Saturday, 25 April 2026
आवेशावतार परशुराम
आप तो विद्वान है प्रभु। आवेश यो क्षणिक होता है फिर चिरंजीवी भगवान परशुराम आवेशावतार कैसे हो गये ? नृसिंह भगवान को तो आवेशावतार कहा जा सकता है किन्तु पूरी पृथ्वी पर गौ, ब्राह्मण और देव निंदक सहसभुज तथा उसके समर्थकों का समूल नाश करने वाले, भगवान राम तथा कृष्ण को सारंग धनुष तथा वज्रनाभ नामक चक्र सुदर्शन प्रदान कर उन्हें विष्णुजी के पहिचान चिन्ह सौंपने वाले, गुरु द्रोण, भीष्म, कर्ण, बलदाऊ आदि के आचार्य गुरु, भगवान भोलेनाथ के एकमात्र शिष्य, अपने पराक्रम से समुद्र को सर्वदा के लिए पीछे धकेलकर मर्यादित करने वाले, कलियारपट्टू नामक एकल युद्ध विद्या के आविष्कारक, अत्रि की पत्नी अनुसूया एवं अगस्त की पत्नी लोपमुद्रा के साथ एकल विवाह का अभियान चलाने वाले, ब्रह्म पुत्र एवं राम गंगा नदियों को पृथ्वी पर लाने वाले आज भी उडीसा के गजपति जिले के महेन्द्रगिरि पर्वत पर तपस्यारत रत भगवान कलि के आचार्य बनने वाले भगवान को आवेशावतार कैसे कह सकते हैं ?
डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित हिंदू कोड बिल
डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित हिंदू कोड बिल भारतीय कानून के इतिहास में महिलाओं की मुक्ति और समानता का एक मील का पत्थर था। इसे 24 फरवरी, 1949 को संविधान सभा के समक्ष पेश किया गया था।
बाबा साहब का मानना था कि किसी भी समाज की प्रगति उस समाज की महिलाओं की प्रगति से मापी जानी चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने इस बिल के माध्यम से सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती दी थी।
हिंदू कोड बिल के मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे:
1. संपत्ति का अधिकार (Right to Property)
इस बिल से पहले महिलाओं को संपत्ति में केवल 'सीमित अधिकार' प्राप्त थे। बाबा साहब ने प्रस्ताव दिया कि:
• बेटियों को बेटों के बराबर संपत्ति का अधिकार मिलना चाहिए।
• विधवाओं को अपने पति की संपत्ति पर पूर्ण अधिकार होना चाहिए, जिसे वे अपनी मर्जी से बेच या हस्तांतरित कर सकें।
2. विवाह और तलाक (Marriage and Divorce)
प्राचीन व्यवस्था में विवाह को एक 'संस्कार' माना जाता था जिसे तोड़ा नहीं जा सकता था, भले ही महिला का उत्पीड़न हो रहा हो। बाबा साहब ने इसे 'कानूनी संविदा' (Legal Contract) के रूप में देखा और प्रस्तावित किया:
• एकविवाह (Monogamy): एक समय में केवल एक ही पत्नी रखने का नियम, ताकि पुरुषों द्वारा किए जाने वाले बहुविवाह को रोका जा सके।
• तलाक का अधिकार: महिलाओं को विशेष परिस्थितियों (जैसे क्रूरता या परित्याग) में वैवाहिक बंधन से मुक्त होने का कानूनी अधिकार दिया गया।
3. गोद लेने का अधिकार (Adoption)
पुराने नियमों के अनुसार, केवल पुरुष ही गोद ले सकते थे। बाबा साहब ने व्यवस्था दी कि:
• एक हिंदू महिला को भी बच्चा गोद लेने का स्वतंत्र अधिकार होना चाहिए।
• गोद लेने की प्रक्रिया में केवल जाति या कुल को आधार न बनाकर कानूनी पात्रता को महत्व दिया गया।
4. अंतर्जातीय विवाह (Inter-caste Marriage)
बाबा साहब जाति व्यवस्था को तोड़ने के पक्षधर थे। उन्होंने इस बिल में अंतर्जातीय विवाहों को कानूनी मान्यता प्रदान करने का प्रावधान रखा, ताकि सामाजिक असमानता को कम किया जा सके।
बिल का विरोध और इस्तीफा
इस क्रांतिकारी बिल का तत्कालीन रूढ़िवादी नेताओं और धार्मिक समूहों ने कड़ा विरोध किया। संसद के भीतर और बाहर भारी हंगामे के कारण यह बिल समय पर पास नहीं हो सका।
इस विरोध और सरकार के ढुलमुल रवैये से आहत होकर बाबा साहब ने सितंबर 1951 में कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने त्यागपत्र में स्पष्ट रूप से कहा था कि हिंदू कोड बिल को पारित न कर पाना उनके लिए सबसे बड़ी निराशा है।
बिल का भविष्य
हालांकि मूल बिल एक साथ पास नहीं हुआ, लेकिन बाद में प्रधानमंत्री नेहरू के कार्यकाल में इसे चार अलग-अलग हिस्सों में तोड़कर पारित किया गया:
1. हिंदू विवाह अधिनियम (1955)
2. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956)
3. हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम (1956)
4. हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (1956)
आज भारतीय महिलाओं को जो भी कानूनी अधिकार प्राप्त हैं, उनकी नींव बाबा साहब के इसी विजन ने रखी थी।
एडवोकेट रितु चौधरी जी ।
Saturday, 11 April 2026
पत्रकारिता का लोकधर्म
तीन तलाक के बराबर भी फारमल्टी की जरुरत नहीं समझते समाचार एजेन्सयों के मालिक।
राय-
संविधान की अनकही कहानी
संविधान सभा के पांव लड़खड़ा रहे थे।
मन में कुछ और था बना कुछ और
तीली लगाना चाहते है।
संतुलन ही लोकधर्म है।
अपने समय की सबसे बड़ी समस्या के समाधान में अपना दायित्व निर्वहन ही उसका लोकधर्म।
पत्रकार की छवि पुलिस जैसी क्यों है?
माधव सप्रे पेंण्ड्रा हिंदी के प्रथम पत्रकार।
स्वतन्त्रता संग्राम में हिन्दी पत्रकारिता
अखवार वही निकाल सकता है जो धनी हो।
प्रेस आयोग 1975
2nd press
1983
2009 m.m.joshi
पेड न्यूज
कमाई बसूल लेना पत्रकारों ने की
हिन्दी और भाषाई पत्रकारिता ने BP singh 1989 PM बनाया।
संपादक का क्षरण लोभ-लालच संपत्ति विस्तार
स्वयं संपादक बनने लगे।
आज संपादक नहीं प्रबंधक हैं।
स्रोत पवित्र नहीं तो परम्परा नहीं
राजेन्द्र माथुर की अकाल मृत्यु संपादकीय भष्टाचार
मीडिया काउंसिल नहीं बन रहा क्योंकि
मीडिया घराने और सरकार में सांठगांठ हो गई है।
मीडिया के लिए नियम और नियमन होना चाहिए।
पत्रकार संस्थान भ्रष्ट हो गये हैं।
नागरिक के पास फोरम नहीं है।
मीडिया में रोजगार के अवसर बढ़ें।
Monday, 6 April 2026
युधिष्ठिरस्य या कन्या नकुलेन विवाहिता। पूजिता सहदेवेन सा कन्या वरदा भवेत्।।
युधिष्ठिरस्य या कन्या नकुलेन विवाहिता। पूजिता सहदेवेन सा कन्या वरदा भवेत्।। द्ववीअर्थी श्लोक
युधिष्ठिर की जिस पुत्री का विवाह नकुल के साथ हुआ था, और सहदेव के द्वारा जिसकी पूजा की गयी, वह कन्या हमारे लिए वरदायिनी हो।
इस श्लोक का सही अर्थ निम्न है। यहाँ पर्यायवाची और व्याकरण की सुंदरता को बड़ी कुशलता से रखा गया है।
युधिष्ठिर नाम हिमालय का भी है। वे सदा अविचल भाव से खड़े रहते हैं। अतः पर्वतों को संस्कृत में भूधर, अचल, महीधर, युधिष्ठिर आदि के नाम से भी कहा गया है। यहाँ युधिष्ठिर का अर्थ पर्वत (हिमालय) है।
नकुल शब्द पर आईये। यहाँ पर नञ् तत्पुरुष समास का नियम लगा है। जिसका कोई कुल नहीं, वही नकुल है। अर्थात्, शिव जी। उनका कोई जनक नहीं। वे अनादि अजन्मा महादेव हैं, अतः न कुल हैं।
सहदेवेन। इस शब्द का दो अर्थ है। शब्दरूप के अनुसार, सहदेव के द्वारा। और कर्मधारय समास तथा तृतीया कारक के अनुसार अर्थ होगा, देव के साथ। तो अर्थ हुआ देव के साथ । यहाँ देव भी महादेव(शिव) के अर्थ में आया है।
अब सही तरीके से सही अर्थ लगाईये...
युधिष्ठिर (हिमालय) की जिस पुत्री का विवाह नकुल (शिव) के साथ हुआ, तथा (महा)देव के साथ जिसकी पूजा हुई, वह कन्या (पार्वती) हमारे लिए वरदायिनी हो।
प्रचलित (गलत) व्याख्या
यदि हम शब्दों का सीधा विच्छेद करें, तो ऐसा लगता है जैसे:
"युधिष्ठिर की कन्या का विवाह नकुल से हुआ..." — जो कि पौराणिक रूप से पूर्णतः असत्य है।
वास्तविक और सही अर्थ (संधि-विच्छेद के साथ)
इस श्लोक का रहस्य 'नकुलेन' और 'सह देवेन' शब्दों के संधि-विच्छेद में छिपा है।
1. नकुलेन (न + कुलेन):
यहाँ 'नकुल' पाण्डव नकुल नहीं हैं। इसका विच्छेद है: न + कुलेन।
कुलेन = उच्च कुल या खानदान में।
न = नहीं।
अर्थात: वह कन्या जिसका विवाह किसी (साधारण) कुल में नहीं हुआ।
2. सह देवेन (सहदेवेन):
यहाँ 'सहदेव' पाण्डव सहदेव नहीं हैं। इसका विच्छेद है: सह + देवेन।
देवेन सह = देवता के साथ (भगवान के साथ)।
3. युधिष्ठिरस्य कन्या:
महाभारत के पात्र युधिष्ठिर की कोई ऐसी कन्या नहीं थी। यहाँ 'युधिष्ठिर' का अर्थ है— 'युद्ध में स्थिर रहने वाला' या स्वयं धर्मराज। लेकिन लोक परंपरा में यहाँ 'गंगा' की ओर संकेत किया जाता है (जो शिव यानी महादेव के साथ पूजी जाती हैं)।
श्लोक का भावार्थ
"वह कन्या जिसका विवाह किसी मानवीय कुल में नहीं हुआ (न-कुलेन), अपितु जिसका मेल स्वयं महादेव/परमात्मा (सह-देवेन) के साथ हुआ है; वह पूजनीय कन्या हम सबको वरदान देने वाली हो।"
आसान शब्दों में:
यह श्लोक किसी पारिवारिक रिश्ते को नहीं, बल्कि एक दैवीय स्थिति को दर्शाता है। यहाँ मुख्य चातुर्य यह है कि सुनने वाले का ध्यान पाण्डवों (नकुल-सहदेव) की ओर जाए, जबकि वास्तविक अर्थ "बिना कुल के" और "देवता के साथ" है।
यह संस्कृत साहित्य की 'प्रहेलिका' (पहेली) शैली का एक उत्कृष्ट नमूना है।
Sunday, 5 April 2026
विवाह वचन
हिन्दू विवाहके सात वचन :
भारतीय नारीaहिन्दू धर्ममें विवाहके समय वर-वधूद्वारा सात वचन लिए जाते हैं । इसके पश्चात् ही विवाह संस्कार पूर्ण होता है । विवाहके पश्चात् कन्या वरसे पहला वचन लेती है कि-
प्रथम वचन इस प्रकार है –
तीर्थव्रतोद्यापनयज्ञ दानं मया सह त्वं यदि कान्तकुर्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद वाक्यं प्रथमं कुमारी।।
अर्थ – इस श्लोकके अनुसार कन्या कहती है कि स्वामी तीर्थ, व्रत, उद्यापन, यज्ञ, दान आदि सभी शुभ-कर्म तुम मेरे साथ ही करोगे तभी मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूं अर्थात् तुम्हारी पत्नी बन सकती हूं। वाम अंग पत्नी का स्थान होता है.
द्वितीय वचन इस प्रकार है-
हव्यप्रदानैरमरान् पितृश्चं कव्यं प्रदानैर्यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं द्वितीयकम्॥
अर्थ – इस श्लोकके अनुसार कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम हव्य देकर देवताओंको और कव्य देकर पितरोंकी पूजा करोगे तब ही मैं तुम्हारे वाम अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।
तृतीय वचन इस प्रकार है-
कुटुम्बरक्षाभरंणं यदि त्वं कुर्या: पशूनां परिपालनं च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं तृतीयम्॥
अर्थ – इस श्लोकके अनुसार कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम मेरी तथा परिवारकी रक्षा करो तथा घर के पालतू पशुओंका पालन करो तो मैं तुम्हारे वाम अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं।
चतुर्थ वचन इस प्रकार है –
आयं व्ययं धान्यधनादिकानां पृष्टवा निवेशं प्रगृहं निदध्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं चतुर्थकम्॥
अर्थ – चौथे वचनमें कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम धन-धान्य आदिका आय-व्यय मेरी सहमतिसे करो तो मैं तुम्हारे वाग अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।
पंचम वचन इस प्रकार है –
देवालयारामतडागकूपं वापी विदध्या:यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं पंचमम्॥
अर्थ – पांचवें वचनमें कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम यथाशक्ति देवालय, उद्यान, कुआं, तालाब, बावडी बनवाकर पूजा करोगे तो मैं तुम्हारे वाग अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।
षष्ठम(छठा) वचन इस प्रकार है –
देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदा विदध्या:क्रयविक्रये त्वम्।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं षष्ठम्॥
अर्थ – इस श्लोकके अनुसार कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम अपने नगरमें या विदेशमें या कहीं भी जाकर व्यापार या सेवा(नौकरी) करोगे और घर-परिवारका पालन-पोषण करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।
सप्तम(सातवां) वचन इस प्रकार है –
न सेवनीया परिकी यजाया त्वया भवेभाविनि कामनीश्च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं सप्तम्॥
अर्थ – इस श्लोकके अनुसार सातवां और अंतिम वचन यह है कि कन्या वरसे कहती है यदि तुम जीवनमें कभी पराई स्त्रीको स्पर्श नहीं करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।
शास्त्रोंके अनुसार पत्नीका स्थान पतिके वाम अंगकी ओर अर्थात् बाएं हाथकी ओर रहता है । विवाहसे पूर्व कन्याको पतिके सीधे हाथ अर्थात् दाएं हाथकी ओर बिठाया जाता है और विवाहके उपरांत जब कन्या वरकी पत्नी बन जाती है तब उसे बाएं हाथकी ओर बिठाया जाता है ।
प्रथम वचन (भोजन/तीर्थ): तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप यदि कभी तीर्थयात्रा, व्रत या यज्ञ करें तो मुझे साथ लेकर जाएं, तब मैं आपके वाम अंग में आऊंगी।
द्वितीय वचन (शक्ति): पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयं।
अर्थ: कन्या कहती है कि जैसे आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, वैसे ही मेरे माता-पिता का भी सम्मान करेंगे, तब मैं आपके वाम अंग में आऊंगी।
तृतीय वचन (समृद्धि): जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात, वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयम्।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवा, प्रौढ़, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करेंगे, तब मैं आपके वाम अंग में आऊंगी।
चतुर्थ वचन (पारिवारिक उत्तरदायित्व): कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ।
अर्थ: कन्या कहती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिंता से मुक्त थे, लेकिन अब मेरे परिवार की जिम्मेदारी भी आप उठाएंगे।
पंचम वचन (कार्य/व्यापार): स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं पञ्चम।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप अपने घर के कार्यों या व्यापार में जो भी व्यय या कर्म करें, उसमें मेरी सलाह भी लेंगे।
