प्पा खोज
एलोरा कैलाश नाथ मंदिर
जल प्रबंधन 
धीवर पिछड़ गया
दुर्जन तालाब चन्द्र गुप्त मौर्य 
रानी की बाव-
धातु विज्ञान 1600 वर्षों से टोपरा पिलर
गणित वैदिक 
लिपिकार 
तर्क करने पर विधर्म हो गया।
ज्योतिषीय 
गुरुत्वाकर्षण भास्कराचार्य सिद्धांत -
चिकित्सा विज्ञान - जच्चा बच्चा मरते रहे।
भारत प्लास्टिक सर्जरी-
नाक कटने का मिथक-
Ag. 1794
कांगड़ा काननाक सर्जरी 
ऐतरेय उपनिषद्
दिशा जानने की क्षमता भागवत् में
प्रकृति और ब्रह्मांड 
चेहरे पर..
 गर्दो मलाल है।
सोमनाथ हमले पर मंत्र फेल क्यों हो गये?
सूर्पनखा की नाक क्यों नहीं जुड़ सकी?





Friday, 9 January 2026

SSTA

जय भीम जय भारत

Reg. No. 06/09/01/12703

SC/ST TEACHER'S ASSOCIATION (SSTA)

TA 
DR. HARI SINGH GOUR VISHWAVIDYALAYA (A CENTRAL UNIVERSITY) SAGAR, M.P.

Email-ssta.dhsgsu@gmail.com

Office - Rajrani Bhavan, Tilakganj Sagar (M.P.)

Membership Form

1. Name (in English) (in Hindi)

2. Father's Name

3. Designation

4. Department

5. Date of birth

6. Date of Appointment

7. Mailing Address

8. Mobile Numbers (Whatsapp) (other)

9. E-mail

10. Membership Fee paid

Photo

Category of member.

The members of the society shall be of following categories:

(a) Patron Member The person who will donate Rs. 10000/- or more at a time or in 12 instalments within a year will be patron member.

(b) Life member - The person who will pay Rs. 5000/-or more will be life member.

(c) Ordinary Member The person who will pay Rs. 50/month or Rs. 500/year will be ordinary member. Ordinary membership will be valid only for the period for which contribution is paid.

(d) Unpaid member The executive committee can give unpaid membership to any person(s). Such member can participate in annual general body meeting of the society but cannot vote.

I hereby declare that all the statements made in the membership form are true and complete to the best of my knowledge and belief. I will support my best to fulfil the objectives of Association.

Date:

Name & Designation of the member

Thursday, 8 January 2026

समुदाय समेन उदयति इति
उच्च शिक्षा में सामाजिक उत्तरदायित्व और सामुदायिक सहभागिता: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में
ज्ञान का हस्तांतरण- अशिक्षित भी सिखा सकता है।
किसान की सलाह कृषि पाठ्यक्रम निर्माण में लें

मैकाले ने अंग्रेजी लादी और श्रेष्ठ हो गये।
यह परंपरा पुरानी है 
किसी ने संस्कृत लादी और श्रेष्ठ हो गये। 
अंतर इतना रहा 
कि अंग्रेज़ी सिखाकर काम दिया
परन्तु संस्कृत सिखाकर काम देने से बचा गया।

ज्ञान का हस्तांतरण किसने नहीं किया?

जिनका में कृतज्ञ राहुल सांकृत्यायन 


हम जो कुछ भी हैं समाज की देन हैं।
जो समाज से मिला वह हम हो गए। 
फैशन में है सो बात में है।
फैशन में नहीं तो चर्चा में नहीं है।

टीचिंग, रिसर्च, एक्सटेंशन 

हर चीज के लिए अतीत की ओर देखते हैं
इतिहास वर्तमान सुधार के लिए। 
जबाव खोजने की प्रक्रिया बन्द तो हमारा जीना बन्द। 
समुदाय विविधता बिना कैसे?
समाज ही शिक्षा तय करता है, शिक्षा ही समाज तय करता है।
संवैधानिक मूल्य समता, स्वतन्त्रता, न्याय, बन्धुत्व
व्यष्टि से समष्टि की तरफ बढ़ना पड़ेगा
दिल की आवाज को सुन के देखो

Sunday, 28 December 2025

आर्य समाज द्वारा अंबेडकर मत का खंडन

आर्य समाज द्वारा

दूध का दूध पानी का पानी !

