Sunday, 28 December 2025

आर्य समाज द्वारा अंबेडकर मत का खंडन

आर्य समाज द्वारा

दूध का दूध पानी का पानी !

6 दिसंबर 1956 को माननीय डा. अंबेडकर जी का देहावसान हुआ । कानपुर के वैदिक गवेषक पंडित शिवपूजन सिंह जी का चर्चित 'भ्रांति निवारण' सोलह पृष्ठीय लेख 'सार्वदेशिक ' मासिक के जुलाई-अगस्त 1951अंक में उनके देहावसान के पांच वर्ष तीन माह पूर्व प्रकाशित हुआ । डा. अंबेडकर जी इस मासिक से भलीभांति परिचित थे और तभी यह चर्चित अंक भी उनकी सेवा में.भिजवा दिया गया था । लेख डा. अंबेडकर के वेदादि विषयक विचारों की समीक्षा में 54 प्रामाणिक उद्धरणों के साथ लिखा गया था। इसकी प्रति विदर्भ के वाशिम जनपद के आर्य समाज कारंजा के प्राचीन ग्रंथालय में सुरक्षित है।

आशा थी कि अंबेडकर जी जैसे प्रतिभाशाली विद्वान या तो इसका उत्तर देते या फिर अपनी पुस्तकें बताये गये अकाट्य तथ्यों की रोशनी में संपादित करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ऐसा इसलिये कि जो जातिगत भेदभाव और अपमान उन्होंने लगातार सहा उसकी वेदना और विद्रोह ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

डा. अंबेडकर जी की दोनों पुस्तकें - अछूत कौन और कैसे तथा शूद्रों की खोज - पर लेख शंका समाधान शैली में लिखा गया था पर डा. कुशलदेव शास्त्री जी ने इसे सुविधा और सरलता हेतु संवाद शैली में रुपांतरित किया है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस लेख को स्वामी जी द्वारा लिखित 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' के आलोक में पढ़कर सत्यासत्य का निर्णय सहर्ष लिया जा सकता है ।

1 - ' अछूत कौन और कैसे '

डा. अंबेडकर- आर्य लोग निर्विवाद रूप से दो हिस्सों और दो संस्कृतियों में विभक्त थे,जिनमें से एक ऋग्वेदीय आर्य और दूसरे यजुर्वेदीय आर्य , जिनके बीच बहुत बड़ी सांस्कृतिक खाई थी।ऋग्वेदीय आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे,अथर्ववेदीय जादू-टोना में।

पंडित शिवपूजन सिंह- दो प्रकार के आर्यों की कल्पना केवल आपके और आप जैसे कुछ मस्तिकों की उपज है।यह केवल कपोल कल्पना या कल्पना विलास है।इसके पीछे कोई ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।कोई ऐतिहासिक विद्वान भी इसका समर्थन नहीं करता।अथर्ववेद में किसी प्रकार का जादू टोना नहीं है।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद में आर्यदेवता इंद्र का सामना उसके शत्रु अहि-वृत्र (सांप देवता) से होता है,जो कालांतर में नाग देवता के नाम से प्रसिध्द हुआ।

पं. शिवपूजन सिंह- वैदिक और लौकिक संस्कृत में आकाश पाताल का अंतर है।यहाँ इंद्र का अर्थ सूर्य और वृत्र का अर्थ मेघ है।यह संघर्ष आर्य देवता और और नाग देवता का न होकर सूर्य और मेघ के बीच में होने वाला संघर्ष है।वैदिक शब्दों के विषय में.निरुक्त का ही मत मान्य होता है।वैदिक निरूक्त प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने के कारण ही आपको भ्रम हुआ है।

डा. अंबेडकर- महामहोपाध्याय डा. काणे का मत है कि गाय की पवित्रता के कारण ही वाजसनेही संहिता में गोमांस भक्षण की व्यवस्था की गयी है।

पं. शिवपूजन सिंह- श्री काणे जी ने वाजसनेही संहिता का कोई प्रमाण और संदर्भ नहीं दिया है और न ही आपने यजुर्वेद पढ़ने का कष्ट उठाया है।आप जब यजुर्वेद का स्वाध्याय करेंगे तब आपको स्पष्ट गोवध निषेध के प्रमाण मिलेंगे।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद से ही यह स्पष्ट है कि तत्कालीन आर्य गोहत्या करते थे और गोमांस खाते थे।