षष्ठ वचन (साथ/सामुदायिक मेलजोल): देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदा विदध्या:क्रयविक्रये त्वम्, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं षष्ठ।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप मुझे सखियों या अन्य स्त्रियों के बीच नहीं ले जाएंगे और न ही पराई स्त्री के प्रति आकर्षित होंगे।
सप्तम वचन (प्रेम/पति-पत्नी निष्ठा): परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तमत्र कन्या।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और हमारे आपसी प्रेम के बीच किसी तीसरे को नहीं आने देंगे।
इन वचनों के बाद ही विवाह संपन्न माना जाता है।
Tuesday, 31 March 2026
मेघदूत
न त्वं दृष्ट्वा न पुनरलकां ज्ञास्यसे कामचारिन्।
या वः काले वहति सलिलोद्गारमुच्चैर्विमाना,
मुक्ताजालग्रथितमलकं कामिनीवाभ्रवृन्दम् ॥
उदयति विततोर्ध्वरश्मिरज्जावहिमरुचौ हिमधाम्नि याति चास्तम्।*
वहति गिरिरयं विलम्बिघण्टाद्वयपरिवारितवारणेन्द्रलीलाम्॥
शिशुपालवधम् महाकाव्य 4/20
रैवतक
उत्प्रेक्षा और रूपक अलंकार
पदलालित्य और अद्भुत कल्पना शक्ति
Sunday, 22 March 2026
रीति
रीति सम्प्रदाय आचार्य वामन (९वीं शती) द्वारा प्रवर्तित एक काव्य-सम्प्रदाय है जो रीति को काव्य की आत्मा मानता है।[1] संस्कृत काव्यशास्त्र में 'रीति' एक व्यापक अर्थ धारण करने वाला शब्द है। लक्षणग्रंथों में प्रयुक्त 'रीति' शब्द का अर्थ ढंग, शैली, प्रकार, मार्ग तथा प्रणाली है। 'काव्य रीति' से अभिप्राय मोटे तौर पर काव्य रचना की शैली से है। रीतितत्व काव्य का एक महत्वपूर्ण अंग है। ‘रीति’ शब्द ‘रीड’ धातु से ‘क्ति’ प्रत्यय मिला देने पर बनता है। इसका शाब्दिक अर्थ प्रगति, पद्धति, प्रणाली या मार्ग है। परन्तु वर्तमान समय में ‘शैली’ (स्टाइल) के समानार्थी के रूप में यह अधिक समादृत है।
आचार्य वामन ने रीति सम्प्रदाय की प्रतिष्ठा की है। उन्होंने काव्यालंकार सूत्रवृत्ति में 'रीति' को काव्य की आत्मा घोषित किया है। उनके अनुसार 'पदों की विशिष्ट रचना ही रीति है' (विशिष्टपदरचना रीतिः)। वामन के मत में रीति काव्य की आत्मा है (रीतिरात्मा काव्यस्य)। उनके अनुसार विशिष्ट पद-रचना, रीति है और गुण उसके विशिष्ट आत्मरूप धर्म है।
विशिष्ट पदरचना रितिः।
विशिष्ट शब्द को स्पष्ट करते हुये वे कहते हैं -
विशेषो गुणात्मा।
वामन ने गुण को विशेष महत्व दिया है। रीति काव्य की आत्मा है और गुण रीति के कारणभूत वैशिष्ट्य की आत्मा है।
डॉ नगेन्द्र अपनी पुस्तक ’रीति काव्य की भूमिका’ में लिखते हैं कि-
रीति शब्द और अर्थ के आश्रित रचना चमत्कार का नाम है जो माधुर्य ओज और प्रसाद गुणों के द्वारा चित्र को द्रवित, दीप्त और परिव्याप्त करती हुयी रस दशा तक पहुँचाती है।
काव्य में रीति का विशेष महत्त्व है। रीति के अन्य परिभाषाकार कहते है कि काव्य में रीति पदों के संगठन से रस को प्रकाशित करने में सहायक होती है। इस प्रकार रीति का काव्य में वही स्थान है जो शरीर में आंगिक संगठन का है। जिस प्रकार अवयवो का उचित सन्निवेश शरीर के सौन्दर्य को बढाता है, शरीर को उपकृत करता है उसी प्रकार वर्णों का यथास्थान प्रयोग शब्द रूपी शरीर और अर्थ रूपी आत्मा के लिए विशेष उपकारक है।
आचार्य वामन ने रीति के तीन भेद तय किये हैं– वैदर्भी रीति, गौडी रीति, पाञ्चाली रीति। आचार्य दण्डी केवल दो ही भेद मानते हैं, वे पाञ्चाली का समर्थन नहीं करते। दण्डी, 'रीति' के स्थान पर 'मार्ग' शब्द का प्रयोग करते हैं। परवर्ती आचार्यो ने रीति के पाञ्चाली रीति न तो वैदर्भी की भांति समासरहित होती है और न गौडी की भांति समास-जटित। यह मध्यममार्ग है जिसमें छोटे-छोटे समास अवश्य मिलते हैं। इस रीति से काव्य भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी बनता है। अनुस्वार का प्रयोग न होने से यह वैदर्भी की तुलना में अधिक माधुर्य युक्त होती है।
‘पाञ्चाली’ रीति के सम्बन्ध मे कहा गया है – ‘माधुर्य सौकुमार्यो प्रपन्ना पांचाली’ । अर्थात, पांचाली में मधुरता और सुकुमारता होती है।
- उदाहरण
- मानव जीवन-वेदी पर, परिणय हो विरह-मिलन का।
- सुख-दुःख दोनों नाचेंगे, है खेल, आँख का मन का।
वैदर्भी रीति
संपादित करें
इसका प्रयोग विदर्भ देश के कवियों ने अधिक किया है, इसी से इसका नाम वैदर्भी पड़ा। इसका एक अन्य नाम 'ललिता' भी है। मम्मट ने इसे 'उपनागरिका' कहा है। वैदर्भी रीति के सम्बन्ध में आचार्य विश्वनाथ का कथन है –
माधुर्य व्यंजक वर्णे:रचना ललितात्मका ।
आवृत्तिरल्यवृत्तिर्या वैदर्भी रीति रिष्यते ॥
अर्थात माधुर्य व्यञ्जक वर्णों से युक्त, समासरहित ललित प रचना को ‘वैदर्भी’ रीति कहते हैं। यह रीति श्रृंगार रस, करुण रस एवं शान्त रस के लिए अधिक अनुकूल होती है।
रुद्रट के अनुसार यह समासरहित श्लेषादि दस गुणों और अधिकांशतः चवर्ग से युक्त, अल्प प्राण अक्षरों से व्याप्त सुन्दर वृत्ति है। इसमें सानुनासिक शब्द (जिन पर चन्द्र बिंदु लगा होता है या जिनका उच्चारण नाक सा होता है ) अधिकांशतः प्रयुक्त होते हैं। कालिदास इस रीति के प्रयोग में अत्यन्त प्रवीण थे। हिन्दी के रीतिकालीन कवियों ने इस रीति का भरपूर प्रयोग किया है। बिहारी के निम्नांकित दोहे में इस ‘रीति’ की छटा देखिये -
रस सिंगार मंजनु किये कंजनु भंजनु दै न ।
अंजनु रंजनु ही बिना खंजनु गंजनु नैन॥ (बिहारी सतसई )
( यहाँ पर अनुस्वार का भरपूर प्रयोग हुआ है, सामासिक पदावली नही है, चवर्ग छाया हुआ है, पद मे माधुर्य है।)
गौडी रीति को 'परुषा' भी कहते हैं। इसमें दीर्घ-समास-युक्त पदावली का प्रयोग उचित माना जाता है। मधुरता और सुकुमारिता का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है। इस दृष्टि से वीर रस, रौद्र रस, भयानक रस और वीभत्स रस की निष्पत्ति में गौडी रीति का भरपूर परिपाक होता है। युद्ध आदि वर्णन इस रीति के प्राण हैं। इसमें ललकार, चुनौती और उद्दीपन का बाहुल्य होता है। कर्ण-कटु शब्दावली और महाप्राण जैसे- ट ,ठ ,ड ,ढ ,ण तथा ह आदि का प्रयोग इसमें अधिक होता है। गौडी या परुषा रीति का काव्य कठिन माना जाता है।
आचार्य मम्मट इसे परिभाषित करते हुए कहते है है -
ओजः प्रकाशकैस्तुपरूषा (अर्थात जहाँ ओज गुण का प्रकाश होता है, वहां ‘परुषा’ रीति होती है।)
हिन्दी में गौडी रीति का एक उदाहरण देखिए-
देखि ज्वाल-जालु, हाहाकारू दसकंघ सुनि,
कह्यो धरो-धरो, धाए बीर बलवान हैं।
लिएँ सूल-सेल, पास-परिध, प्रचंड दंड
भोजन सनीर, धीर धरें धनु-बान है।
‘तुलसी’ समिध सौंज, लंक जग्यकुंडु लखि,
जातुधान पुंगीफल जव तिल धान है।
स्रुवा सो लँगूल, बलमूल प्रतिकूल हबि,
स्वाहा महा हाँकि-हाँकि हुनैं हनुमान हैं। (कवितावली)
पाञ्चाली रीति न तो वैदर्भी की भांति समासरहित होती है और न गौडी की भांति समास-जटित। यह मध्यममार्ग है जिसमें छोटे-छोटे समास अवश्य मिलते हैं। इस रीति से काव्य भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी बनता है। अनुस्वार का प्रयोग न होने से यह वैदर्भी की तुलना में अधिक माधुर्य युक्त होती है।
‘पाञ्चाली’ रीति के सम्बन्ध मे कहा गया है – ‘माधुर्य सौकुमार्यो प्रपन्ना पांचाली’ । अर्थात, पांचाली में मधुरता और सुकुमारता होती है।
उदाहरण
मानव जीवन-वेदी पर, परिणय हो विरह-मिलन का।
सुख-दुःख दोनों नाचेंगे, है खेल, आँख का मन का।
इस उदाहरण में अनुनासिक शब्द का अभाव है। जीवन-वेदी, विरह-मिलन और सुख-दुःख में समास है। कर्ण-कटु या महाप्राण का प्रयोग लगभग नहीं किया गया है। शान्त-रस का निर्वेद इसमें मुखर है। अतः यहाँ पर पांचाली रीति का सुन्दर निर्वाह हुआ है।
मुगल दरवारी
अवसरवादी, मुगल दरबारी जो,
उन भाट-बीरबलों के साथ लड़े।
मूलनिवासी दमन सहकर भी
मुगलों के सालों के साथ लड़े।
कब तक लड़ेगा उन लोंगों से,
सहकर भी तेरे साथ खड़े।
आँख खोल अपमान छोड़,
लक्ष्य, भारत एक साथ बड़े।
तिरस्कार अकेला कर देता,
सत्कार अपनापन भर देता।
दुर्योधन-द्रोण पन छोड़ भैय्या,
सोचो कैसे सब एक साथ बड़े?
दशरथ जातक
भगवान राम, भगवान बुद्ध के पूर्वज थे
जातक कथाओं में बुद्ध के पिछले जन्म के वर्णन मिलते हैं। दशरथ जातक, एक जातक कथा है जो पाली में सुत्त पिटक के खुद्दक निकाय में 461वीं जातक कथा के रूप में पाई जाती है।
कथा इस तरह से है। राम -पंडित अनासक्ति और आज्ञाकारिता नैतिकता से ओत प्रोत राजकुमार है जिसे उसके पिता राजा दशरथ ने बारह साल के वनवास पर इसलिए भेज दिया था क्योंकि दशरथ को डर था कि राज्य के लिए राम पंडित को उसकी सौतेली माँ द्वारा मार दिया जाएगा। राम-पंडित छोटे भाई, लक्खना -कुमार और सीता ने उनका वन जाने में अनुसरण किया। नौ साल बाद ही राजा की मृत्यु हो गई। सौतेली माँ के पुत्र भरत नैतिकता और करुणा की मूर्ति थे उन्होंने राज्याभिषेक करने से इनकार कर दिया; क्योंकि अधिकार उसके बड़े भाई का है। वे राम पंडित और अन्य दो की तलाश में गए जब तक कि वे नहीं मिल गए, और तीनों को उनके पिता दशरथ की मृत्यु के बारे में बताया।
लक्खण-कुमार और सीता दोनों पिता की मृत्यु का दुःख सहन नहीं कर सके, लेकिन राम चुप थे। उन्होंने कहा, दुःख तो अपने मृत पिता को वापस नहीं ला सकता, फिर दुःख किस बात का? सब कुछ अनित्य है. सभी श्रोता दुःखी हो गये। उन्होंने अपने पिता के प्रति अपना वचन निभाने के लिए उस समय राज्याभिषेक करने से इनकार कर दिया (क्योंकि उनका निर्वासन पूरा नहीं हुआ था) और इसके बदले राज्य पर शासन करने के लिए अपनी पादुकाएं दे दीं। निर्वासन के बाद, बोधिसत्व राज्य लौट आए और सभी ने इस कार्यक्रम का जश्न मनाया। फिर उसने 16,000 वर्षों तक बहुत बुद्धिमानी से राज्य पर शासन किया।
इस कथा में बुद्ध कहते हैं, सीता राहुल की मां, शुद्धोधन दशरथ, आनंद भरत और मैं यानी बुद्ध पिछले जन्म में राम था।
इसी तरह अनामक जातक में भगवान राम का वनवास, सीता हरण, बंदरों की सेना, रावण वध का उल्लेख किया गया है। रही बात अभिलेखित प्रमाण की तो कौशांबी में मिला प्रस्तर अभिलेख जो दूसरी शती ईस्वी पूर्व का है, उसमे अंकित है कि
कौशाम्बी के गृहपति इन्द्रघोश ने अपनी पत्नी के साथ भगवान राम की उपासना की थी ।
इंडोनेशिया से इराक तक, चीन से माया सभ्यता तक राम रमण कर रहे हैं।
नव बौद्ध राम को बुद्ध के बाद का मिथकीय चरित्र बताते हैं जबकि जातक कथाएं बुद्ध के अनुसार उनके पूर्व की कथाएं हैं। नव बौद्ध, भगवान बुद्ध की बात भी नही मानते।
मानसिक रूप से मतिमंद लोगों पर दया आती है।
28 बुद्धों का स्रोत
यह वर्णन त्रिपिटक के खुद्दक निकाय में 'बुद्धवंश' (Buddhavamsa) में मिलता है। गौतम बुद्ध ने स्वयं अपने पूर्व बुद्धों (जैसे दीपांकर, कश्यप आदि) का उल्लेख किया, जो विभिन्न कल्पों में अवतरित हुए। यह 28 बुद्धों की परंपरा दर्शाता है।
पुनर्जन्म और बुद्धत्व
बुद्ध अनात्म (no-self) सिद्धांत पर जोर देते थे, फिर भी पुनर्भव को स्वीकार किया—कर्म और चेतना की निरंतरता के रूप में, न कि आत्मा के। बुद्ध पदवी या अवस्था है, जो सम्यक् ज्ञान प्राप्त व्यक्ति को मिलती है; इसलिए 28 पूर्व बुद्ध संभव।
रामायण से भिन्नताएँ
रामायण: दशरथ अयोध्या के राजा; सीता जनक की पुत्री व राम की पत्नी; 14 वर्ष वनवास; रावण अपहरण।
दशरथ जातक: दशरथ वाराणसी राजा; सीता दशरथ की पुत्री (राम की बहन); कोई रावण/हनुमान/युद्ध नहीं; मात्र 12 वर्ष वनवास।
दशरथ जातक में राम (बोधिसत्व) का अंत सुखद और राजपाट के साथ होता है। यह रामायण के युद्ध-पूर्ण अंत से भिन्न है।
जातक कथा लोगों को मोरल शिक्षा देने के लिये ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर हर्षवर्धन काल तक लिखा गया। जिसमें पक्षी,जानवर और मनुष्य को आधार बनाया गया।मुख्य पात्र को पूर्व जन्म बुद्ध को इस जन्म का बौद्धिसत्व बताया गया।ताकि लोग बुद्ध का कहानी समझे।इस दशरथ जातक कथा का मूल संदेश था जीवन और मृत्यु एक सत्य घटना है। इसलिए मृत्यु पर शोक नहीं करना चाहिए।इसी दसरथ जातक कथा का विस्तरित रुप रामायण है।यह कथा है।इसका इतिहास से कोई लेना देना नहीं है।बुद्ध ने कभी पुनर्जन्म का बात नहीं किए हैं।जिस तरह की पुनर्जन्म की मान्यता हिन्दू धर्म में है।
फिर अठाईस बुद्ध कौन थे।बुद्ध से पहले सात बूद्ध का तो आर्कियोलॉजिकल प्रमाण है।बुद्ध कोई धर्म के जनक नहीं थे।वो धम्म प्रवर्तक थे। इसलिए उन्हें धम्म चक पवतक कहा जाता है।
ये भाई कथा समझते हो क्या होती है. एक कहानी इसमें राम बौद्ध सत्व है वैदिक राम नहीं इसमें शीता राम की बहिन है पत्नी नहीं. और जातक पढोगे तो हनुमान भी मिलेगे बानर जातक में. और लंका अवतार सुत्त जातक में रावण भी मिलेगा इन जातको की कहानियाँ जोड़ दीजिये रामायण बन जायेगी. लेकिन इन जातको में सभी किरदार बुद्ध के अनुयाई है
जातक कथाएं बहुत सारी हैं जो बुद्ध के कई सौ साल बाद बनाई गई, दान और त्याग की कहानियां दर्शाने के लिए उदाहरण के तौर पर
Saturday, 14 March 2026
क्या आपको कभी हैरानी नहीं होती की वर्तमान पौराणिक हिंदू समाज, बौद्ध संस्कृति के विरोध में खड़ा है अपशब्द (गाली) का प्रयोग करता है ?
शब्दों पर गौर करिए
बुद्ध से ..बुद्धू
जहां बुद्ध को बोध(ज्ञान)आया, उसका नाम... बोध गया
पीपल के नीचे बुद्ध को ज्ञान मिला तो पीपल पर भूत रहते हैं (बुद्ध ने आत्मा प्रेत ईश्वर को नकारा इसके विरोध में मृतक आत्माओं के लिए घड़े बांधते हैं)
देवनामप्रिय (अशोक के लिए) जिसका अर्थ मूर्ख
वैशाख नंदन (शाक्य मुनि बुद्ध) जिसका अर्थ गधा
सालभंजिका (बुद्ध की मां) संस्कृत में अर्थ वेश्या
सील से (स्त्री अपमानजनक) शीलभंग
भद्र से भदरा (पंचांग के अनुसार अशुभ घड़ी भद्रा)
भंते से भद्दा
(जैन मुनि केश लोचन करते हैं नग्न रहते हैं उनके लिए शब्द नंगा लुच्चा..)