6 दिसंबर 1956 को माननीय डा. अंबेडकर जी का देहावसान हुआ । कानपुर के वैदिक गवेषक पंडित शिवपूजन सिंह जी का चर्चित 'भ्रांति निवारण' सोलह पृष्ठीय लेख 'सार्वदेशिक ' मासिक के जुलाई-अगस्त 1951अंक में उनके देहावसान के पांच वर्ष तीन माह पूर्व प्रकाशित हुआ । डा. अंबेडकर जी इस मासिक से भलीभांति परिचित थे और तभी यह चर्चित अंक भी उनकी सेवा में.भिजवा दिया गया था । लेख डा. अंबेडकर के वेदादि विषयक विचारों की समीक्षा में 54 प्रामाणिक उद्धरणों के साथ लिखा गया था। इसकी प्रति विदर्भ के वाशिम जनपद के आर्य समाज कारंजा के प्राचीन ग्रंथालय में सुरक्षित है।

आशा थी कि अंबेडकर जी जैसे प्रतिभाशाली विद्वान या तो इसका उत्तर देते या फिर अपनी पुस्तकें बताये गये अकाट्य तथ्यों की रोशनी में संपादित करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ऐसा इसलिये कि जो जातिगत भेदभाव और अपमान उन्होंने लगातार सहा उसकी वेदना और विद्रोह ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

डा. अंबेडकर जी की दोनों पुस्तकें - अछूत कौन और कैसे तथा शूद्रों की खोज - पर लेख शंका समाधान शैली में लिखा गया था पर डा. कुशलदेव शास्त्री जी ने इसे सुविधा और सरलता हेतु संवाद शैली में रुपांतरित किया है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस लेख को स्वामी जी द्वारा लिखित 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' के आलोक में पढ़कर सत्यासत्य का निर्णय सहर्ष लिया जा सकता है ।

1 - ' अछूत कौन और कैसे '

डा. अंबेडकर- आर्य लोग निर्विवाद रूप से दो हिस्सों और दो संस्कृतियों में विभक्त थे,जिनमें से एक ऋग्वेदीय आर्य और दूसरे यजुर्वेदीय आर्य , जिनके बीच बहुत बड़ी सांस्कृतिक खाई थी।ऋग्वेदीय आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे,अथर्ववेदीय जादू-टोना में।

पंडित शिवपूजन सिंह- दो प्रकार के आर्यों की कल्पना केवल आपके और आप जैसे कुछ मस्तिकों की उपज है।यह केवल कपोल कल्पना या कल्पना विलास है।इसके पीछे कोई ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।कोई ऐतिहासिक विद्वान भी इसका समर्थन नहीं करता।अथर्ववेद में किसी प्रकार का जादू टोना नहीं है।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद में आर्यदेवता इंद्र का सामना उसके शत्रु अहि-वृत्र (सांप देवता) से होता है,जो कालांतर में नाग देवता के नाम से प्रसिध्द हुआ।

पं. शिवपूजन सिंह- वैदिक और लौकिक संस्कृत में आकाश पाताल का अंतर है।यहाँ इंद्र का अर्थ सूर्य और वृत्र का अर्थ मेघ है।यह संघर्ष आर्य देवता और और नाग देवता का न होकर सूर्य और मेघ के बीच में होने वाला संघर्ष है।वैदिक शब्दों के विषय में.निरुक्त का ही मत मान्य होता है।वैदिक निरूक्त प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने के कारण ही आपको भ्रम हुआ है।

डा. अंबेडकर- महामहोपाध्याय डा. काणे का मत है कि गाय की पवित्रता के कारण ही वाजसनेही संहिता में गोमांस भक्षण की व्यवस्था की गयी है।

पं. शिवपूजन सिंह- श्री काणे जी ने वाजसनेही संहिता का कोई प्रमाण और संदर्भ नहीं दिया है और न ही आपने यजुर्वेद पढ़ने का कष्ट उठाया है।आप जब यजुर्वेद का स्वाध्याय करेंगे तब आपको स्पष्ट गोवध निषेध के प्रमाण मिलेंगे।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद से ही यह स्पष्ट है कि तत्कालीन आर्य गोहत्या करते थे और गोमांस खाते थे।

पं. शिवपूजन सिंह- कुछ प्राच्य और पाश्चात्य विद्वान आर्यों पर गोमांस भक्षण का दोषारोपण करते हैं , किंतु बहुत से प्राच्य विद्वानों ने इस मत का खंडन किया है।वेद में गोमांस भक्षण विरोध करने वाले 22 विद्वानों के मेरे पास स-संदर्भ प्रमाण हैं।ऋग्वेद से गोहत्या और गोमास भक्षण का आप जो विधान कह रहे हैं , वह वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के अंतर से अनभिज्ञ होने के कारण कह रहे हैं । जैसे वेद में'उक्ष' बलवर्धक औषधि का नाम है जबकि लौकिक संस्कृत में भले ही उसका अर्थ 'बैल' क्यों न हो ।

डा. अंबेडकर- बिना मांस के मधुपर्क नहीं हो सकता । मधुपर्क में मांस और विशेष रूप से गोमांस का एक आवश्यक अंश होता है ।

पं. शिवपूजन सिंह- आपका यह विधान वेदों पर नहीं अपितु गृह्यसूत्रों पर आधारित है । गृहसूत्रों के वचन वेद विरूध्द होने से माननीय नहीं हैं । वेद को स्वत: प्रमाण मानने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार," दही में घी या शहद मिलाना मधुपर्क कहलाता है । उसका परिमाण 12 तोले दही में चार तोले शहद या चार तोले घी का मिलाना है ।"

डा. अंबेडकर- अतिथि के लिये गोहत्या की बात इतनी सामान्य हो गयी थी कि अतिथि का नाम ही 'गोघ्न' , अर्थात् गौ की हत्या करना पड़ गया था ।

प. शिवपूजन सिंह- 'गोघ्न' का अर्थ गौ की हत्या करने वाला नहीं है । यह शब्द 'गौ' और 'हन' के योग से बना है। गौ के अनेक अर्थ हैं , यथा - वाणी , जल , सुखविशेष , नेत्र आदि। धातुपाठ में महर्षि पाणिनि 'हन' का अर्थ 'गति' और 'हिंसा' बतलाते हैं।गति के अर्थ हैं - ज्ञान , गमन , और प्राप्ति । प्राय: सभी सभ्य देशों में जब किसी के घर अतिथि आता है तो उसके स्वागत करने के लिये गृहपति घर से बाहर आते हुये कुछ गति करता है , चलता है,उससे मधुर वाणी में बोलता है , फिर जल से उसका सत्कार करता है और यथासंभव उसके सुख के लिये अन्यान्य सामग्रियों को प्रस्तुत करता है और यह जानने के लिये कि प्रिय अतिथि इन सत्कारों से प्रसन्न होता है नहीं , गृहपति की आंखें भी उस ओर टकटकी लगाये रहती हैं । 'गोघ्न' का अर्थ हुआ - ' गौ: प्राप्यते दीयते यस्मै: स गोघ्न: ' = जिसके लिये गौदान की जाती है , वह अतिथि 'गोघ्न' कहलाता है ।

डा. अंबेडकर- हिंदू ब्राह्मण हो या अब्राह्मण , न केवल मांसाहारी थे , किंतु गोमांसहारी भी थे ।

प. शिवपूजन सिंह- आपका कथन भ्रमपूर्ण है, वेद में गोमांस भक्षण की बात तो जाने दीजिये मांस भक्षण का भी विधान नहीं है ।

डा. अंबेडकर- मनु ने गोहत्या के विरोध में कोई कानून नहीं बनाया । उसने तो विशेष अवसरों पर 'गो-मांसाहार' अनिवार्य ठहराया है ।