नाथ पंथी सम्यक/श्रमण (बौद्ध)परंपरा से हैं गोरखनाथ के लिए गोरखधंधा
कबीर के लिए (बचपन में होली में अक्सर सुनता था) कबीरा सर र ...र
योगी गोरख के लिए जोगीरा सा रा ..रा र
बाल्मीकि रामायण में बुद्ध के लिए अपशब्द/गाली
अम्बेडकर शतकम्
परिचय
प्राचीन काल से ही संस्कृत काव्य लेखन की परम्परा अपने समृद्धिपूर्ण अतीत से अनुप्ररित होकर वर्तमान और भविष्य दोनों का मार्ग दर्शन करती आई है। स्वतन्त्रता आन्दोलन को जागूत करने में संस्कृत लेखकों को महत्त्वपूर्ण भूमिका थी तो स्वातन्त्र्योत्तर युग की राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति आधुनिक संस्कृत कवि कम जागरूक नहीं है। कविरत्न श्रीकृष्ण सेमवाल रचित 'भीम शतकम्' नामक वर्तमान काव्य भारतरत्न डॉ० भीमराव अम्बेडकर के जीवन दर्शन पर लिखा गया अत्याधुनिक शैली का शतक काव्य है। यह शतक अम्बेडकर जन्मशताब्दी के अवसर पर जातिवाद जैसे ज्वलन्त मुद्दे पर राष्ट्रीय संवाद उपस्थित करता है। भारतीय संविधान के निर्माता तथा राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के पक्षधर डॉ० भीमराव अम्बेडकर का सारा जीवन समाज को सर्मापित था। उन्होंने मूक तथा असहाय दलित समाज को एक नई चेतना प्रदान की। इन सभी उदात्त गुणों के कारण अम्बेडकर जननायक कहलाए किन्तु 'भीमशतकम्' ने उन्हें काव्य नायक की अमर कीति से अभिमण्डित किया है। वर्तमान कृति जातिवाद की अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन करती है। काव्य का कथ्य है कि भारतीय परिवेश में जातिवाद एक भ्रांतिमूलक विचार है जिसे प्रभुसत्तावादी अपने निहित स्वार्थों के कारण प्रचारित करते झाए हैं। भारतीय संस्कृति 'वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता पर आधारित है जिसके अनुसार समग्र मानव जाति एक और अविभाज्य है। यह वाल्मीकि युग से अम्बेडकर युग की ओर उन्मुख संस्कृत काव्यधारा का नवचिन्तन है और साथ ही दलित संस्कृत साहित्य की एक नूतन रचना भी। काव्य को बहुजनोपयोगी बनाने के उद्देश्य से संस्कृत पद्यों का हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद भी किया गया है और प्रारम्भ में भूमिका लेख के रूप में आधुनिक सस्कृत काव्य की पृष्ठभूमि का विवेचन हुआ है।
सन्देश
संस्कृत भारतीय जन मानस की आत्मा है जिससे भारत का अङ्ग प्रत्यङ्ग स्पन्दित होता आया है। वेदों से लेकर वर्तमान साहित्य का अवलोकन करने से विदित होता है कि संस्कृत ने "वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को समाज में आत्मसात् करने का निरन्तर प्रयास किया है। प्रस्तुत खण्ड काव्य "भीमशतकम्" इसी भावना की अभिव्यक्ति का प्रतीक है। डा० भीमराव अम्बेडकर एक सच्चे भारतीय एवं समाज सुधारक थे। उनका चिन्तन भारतीय दर्शन के मूलभूतसिद्धान्त पर आधारित था। वे दर्शन के "समानप्रसवा जातिः" के सिद्धान्त को लेकर निरन्तर संघर्षरत रहे। उनकी संकल्पशक्ति और अपने आदर्शों के प्रति समर्पण की भावना उत्कृष्ट थी। उनकी जन्मशती के पावन अवसर पर दिल्ली संस्कृत अकादमी के सचिव द्वारा लिखित यह खण्डकाव्य डा० अम्बेडकर के प्रति एक भावभीनी श्रद्धाञ्जलि है। साथ ही अकादमी ने हिन्दी एवं अंग्रेजी अनुवाद सहित इसका प्रकाशन करके एक प्रशंसनीय कार्य किया है। डा० भीमराव अम्बेडकर को उनकी जन्मशती पर काव्य धद्धाञ्जल को सर्मापत करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही रही है। इसके लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
मार्कण्डेय सिंह
शुभकामना
समस्त विश्व के दलितों के प्रेरणास्रोत डा० भीमराव अम्बेडकर मानव मात्र की कल्याण की भावना से अभिभूत होकर भारत में एक ऐसे वर्ग विहीन समाज की संरचना चाहते थे जिसमें जातिवाद, वर्गवाद एवं छोटे बड़े का प्रश्न ही न हो और प्रत्येक मनुष्य एक सम्मानपूर्ण जीवन जीता हुआ सुखी रह सके। इस कार्य के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया। उनके तीन मन्त्र शिक्षित बनो, संगठित होओ व संघर्ष करो, आज प्रत्येक दलित के दिलो दिमाग में घर कर गये है। आज जो जागृति हम दलित समाज में देख रहे हैं यह उनके संघर्ष व मार्गदर्शन का ही फल है। ऐसे आदर्श व्यक्तित्व पर विश्व की प्राचीनतम भाषा संस्कृत में सर्वप्रथमदिल्ली संस्कृत अकादमी के सचिव श्री श्रीकृष्ण सेमवाल ने "भीमशतकम्" नामक इस काव्य को लिखकर महनीय कार्य किया है। श्री सेमवाल द्वारा लिखित उक्त काव्य का मैंने आध्योपान्त अवलोकन किया। कवि ने डा० अम्बेडकर की भावनाओं का गम्भीर एवं सूक्ष्म वर्णन कर उनके प्रति अपनी श्रद्धा अभिव्यक्त की है जो बाबा साहब डा० अम्बेडकर के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विशेष महत्वपूर्ण है। श्री सेमवाल संस्कृत के एक सर्पित कार्यकर्त्ता, विद्वान् एवं उदार दृष्टि वाले व्यक्ति हैं। उनके इस श्रेष्ठतम कार्य के लिए हार्दिक बधाई । शुभकामना
गंगादास
शुभकामना
डा० भीमराव अम्बेडकर की जन्मशती पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर दिल्ली संस्कृत अकादमी के सचिव कविरत्न श्री श्रीकृष्ण सेमवाल ने संस्कृत भाषा में "भीमशतकम्' नामक काव्य लिखकर संस्कृत जगत् में एक क्रान्तिकारी कदम उठाया है। उनका यह कार्य दलित जनों को संस्कृत के अध्ययन की ओर अधिकाधिक प्रवृत्त होने के लिए सर्वतोभावेन उपयोगी सिद्ध होगा। श्री सेमवाल संस्कृत के सिद्ध कवि एवं एक कर्तव्य निष्ठ अधिकारी है। उनकी इस उत्तम रचना के लिए मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूँ और साथ ही इस अवसर पर डा० अम्बेडकर को अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करता हूँ।
कालीचरण गौतम
भूमिका
साहित्य समाज का दर्पण है' इसलिए साहित्यकार अपने युग सत्यों को उपेक्षा नहीं कर सकता। विश्व सभ्यता के इतिहास में संस्कृत साहित्य की उत्कृष्टता का एक मुख्य कारण यह भी है कि संस्कृत भारती ने युग संघर्षों के ज्वार भाटा को अपने उदर में समेटा है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक आर्य आर्येतर, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम आदि सभी सांस्कृतिक आवेग स्थायीभाव बनकर संस्कृत काव्य मञ्जरी को रसात्मकता प्रदान करते आए हैं। वैचारिक आदान-प्रदान तथा आत्मसात्करण की प्रवृत्ति ऋग्वैदिक काल में ही प्रारम्भ हो चुकी थी। उपनिषत्काल में याज्ञवल्क्य शाण्डिल्य जैसे ब्राह्मणों ने, जनक अश्वपति कैकेय आदि क्षत्रियों ने तथा समुग्व रैक्व आदि शूद्रों ने तत्कालीन साहित्य और चिन्तनधारा को अपना बहुआयामो योगदान दिया था। विश्व की शायद ही कोई प्राचीन सभ्यता होगी जहां तत्त्वचिन्तन के उद्भव तथा विकास में स्त्रियों की विशेष भागीदारी रहो हो किन्तु भारतीय सभ्यता को यह श्रेय भी जाता है कि उसने ऋग्वेद काल में ही अपाला, विश्ववारा, घोषा जैसी स्त्री-ऋषियों को जन्म दिया तथा उपनिषद् युग में मैत्रेयी, गार्गी, वाचकण्वी जादि महिला दार्शनिकों को प्रतिष्ठा के उन्नत शिखर तक पहुंचाया। प्राचीन काल में शौला, विज्जिका, सुभद्रा, मरूला, मोरिका आदि ऐसी प्रसिद्ध कर्यायत्रियां हो चुकी हैं जो काव्य-सूजन के क्षेत्र में पुरुष कवियों से किसी भी प्रकार कम नहीं थीं। वस्तुतः संस्कृत साहित्य में एक विलक्षण प्रकार की अनेकता विद्यमान है। संस्कृत साहित्य के विषय में यह धारणा बनाना कि
यह एक विशिष्ट वर्ग अथवा धर्म की भाषा है सर्वया अनुचित है। वैदिक धर्म के अनुयायियों की यह मुख्य भाषा रही थी तो जैन तथा बौद्ध लेखकों ने भी इसो भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय संवाद किए। बौद्ध लेखक अश्वघोष, धर्मकीति, दिङ्नाग तथा जैन लेखक, रविषेण, सोमदेव, हेमचन्द्र आदि का क्रान्तिदर्शन संस्कृत भाषा के माध्यम से हो मुखरित हुआ है। वर्णव्यवस्था, वेदप्रामाण्य, ईश्वरवाद आदि अवधारणाओं के बारे में भिन्न-भिन्न वाद-प्रतिवाद हो सकते हैं किन्तु 'वादे वादे जायते तत्त्वबोधः' की समग्रता तक पहुंचाने वाली यदि कोई भाषा हो सकती है तो वह संस्कृत भाषा ही है। इसलिए वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि कवि ने तो यह उद्घोषित ही कर दिया- पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति कवि का काव्यकर्म शून्य में घटित नहीं होता। पुरुषार्थ- चतुष्टय मनुष्य और काव्य दोनों का साध्य है। अतएव संस्कृत- जगत् में कवि को प्रजापति, क्रान्तदर्शी, युगद्रष्टा आदि भिन्न भिन्न उपाधियों से विभूषित किया जाता है। एक प्रसिद्ध मान्यता यह भी रही है कि काव्य-प्रणेता तथा उसमें वर्णित काव्य-नायक दोनों ही काव्य-शरीर का आश्रय पाकर, धन्य, महान् और लोक विश्रुत हो जाते हैं- ते
धन्यास्ते महात्मानस्तेर्षा लोके स्थितं यशः । यंनिबद्धानि काव्यानि ये वा काव्येषु कोतिताः ।।
यह भारत भारती के लिए गौरवास्पद है कि भारत रत्न डा० भीमराव अम्बेडकर की जन्म शताब्दी के अवसर पर कवि रत्न श्रीकृष्ण सेमवाल रचित 'भीमशतकम्' से ब्रह्मा दो दायित्वों से एक साथ मुक्त हो गए। प्रथम तो इसलिए क्योंकि उन्होंने दलित कल्याण के मसोहा अम्बेडकर जैसे मानव रत्न को पृथ्वी पर जन्मदिया। दूसरा, इसलिए क्योंकि कविरत्न सेमवाल को प्रेरित किया कि वे संस्कृत काव्य गिरा में दलित साहित्य का सूजन करें-
भूमौ जन्म प्रदायेतं रत्नमत्यन्तमद्भुतम् । बह्यापि भारमुक्तोऽभूत् दलितानां हिते रतः ।।
भीमशतकम्, १८
भारतीय काव्य परम्परा के आदि कवि महर्षि वाल्मीकि माने जाते हैं। परवर्ती काल में महर्षि वाल्मीकि दत्रित समाज के सर्वाधिक पूज्यनीय और प्रेरक धर्माचार्य भी बन गए । आज भारतीय साहित्य और संस्कृति के इस मूल उत्स 'बाल्मीकि विन्दु' को रूपाकार देने की महान आवश्यकता आ पड़ी है। कम से कम भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा को पहचानने वाले संस्कृत कवियों और संस्कृत काव्य समीक्षकों को इस दिशा में रचनात्मक कार्य करने का विशेष अभियान चलाना चाहिए। यह सृष्टि का शाश्वत धर्म है कि कोई न कोई शिकारी काम-मोहित क्रौञ्च-द्वन्द्व में से किसी एक की हत्या करके वातावरण को शोकाकुल कर देता है और तब फूटती है शोकाकुल काव्य वाणी-
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत् क्रौञ्चमियुनादेकमवधीः काममोहितम् ।। -
रामायण, बाल०, २०१५ हर युग में न तो वाल्मीकि पैदा होते हैं और न ही 'रम्या रामायणी कथा' रची जाती है पर क्रौञ्चन्द्वन्द्व के वियोग का दुःख हर युगवासी को झेलना पड़ता है। वर्तमान 'भीमशतकम' का कवि हृदय भी इसी दुःख से उद्वेलित होकर काव्य की पृष्ठभूमि की ओर संकेत कर रहा है-
हा हन्त सोदति मनो नितरां मदीयं, सम्बोक्ष्य वर्गरहितस्य समाजकर्तुः । वर्षेऽधुना सुविमले सकले शताब्द्याः, संघर्षवर्गपरकः परिवीक्ष्यतेऽत्र ।॥ -
भोमशतकम्, १३
'भीमशतकम्' के नायक डॉ० भीमराव अम्बेडकर हैं। इन्होंने धर्मनिरपेक्ष, समाजवाद और लोकतन्त्र की आस्था से संवलित भारतीय संविधान को मूर्त रूप प्रदान किया। समाज में दलितों तथा शोषितों को अपमानित जीवन मूल्यों से मुक्त कराने की अदम्य इच्छा शक्ति से वे सन्तप्त थे और परम कारुणिक गौतम बुद्ध के दुःख निवारण की भाँति उन्होंने भी अस्पृश्यता निवारण का संकल्प ले लिया था-
अपमानस्य दुःखेन दग्धस्तप्तस्तपोधनः । अस्पृश्यता विनाशायं दृढ़संकल्पपरोऽभवत् ।। -
भीमशतकम्, ५५
कवि के लिए यह युक्तिसंगत ही था कि वह इस अम्बेडकर चरित का मंगलाचरण भगवान बुद्ध को प्रणाम करके करता और तदनन्तर उस संस्कृत भाषा का भी आदरभाव से स्मरण करता जिसके लालित्य एवं अर्थ गौरव में युगपुरुषों को काव्य पुरुष बनाने को एक अद्भुत शिल्प योजना विद्यमान है-
गौतमं प्रथमं नत्वा नत्वा सर्वाम्गुणोत्तमान् । लिखामि शतकं रम्यं भीमरावस्य साम्प्रतम् । संस्कृतं प्रति श्रद्धासीत् यस्य चित्ते निरन्तरम् । तस्यामेव सुवाण्यान्ते लिख्यते चरितं मया ।। -
भीमशतकम्, १-२
आधुनिक संस्कृत साहित्य के सन्दर्भ में कवि रत्न श्रीकृष्ण सेमवाल का 'भीमशतकम्' काव्य एक सर्वथा नवीन प्रयोग हो- ऐसी बात नहीं है। सामान दो चरणों में विभाजित स्वातन्त्र्योत्तर युग। आ से अछूता नहीं रहा पर क वह जुड़ा रहा। स्वतन् साहित्यकारों की भी संस्कृत का कवि अपने युग करता आया है। स्वतन विनायकभट्टकृत 'अंग्रेज तिरुमल बुक्क पट्टनम् श्वराचार्यकृत 'कर्जनप्रशसि आदि काव्य उल्लेखनीय चन्द्र बोस, लोकमान्य तिम लाल बहादुर शास्त्री, इनि गाँधी आदि राजनैतिक नेता स्वामी दयानन्द, मषि दर्शन संस्कृत काव्यधारा पर पद्म शास्त्री ने 'ले लिखा। इनके अतिरिक्त संस्कृत का लेखक जागरूक श्रीकृष्ण सेमवाल वा का प्रतिनिधित्व करते हैं ि माना बल्कि समसामयिक संस्कृत काव्य धारा की 'पीयूषम्', 'सर्वमङ्गलाशत तथा 'व्यावहारिक संस्कृता जिनकी संस्कृत जगत् में आधुनिक पुरुषों को ऐसी बात नहीं है। सामान्यतया आधुनिक संस्कृत काव्य को मुख्यतः दो चरणों में विभाजित किया जाता है- स्वातन्त्र्यपूर्व युग तथा स्वातन्त्र्योत्तर युग। आधुनिक संस्कृत रचनाकार अपने युगबोध से अछूता नहीं रहा पर साथ ही काव्य की पुरातन परम्परा से भी वह जुड़ा रहा। स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में संस्कृत साहित्यकारों की भी अहम् भूमिका रहती आई है किन्तु संस्कृत का कवि अपने युग चरितों का भी तटस्थ भाव से बखान करता श्राया है। स्वतन्त्रतापूर्व की संस्कृत रचनाओं में जहाँ विनायकभट्टकृत 'अंग्रेजचन्द्रिका', उर्वीदत्तकृत 'एडवर्डवंशम्', तिरुमल बुक्क पट्टनम् कृत 'आंग्लजर्मनीयुद्धविवरणम्', धीरे- श्वराचार्यकृत 'कर्जनप्रशस्तिः', रामावतार शर्माकृत 'जाजंप्रशस्तिः' आदि काव्य उल्लेखनीय हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के jiउपरान्त सुभाष चन्द्र बोस, लोकमान्य तिलक, महात्मा गान्धी, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इन्दिरा गाँधी, हेमवतोनन्दन बहुगुणा, राजीव गाँधी आदि राजनैतिक नेताओं तथा रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, मषि अरविन्द आदि युगचिन्तकों का जीवन दर्शन संस्कृत काव्यधारा का अंग बना है। रूस के लेनिन के जीवन पर पद्म शास्त्री ने 'लेनिनामृतम्' नामक एक रमणीय काव्य लिखा। इनके अतिरिक्त भी समसामयिक युग समस्याओं के प्रति संस्कृत का लेखक जागरूक रहता आया है। श्रीकृष्ण सेमवाल आधुनिक संस्कृत कवियों की उस परम्परा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्होंने काव्य को केवल वाग्विलास ही नहीं माना बल्कि समसामयिकता के प्रति भी कवि के दायित्व को समझा संस्कृत काव्य धारा की प्राचीन कड़ी से जुड़ते हुए सेमवाल रचित 'पीयूषम्', 'सर्वमङ्गलाशतकम्', 'हनुमत्युप्रभातम्', 'जगदम्बासुप्रभातम्' तथा 'व्यावहारिक संस्कृतम्' ऐसी परम्परानिष्ठ काव्य कृतियां हैं जिनकी संस्कृत जगत् में पर्याप्त प्रशंसा हुई है। दूसरी ओर उन्होंने आधुनिक पुरुषों को आधार बनाकर 'इन्दिराकीतिशतकम्', रा आज संस्कर हो अत्यन्त क दो कर xix एत अभिशप्त है। इस काव्य को पढ़ने पर भ्रम होने लगता है कि लालित्य पूर्ण पदावली में साहित्य सृजन कर रहा है? या के शासक वर्ग के समक्ष आम जनता की दुर्दशा का विज्ञप्तिपत्र महाप्रयाणम्', 'हिमाद्विपुषाभिनन्दनम्' जैसे काव्यों की रचना करके इस तथ्य को रेखांकित किया है कि संस्कृत भाषा आज भी एक जीवन्त भाषा है। उनका 'भीमशतकम्' आधुनिक संस्कृत काव्य धारा की अत्याधुनिक रचना है। इस काव्य का नाम हो आधुनिक नहीं अपितु इसमें पल्लवित विचार वल्लरी भी अत्यन्त प्रगति- शील है। कुछ वर्ष पहले जोधपुर विश्वविद्यालय में सम्पन्न आधुनिक संस्कृत साहित्य पर हुई संगोष्ठी में यह तथ्य उभर कर आया है कि संस्कृत काव्य धारा अपने अतीत तथा वर्तमान दोनों के प्रति सजग होकर रचना धर्मिता का दायित्व वहन कर रही है। संस्कृत कविता अपनी रचना चातुरी में चाहे जितनी समृद्ध औ होर सम्पन्न लगती हो किन्तु वह अपने जनाधार की विपन्नता और दरिद्रता से अनभिज्ञ नहीं। संस्कृत का कवि भले ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश को उपमा-त्रिपुटी से अपनी काव्य भाषा को अलंकृत करता है किन्तु उसका कवि हृदय इस चिन्ता से ग्रस्त है कि आज भारतीय जनमानस को स्वतन्त्रता, समानता और सहिष्णुता का अपेक्षित न्याय नहीं मिल सका है। काव्यशास्त्रीय समृद्धि और समाजशास्त्रीय दैन्य भाव आधुनिक संस्कृत काव्य को विरोधाभास से अलंकृत कर रहे हैं। 'इन्दिरागांधीचरितम्' के रचयिता डॉ० सत्यव्रत शास्त्री की यह काव्य जिज्ञासा है कि निरन्तर रूप से मेहनत-मजदूरी करने के बाद भी हमारे देशवासी दीन और दरिद्र क्यों रहते हैं- अनारतं ये श्रममाचरन्ति तथापि दीनाइच दरिद्विताश्च । -इन्दिरा०, १५।७ परमानन्द शास्त्री के 'जनविजय' काव्य में आधुनिक भारत के कर्णधारों से वे ढेर सारे प्रश्न किए गए हैं जिनसे आज समय जातिप्रथायाः XX