पं. शिवपूजन सिंह- मनुस्मृति में कहीं भी मांसभक्षण का वर्णन नहीं है । जो है वो प्रक्षिप्त है । आपने भी इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया कि मनु जी ने कहां पर गोमांस अनिवार्य ठहराया है। मनु ( 5/51 ) के अनुसार हत्या की अनुमति देनेवाला , अंगों को काटने वाला , मारनेवाला , क्रय और विक्रय करने वाला , पकाने वाला , परोसने वाला और खानेवाला इन सबको घातक कहा गया है ।

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2- ' शूद्रों की खोज '

डा. अंबेडकर- पुरूष सूक्त ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिध्दि के लिये प्रक्षिप्त किया है।कोल बुक का कथन है कि पुरूष सूक्त छंद और शैली में शेष ऋग्वेद से सर्वथा भिन्न है।अन्य भी अनेक विद्वानों का मत है कि पुरूष सूक्त बाद का बना हुआ है।

पं. शिवपूजन सिंह- आपने जो पुरूष सूक्त पर आक्षेप किया है वह आपकी वेद अनभिज्ञता को प्रकट करता है।आधिभौतिक दृष्टि से चारों वर्णों के पुरूषों का समुदाय - 'संगठित समुदाय'- 'एक पुरूष' रूप है।इस समुदाय पुरूष या राष्ट्र पुरूष के यथार्थ परिचय के लिये पुरुष सूक्त के मुख्य मंत्र ' ब्राह्मणोSस्य मुखमासीत्...' (यजुर्वेद 31/11) पर विचार करना चाहिये।

उक्त मंत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण मुख है , क्षत्रिय भुजाएँ , वैश्य जङ्घाएँ और शूद्र पैर। केवल मुख , केवल भुजाएँ , केवल जङ्घाएँ या केवल पैर पुरुष नहीं अपितु मुख , भुजाएँ , जङ्घाएँ और पैर 'इनका समुदाय' पुरुष अवश्य है।वह समुदाय भी यदि असंगठित और क्रम रहित अवस्था में है तो उसे हम पुरूष नहीं कहेंगे।उस समुदाय को पुरूष तभी कहेंगे जबकि वह समुदाय एक विशेष प्रकार के क्रम में हो और एक विशेष प्रकार से संगठित हो।

राष्ट्र में मुख के स्थानापन्न ब्राह्मण हैं , भुजाओं के स्थानापन्न क्षत्रिय हैं , जङ्घाओं के स्थानापन्न वैश्य और पैरों के स्थानापन्न शूद्र हैं । राष्ट्र में चारों वर्ण जब शरीर के मुख आदि अवयवों की तरह सुव्यवस्थित हो जाते हैं तभी इनकी पुरूष संज्ञा होती है । अव्यवस्थित या छिन्न-भिन्न अवस्था में स्थित मनुष्य समुदाय को वैदिक परिभाषा में पुरुष शब्द से नहीं पुकार सकते ।

आधिभौतिक दृष्टि से यह सुव्यवस्थित तथा एकता के सूत्र में पिरोया हुआ ज्ञान , क्षात्र , व्यापार- व्यवसाय , परिश्रम-मजदूरी इनका निदर्शक जनसमुदाय ही 'एक पुरुष' रूप है।

चर्चित मंत्र का महर्षि दयानंद जी इसप्रकार अर्थ करते हैं-

"इस पुरूष की आज्ञा के अनुसार विद्या आदि उत्तम गुण , सत्य भाषण और सत्योपदेश आदि श्रेष्ठ कर्मों से ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न होता है । इन मुख्य गुण और कर्मों के सहित होने से वह मनुष्यों में उत्तम कहलाता है और ईश्वर ने बल पराक्रम आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त क्षत्रिय वर्ण को उत्पन्न किया है।इस पुरुष के उपदेश से खेती , व्यापार और सब देशों की भाषाओं को जानना और पशुपालन आदि मध्यम गुणों से वैश्य वर्ण सिध्द होता है।जैसे पग सबसे नीचे का अंग है वैसे मूर्खता आदि गुणों से शूद्र वर्ण सिध्द होता है।"