भारत अभिशप्त है। इस काव्य को पढ़ने पर भ्रम होने लगता है कि कवि लालित्य पूर्ण पदावली में साहित्य सृजन कर रहा है? या देश के शासक वर्ग के समक्ष आम जनता की दुर्दशा का विज्ञप्तिपत्र प्रस्तुत कर रहा है? 'जनविजय' काव्य का लेखक पूछता है कि आखिर इस देश का जनमानस भला कब तक भूखे पेट रह कर बिना वस्त्र और मकान के जीता रहेगा ? भला कब तक श्वानवृत्ति द्वारा टूक पाने के लिए उसे दर दर भटकना पड़ेगा ? मजदूर के शारीरिक श्रम से दूसरे लोग कब तक अपना घर भरते रहेंगे ? रिश्वत खोर भेड़िये आखिर कब तक इस दीन-हीन भारत- वासी का मांस भी नौंचते रहेंगे-
रिक्तोदरस्याधिनिपीडितस्य बासो विहीनौषधवञ्चितस्य । किच्विरं भो मम बालवृन्दं शिलां विना भ्राम्यति कुक्कुर। भम् । धमोमदोवस्तु किर्याच्चरं भो परस्य गेहूं मम चंव देहम् । उत्कृत्य कृत्ति मृगवद्विहित्र रुत्कोचलुब्धः कियदस्मि भक्ष्यः ॥ -
जनविजयम्, १५।५-१०
वस्तुतः स्वातन्त्र्योत्तर भारत की मुख्य समस्याओं जैसे भाषा- वाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद पर समकालीन संस्कृत कवियों ने जमकर लेखनी चलाई है। उदाहरणार्थ 'तर्जनी' काव्य के सुप्रसिद्ध लेखक दुर्गादत्त शास्त्री ने जातिवाद की मिथ्या धारणा को एक राष्ट्रीय अभिशाप के रूप में देखा है-
ववति जन्मना शूद्रमिह योऽन्यमतिर्नरः । भूत्वा मिथ्याभिमानी स हरित राष्ट्र स्वभावतः ।।
तर्जनी, ३/३५
आधुनिक संस्कृत काव्य में प्रतिबिम्बित युगबोध की दृष्टि से वर्तमान 'भीमशतनाम्' की परीक्षा की जाए तो स्पष्ट कहा जा सकता है कि इस काव्य का नायक जातिप्रथा रूपी भयंकर सर्पों से डसा हुआ एक 'उत्पीडित नायक' है- आदि सभी समान है। जन्म, मृत्यु, मंत्री, शत्रुता, मुख, दुःख आदि
जातिप्रथायाः विकरालकालः दुष्पीडितोऽयं भुवि भीमरावः । तन्नाशनायात्र कृतप्रतिज्ञः स्वे कर्मणि प्रोनिपरोऽभवद् वं ॥ भीमशतकम्, ३४
दरअसल, श्रीकृष्ण सेमवाल की 'भोमशतकम्' अम्बेडकर शताब्दी के उपलक्ष्य में जातिवाद जैसे ज्वलन्त मुद्दे पर राष्ट्रीय संबाद उपस्थित करती है। शास्त्रों में जाति की परिभाषा की गई है- समानप्रसवात्मिका जातिः' अर्थात् समान नस्ल की वस्तु को 'जाति' कहते है। इस परिभाषा के सन्दर्भ में संसार के सभी बड़े और छोटे मनुष्य 'मानवजाति' का अंग हैं। उनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र के रूप में जातिगत भेद अयुक्ति संगत है। इसी भारतीय तत्त्व चिन्तन को कवि ने स्पष्ट करते हुए कहा है- यत्रापि कुत्रापि विलोक्यते भृशं वास्त्रेषु जातेस्तु विवेचनं भुवि । मनुष्यरूपे च पशु स्वरूपे, जातेस्समः गयान मिहैव दृश्यते । - भीमशतकम्, ३१ 'मनुष्य' का व्यावर्त्तकधमी पद्म' है। सिह आदि हिंसक व्यवहार के कारण 'अस्पृश्य' हैं न कि मनुष्य -
सर्वादयो विययुक्ताः भुवि जन्तवो ये, वदावस्समस्ताः । एतेऽस्पृशाः किल च सन्ति न वा मनुष्याः किन्नो बुधः किर्माप तत्र विचारितं कदा ।।
भीमशतकम्, ३०
संसार में सभी मनुष्य समान शारीरिक विशेषताओं से युक्त होते हैं। उनका बोलना, चलना, देखना, सोचना, हंसना, रोना वर्गों में विभाजित करना प्रमाण एवं नयों आदि सभी समान है। जन्म, मृत्यु, मैत्री, शत्रुता, सुख, दुःख आदि मनुष्यों में समान रूप से व्यापते हैं। एक हो धरती और आकाश में वे रहते हैं। जल, अन्न, वस्त्रादि सब कुछ समान है फिर संसार में अस्पृश्यता केसी -
वाणी समाना गमनं समानं, दृष्टिः समाना हृदयं समानम् । भावाः समानाः हसनं समानं, ततोऽस्पृश्यत्वं कथमत्र जातो ।
भोमशतकम्, २७
कवि का मानना है कि अनवरत रूप से अपनी प्रभुसत्ता बनाए रखने के लोभ से राजबल ने इस जातिवादी कुमार्ग को संरक्षण प्रदान किया है-
स्वकोय वैशिष्ट्यविभावनाय, विकासितोऽयं कुपयो विनाशी। रनारतं राजबलेन लोके । - भीमशतकम्, ३३
'भीमशतकम्' में जातिभेद की जिस अवधारणा का खण्डन किया गया है प्राचीन भारतीय साहित्य में उसके पूर्व इतिहास को भी खोजा जा सकता है। बौद्ध तथा जैन लेखकों ने जातिवाद की कटु आलोचना की है। सातवी-आठवीं शताब्दी में जैन महाकवि जटासिह नन्दि ने जाति व्यवस्था के विरोध में लगभग वैसे हो तर्क दिए है जैसे 'भोमशतकम्' में निबद्ध हैं। जटासिह की मान्यता है कि सत्युग में किसी प्रकार का वर्ण विभाजन नहीं था किन्तु त्रेता- युग में कुछ स्वार्थी लोगों ने अपनी सेवा कराने के उद्देश्य से भूत्य- वर्ग की नींव डाली। वस्तुतः मनुष्य जाति एक है। उसे चार अकारणञ्च भवति दुष्प्रकृतेरस्वयः श्रुतं चाऽविनयस्य ।
वर्गों में विभाजित करना प्रमाण एवं नयों को दृष्टि से भी अनुचित है -
अस्त्येक एवात्र यदि प्रजानां कयं पुनर्जातिवतुष्त्रभेदः । प्रमाणदृष्टान्तनयप्रवादः परीक्ष्यमाणो विघटामुपेति ।। । वराङ्गचरित२५१२
जटासिह कहते हैं कि रङ्ग अर्थात् वर्ण की दृष्टि से मनुष्य जाति की नस्ल को विभाजित करना भी सर्वथा अनुपयुक्त है क्योंकि व्यवहार में देखा यह जाता है कि ब्राह्मण चन्द्रकिरणों के समान श्वेत नहीं होते, क्षत्रिय भी किशुक पुष्प के समान गौरवर्ण नहीं होते, वैश्य हरिताल पुष्प के समान हरे रंग के नहीं होते और शूद्र भी कोयले के समान कृष्ण वर्ण के नहीं होते-
न ब्राह्मणाश्चन्द्रमरीचिशुभ्रा न क्षत्रियाः किंशुकपुष्यगौराः । न चेह वंश्या हरितालतुल्याः शूद्रा न चाङ्गारसमानवर्णाः ॥ - वराङ्गचरित, २५।७
व्यवसाय के आधार पर किसी वर्ग को ऊँचा मानना और निम्न कार्य करने वाले व्यक्ति को घृणित मानना महाकवि कालिदास के मत में सर्वथा अनुबित है। अभिज्ञानशाकुन्तल के धीवर प्रसंग में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि किसी भी निम्न पेशे के व्यक्ति को हेय कैसे समझा जा सकता है-
सहजं किल यद्धिनिन्दितं न खलु तत्कर्म विवर्जनीयम् । पशुमारणकर्म दारुणोऽनुकम्पामृदुरेब श्रोत्रियः ।। -
अभिज्ञानशाकुन्तल, ६११
प्राचीन काल से ही संस्कृत कवि यह उद्घोषित करते आए हैं कि मनुष्य की निम्नवृत्ति का मूल कारण आनुवंशिकता नहीं। महाकवि बाण ने पूछा है- अक जातिवा थे। वनपर्व कि महयिके कठिन हो गम बन गई थी- जाति संकर सर्वे महाभार बल्कि गुणों ने कहा है यर्या है तो वह शू संस्कृत क सदैव जूझता आग्रहों से जा सुधारक की वर्तमान शतकम् इस 34
अकारणञ्च भवति दुष्प्रकृतेरन्वयः श्रुतं चाऽविनयस्य । चयनप्रभवो न वहति किमनलः ? -
कादम्बरी, शुकनासोपदेश तवतुष्य भेदः । बघटामुपेति ।। वराङ्गचरित, २५।२
मनुष्य जाति पयुक्त है क्योंकि किरणों के समान कौरवर्ण नहीं होते, होते और शूद्र भी पुष्पगौराः । मानवर्णाः ।। , ङ्गचरित, २५।७
नना और निम्न कालिदास के वीवर प्रसंग में व्यक्ति को हैय बीयम् । त्रयः ॥
कुन्तल, ६।१ करते आए हैं शकता नहीं। जातिवाद की विभीषिका से महाभारतकार भी चिन्तित थे। वनपर्व में युधिष्ठर-सर्प वार्तालाप से यह तथ्य प्रकट हुआ है कि महर्षि वेद व्यास के काल में जाति परीक्षा करना अत्यन्त कठिन हो गया था। इस समय सभी वर्षों में वर्णसंकरता अपरिहार्य बन गई थी -
जातिरत्र महासर्यो मनुष्यत्वे महामते । संकरात् सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः ॥ सर्व सर्वास्वपत्यानि जनयन्ति सदा नराः । वाङ्मंबुनमयो जन्म मरणं च समं नृणाम् ॥ वनपर्व, १८०/३०-३१
शदत्य को जाति महाभारतकार ब्राह्मणत्व और शूद्रत्व को जातिवाद बल्कि गुणों और सदाचार से जोड़ते हैं। इस सम्बन्ध में युधिष्ठर ने कहा है यदि शूद्र में सत्य आदि गुण हैं और ब्राह्मण उनसे अछूता है तो वह शूद्र शूद्र नहीं और ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं-
शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्मः द्विजे तच्च न विद्यते । न वं शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राहारणः ।। - वनपर्व, १८०/२५
संस्कृत काव्यधारा का कान्तदर्शी कवि जातिवाद के संघर्ष से सदैव जूझता आया है। राजसत्ता, प्रभुत्ववाद तथा साम्प्रदायिक आग्रहों से जातिवाद पनपा है किन्तु संस्कृत कवि ने एक समाज सुधारक की दृष्टि से जाति प्रथा की कटु भर्त्सना की है। वर्तमान युग परिस्थितियों में श्रीकृष्ण सेमवाल रचित 'भोम- शतकम्' इस दृष्टि से भी प्रप्सङ्गिक है कि इस काव्य का नायक अकारणञ्च भवति दुष्प्रकृतेरन्वयः श्रुतं चाऽविनयस्य ।
वगों में विभाजित करना प्रमाण एवं नयों को दृष्टि से भी अनुचित है -
अस्त्येक एवात्र यदि प्रजानां कथं पुनर्नातिवतुष्द्र भेदः । प्रमाणदुष्टान्तनयप्रवादेः परीक्ष्यमाणो बिघटामुपेति ।। बराङ्गचरित, २५।२
जटासिह कहते हैं कि रङ्ग अर्थात् वर्ण की दृष्टि से मनुष्य जाति की नस्ल को विभाजित करना भी सर्वथा अनुपयुक्त है क्योंकि व्यवहार में देखा यह जाता है कि ब्राह्मण चन्द्रकिरणों के समान श्वेत नहीं होते, क्षत्रिय भी किंशुक पुष्प के समान गौरवर्ण नहीं होते, वैश्य हरिताल पुष्प के समान हरे रंग के नहीं होते और शूद्र भी कोयले के समान कृष्ण वर्ण के नहीं होते
न ब्राह्मणाश्चन्द्रमरीचिशुभ्रा न क्षत्रियाः किंशुकपुष्यगौराः । न चेह वंश्या हरितालतुल्याः शूद्रा न चाङ्गारसमानवर्णाः ॥ - वराङ्गचरित, २५।७
व्यवसाय के आधार पर किसी वर्ग को ऊँचा मानना और निम्न कार्य करने वाले व्यक्ति को घृणित मानना महाकवि कालिदास के मत में सर्ववा अनुबित है। अभिज्ञानशाकुन्तल के धीवर प्रसंग में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि किसी भी निम्न पेशे के व्यक्ति को हेय कैसे समझा जा सकता है- सहजं किल पद्धिनिन्दितं नासु तत्कर्म विवर्जनीयम् । पशुमा रणकर्मदा रुणोऽनुकम्पा मृदुरेख श्रोत्रियः ॥ - अभिज्ञानशाकुन्तल, ६११ प्राचीन काल से ही संस्कृत कवि यह उद्घोषित करते आए हैं कि मनुष्य की निम्नवृत्ति का मूल कारण आनुवंशिकता नहीं । महाकवि वाण ने पूछा है-
अकारणञ्च भवति दुष्प्रकृतेरन्वयः श्रुतं चाऽविनयस्य । चन्दनप्रभवो न किमनलः ? दहति - कादम्बरी, शुकनासोपदेश जातिवाद की विभीषिका से महाभारतकार भी चिन्तित थे। वनपर्व में युधिष्ठर-सर्प बार्तालाप से यह तथ्य प्रकट हुआ है कि महर्षि वेद व्यास के काल में जाति परीक्षा करना अत्यन्त कठिन हो गया था। इस समय सभी वर्षों में वर्णसंकरता अपरिहार्य बन गई थी-
जातिरत्र महासर्यो मनुष्यत्वे महामते । संकरात् सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः ॥ सर्वे सर्वास्वपत्यानि जनयन्ति सदा नराः । वाङ्ङ्गंबुनमचो जन्म मरणं च समं नृणाम् ॥
in good company of को जातिवाद से नहीं इस सम्बन्ध में युधिष्ठर और ब्राह्मण उनसे अछूता महाभारतकार ब्राह्मणत्व और शूद्रत्व बल्कि गुणों और सदाचार से जोड़ते हैं। ने कहा है यदि शूद्र में सत्य आदि गुण हैं है तो वह शूद्र शूद्र नहीं और ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं-
शूद्रे तु पबू भवेल्लक्ष्मः द्विजे तच्च न विद्यते । न वे शूद्रो भवेच्छ्द्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्वाणः ।।
संस्कृत काव्यधारा का कान्तदर्शी कवि जातिवाद के संघर्ष से सदैव जूझता आया है। राजसत्ता, प्रभुत्ववाद तथा साम्प्रदायिक आग्रहों से जातिवाद पनपा है किन्तु संस्कृत कवि ने एक समाज सुधारक की दृष्टि से जाति प्रथा की कटु भर्त्सना की है। वर्तमान पुन परिस्थितियों में श्रीकृष्ण सेमवाल रचित 'भोम- शतकम्' इस दृष्टि से भी प्रासङ्गिक है कि इस काव्य का नायकब्राह्मण बनाम शूद्र को अवधारणा को निरस्त करते हुए भीमराव अम्बेडकर का महामानवत्व उपस्थित करता है पर इस महान् कार्य में भीमराव के अम्बेडकर नामक ब्राह्मण शिक्षक की कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी आज के समाज सुधारक इस तथ्य से कम परिचित हैं-
पूम्योऽम्बेडकरोऽददात्प्रियतरं नामापि यस्म मुदा । स्नेहेन प्रियभीमरावविदुषे हर्षप्रकर्षपरः। तस्मादेव दिनात् प्रसिद्धिमगमन्नाम्नंव चानेन सः । मान्यो ज्ञानगुणेन विश्वनिलये संजायते मानवः ॥ ३८
भीमराव अम्बेडकर का सारा जीवन समाज को अर्पित था। उन्होंने मूक जनों को वाणी दी, निरक्षरों को अक्षर ज्ञान दिया, और दलितों को अभय दान दिया। इन सभी उदात्त गुणों के कारण अम्बेडकर भारत रत्न और जननायक तो थे ही किन्तु श्रीकृष्ण सेमवाल ने उन्हें काव्यनायक भी बना दिया। यह संस्कृत जगत् के लिए एक गौरवपूर्ण अनुष्ठान है-
संघर्षपूरितमिदं तव जीवनग्नो सौख्यस्य मार्गममलं विननोतु भूमौ ।
आशामिर्मा हृदि निधाय ददाति तुभ्यं श्रद्धाञ्जल सुमनसा वचसा जनोऽयम् ।। १२
भीमराव अम्बेडकर के मन में एक अखण्ड हिन्दुत्व की अवधारणा विद्यमान थी। लेखक ने बताया है कि यद्यपि अम्बेडकर बौद्धधर्म की तत्त्वमीमांसा से प्रभावित होकर ब्रौढानुयायी बन गए थे किन्तु जहां तक भारतीय संविधान में हिन्दुत्व की परिभाषा है उसके अन्तर्गत जैन, बौद्ध तथा सिख हिन्दुओं के रूप में ही पारि- भाषित किए गए हैं-
हिन्दूवर्गसमाख्यानं विचाने यत्र दृश्यते ।
जंनाः बौद्धाश्च सिख्खाश्च सर्वे तत्र सुयोजिताः ॥ ८३
धार्मिक विविधता रहते हुए भी देश के विभिन्न धर्मानुयायो of जाति निरपेक्ष और सम्प्रदाय निरपेक्ष होकर एक अखण्ड राष्ट्रीय चेतना का विकास कर सकते हैं। भौमराव अम्बेडकर का यही राष्ट्रीय अवदान है। 'भीमशतकम्' के लेखक बधाई योग्य हैं कि उन्होंने इसी भारतीय जीवन दर्शन को एक नूतन काव्य शैली में प्रस्तुत किया-
राष्ट्रवादी महानेष भारतीयो गुणोत्तमः ।
पवित्रः शुद्धिचित्तश्च भीमरावो विलोक्यते ॥ , ८६
आशा है नीर-क्षीर विवेकी विद्वज्जन श्रीकृष्ण सेमवाल की इस नूतन कृति का समुचित मूल्यांकन करेंगे। यह वाल्मीकि युग से अम्बेडकर युग की ओर प्रवाहित होने वाली संस्कृत काव्यधारा है और साथ ही समकालीन विचारधारा भी।
किञ्चिन्निवेदनम्
अयि सुरभारती सेवासमाराधनैकतत्परा विद्धद्वरेण्याः ? तत्र भवतां श्रीमतां पुरस्ताद् भारतगणराज्यस्य संविधान- निर्मातुः डा० भीमराव अम्बेडकरस्य जन्मशताब्द्द्यावसरे तज्जीवन- सम्बन्धिनं संस्कृतभाषायां ग्रथितं "भोमशतकम्" नामकं खण्डकाव्यं समर्पयन्नतितरां मदमावहामि । शतकस्यास्य प्रकाशनाय दिल्ली संस्कृत अकादमीं प्रति कृतज्ञतां व्याहरामि, यया कृपया साम्प्रतं शतकमिदं पुस्तकरूपेण परिदृश्यते । काव्यस्यास्य लेखने प्रकाशने च दिल्ली संघ राज्यस्य महामहिम- शालिनामुपराज्यपालानां श्रीमतां मार्कण्डेयसिह महाभागा- नामाशीर्वादः, दिल्ली प्रशासनस्य पूर्वशिक्षायुक्तानां श्री गङ्गादास- महोदयानां सहयोगः, शिक्षानिदेशालयस्यातिरिक्त शिक्षा निदेशकानां श्री कालीचरण गोतमानां प्रेरणापरकः समुत्साहश्च पाथेयत्वेनानारतं मयाधिगतोऽतस्तान्प्रति हार्दिकी कृतज्ञतां प्रकटयन्मनो नितरां प्रसीदति, अनुवादकार्यार्यञ्च मम सहयोगिनौ श्रीमन्तौ लीलाकृष्ण सचदेव-ईश्वरीदत्त सगटा महोदयावपि वर्धापनीयौस्तः । अस्मिन्नवसरे प्राक्कथन लेखकान् भूमिका लेखकाञ्च डा० सत्यव्रतशास्त्रिवर्यान् डा० मोहनचन्दाञ्च मुद्रकानन्यानपि भित्रवर्यान् प्रति सविनयमाभारं प्रकटयन्निवेदयामि । अयि ? पण्डितवृन्दवन्दिताः कवितायां भवदीक्षणे यदि । स्खलनं क्वचिदत्र वीक्ष्यते सकलं स्यात्तदुपेक्षितं बुधः ॥
दिनाङ्कः ५-३-१६६१
विदुषाञ्चरणचञ्चरीकः
श्री कृष्ण सेमवाल:
भीमशतकम
गौतमं प्रथमं नत्वा नत्वा सर्वान्गुणोत्तमान् । लिखामि शतकं रम्यं भीमरावस्य साम्प्रतम् ॥१॥
संस्कृतं प्रति श्रद्धासीत् यस्य चित्ते निरन्तरम्। तस्यामेव सुवाण्यान्ते लिख्यते चरितं मया ॥२॥
महाराष्ट्प्रदेशेऽस्मिन् रम्यो रत्नगिरिः प्रियः। मण्डलो लोकविख्यातस्तत्र ग्रामो मनोहरः ॥३॥
धर्म-कर्मपरः श्रेष्ठः देवमन्दिरभूषितः । आम्बाबडेपदेनंव सोऽयं ख्यातिप्रदो भुवि ॥४॥
तस्मिन् ग्रामे समुत्पन्नः त्यागी धर्मधुरन्धरः। पवित्रः प्रभुभक्तश्च रामनामजपे रतः ॥५॥
पवित्रश्च सहिष्णुश्च गुणग्राहो गुणान्वितः। मालो जो सकपालाख्यो महारकुलनुषितः ।।६।।
विद्याविनयसम्पन्नः देवसेवासमन्वितः । युद्ध-विद्याप्रवीणश्च देशभक्तश्च सैनिकः ॥७॥
वंशानुक्रमतो येन प्राप्तो भव्यः सुखप्रदः। देवताराधनायाः वे त्वधिकारो महोत्तमः ।।८।।
तेषां परवदेवानामाशिषेव च तद्गृहे। धर्मानुरागी पुण्यात्मा प्रभुसेवापरायणः ॥६।।
रामजीसकपालाख्यः पुत्रो जातस्तपोधनः । बुद्धिमान् परमोदारो नम्रश्च विमलो बुधः ॥१०।
रामचर्चापरो नित्यं धर्मरक्षारतोऽपि च। दयालुश्च कृपालुश्च विनयो विप्रपूजकः ॥११॥
सोऽपि समुचिते काले सेनायां शिक्षके पदे। आसीनः किल धर्मात्मा देशरक्षारतोऽभवत् ॥१२॥
पित्राज्ञया कृतो येन विवाहः श्रद्धया मुदा। गुणवत्या महादेव्या प्रियया भीमया सह ॥१३॥
देवविप्रप्रसादेन तस्या एव सुकुक्षितः। पूर्णचन्द्रनिभो दिव्यः पुत्रो जातः सुखप्रदः ।। १४।।
पिता प्रसन्नतां जातो जननी च तथैव सा। जाते सुपुत्रे जाताः प्रसन्नाः सर्वबान्धवाः ।।१५।।
आकाशो मुदितो जातो धराणि मुदिता समा। मुदितस्सकलो लोको दिशश्च प्रदिशस्तथा ॥१६॥
शोषिताः मानवाः सर्वे दुःखिताः दलितास्तथा। मुदिताः प्रमुदिताः प्रेम्णा भूयोभूयः पुनः पुनः ॥१७॥
भूमौ जन्मप्रदायेतं रत्नमत्यन्तमद्भुतम् । ब्रह्मापि भारमुक्तोऽभूत् दलितानां हिते रतः ॥१८॥
अनेक जन्मपुण्यानां फलेन भुवने ध्रुवम्। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टः प्रजायते ॥१६॥
उक्तीयं फलिता जाता निश्चयेनास्य सद्मनि। येनास्य जन्म संजातो बालकस्यास्य योगिनः ॥२०॥
भीमादेवीसुतत्वेन ख्यातोऽयं भुवि बालकः। भीमरावाभिधानेन भूतिमान् भव्यभावनः ॥२१॥
पितुराज्ञापरो बालः श्रद्धाभावसमन्वितः । विद्याध्ययनसंलग्नो शालायां शिक्षकाणाञ्च छात्राणामपि प्रत्यहम्।। २२।।
शालायां शिक्षकाणाञ्च छात्राणामपि प्रत्यहम्। व्यवहारं कुत्सितं दृष्ट्वा त्रस्तो बालो मुहुर्मुहुः ॥२३॥
वाप्यां कूपे गृहस्वेवं मन्दिरेऽपि मठेऽपि वा। भेदबुद्धि विलोक्यात्र विचारः कृतवान्नसौ ॥२४॥
मानवाः मानवाः सर्वे समरक्ताः समक्रियाः। कथमस्पृश्यता तत्र किमाश्चार्यमतः परम् ।।२५।।
धरापि संवास्ति नभस्तदेव, जलान्नवस्त्रादिकमेवतुल्यम् समानरूपेण मनुष्यजातो, ततोऽस्पृश्यत्वं किमु नास्ति चित्रम् ॥ २६॥
वाणी समाना गमनं समानं, दृष्टिः समाना हृदयं समानम्। भावाः समानाः हसनं समानं, ततोऽस्पृश्यत्वं कथमत्र जातौ ॥ २७॥
मृत्युः समानः जननं समानं, मैत्री समाना रिपुता समाना। सौख्यं समानं विपदा समाना, ततोऽस्पृश्यत्वं कथमत्र लोके ॥२८॥
गतिः समाना च मतिः समाना, रतिः समाना च कृतिः समाना। पतिः समानः च यतिः समानः, ततोऽस्पृश्यत्वं कथमत्र लोके ॥ २६ ॥
सर्वादयो विषयुक्ता भुवि जन्तवो सिहार्दिहसनपराः पशवस्समस्ताः । एतेऽस्पृशाः किल च सन्ति न वा मनुष्याः, किन्नो बुधैः किमपि तत्र विचारितं कदा ॥३०॥
यत्रापि कुत्रापि विलोक्यते भृशं, शास्त्रेषु जातेस्तु विवेचनं भुवि। मनुष्यरूपे च पशुस्वरूपे, जातेस्समाख्यानमि हैव दृश्यते ॥३१॥
अनेन बालेन विचारितं दुतं, गभीरभावेन च सूक्ष्मदृष्टितः। कथं समाजे विषबल्लरीयं, वृद्धि प्रयाता भरतार्यभूमो ॥३२॥
स्वकीय वैशिष्ट्यविभावनाय, विकासितोऽयं कुपथो विनाशी। अतीवसत्ता सुखभोगिभिर्जनै- रनारतं राजबलेन लोके ॥३३॥
जातिप्रथायाः विकरालकालैः, दुष्योडितोऽयं भुवि भीमरावः। तन्नाशनायात्र कृत प्रतिज्ञः, स्वे कर्मणि प्रोतिपरोऽभवद् वै। आक्रोशपोडापरिपीडितोऽसौ, क्लेशान्नशेषान्नपि सह्यमानः। विद्याविलासे नितरां प्रवृत्तः, विचार्य मुक्तेश्च स एव मार्गः ॥३५॥
संसारसारस्तु विचित्र एव, रूढाश्च मूढाश्च विचारवन्तः। भवन्ति भव्याः मनुजाः जगत्यां, तेनैव लोको ध्रुवमत्र याति ॥३६॥
श्रयाताः बहवोऽस्य जीवनपथे विज्ञाः नयज्ञास्तथा, दुष्टाश्चापि च सज्जनाः सुमतयस्तत्राप्यहो चादिमः। मान्योऽम्बेडकरो बुधो द्विजवरो तच्छिक्षकस्सद्धती, येनस्वात्मजतुल्यमेव सततं संलालितोऽयं सुधी ॥३७॥
पूज्योऽम्बेडकरोऽददत्प्रियतरं नामापि यस्मंमुदा, स्नेहेन प्रियभीमरावविदुषे हर्षप्रकर्षपरः। तस्मादेव दिनात् प्रसिद्धिमगमन्नाम्नैव चानेन सः, मान्यो ज्ञानगुणेन विश्वनिलये संजायते मानवः ॥३८॥
विद्याध्ययन भावेन पित्रासाकमसौ यतिः। मुम्बयोनगरों प्राप्तो धनाभावेऽपि सद्धती ॥३६॥
तत्रापि यातनाः प्राप्ताः समाजादू विविधाः भृशम्। आक्रोशतप्तचित्तोऽपि न कदापि चलितोऽभवत् ।।४०।।
अस्य वैशिष्ट्धमत्यन्तं वीक्ष्य केलुस्करेण वै। आशिषा दोक्षया प्रेम्णा भीमः सम्मानितो मुदा ॥४२।।
अर्धाभावने संरुद्ध शिक्षणं तत्क्षणञ्च यत्। बड़ौदाराज्यसाहह्येन पुनः प्रारम्भतां गतम् ॥४५।।
निष्ठया ध्यानचित्तेन भीमेनाध्ययनं कृतम्। तेनैव प्रथमं स्थानं कक्षास्वधिगतंदा ॥४१॥
प्रारम्भीकृतवानेषः शिक्षां स्वीयां महोत्तमाम्। गुरोः केलुस्करस्यैव मार्गदर्शनतो द्रुतम् ॥४३॥
युगानुरूपं भीमेन विवाहो विहितस्तदा। रामाबाई महादेव्याः साकन्तु पितुराज्ञया ॥४४॥
बो० ए० परीक्षा महताश्रमेण श्री भीमरावेण मुदा तदानीम्। उत्तीर्णता या च कृतासगवं, तैनात्र वंशो ननु धन्यतां गतः ॥४६॥
गेहस्य दयनीयदशां स्वकीयां समीक्ष्य भीमे विकलेऽपि जाते। तपोधनोऽयं चलितो न जातो, धीरस्य लोके गुण एव एव ॥४७॥
आजीविकार्थ किल साधनानि, यद्यप्यनेकानिविधानितत्र साह्यप्रदानप्रतिदानहेतोः, सेवाकृता तेन बड़ोदरायाम् ।।४८।।
न वासयोग्यं भवनं सुलब्धं, न भोजनञ्चापि बड़ोदरायाम्। न मानसम्मानविभाविकासः, स्नेहादिकस्यात्र कथापि नैव ॥५०॥
दयापरे शासनशासकेऽपि, दुष्कृत्यदक्षात्मचरे रजत्रम् अतन्द्रितोऽपि त्वपमानितोऽसौ, बुद्धेनिधानः प्रियभीमरावः ॥५२॥
अनेन कष्टेन बड़ोदरायां, कृता सुसेवा नृपतेस्तदानीम्। तत्रापि जातिग्रहग्रस्त एब, प्रपीडितोऽभूदपरैः जनैः नु ॥४६।।
पाखण्डकैस्तत्र मुहुर्मुहुः सः, प्रताडितोऽयं गुणरत्नराशिः। स्वकार्यवृत्तश्चलितो न जातो, धैर्यस्य चैषा महती परीक्षा ॥५१ ।।
अपमानस्य दुःखेन दग्धस्तप्तस्तपोधनः । अस्पृश्यताविनाशार्थं दृढ़संकल्परोऽभवत् ।। ५५।।
एतदर्थं मुम्बय्यां सभा नैकास्तु योजिताः। दलितानान्तत्र चित्तेषु स्वाभिमानः प्रजायतः ।।५६।।
दीनानां दलितानाज्य समुद्धारे रतेऽप्यहो। विद्याव्यसनसंपृक्तो दृश्यतेस्म सदैव सः ॥५७॥
कृतज्ञभावी प्रियभीमरावो, राज्यस्य सेवां विदधातुमिच्छन् । न सम्प्रयातस्सफलत्वमत्र, विर्घावधानन्तु किमन्यमेव ॥५३॥
अपमानभरेण पोडितः, प्रतियातो नगरों विहाय ताम्। सकलाश्रयदायिनों पुनः, सुखदां तत्र सुमुम्बयोमसौ ॥५४॥
अनेन भावेन समन्वितोऽसौ गती विदेशं प्रति वै यशोधनः । समस्तशास्त्रं विधितत्वयुक्तं पठन्नसौ संगमितः स्वदेशम् ॥५८॥
विदेशभूमौ विमलैस्सुहृद्दभिः, कृतञ्च साह्य बहुधा विशेषम्। पाथेयमेनं हृदि सन्निधाय समागतो जन्मभुवं प्रतीत्थम् ॥५६॥
मुम्बय्यां सम्प्रयातोऽसौ विद्याधनधनी यतिः। श्रचार्यरूपे शालायां शिक्षणे संरतोऽभवत् ॥६०॥
प्रकाण्डं पाण्डित्यं गुणगणनिवासेकनिलयम्, निधानं विद्यानां वचनरचनावाचनमपि। तवेदं सम्वीक्ष्य प्रमुदितजनः त्वां प्रति यतः, गुणाः पूजास्थानं न च गुणिषु लिङ्ग न च वयः ॥५१॥
शास्त्रममेज्ञतां प्राप्ते ज्ञानसूर्यसमो भुवि। दोप्तिमान् भीमरावोऽयं लोके ख्याति समागतः ।॥ ६२॥
अध्यापनस्य कार्यन्तु गौणत्वेन स्वीकृतम्। दलितोद्धारकं कार्य मुख्येनाङ्गीकृतं प्रियम् ॥६३॥
विद्वांसो बुद्धिमन्तश्च व्याख्यानं श्रोतुमुत्सुकाः। सभास्थले प्रयान्ति स्म यत्र भोमेन भाष्यते ॥६४॥
रोमाञ्चितं चित्तं सिंहस्य गर्जनं सदा। कुरुते तथैव लोकेऽस्मिन् भोमस्य गर्जनं ध्रुवम् ॥६५॥ अस्पृश्यताविनाशाय प्रयासाः विविधाः कृताः। उद्घाटितास्तु शिक्षार्थ शिक्षाया आलयाः प्रियाः ॥६६॥
गृहे गृहे स्वतो गत्वा दलितास्तेन प्रेरिताः। सभ्याः भवन्तु विज्ञाश्च भूयांशास्त्रशालिनः ।। ६७।। जनसम्पर्कतश्वापि पत्रिका व्याजतोऽपि वा। दलिताः बोधितास्तेन भाषणः कर्मभिस्तथा ॥६८॥
यत्र यत्र भवन्तिस्म दलितोद्धारकक्रियाः । उत्साहस्तान् प्रयच्छन्ति भीमरावस्य सत्क्रियाः ॥६६॥
कोल्हापुरीयराज्यस्य राजादलितसेवकः। तस्य कृतज्ञतां चित्ते भीमो वहत्ति सर्वदा ॥७०॥
दलिताराधने बाधां सम्वीक्ष्य तेन सत्वरम्। शालायाः शिक्षणं त्यक्तं लाभप्रदमपि प्रियम् ॥७१॥
बहिष्कृताख्याहितकारिणी सभा, विकासिता तेन जगदूहिताय। यस्याः प्रभावेण च शातकोऽपि, विन्तापरोऽभूद् झटतीव तत्र ।।७२।।
स्वातन्त्र्ययुद्धश्चलतिस्म तत्र, तत्रत्य योद्धा अपि भीमबद्धाः । अस्पृश्यतायाः शमने प्रवृत्ताः, श्रद्धाभरेण मनसापि सर्वे ॥७३॥
जातिप्रथायाः शमनाय नित्यं, सत्यप्रतिष्ठापरिवर्धनाय योग्यस्य मानाय तथा प्रियाय, किन्नो कृतं भोभवरेण लोके ॥७४॥
अस्यप्रभावेण प्रबोधिता सतो, सत्तापि तत्रक्षणतत्पराभूत् सर्वत्र सत्तासनभागधेयं, प्रदत्तमस्मै दलिताय शीघ्रम् ॥७५॥
मानवस्याधिकाराणां भीमे गुञ्जने कृते। दलिताः दुर्बलाः जाताः सबलाः बुद्धिशालिनः ॥७६॥
हिन्दूनां जातिभेदस्य विनाशाय कृतश्रमः । साफल्यं तत्र न प्राप्य भीमोऽयं व्यथितोऽभवत् ॥४७॥
पाखण्डखण्डने दक्षः परपीडाप्रपीडितः। भीमरावो महायोगी सर्वत्र जयताद् भुवि ।।७८।।
स्वतन्त्रभारते जाते दृष्ट्वास्य बुद्धिवंभवम् । विधिमन्त्रिपदे श्रेष्ठे स्नेहेन मानितो जनैः ॥७६॥
राष्ट्रवादी महानेष भारतोयो गुणोत्तमः। पवित्रः शुद्धिचित्तश्च भीमरावो विलोक्यते ॥८०॥
हिन्दून्प्रति च विद्वेषे जातेऽपि मानसेऽनिशम् । संविधानस्य निर्माणे विद्वेषो नोपलक्ष्यते ॥८१॥
गरिमा महतीत्येषा गरिम्णः परिदृश्यते। येन न्यायपथो नित्यं रक्षितः पालितस्तथा ॥८२॥
हिन्दूवर्गसमाख्यानं विधाने यत्र दृश्यते। जैनाः बौद्धाश्च सिख्खाश्च सर्वे तत्र सुयोजिताः ॥८३॥
धन्यो भीमश्च धन्या ते निश्चला सरला मतिः । धन्यं कर्म त्वदीयन्तद् यत्र सत्यं समाश्रितम् ॥ ८४॥
हिन्दूनां व्यवहारेण संत्रस्तो भीमभैरवः। यतः धर्मपरित्यागे बद्धपरिकरोऽभवत् ॥८५॥
राष्ट्रवादस्य भावेन भीमेन समलंकृतः। हिन्दूनां भागरूपोऽयं बौद्धधर्मोन्वाहसकः ॥८६॥
भीमभावसमायुक्ताः भक्ताः भक्तिसमन्विताः । बौद्धधर्मपराः जाताः भारते सर्व एव ते ॥८७॥ लोककल्याणकृत्यानां करणे यो निरन्तरम्। त्यागी गुणात्मा भीमोऽयं जयताज्जगतीतले ॥८८॥
ऋषीणां योगिनां चैव बौद्धधर्मानुसारिणाम्। पन्थानमनुगच्छन्तः स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥८६॥
स्वर्गलोके प्रयाते ते ह्यनाथाः सकलाः प्रजाः। श्रद्धा पुष्पभरैः हस्तैः पूजयन्तिस्म मूरिशः ॥६०॥
मूकाय वाणी भवता प्रदत्ता, निरक्षरेभ्योऽक्षरदानदत्तम् तुभ्यं प्रदत्तं दलिता भयत्वम्, किन्नो प्रदत्तं जनताहिताय ॥६१।।
संघर्षपूरितमिदं तव जीवनन्नों, सौख्यस्य मार्गममलं वितनोतु भूमौ। आशामिमां हृदि निधाय ददाति तुभ्यं, श्रद्धाञ्जल सुमनसा वचसा जनोऽयम् ॥६२॥
हा हन्त सीदति मनो नितरां मदीय, सम्वीक्ष्य वर्गरहितस्य समाजकर्तुः । वर्षेऽधुना सुविमले सकले शताब्द्याः, संघर्ष वर्गपरकः परिवीक्ष्यतेऽत्र ॥६३॥
स्वर्गे स्थितोऽम्बेडकरोऽपि दृष्ट्वा, वर्गाग्निदग्धं सन्तापतापे कष्टानुर्भूत निजमातृभूमिम्। परितप्यमानः, कुरुते यतीन्द्रः ॥६४।।
दलितजनहिताय सर्वसौख्यं विहाय, विकटपथविशेषस्स्वीकृतो येन भव्यः। सकलजनसमानस्विन्तनस्यास्यधारा, प्रवहतु भुवनेऽस्मिन् सर्वदेव सुरूाय ॥ ६५॥
गुणिगणगणनानां योऽग्रणी माननीयः, सहृदहृदयानां स्नेहपात्रः विशेषः सकलमनुजपीडापीडितो दोनबन्धुः, जयतु जयतु लोके भीमरावो यतीन्दः ॥६६॥
श्रूयतां मे वचांसि, सकलभुवनमध्ये यस्तुमार्गस्त्ययात्र। व्यधितजनहिताय दर्शितस्त्यागतो वं, स भवतु विजयी में प्रार्थनैषा पवित्रा ॥ ६७॥
संघर्षपूरितमिदं तव जीवनन्नो, सौख्यस्यमार्गममलं वितनोतु भूमौ। आशामिमां हृदि निधाय ददाति तुभ्यम् श्रद्धाञ्जल सुमनसा मनता जनोऽयम् ॥६८॥
राष्ट्रस्य भाषा भरतस्य भूमौ, गोर्वाणवाणी भवताद् विचारः। चित्ते सदा यस्य विराजते स्म, सोऽयं जयेद् भोमवरो जगत्याम् ॥६६॥
यः इदं पठते काव्यं भीमशतकमुत्तमम् । विनाशो विपदो यान्ति सौख्यं मिलति सर्वदा ॥१००॥
उत्तरस्थप्रदेशस्य चमोली मण्डलः प्रियः। तत्रत्य कविना काव्यं लिखितं भीमबोधकम् ॥१०१॥
देववाण्याः प्रचाराय रक्षणाय च साम्प्रतम् । श्रीकृष्णसेमवालेन रचितं शतकमद्भुतम् ॥१०२॥
महातपस्वी योगीश्वर भगवान् बुद्ध को प्रणाम कर तदनन्तर सभी श्रेष्ठ गुणशाली महापुरुषों को प्रणाम करता हुआ मैं वर्तमान में डा० भीमराव अम्बेडकर के व्यक्तित्व पर सुन्दर शतक काव्य लिख रहा हूं।।१।।
जिस भीमराव के हृदय में संस्कृत भाषा के प्रति अपार श्रद्धा थी, उसी संस्कृत भाषा में मेरे द्वारा उसका चरित्र लिखा जा रहा है।।२।।
महाराष्ट्र प्रदेश में रत्नगिरि नामक एक लोक प्रसिद्ध जिला है। उस जिले में एक अत्यन्त सुन्दर ग्राम है।।३।।