आपका लिखना कि पुरुष सूक्त बहुत समय बाद जोड़ दिया गया सर्वथा भ्रमपूर्ण है।मैंने अपनी पुस्तक " ऋग्वेद दशम मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात " में संपूर्ण पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों के इस मत का खंडन किया है कि ऋग्वेद का दशम मण्डल , जिसमें पुरूष सूक्त भी विद्यमान है , बाद का बना हूआ है ।

डा. अंबेडकर- शूद्र क्षत्रियों के वंशज होने से क्षत्रिय हैं।ऋग्वेद में सुदास , तुरवाशा , तृप्सु,भरत आदि शूद्रों के नाम आये हैं।

पं. शिवपूजन सिंह- वेदों के सभी शब्द यौगिक हैं , रूढ़ि नहीं । आपने ऋग्वेद से जिन नामों को प्रदर्शित किया है वो ऐतिहासिक नाम नहीं हैं । वेद में इतिहास नहीं है क्योंकि वेद सृष्टि के आदि में दिया गया ज्ञान है ।

डा. अंबेडकर- छत्रपति शिवाजी शूद्र और राजपूत हूणों की संतान हैं (शूद्रों की खोज , दसवां अध्याय , पृष्ठ , 77-96)

पं. शिवपूजन सिंह- शिवाजी शूद्र नहीं क्षत्रिय थे।इसके लिये अनेक प्रमाण इतिहासों.में भरे पड़े हैं । राजस्थान के प्रख्यात इतिहासज्ञ महामहोपाध्याय डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डी.लिट् , लिखते हैं- ' मराठा जाति दक्षिणी हिंदुस्तान की रहने वाली है । उसके प्रसिद्ध राजा छत्रपति शिवाजी के वंश का मूल पुरुष मेवाड़ के सिसौदिया राजवंश से ही था।' कविराज श्यामल दास जी लिखते है - ' शिवाजी महाराणा अजय सिंह के वंश में थे। ' यही सिध्दांत डा. बालकृष्ण जी , एम. ए. , डी.लिट् , एफ.आर.एस.एस. , का भी था।

इसी प्रकार राजपूत हूणों की संतान नहीं किंतु शुध्द क्षत्रिय हैं । श्री चिंतामणि विनामक वैद्य , एम.ए. , श्री ई. बी. कावेल , श्री शेरिंग , श्री व्हीलर , श्री हंटर , श्री क्रूक , पं. नगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य , एम.एम.डी.एल. आदि विद्वान राजपूतों को शूद्र क्षत्रिय मानते हैं।प्रिवी कौंसिल ने भी निर्णय किया है कि जो क्षत्रिय भारत में रहते हैं और राजपूत दोनों एक ही श्रेणी के हैं ।

- ' आर्य समाज और डा. अंबेडकर,

डा. कुशलदेव शास्त्री

(अरुण लवानिया)

Wednesday, 24 December 2025

gaur

मैं इलाहाबाद भी रहा ताकि उसे अपने व्यवसाय की संभावनाओं के हिसाब से परख सकूँ। लेकिन वहाँ मुझे इतना बड़ा मकान नहीं मिला जो मेरी किताबों को संभाल सके, दूसरा वहाँ की दलाली व्यवस्था जिससे मुझे बड़ी घृणा थी वहाँ जड़ पकड चुकी थी। 50-50 वहाँ की सामान्य दर थी और मेरा सम्मान व स्वाभिमान मुझे इस बिरादरी से सम्बंध बनाने से रोक रहा था। मेरेक्लर्क ने मुझे सुझाव दिया कि जब तक मैं अपनी स्थानीय वकील बिरादरी के तौर तरीकों को नहीं अपनाऊँगा। मेरा यहाँ कोई भविष्य नहीं होगा और उसकी सलाह सही साबित हुई। जिसके परिणाम स्वरूप मैंने नागपुर में रहने का निर्णय लिया।