धर्म-कर्म में संलग्न उत्तम, देवताओं के मन्दिरों से सुशोभित आम्बाबडे नाम से वह गाँव प्रसिद्ध हुआ।। ४।।
उस ग्राम में त्यागी धर्माचरण में अग्रणी, पवित्र, प्रभुभक्त एवं रामनाम के जाप में निरन्तर तल्लीन मालो जी सकपाल नाम का एक व्यक्ति हुआ ।।५।।
महार कुल को सुशोभित करने वाला मालोजी सकपाल पवित्र, सहनशील, गुणग्राही एवं सर्वगुण सम्पन्न था।। ६।।
मालोजी सकपाल विद्या एवं विनय सम्पन्न तथा देवताओं की सेवा में सदा तत्पर रहने वाला, युद्ध विद्या में प्रवीण देशभक्त सैनिक था।। ७।।
श्री मालोजी सकपाल के परिवार को वंशपरम्परा से सर्व प्रकार के सुख को प्रदान करने वाला महनीय एवं भव्य देवताओं की सेवा का अधिकार प्राप्त था अर्थात देवताओं की पालकी ले जाने का अधिकार एकमात्र उन्हें ही प्राप्त था।। ८।।
उन परमोज्ज्वल देवताओं के आशीर्वाद से ही उनके घर में धर्मानुरागी, पुण्यात्मा एवं प्रभु सेवापरायण रामजी सकपाल का जन्म हुआ ।।९।।
श्री मालोजी सकपाल का पुत्र रामजी सकपाल परम उदार, बुद्धिमान्, नम्र, स्वच्छ विचारों वाला अत्यन्त समझदार एवं तपस्वी व्यक्ति था।।१०।।
रामजी सकपाल निरन्तर राम की चर्चा में तल्लीन, धर्म की रक्षा के कार्यों में भी संलग्न रहते थे। और वे अत्यन्त दयालु, कृपालु,रामजी सकपाल निरन्तर राम की चर्चा में तल्लीन, धर्म की रक्षा के कार्यों में भी संलग्न रहते थे। और वे अत्यन्त दयालु, कृपालु, विनयी तथा विद्वानों की पूजा में व्यस्त रहते थे।।११।।
वह सकपाल भी उचित समय पर सेना में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुआ और धर्म कर्म में प्रवृत्त होता हुआ देश रक्षा में तत्पर हुआ।।१२।।
आदरणीय पिता की आज्ञा से रामजी सकपाल ने बड़ी श्रद्धा एवं प्रसन्नता से गुणशालिनी प्रिय भीमादेवी के साथ विवाह किया।।१३।।
देव-विप्रप्रसाद से उसी देवो को कोख से पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान दिव्य एवं सभो को सुख देने वाला पुत्र रत्न पैदा हुआ।।१४।।
पुत्ररत्न की प्राप्ति से पिता एवं माता तथा समस्त मित्र, बन्धु बान्धव सभी परम प्रसन्न एवं हर्षित हुए ।१५
सकपाल के घर में पुत्ररत्न के उत्पन्न होने से आकाश प्रसन्न हुआ, पृथिवी प्रसन्न हुई, समस्त संसार एवं दिशाएं-उपदिशाएं सभी प्रसन्न हुई।।१६ ।।
सकपाल के घर में पुत्ररत्न के उत्पन्न होने पर समस्त शोषित, दलित, दुःखित व पीड़ित मानद-प्रेम से परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए।।१७।।
इस मानवरूपी अत्यन्त अद्भुत रत्न को पृथिवी पर जन्म देकर दलितों की भलाई में संलग्न ब्रह्मा भी भारमुक्त हो गया ।।१८।।
अनेक जन्मों के पुण्यों के फल से निश्चय ही पवित्र एवं श्रीसम्पन्न लोगों के घर में योग-भ्रष्ट महामानव जन्म लेते हैं।।१९।।
श्री सकपाल के घर में यह उक्ति निश्चय रूप से पूर्ण चरितार्थ हुई, जिसके कारण इनके घर में एक योगी स्वरूप बालक का जन्म हुआ।। २०।।
ऐश्वर्यशाली, भव्याकृति यह बालक भीमादेवी के पुत्र होने के कारण भीमराव के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ ।२१
आदरणीय पिता की आज्ञा से रामजी सकपाल ने बड़ी श्रद्धा एवं प्रसन्नता से गुणशालिनी प्रिय भीमादेवी के साथ विवाह किया।।२२।।
देव-विप्रप्रसाद से उसी देवों को कोख से पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान दिव्य एवं सभी को सुख देने वाला पुत्र रत्न पैदा हुआ ।।२३।।
पुत्ररत्न की प्राप्ति से पिता एवं माता तथा समस्त मित्र, बन्धु बान्धव सभी परम प्रसन्न एवं हर्षित हुए ।।२४।।
सकपाल के घर में पुत्ररत्न के उत्पन्न होने से आकाश प्रसन्न हुआ, पृथिवी प्रसन्न हुई, समस्त संसार एवं दिशाएं-उपदिशाएं सभी प्रसन्न हुई।।२५।।
सकपाल के घर में पुत्ररत्न के उत्पन्न होने पर समस्त शोषित, दलित, दुःखित व पीड़ित मानद-प्रेम से परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए।।२६।।
इस मानवरूपी अत्यन्त अद्भुत रत्न को पृथिवी पर जन्म देकर दलितों की भलाई में संलग्न ब्रह्मा भी भारमुक्त हो गया ।।२७।।
जन्म-मृत्यु, दोस्ती-दुश्मनी, सुख-दुःख आदि सभी क्रियाएं सभी मनुष्यों में समान हैं तो फिर संसार में परस्पर मनुष्यों में यह अस्पृश्यता कैसे ?।२८।।
प्रत्येक मनुष्य की गति, मति, रति, कृति आदि सभी समान है। इतना ही नहीं पति तथा योगादि क्रिया भी समान हैं तो फिर संसार में परस्पर मनुष्यों में यह अस्पृश्यता कैसे ?।२९।।
संसार के विष धारण करने वाले सर्पादि समस्त जन्तु एवं सिंहादि समस्त हिंसक पशु अस्पृश्य हैं, जिनके स्पर्श मात्र से प्राणिमात्र को हानि होती है। न कि मनुष्य अस्पृश्य हैं। क्या इस विषय पर कभी विद्वानों ने विचार किया ?।३०।।
शास्त्रों में जहाँ कहीं भी जाति शब्द का विवेचन दिखाई देता है, वहाँ सभी स्थानों पर जाति के समाख्यान में जाति से मनुष्य जाति एवं पशु जाति का हो बोध होता है।।३१।।
शीघ्र ही इस बालक ने अत्यन्त गम्भीरता एवं सूक्ष्मदृष्टि से इस प्रकरण पर विचार किया कि भरत की श्रेष्ठ भूमि वाले इस समाज में अस्पृश्यता रूपी विष बैल कैसे फैली! ।।३२।।
निरन्तर सत्ता के अधिकाधिक सुख को भोगने वाले मनुष्यों ने अपने वैशिष्ट्य की रक्षा के लिए शासन के बल पर इस विनाशकारी कुमार्ग को विकसित किया।। ३३।।
जाति प्रथा रूपी भयंकर सांपों से बुरी तरह डंसे इस भीमराव ने संसार से इस प्रथा की समाप्ति की प्रतिज्ञा की। एतदर्थ वह अच्छे कार्य में दत्तावधान होकर प्रवृत्त हुआ।।३४।।
सामाजिक विद्वेष के आक्रोश की पोड़ा से पीड़ित होता हुआ यह अनेकों दुःखों को सहन करता हुआ भी विद्याध्ययन में निरन्तर तल्लीन रहा, क्योंकि विद्या के अध्ययन को ही अस्पृश्यता से मुक्ति का अम्बेडकर मुख्य मार्ग मानता था।।३५।।
संसार का सार अत्यन्त विचित्र ही दृष्टिगोचर होता है इस संसार में रूढ़िवादी, मूर्ख, विद्वान् श्रेष्ठादि सभी प्रकार के मनुष्य जन्म लेते हैं। जिसके आधार पर संसार की प्रक्रिया चलती है।।३६।।
इस अम्बेडकर के जीवन पथ में बहुत से विद्वान्, नीतिमान्, दुर्जन-सज्जन और बुद्धिमान् व्यक्ति आये होंगे, परन्तु उनमें सर्वप्रथम उसके जीवन में अम्बेडकर नामक अत्यन्त बुद्धिमान् श्रेष्ठ एवं सदाचारी शिक्षक रूप में एक ब्राह्मण आया। जिसने इस विद्वान् बालकको पुत्रवत् प्यार दिया।।३७।।
पूजनीय गुरुचरण पण्डितवर श्री अम्बेडकर ने अत्यन्त स्नेह एवं प्रसन्नता से मेधावी प्रिय शिष्य भीमराव को अपना नाम प्रदान कर दिया। उसी दिन से वह भीमराव अम्बेडकर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वस्तुतः विश्वनिलय में ज्ञानरूपी गुणों से ही मनुष्य माननीय होता है।। ३८।।
यह सदाचारी एवं योगी भीमराव अम्बेडकर विद्यार्जन की भावना से धनाभाव के होते हुए भी पूज्यपिता के साथ बम्बई नगरी में पहुँचा,।।३९।।
अम्बेडकर को बम्बई नगर में भी नाना प्रकार की यातनाओं को भोगना पड़ा। यातनाओं के कारण आक्रोशित एवं दग्ध- चित्त होता हुआ भी वह अपने कर्तव्य-मार्ग से कभी भी विचलित नहीं हुआ।। ४०।।
अम्बेडकर ने निष्ठा एवं ध्यानमग्न चित्त से अध्ययन किया। जिसके कारण उसने सभी कक्षाओं में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया ।।४१।।
इसकी प्रत्युत्पन्नमतिपरक विशिष्टता को देखकर केलुस्कर महोदय ने प्रसन्नता पूर्वक आशीर्वाद से, दीक्षा से व प्रेम से भीमराव को सम्मानित किया ।।४२।।
श्री अम्बेडकर ने अपनी उच्च शिक्षा आदरणीय गुरुतुल्य कृष्णा- केलुस्कर के मार्गदर्शन में प्रारम्भ की ।।४३।।
समय की स्थिति के अनुसार पिता की आज्ञा पालन की भावना से अम्बेडकर ने रामाबाई नामक देवी के साथ विवाह किया।।४४।।
अर्थाभाव के कारण जो उच्च शिक्षण भीमाराव का रुक गया था, वह बड़ोदा के राजा के सहयोग से पुनः प्रारम्भ हो गया ।।४५।।
आर्थिक सहायता प्राप्त होने पर भीमराव ने प्रसन्नता से अत्यन्त परिश्रम से सगर्व जो बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की उससे सारा वंश अपने को धन्य समझने लगा ४६
अपने परिवार की दयनीय दशा को देखकर भीमराव के विकल होने पर भी तपस्वी भीमराव क्षणमात्र के लिए भी विचलित नहीं हुआ। संसार में धैर्यवान् व्यक्ति का यही गुण है।। ४७।।
यद्यपि बम्बई में आजीविका के लिए नाना प्रकार के साधन थे, परन्तु अम्बेडकर ने बड़ौदा के राजा द्वारा प्रदत्त सहयोग के प्रतिदान निमित्त बड़ोदा के राजा के यहाँ आजीविका सम्बन्धी सेवा कार्य करना स्वीकार किया।।४८।।
इसने अनेक कष्टों को सहन करते हुए बड़ोदा के राजा की सेवा की। परन्तु वहाँ भी वह जातिवादी ग्रह से ग्रस्त होता हुआ अन्य व्यक्तियों से अत्यन्त प्रताड़ित हुआ ।।४९।।
अम्बेडकर को बड़ोदा में न निवासार्थ स्थान मिला, न ही भोजन की व्यवस्था ही हो सकी, और न ही मानसम्मान एवं व्यक्तित्व विकास का ही अवसर मिला। स्नेहादि की तो चर्चा भी नहीं थी।।५०।।
पाखण्डों लोगों के द्वारा इस गुणरत्नराशि रूप अम्बेडकर को अनेकों बार वहाँ प्रताड़ित होना पड़ा। किन्तु तब भी वह स्वकार्य से विचलित नहीं हुआ, उसके धैर्य की यह बड़ी परीक्षा थी।।५१।।
बड़ोदा के राजा के दयालु एवं उदार होने पर भी वहाँ के दुराचारी कर्मचारियों के द्वारा आलस्यरहित, कर्त्तव्यपरायण, बुद्धिमान् इस भीमराव को निरन्तर अपमानित किया जाता रहा।।५२।।
कृतज्ञभावी भीमराव राज्य द्वारा प्रदत्त सहायता के प्रतिदान के रूप में राज्य की सेवा को करने की इच्छा रखता हुआ सफल नहीं हुआ, क्योंकि भीमराव के सम्बन्ध में विधि का 'विधान कुछ अन्य ही था।।५३।।
अपमान के घूंट को पीता हुआ अम्बेडकर बड़ोदा नाम की उस नगरी को छोड़ कर सभी को समानरूप से आश्रय देने वाली तथा सुख देने वाली मुम्बई नामक नगरी में पुनः लौट आया।।५४।।
अपमान के दुःख से जला एवं तपा वह तपोधन अस्पृश्पता के विनाश के लिए कटिबद्ध हो गया।। ५५।।
इस कार्य के लिए अम्बेडकर ने विभिन्न स्थानों पर अनेकों सभाओं का आयोजन किया। जिससे दलितों के हृदय में स्वाभिमान जागृत हुआ।।५६।।
दीन एवं दलित जनों के समुद्धार में तल्लीन होते हुए भी अम्बेडकर विद्यारूपी व्यसन में सदैव संपृक्त रहता था ५७
विद्याध्ययन की आदर्श भावनाओं से जुड़ा हुआ वह यशोधन अम्बेडकर विधि शास्त्र के गम्भीर अध्ययन के लिए विदेश गया और वहाँ से विधि एवं अन्य शास्त्रों के अध्ययन के पश्चात् स्वदेश लौटा।।५८।।
विदेश में पवित्र हृदय वाले मित्रों द्वारा अनेकों बार विभिन्न प्रकार से की गई सहायता रूपी पाथेय की गठरी को हृदय में समेटता हुआ अम्बेडकर अपनी जन्मभूमि भारत में लौटा ।।५९।।
बम्बई नगरी में पहुँचकर विद्या रूपी धन से धनी इस योगी ने आचार्य के रूप में महाविद्यालय में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया ।।६०।।
प्रकाण्ड पाण्डित्य, समस्त गुणों की एकमुस्तखान, विद्या का खजाना, एवं वाक्चातुर्य को भी तुममें देखकर समस्त समाज प्रसन्नता का अनुभव करने लगा। क्योंकि गुण ही पूजा के पात्र हैं। गुणवानों में वर्ग, आयु, लिङ्ग आदि कुछ नहीं देखा जाता है।।६१।।
विधि शास्त्र को मर्मज्ञता प्राप्त कर परम ज्ञान रूपी सूर्य तुल्य भीमराव समस्त संसार में प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ ।।६२।।
अम्बेडकर ने अपने जीवन में अध्ययन का कार्य गौणरूप में ही स्वीकृत किया, किन्तु मुख्यरूप से जीवन का लक्ष्य दलितोद्धार ही उसने अङ्गीकार किया।। ६३।।
जहाँ-जहाँ भीमराव प्रवचन करने जाते, वहाँ-वहाँ तत्कालीन विद्वान् एवं बुद्धिमान् लोग श्रीभीमराव के गम्भीर एवं तर्कपूर्ण व्याख्यानों को सुनने के लिए उनकी सभाओं में जाते थे ।।६४।।
जिस प्रकार सिह की गर्जना से प्राणिमात्र का चित्त रोमाञ्चित होता है, उसी प्रकार भीमराव की सत्य गर्जना समाज को रोमांचित करती थी।।६५।।
श्री भीमराव ने अस्पृश्यता के विनाश के अनेक प्रकार के उपाय किये। जिसमें सर्वप्रथम दलितों की शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की।।६६।।
श्री भीमराव ने घर-घर जाकर दलितों को प्रेरित किया कि आप सभ्य बनों, विज्ञ वनों, अधिकाधिक शास्त्रों के ज्ञाता बनों ।।६७।।
भीमराव ने जनसम्पर्क से, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से, अपने प्रभावशाली भाषणों और अपने अच्छे कार्यों से दलितों को निरन्तर प्रबोधित किया।।६८।।
जहाँ-जहाँ जिस क्षेत्र में दलितोद्धारक कार्य होते थे, भीमराव उन सभी को तत्सम्बन्धी उत्तम कार्य के लिए उत्साह प्रदान करते थे।।६९।।
कोल्हापुरराज्य का राजा दलितों का परम सेवक था, इसलिये उसके प्रति भीम के हृदय में हमेशा कृतज्ञता की भावना रहती थी ।।७०।।
अध्यापन कार्य से दलितों की सेवा में भीमराव ने बाधा समझी। इसलिए उसने शीघ्र ही अत्यन्त लाभप्रद व सम्मानित शिक्षक के पद से त्यागपत्र दे दिया।।८१।।
संसार के दलितों के हित के लिए भीमराव ने "बहिष्कृत हितकारिणी" नामक संस्था को विकसित किया। जिसके प्रभाव से शीघ्र ही वहाँ का शासक वर्ग भी चिन्तित हो उठा ।।७२।।
भीमराव के अस्पृश्यता आन्दोलन के समय स्वतन्त्रता-युद्ध का भी सर्वत्र प्रभाव था, उस युद्ध के योद्धा भी भीमर गये और अस्पृश्यता के शमन में मन से एवं श्रद्धा से प्रवृत्त हो गये।
७३।।
जातिप्रथा के शमन के लिए, सत्य को प्रतिष्ठा के लिए, योग्य व्यक्तियों के सम्मान के लिए और अपने प्रिय दलित जनों के लिए भीमराव ने संसार में क्या नहीं किया।।७४।।
भोमराव के प्रभाव से प्रतिबोधित होती हुई सत्ता भी इनके संरक्षण के लिए तत्पर हुई और सत्ता में दलितों के लिए भागीदारी प्रदान की।।७५।।
भीमराव के मानवाधिकार सम्बन्धी चिन्तन के गुञ्जायमान होने पर दलित एवं दुर्बल व्यक्ति सबल एवं बुद्धिमान् हो गये।।७६।।
हिन्दुओं में व्याप्त जाति भेद के विनाश के लिए निरन्तर परिश्रम करने वाले भीमराव को सफलता न मिलने पर अत्यन्त कष्ट हुआ।। ७७।।
पाखण्ड के खण्ड में दक्ष एवं दूसरों के दुःखों से दुःखी होने वाला महायोगी भोमराव समस्त संसार में विजय को प्राप्त करे।।७८।।
भारतवर्ष के स्वतन्त्र होते ही नेहरू आदि प्रतिष्ठित लोगों ने इनके बुद्धि-वैभव को देखकर विधिमन्त्री के श्रेष्ठ पद पर नियुक्त कर स्नेहपूर्वक इन्हें सम्मानित किया।।७९।।
यह भीमराव महान् राष्ट्रवादी सर्वगुणसम्पन्न, सच्चा भारतीय एवं पवित्र तथा शुद्ध हृदय वाला व्यक्ति था।। ८०।।
श्री भीमराव के मन में हिन्दुओं के प्रति विद्वेष होने पर भी संविधान के निर्माण में यह भावना कहीं भी दिखाई नहीं दी।।८१।।
गरिमाशाली भीमराव का यह एक गौरवपूर्ण व्यक्तित्व है जो उसने हमेशा न्याय मार्ग का संरक्षण एवं परिवर्धन किया।।८२।।
भीमराव का हिन्दुत्व इसी से परिलक्षित होता है कि संविधान निर्माण में जब हिन्दुओं का वर्ग विभाजन उन्होंने किया तो जैन सिख बौद्धादियों को हिन्दुओं का अभिन्न अंग बताया।।८३।।
हे भीम। तुम धन्य हो, तुम्हारी निश्छल एवं सरल मति धन्य है, तुम्हारे समस्त शुभ काय धन्य हैं, जहाँ सर्वदा सत्य विद्यमान है।।८४।।
हिन्दुओं के निन्दनीय व्यवहार से दुःखी होते हुए भीमराव ने हिन्दू धर्म के परित्याग का दृढ़संकल्प किया।। ८५।।
राष्ट्रवाद की भावना से प्रभावित भीमराव ने हिन्दुओं के अङ्गीभूत हिंसावादी बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।।८६ ।।
भारतवर्ष में मान्य भीमराव की भावनाओं से जुड़े हुए उनके सभी समर्थकों ने भक्तिपूर्वक शीघ्र ही बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।। ८७।।
लोककल्याण के कार्यों में निरन्तर संलग्न, त्यागी एवं गुणात्मा यह भीमराव संसार में विशेषोत्कर्ष से विराजमान रहे।।८८।।
बौद्धधर्म के मार्गानुगामी ऋषियों और योगियों के मार्ग का अनुसरण करता हुआ यह भीमराव स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ ।। ८९।।
हे महामानव ! तुम्हारे स्वर्गलोक को प्रस्थान करने से सारे दलित संसार ने अपने को अनाथ एवं असहाय समझते हुए श्रद्धारूपी पुष्पों से भरे हाथों से बार-बार तुम्हें श्रद्धाञ्जलि अर्पित की है।।९०।।
है मान्य! तुमने मूक जनों को वाणी दी, निरक्षरों को अक्षर ज्ञान दिया और दलितों को तुमने अभयदान दिया। इतना ही नहीं अपनी प्रिय जनता के हित के लिए आपने अपना क्या कुछ अपित नहीं किया। अर्थात् अपना सर्वस्व समाज को पित किया।। ९१।।
हे महामानव संघर्षों से परिपूर्ण तुम्हारा सम्पूर्ण जीवन संसार में सुख के एक प्रशस्त मार्ग को विकसित करे। इस आशा और विश्वास को हृदय में धारण करता हुआ मैं सहृदय मन से काव्य- पुष्पांजलि द्वारा सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।।९२।।
हा! कष्ट है कि वर्ग रहित समाज की संरचना के सूत्रधार डा० भीमराव अम्बेडकर की जन्मशती पर आज उनके प्यारे भारतवर्ष में भर्धकर वर्ग-संघर्ष दिखाई दे रहा है, जिससे मेरा मन दुःखित हो रहा है।।९३।।
स्वर्ग में विराजमान श्रद्धेय डा० भीमराव अम्बेडकर भी प्यारी मातृभूमि को इस वर्ग-संघर्ष रूपी अग्नि में जलता हुआ देखकर सन्ताप के ताप से परितप्त होता हुआ अत्यधिक कष्ट का अनुभव कर रहा है।।९४।।
जिस महामानव ने दलित जनों के कल्याण के लिए अपने सभी सुखों को त्याग कर संघर्ष के अत्युत्कृष्ट एवं विकट मार्ग को अपनाया। समस्त मानव मात्र को समान रूप से मानने वाले भीमराव की चिन्तनधारा संसार में प्राणिमात्र के सुख के लिए बहती रहे।।९५।।
जो माननीय गुणियों की गणना में अग्रणी, सहृदयवान् व्यक्तियों का विशेष स्नेहभाजन, सम्पूर्ण प्राणियों के पीड़ा से पीड़ित और दीनबन्धु है, वह योगीराज भीमराव संसार में विशेषोत्कर्ष से विराजमान रहे।। ९६।।
अयि सहूद मित्र ! मेरे वचनों को सुनो। दीनदलित एवं व्यथित जनों के लिए समस्त संसार में त्यागभावना से युक्त जो मार्ग भीमराव ने दिखाया है वह मार्ग समस्त संसार में विशेषोत्कर्ष से रहे। यही मेरी पवित्र मन से शुभकामना है।।९७।।
संघर्ष से परिपूर्ण तुम्हारा जीवन संसार के सभी प्राणियों के लिए सुख का मार्ग प्रशस्त करे, इस भावना एवं आशा को हृदय में संजोये हुए पवित्र मन से काव्य पुष्पाञ्जलि के द्वारा मैं श्रद्धाञ्जलि अर्पित करता हूं।।९८।।
भारतवर्ष में राष्ट्रभाषा संस्कृत हो, इस प्रकार की भावना जिसके मन में सदा विराजमान रहती थी, वह डा० भीमराव अम्बेडकर संसार में विशेषोत्कर्ष से विराजमान हैं।। ९९।।
जो व्यक्नि इस भीमशतकनामक उत्तम काव्य का पाठ करता है उसकी समस्त विपत्तियां नष्ट होती हैं और निरन्तर सुख की प्राप्ति होती हैं।।१००।।
उत्तरप्रदेश में चमोली नामक मण्डल के निवासी कवि ने, डा० भीमराव अम्बेडकर के व्यक्तित्व को प्रकट करने वाले इस काव्य को लिखा है।।१०१।।
वर्तमान में देववाणी संस्कृत भाषा के प्रचार एवं संरक्षण के लिए श्रीकृष्ण सेमवाल ने इस उत्तम शतक को लिखा ।।१०२।।
Tuesday, 10 March 2026
सीता का मिथक स्त्री की दासता का प्रतीक है,
सीता का मिथक स्त्री की दासता का प्रतीक है, यह लेख लिखने के चलते भी उमा चक्रवर्ती नफ़रती गैंग के निशाने पर हैं-
सीता के मिथक का विकास : मिथक और साहित्य में महिलाएँ
भारत के पंरपरागत शास्त्रीय साहित्य के स्त्री-अस्मिता सम्बन्धी मिथकों के क्रम में मुख्यतः स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध पति-पत्नी के रूप में केंद्रित किये गये हैं। भारत में जहाँ ‘अच्छी स्त्री’ अच्छी पत्नी की पर्यायवाची है, वहाँ स्त्री-सुलभ पहचान के निर्माण में यह काफी प्रासंगिक हो जाता है। यह स्त्रियों से सम्बन्धित सर्वाधिक लोकप्रिय और जाने-माने मिथकों में झलकता है, उदाहरण के लिए सावित्री और सत्यवान की कहानी, नल और दमयन्ती तथा सबसे ऊपर राम और सीता के आख्यान में। अन्य भी, द्रौपदी, गान्धारी अरुन्धती और यहाँ तक कि अहल्या भी अपने पतियों के संदर्भ में ही देखी गयी।
अतः शास्त्रीय पौराणिक कथाओं में इस नमूने की ज़बरदस्त प्रबलता रही, जिसमें माँ और बच्चे के सम्बन्धों के रूपक मुश्किल से आ पाये, बावजूद इसके कि भारत में मातृत्व स्त्री-सुलभ पहचान के लिए महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। माँ और बच्चे के सम्बन्ध का क्लासिकल मिथकों में केवल एक ही प्रसिद्ध दृष्टान्त हमें मिलता है, वह है- कृष्ण और यशोदा का प्रसंग, जोकि भारत के संगीत, नाटक और साहित्य में बेहद लोकप्रिय रहा, फिर भी माँ की जगह कृष्ण ही केन्द्र बिन्दु रहे। कर्ण और कुन्ती की कथा माँ और बेटे का एक आरम्भिक प्रसंग है, लेकिन वास्तव में यह कभी विकसित नहीं हुआ और ‘महाभारत’ के घटनाक्रम में ये काफ़ी गौण और ग़ैरज़रूरी रूप में ही रहे। माँ और बेटे के बारे में कोई भी प्रभावकारी मिथक नहीं है, परिणामस्वरूप एक ऐसी स्त्रियोचित पहचान बनी, जिसमें किसी भी स्त्री के लिए उसकी सर्वोत्कृष्ट अभिलाषा अपने पति की ईश्वर के समान सेवा करना और पतिव्रता बने रहना था।
प्रमुख मिथकों ने दृढ़ता के साथ इस संदेश को संप्रेषित किया कि महिलाओं को पवित्र और निष्ठावान होना चाहिए और यदि वे पर्याप्त मात्रा में ये विशेषताएँ अपने भीतर रखती हैं, तो उनका यह सदाचार हर मुसीबत में उनकी रक्षा करेगा।
पतिव्रता पत्नी का यह प्रशंसनीय समर्पण उसके भीतर एक शक्ति उत्पन्न करता है, जो उसके पति को काल के गाल से भी निकाल सकता है या वह सूर्य की खगोलीय परिक्रमा को भी रोक सकता है। इसका प्रमाण दमयन्ती की कहानी है, जो पाँच एक जैसे पुरुषों में से अपने भावी पति नल को पहचान लेती है। ऐसे ही सावित्री के सदाचार और त्याग ने सिद्ध किया कि वह अपनी इच्छा से पति के पीछे-पीछे मृत्युलोक तक जा सकती है, और अन्त में उसे उसके पति सत्यवान का जीवन दोबारा लौटाकर सम्मानित किया गया। पतिव्रता की ख़ास शक्ति और पत्नी के समर्पण के दूसरे प्रभावशाली उदाहरणों में अरुन्धती का प्रसंग भी है। पातिव्रत पर आधारित पर अपने भीतर की पवित्र शक्ति के कारण उसने सतीत्व को नष्ट करने वालों को छोटे बच्चों में बदल दिया और अपने आप को दूषित होने से बचाया। केवल बेचारी अहल्या इन्द्रदेव द्वारा किये छल को नहीं पहचान पायी, जिसने उसके सतीत्व को नष्ट करने के लिए उसके पति का रूप धारण कर लिया था। अरुन्धती के समान वस्तुतः अहल्या पर्याप्त पवित्र नहीं थी। अतः वह अपने पति और पति का रूप धारण किये व्यक्ति के बीच अन्तर को नहीं समझ पायी। अहल्या की कहानी खासतौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि कथा के अनुसार उसे पत्थर में बदल जाने की सजा मिली, यद्यपि वह स्वयं शारीरिक अत्याचार की बड़ी शिकार थी। दूसरी ओर इस उदाहरण के खलनायक ने दूसरे देवताओं को अपनी ओर मिलाकर उनकी सहायता से गौतम ऋषि के श्राप को महत्वहीन कर दिया और आसानी से अपना पिंड छुड़ा लिया। यह कथानक समकालीन भारत में बलात्कार को लेकर समाज के रवैये की वास्तविक स्थिति के अनुरूप ही है। पवित्रता के प्रसंग पर इतनी सनक की एक व्याख्या यह हो सकती है कि अहल्या की कहानी का उदाहरण हमें बताता है कि पैराणिक और शास्त्रीय पाठ पुरुषों के संरक्षित क्षेत्र हैं और इन मिथकों और पाठों के माध्यम से वे वैसी आदर्श स्त्री की रूढ़िवादी छवि को प्रदर्शित करते हैं, जैसा वे उसे देखते हैं।
प्राचीन भारतीय साहित्य के दो प्रमुख ग्रन्थों ‘महाभारत’ और ‘रामायण’ में महिलाओं के कई चित्रण हैं, और ख़ासतौर पर ‘महाभारत’ की महिलाएँ ‘रामायण’ की रूढ़िबद्ध छवि की महिलाओं से ज्यादा जटिल और ज़्यादा रोचक हैं। कुन्ती और द्रौपदी मज़बूत महिलाएँ, हैं जिनके व्यक्तित्व के कई पहलू हैं। आगे, ‘महाभारत’ की महिलाएँ न पवित्र हैं, न ही दब्बू। कुन्ती अपने विवाह से बाहर सूर्य, यम, वायु और इन्द्र के माध्यम से पुत्रों को जन्म देती है और ‘महाभारत’ आख्यान के आरम्भिक भाग में वंश अधिकांशतः नियोग प्रथा द्वारा ही विस्तार पाता है। फिर भी, यह जानकारी हो कि नियोग स्वीकार्य था, पर अवैध सम्बन्ध नही, इसलिए जायज़ पति की प्राप्ति से पहले प्राप्त हुए पुत्र कर्ण को कुन्ती को त्यागना पड़ा। आगे, जब तक कर्ण मर नहीं गया, तब तक कुन्ती उसकी पहचान को खोल नहीं सकी, यहाँ तक कि अपने पुत्रों के सामने भी नहीं। कथानक बताता है कि वास्तव में कुन्ती ने अपने जायज पुत्रों के हितो की रक्षा के लिए कर्ण का बलिदान कर दिया।
द्रौपदी की दन्तकथा भी काफी महत्वपूर्ण है। यह एक पुरुष के प्रति निष्ठा की छवि से बिल्कुल विपरीत है, जोकि शास्त्रीय परंपराओं में महिलाओं के आदर्शीकरण का प्रधान पक्ष है। द्रौपदी की कथा मुख्यतः दिखाती है कि भारतीय समाज के प्रारम्भिक चरण में भ्रातृ बहुपति-प्रथा सामान्य थी। जो भी हो, कुन्ती और द्रौपदी दोनों ही की कहानी ‘महाभारत’ को चमक प्रदान करती हैं। यह खासतौर पर द्रौपदी की विचित्र वैवाहिक व्यवस्था के लिए सत्य है, जो कि पांडवों द्वारा दिये वचन, कि पाँचों भाई हर वस्तु बाँटेंगे, के अनोखे परिणामस्वरूप बनी।
कुन्ती और द्रौपदी शास्त्रीय पाठों में स्त्री की महत्वपूर्ण छवियाँ हैं, क्योंकि इन्होंने अपने पुरुषों के साथ एक गतिशील भूमिका अदा की और बहुधा पांडवों के विरोध में युद्ध करने के लिए शब्दों के माध्यम से प्रेरित किया। द्रौपदी चुप नही बैठी बल्कि उसने अपने अपमान के दंडस्वरूप पांडवों की भर्त्सना की। कौरवों की सभा में जब उस पर अपना हक जमाने के लिए उसे खींचकर लाया गया, तब भी वह निर्भीक ही रही। उसने राज-सभा में बैठे सभी वरिष्ठों से गुलाम की कानूनी स्थिति के बारे में पूछा कि जब युधिष्ठिर उसे दाँव पर लगाने से पहले स्वयं को ही हार चुके हैं, तो वह पहले से ही उस पर अधिकार खो चुके हैं। फिर वह बहस करती है कि उसे दाँव पर लगाना ग़ैरक़ानूनी हैं। कौरवों द्वारा अपमानित होने के बाद वह पांडवों को उनके बन्धन से मुक्त करने की व्यवस्था करती है और पांडवों को अपनी अवमानना और अपमान को लगातार याद दिलाये रखने के लिए अपने बालों को कभी नहीं बाँधती। किन्तु ‘महाभारत’ में महिलाएँ जिस छवि के साथ प्रस्तुत होती हैं, उसमें वे एक द्वितीयक छवि में ही रहीं और ‘महाभारत’ की महिलाओं के तेज और सक्रियता के बावजूद उनमें से कोई भी आदर्श भारतीय महिला नहीं बन पायी। इस सत्यता के साथ इसे व्याख्यायित किया जा सकता है कि ‘महाभारत’ का निर्माण सम्पूर्णता में नहीं हुआ, जबकि दूसरी ओर ‘रामायण’ में सीता के रूप में भारतीय स्त्री की छवि का निर्माण पूरे महाकाव्य में शुरू से आखिर तक किया गया है। ‘रामायण’ की कथावस्तु और विषय-वस्तु सम्बन्धी निरन्तरता के कारण यह पति-पत्नी के सम्बन्ध में एक बड़ी विचारधारात्मक शक्ति है। यह भी कहा जा सकता है। कि ‘रामायण’ की पूरी संरचना वास्तव में एक सचेत प्रक्रिया के तहत बुनी गयी है, जिससे पवित्र और सहनशील महिला की प्रभावकारी रूढ़िवादी छवि निर्मित की जा सके, जोकि सीता का मिथक प्रस्तुत करता है। हिन्दू समाज में स्त्री-पुरुष दोनों के लिए आदर्श महिला का पारम्परिक रूपक सीता का ही दिया जाता है, जिसने ‘रामायण’ में पत्नी के त्याग के सार-तत्व का प्रदर्शन किया। कोई व्यक्ति बचपन से ही धार्मिक और ग़ैर-धार्मिक अवसरों पर न जाने कितनी बार सीता की कथा को सुनता है और उनके द्वारा प्रतीकात्मक आदर्श, स्त्री-सुलभ पहचान-हर दिन के रूपकों और उपमानों के द्वारा जो उनके नाम से जुड़ी है- को अपने भीतर आत्मसात करता है। जब यह अपने पूरे रूप में विकसित होता है, तो सीता का मिथक सतीत्व, पवित्रता और एकनिष्ठ विश्वसनीयता को प्रस्तुत करता है, जो राम की थोड़ी या सम्पूर्ण अस्वीकृति के बाद भी नष्ट नहीं होता।
एक ऐतिहासिक परिदृश्य में सीता की कथा के विकास का विश्लेषण सतीत्व के महत्त्व और इस धारणा को उद्घाटित करता है कि आदर्श विवाह का आधार पत्नी का समर्पण ही हो सकता है। ये इस साधारण कथा के कुछ पहलू हैं, जो इससे जुड़े हैं। शताब्दियों बाद भी, कहानी में जो जरूरी जानकारियाँ जोड़ी गयी हैं, उनका एक ठोस प्रभाव स्त्री-सुलभ पहचान को आकार देने में है। यदि हम इस विकास को ऐतिहासिक परिदृश्य से जोड़कर देखें या उस सामाजिक या सांस्कृतिक उत्पत्ति को देखें, जिसमें कि कथानक अपना रूप बदलते हैं, तो हम उस सचेत प्रक्रिया को समझने की अन्तर्दष्टि पा सकते है, जिसमें कि स्त्री-सुलभ पहचान को प्रशिक्षित किया जाता है।
‘रामायण’ का सबसे प्राचीन वर्णन ‘दशरथ जातक’ में मिलता है। ‘महाभारत’ के ‘शान्ति पर्व’ में राम के बारे में एक साधारण कथा है। ‘महाभारत’ के इस वर्णन के अनुसार राम एक महान सन्यासी के रूप में वर्णित है, जो 14 वर्षों तक जंगल में रहे। इसमें उनके पिता, भाइयों और यहाँ तक कि उनकी पत्नी सीता तक का कोई जि़क्र नहीं है। उसके बाद राम ने दस हजार वर्ष तक अयोध्या पर शासन किया। ‘दशरथ जातक’ में राम की कहानी बहुत विस्तृत है, पर यह ‘महाभारत’ के प्रारम्भिक वर्णन के अनुरूप ही है। ‘दशरथ जातक’ में राम, सीता और लक्ष्मण का वर्णन दशरथ की बड़ी पत्नी के बच्चों के रूप में किया गया है। उनकी छोटी पत्नी ने मांग रखी कि उसके बेटे भरत कुमार को राजा बनाया जाए। तब से दशरथ अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गये और उन्हें घरेलू षडयंत्रों से बचाने के लिए 12 वर्ष के लिए बाहर भेज दिया। कुछ समय बाद राजा दशरथ की मृत्यु हो गयी लेकिन भरत ने सिंहासन का उत्तराधिकारी बनने से इन्कार कर दिया और राम को वापस लाने उनकी कुटिया की ओर चल पड़े। राम ने नियत समय से पूर्व आने से इन्कार कर दिया, पर सीता और लक्ष्मण से लौट जाने को कहा। छठी शती ईसवी की गद्य-टीका ‘जातक अथकवन्न’ में हमें कुछ और तथ्य मिलते हैं, जिनके अनुसार भरत के आग्रह पर राम ने अपनी चरण पादुकाएँ उन्हें दे दीं, जो उनके वापस आने तक सिंहासन पर उनका प्रतिनिधित्व करेंगी। नियत अवधि पूरी होने पर राम वापस आये और राज सिंहासन पर बैठे तथा सीता उनकी प्रमुख रानी बनीं। मुख्यतः यह कहानी निर्वासन की प्रतिज्ञा, जंगल में तपस्या द्वारा प्रतिज्ञा पूरी करना, घर वापस आना और राजत्व स्वीकार करने की कहानी है। सुकुमार सेन के अनुसार राम के मिथक का यह प्राचीनतम रूप है। ‘महाभारत’ के शान्ति पर्व का वर्णन इससे जुड़ा हो सकता है। वे सुझाव देते हैं कि यह वर्णन ‘रामायण की बीज रूप’ है, आगे सेन एक दूसरे मिथक के अस्तित्व का संकेत करते हैं, जिसे वे ‘रावण मिथक’ कहते हैं और उनके अनुसार यह मूल रूप में राम की कथा से नहीं जुड़ा था। ‘रावण मिथक’ का प्राचीनतम रूप हमें जातक के चीनी अनुवाद में उपलब्ध होता है, जिसका समय 251 ईसवी है। इसका नायक एक राजा है, जो बोधिसत्व था और अपने चाचा द्वारा राज्य से बेदखल कर दिया गया था। वह अपनी पत्नी के साथ पहाड़ों पर जाने के लिए विवश कर दिया गया था, वहाँ उसने एक तपस्वी का शान्त जीवन जिया। एक दिन एक समुद्री दानव तपस्वी के रूप में आया और बोधिसत्य की पत्नी को उठाकर ले गया। बोधिसत्व ने वानरों की सेना के राजा को अपना दोस्त बनाया और वानरों की मदद से उसने अपनी पत्नी को मुक्त कराया। पत्नी ने अपनी पवित्रता को सिद्ध किया और पत्नी-पति एक हो गये। सेन तर्क देते है कि दो भिन्न मिथकों के योग से ‘वाल्मीकि रामायण’ की मूल कथा विकसित हुई है।
‘वाल्मीकि रामायण’ से ही राम की सम्पूर्ण कथा का विस्तार हुआ। इसमें राम की पुरानी गाथा और रावण के मिथक से ग्रहण कर एक महान महाकाव्य का सृजन किया गया, जिसमें राम के भीतर पुरुष-नायकत्व, शौर्य और सम्मान तथा सीता के भीतर नारी-सुलभ आत्म-त्याग, सदाचार, पातिव्रत् और पवित्रता पर बल दिया गया। ‘वाल्मीकि रामायण’ से सीता की नव-उत्पन्न छवि के विश्लेषण से सूचना मिलती है कि यह पाठ इन दो धारणाओं के प्रसार का प्रमुख माध्यम बना कि स्त्रियाँ पुरुषों की सम्पत्ति हैं और स्त्रियों की यौन-वफादारी उनके जीवन का महान सद्गुण है। जैसा कि हमने देखा है, प्राचीनतम वर्णन में सीता का अपहरण नहीं हुआ था और वह पीड़ित स्त्री-चरित्र भी नहीं थी, जिसे अपनी पवित्रता सिद्ध करनी पड़ी हो। मूलकथा के ‘वाल्मीकि रामायण’ के रूप में विस्तार के परिणामस्वरूप कहानी तीन घटनाओं पर घूमती रही, जिसमें से प्रत्येक ने स्त्री को रूढ़िबद्ध बनाकर कलंकित किया। पहली घटना है, राम के निर्वासन की कैकेयी की माँग, दूसरी है- शूर्पणखा का राम से प्रणय-निवेदन, उनके हाथों उसका अस्वीकार और तत्पश्चात् लक्ष्मण द्वारा उसका अंग-भंग करना, और तीसरी है- सीता द्वारा हिरण की मांग और लक्ष्मण द्वारा उन्हें कुटिया में छोड़कर जाने में अनिच्छा दिखाने पर सीता द्वारा अनुचित दोषारोपण करना। अंतिम घटना का परिणाम यह हुआ कि सीता असुरक्षित छूट गयी, जिससे उनका अपहरण हो गया। वास्तव में ‘वाल्मीकि रामायण’ की कहानी प्रतिपादित करती है कि जीवन सुखद ढंग से चल सकता है, पर स्त्रियों के दुर्गुण या चंचल स्वभाव के कारण यह नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त, ‘रामायण’ कैकेयी और शूर्पणखा जैसी महत्वाकांक्षी और पहल करने वाली स्त्रियों को बुरा और घृणित बताकर स्त्रियों को नकारात्मक छवि भी प्रदान करती है।
‘वाल्मीकि रामायण’ रामायण में स्त्रीत्व के निरूपण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह आदिवासी समाज की स्त्री के विपरीत स्त्रियों की छवि के आर्य आद्य रूप का विकास है। इसका सम्बन्ध वाल्मीकि द्वारा समाजों के आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के विभिन्न स्तरों के निरूपण से है, जैसे आर्यों या नर के विरूद्ध राक्षस और वानर। राक्षस और वानर आर्थिक विकास की निम्न अवस्था में हैं, परन्तु उनकी स्त्रियाँ शक्तिशाली स्वतन्त्र व्यक्तित्व वाली प्रतीत होती हैं, जबकि अयोध्या के समाज में स्त्रियाँ कारुणिक रूप से पुरुषों के अधीन प्रदर्शित होती हैं।
राक्षसों और वानरों को ‘वाल्मीकि रामायण’ में कृषि-पूर्व अवस्था में दिखाया गया है। वानर जंगल की भूमि और पर्वतों पर अपना अधिकार कर लेते हैं और यहाँ तक कि लंका में भी कृषि-कर्म के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। वानरों के बीच समूह-विवाह के प्रमाण मिलते है: बाली और सुग्रीव का विवाह क्रमशः तारा और रूमा से हुआ है, पर वे अलग-अलग समय में दोनों स्त्रियों के साथ साझा करते हैं। यहाँ पवित्रता की कोई नैतिक वर्जना नहीं प्रतीत होती, जो स्त्रियों को पुरुषों के अधीन बनाने में प्रयुक्त होती रही है। अंजना ने वायु के द्वारा हनुमान को गर्भ में धारण किया, जबकि उनके पति केसरी जीवित थे। बाली द्वारा रूमा के अपहरण के बावजूद सुग्रीव ने बिना शर्त रूमा को वापस अपनाया। यह राम द्वारा सीता को पुनः अपनाने की कठोर शर्तों से बिल्कुल विपरीत है। यह कहा गया है कि सीता के साथ राम के व्यवहार की कठोरता यौन-नैतिकता की कठोर संहिता की ओर गति को प्रतिबिम्बित करती है, जिसकी ‘रामायण’ प्रतीक है।
लंका संक्रमण से गुजर रहा समाज प्रतीत होता है। वह मातृवंशीय समाज से पिवृवंशीय समाज की ओर बढ़ रहा है। यद्यपि वंश का पता पिता से चलता है, पर लंका में स्त्रियों की सापेक्ष महत्ता और स्वतन्त्रता दर्शाती है कि उनकी भूमिका अभी भी शक्तिशाली है। शूर्पणखा अयोध्या की रानी से अधिक वैयक्तिकता प्रदर्शित करती है और जंगल में स्वच्छन्दता से घूमती है। यह केवल राक्षसों के मातृवंशीय स्वभाव के कारण ही था। रावण और उसके तीन भाइयों को राक्षसों के रूप में ही पहचाना जाता है, क्योंकि उनकी माँ केकसी एक राक्षसी थी, जबकि उनके पितामह पुलत्स्य थे।
राक्षसों में भाई-बहन सम्बन्ध की मजबूती की प्रतीति शूर्पणखा द्वारा अपने भाइयों से अपने अपमानित करने वाले के अंग-भंग के प्रतिशोध के आह्वान से होती है। दूसरी तरफ, सीता एकदम अकेली हैं और उनके अपमान में उनके साथ कोई नहीं है। उनकी शरण-स्थली के रूप में तपस्वी का आश्रम वर्णित है। समग्रतः आर्यों के विकसित समाज और आदिवासियों के अविकसित समाज के बीच भेद यह संकेत करता है कि आर्थिक विकास और स्त्रियों की दशा के बीच विलोम सम्बन्ध है: समाज की उच्चतर आर्थिक विकास की दशा में स्त्रियों की स्थिति निम्नतर होती है, जैसी कि पितृसत्तात्मक समाज में है।
‘दशरथ जातक’ और ‘वाल्मीकि रामायण’ में राम के आख्यान में बड़ा अन्तर परिवार के एक महत्वपूर्ण पहलू की ओर इंगित करता है। मॉर्गन के अनुसार परिवार-संस्था के प्रारम्भिक रूप सगोत्रीय परिवार थे, जहाँ एक ही पीढ़ी के स्त्री-पुरुष भाई-बहन से निरपेक्ष स्वाभाविक रूप से पति-पत्नी होते थे। यह ‘दशरथ जातक’ के वर्णन में मिथक के बीज रूप में प्रतिबिंबित हो सकता है, जहाँ राम और सीता भाई और बहन हैं और साथ ही सीता राम की मुख्य पत्नी भी हैं। यह ऐसे समाज को प्रतिबिम्बित करता है जिसमें पुरुष स्त्रियों से उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं। दूसरी ओर, वाल्मीकि द्वारा वर्णित अयोध्या का समाज विवाह के परवर्ती चरण का वर्णन करता है, जिसका उद्देश्य पिता की सम्पत्ति के स्वाभाविक उत्तराधिकार के लिए अविवादित पितृत्व वाली सन्तानों का प्रजनन करना है। पवित्रता और एक पुरुष के प्रति एकनिष्ठता पर बल देना ही सीता की कथा का मूल कारण रहा है।
मूल ‘वाल्मीकि रामायण’ में उत्तरकांड नही मिलता। उत्तरकांड ने राम-कथा को नया मोड़ दिया, जिसमें सीता का परित्याग, उनके दो जुड़वा बच्चों का जन्म, अश्वमेध-यज्ञ की तैयारी, लव और कुश की राम के पुत्रों के रूप में खोज और अन्त में सीता को बिना अग्नि-परीक्षा के दूसरी बार स्वीकार करने में राम का संकोच है। सीता द्वारा धरती माता से अपने निरन्तर अपमान से बचाव, अपनी पवित्रता और सतीत्व को निर्णायक रूप से सिद्ध करने की कारुणिक अभ्यर्थना में होता है। उसके बाद धरती फट जाती और सीता उसमें समाहित हो जाती हैं। पवित्रता और पातिव्रत-विषयक कथा की निरन्तरता सीता के अपमान और यातना के साथ जुड़ जाती है। वैसे ‘वाल्मीकि रामायण’ में यह विषय-वस्तु पहले से ही मौजूद थी। इस विषय-वस्तु के विकास में ‘रघुवंश’ और ‘उत्तरकांड’ ने स्त्री की छवि में एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ा— स्त्री के साथ जब भी अन्याय होता है, वह उसका प्रतिकार नहीं करती, बल्कि अपनी यन्त्रणा का अन्त आत्मघाती कृत्य से करती है।
हाल ही में यह बताया गया है कि अपने बच्चों की वैधता को अखंड और अंतिम रूप से सिद्ध करने के लिए सीता का धरती में समाना आवश्यक था, क्योंकि इसके पहले वह अग्नि-परीक्षा दे चुकी थीं, उसके बाद भी उसकी पवित्रता पर कलंक लगाने वाली दुर्भावनाग्रस्त चर्चाएँ बंद नही हुईं। इसलिए, वे कैसे विश्वास कर लेतीं कि दूसरी बार अग्नि-परीक्षा उनके विरूद्ध अफवाहों को बंद करने में सफल होगी और चूँकि राम भी उन्हें सार्वजनिक अग्नि-परीक्षा के बिना वापस नहीं ले जाते, तब सीता का धरती के गर्भ में समा जाने का कार्य रघु की राजवंश की परंपरा को निष्कलंक सिद्ध करने वाला रहा। चाहे जो हो, सीता का कृत्य आत्म-विनाशक ही है और यह बार-बार अपमान के प्रति आत्म-घात की स्त्री-प्रवृत्ति को और पुख्ता करता है।
सीता के आख्यान का अंतिम व सबसे महत्वपूर्ण विकास मध्यकाल में हुआ, जब इसमें आजकल लोकप्रिय शब्द ‘लक्ष्मण-रेखा’ जुड़ा। इस वर्णन में जब सीता ने लक्ष्मण को राम की सहायता के लिए जाने को कहा, तो लक्ष्मण ने सीता को अकेले छोड़कर जाने में अनिच्छा दिखायी, फिर भी लक्ष्मण ने जंगल में कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा-रेखा खींच दी और सीता को इसके भीतर ही रहने को कहा। यह एक जादुई रेखा थी, जो उन्हें किसी भी भौतिक खतरे से सुरक्षित रखती। यह सुरक्षात्मक देहरी ‘वाल्मीकि रामायण’ में नहीं है। पहली बार इसकी झलक ‘रामायण’ में लगभग 9वीं सदी में मिलती है। इसमें राम, सीता और लक्ष्मण जंगल में एक ऐसे क्षेत्र में अपना घर बनाते हुए वर्णित हैं, जो चारों तरफ से जादुई रेखा से घिरा हुआ है, जिसे कोई भी बाहरी लाँघ नहीं सकता। ‘रामायण’ के एक मध्यकालीन वर्णन ‘गीतावली’ (जो तुलसीदास की रचना है) में जब लक्ष्मण सीता की सुरक्षा करने के लिए उपलब्ध नहीं थे, तब अकेली सीता की सुरक्षा करने के लिए लक्ष्मण ने रेखा खींची। लक्ष्मण ने सीता को चेताया कि किसी भी परिस्थिति में वे उससे बाहर न निकलें। तुलसीदास ने उस समय ‘रामायण’ पर आधारित कई ग्रन्थ लिखे, जब उनकी दृष्टि में हिन्दू समाज पर गहरा दबाव था और उसके सारे मूल्यों और प्रतिमानों के ध्वस्त होने का खतरा था। असल में, तुलसीदास की रामायण में 16वीं सदी के भारत की आर्थिक और राजनीतिक दशा का तुलसीदास द्वारा विवेचन है। ऐसी स्थिति में, तुलसीदास यह सिद्धान्त प्रतिपादित कर रहे थे कि यदि महिलाएँ अपने लिए निर्धारित परिधि के भीतर रहें, तो वे सुरक्षित रहेंगी, यदि वे उससे बाहर आती है, तो उनकी सुरक्षा कोई नहीं कर सकेगा। महत्वपूर्ण है कि अत्यधिक प्रचलित ‘रामचरित मानस’ में लक्ष्मण-रेखा प्रसंग उपस्थित है। यह केवल तुलसीदास की कम प्रसिद्ध रामायण में व्यक्त हुआ है, फिर भी वार्षिक राम-लीला नाटकों में प्रदर्शन से यह प्रसंग आश्चर्यजनक रूप से लोकप्रिय हुआ। अब यह राम-कथा का अनिर्वाय अंग बन चुका है और इसका संदेश प्रतिवर्ष राम-लीला के प्रदर्शन से दुहराया जाता है।
शास्त्रीय परपंरा में सीता की कथा के समय के साथ विकास के विश्लेषण से स्पष्टतः पता चलता है कि आदर्श विवाह के मूल विषय के साथ जुड़े क्रमिक वर्णन पुरुष के प्रति स्त्री की एकनिष्ठता और समर्पण पर आधारित हैं। प्रत्येक नया वर्णन आदर्श स्त्री की रूढ़ छवि को बल प्रदान करता है, जिसका मुख्य कार्य संकट की कठिन घड़ियों में आज्ञाकारी और पतिव्रता बने रहना है। यदि अपमान बहुत ज्यादा है, तो वह एक ‘सम्मानजनक मृत्यु’ का सहारा लेकर अपने दुखों का अन्त कर सकती है, पर उसके लिए सम्मानित जीवन का कोई प्रश्न ही नहीं है। फिर भी, यदि शास्त्रीय हिंदू परम्परा के बाहर कोई सीता की कथा को देखे, तो कुछ मुक्तिदायी वर्णन मिलती हैं, जिनकी तरफ लोगों का पर्याप्त ध्यान नहीं गया। ‘रामायण’ का जैन धर्मशास्त्र ‘पद्मपुराण आख्यान’ का अन्त निम्न ढंग से करता है— जब राम का जंगल में अपने पुत्रों की खोज और परित्याग के बाद सीता से पहली बार सामना हुआ, तो राम ने कहा कि सीता अग्नि-परीक्षा देकर अयोध्या वापस लौट सकती हैं। सीता अपमानजनक शर्त से विचलित हो जाती हैं और प्रकृति उनकी सहायता करती है। आग जादुई वर्षा से बुझ जाती है और बाढ़ आ जाती है। तब अयोध्या के लोग डूब रही अयोध्या को बचाने के लिए सीता से अनुनय-विनय करते हैं। सीता उनकी बात मान जाती हैं। लेकिन, शास्त्रीय परंपरा वाले वर्णन से भिन्न, जहाँ वे अपमान का अन्त आत्म-घाती कार्य से करती है, यहाँ वे राम और परिवार का परित्याग कर भिक्षुणी बन जाती हैं। भिक्षुणी जीवन में प्रवेश एकदम जैन रीति से करती हैं— अपने सिर के प्रत्येक बाल को नोंचकर। ऐसा प्रतीत होता है कि यह आत्यन्तिक दर्द भी राम के साथ अपमानित अस्तित्व से अधिक काम्य है। सीता की कथा का एक लोक-वर्णन अधिक रोचक है। यहाँ सीता राम को अस्वीकार कर देती हैं और अपने पुत्रों को मातृवंशीय विरासत देने की सीमा तक जाती हैं। वे संत वाल्मीकि द्वारा राम के पास जाने के परामर्श पर तीव्र प्रतिक्रिया करती हुई कहती हैं- ‘‘गुरू आप प्रत्येक की स्थिति से वाकिफ हैं फिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, जैसे आप कुछ जानते ही न हों?...... जिस राम ने मुझे ऐसा दुख दिया, जिसने मुझे आग में डाला और मुझे घर से बाहर फेंक दिया, गुरू, मैं उसका चेहरा पुनः कैसे देख सकती हूँ? मैं अयोध्या कभी नहीं जाऊँगी और भाग्य हमें दुबारा कभी न मिलवाए। अन्ततः जब वे धरती में समाहित होती हैं, तो यह प्रतिरोध और सम्मानित जीवन के अधिकार का दावा— दोनों है।
शास्त्रीय परंपरा और गैर-शास्त्रीय परंपराओं के वर्णन में सीता के मिथक की तुलना का यह उदाहरण है, जिसकी रूपरेखा में स्त्री-सुलभ पहचान का प्रधान वर्णन और स्त्री-सुलभ पहचान से जरा हटकर वर्णन में एक बेहतर अभिव्यक्ति के बीच एक वैषम्य मिलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यद्यपि सीता सामान्यतः पूर्व लिखित संवादों की ही आवृत्ति करती रहीं, पर कई बार वे अपनी दबी भावनाओं को खोलती भी हैं और इन भावनाओं पर कई बार ध्यान भी दिया जाता है। वंश और आदर्श स्त्री के अधीन रूप के संकुचित ढाँचे में डालने का उनका विरोध गैर-शास्त्रीय परंपरा के अध्ययन से काफी सशक्त रूप से निकल कर आएगा।
मिथक और इतिहास में स्त्री का अध्ययन करना प्रचलित प्रस्तावों से एक भिन्न रास्ते को दर्शाता है। हम सीता के मिथक का वर्णन ‘रामायण’ के कई सारे खंडें के विश्लेषण के माध्यम से करते हैं और मिथक का विकास उसके बदलते सामाजिक आर्थिक वातावरण के परिदृश्य में निर्धारित करते हैं, जिसमें महिलाओं की पहचान आकार लेती है। स्पष्ट रूप से स्त्री-अध्ययन के लिए समय के द्वारा महिलाओं की एक सम्पूर्ण तस्वीर के लिए नये औज़ारों के निर्माण की अत्यंत आवश्यकता है।
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