पं. शिवपूजन सिंह- कुछ प्राच्य और पाश्चात्य विद्वान आर्यों पर गोमांस भक्षण का दोषारोपण करते हैं , किंतु बहुत से प्राच्य विद्वानों ने इस मत का खंडन किया है।वेद में गोमांस भक्षण विरोध करने वाले 22 विद्वानों के मेरे पास स-संदर्भ प्रमाण हैं।ऋग्वेद से गोहत्या और गोमास भक्षण का आप जो विधान कह रहे हैं , वह वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के अंतर से अनभिज्ञ होने के कारण कह रहे हैं । जैसे वेद में'उक्ष' बलवर्धक औषधि का नाम है जबकि लौकिक संस्कृत में भले ही उसका अर्थ 'बैल' क्यों न हो ।

डा. अंबेडकर- बिना मांस के मधुपर्क नहीं हो सकता । मधुपर्क में मांस और विशेष रूप से गोमांस का एक आवश्यक अंश होता है ।

पं. शिवपूजन सिंह- आपका यह विधान वेदों पर नहीं अपितु गृह्यसूत्रों पर आधारित है । गृहसूत्रों के वचन वेद विरूध्द होने से माननीय नहीं हैं । वेद को स्वत: प्रमाण मानने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार," दही में घी या शहद मिलाना मधुपर्क कहलाता है । उसका परिमाण 12 तोले दही में चार तोले शहद या चार तोले घी का मिलाना है ।"

डा. अंबेडकर- अतिथि के लिये गोहत्या की बात इतनी सामान्य हो गयी थी कि अतिथि का नाम ही 'गोघ्न' , अर्थात् गौ की हत्या करना पड़ गया था ।

प. शिवपूजन सिंह- 'गोघ्न' का अर्थ गौ की हत्या करने वाला नहीं है । यह शब्द 'गौ' और 'हन' के योग से बना है। गौ के अनेक अर्थ हैं , यथा - वाणी , जल , सुखविशेष , नेत्र आदि। धातुपाठ में महर्षि पाणिनि 'हन' का अर्थ 'गति' और 'हिंसा' बतलाते हैं।गति के अर्थ हैं - ज्ञान , गमन , और प्राप्ति । प्राय: सभी सभ्य देशों में जब किसी के घर अतिथि आता है तो उसके स्वागत करने के लिये गृहपति घर से बाहर आते हुये कुछ गति करता है , चलता है,उससे मधुर वाणी में बोलता है , फिर जल से उसका सत्कार करता है और यथासंभव उसके सुख के लिये अन्यान्य सामग्रियों को प्रस्तुत करता है और यह जानने के लिये कि प्रिय अतिथि इन सत्कारों से प्रसन्न होता है नहीं , गृहपति की आंखें भी उस ओर टकटकी लगाये रहती हैं । 'गोघ्न' का अर्थ हुआ - ' गौ: प्राप्यते दीयते यस्मै: स गोघ्न: ' = जिसके लिये गौदान की जाती है , वह अतिथि 'गोघ्न' कहलाता है ।

डा. अंबेडकर- हिंदू ब्राह्मण हो या अब्राह्मण , न केवल मांसाहारी थे , किंतु गोमांसहारी भी थे ।

प. शिवपूजन सिंह- आपका कथन भ्रमपूर्ण है, वेद में गोमांस भक्षण की बात तो जाने दीजिये मांस भक्षण का भी विधान नहीं है ।

डा. अंबेडकर- मनु ने गोहत्या के विरोध में कोई कानून नहीं बनाया । उसने तो विशेष अवसरों पर 'गो-मांसाहार' अनिवार्य ठहराया है ।

पं. शिवपूजन सिंह- मनुस्मृति में कहीं भी मांसभक्षण का वर्णन नहीं है । जो है वो प्रक्षिप्त है । आपने भी इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया कि मनु जी ने कहां पर गोमांस अनिवार्य ठहराया है। मनु ( 5/51 ) के अनुसार हत्या की अनुमति देनेवाला , अंगों को काटने वाला , मारनेवाला , क्रय और विक्रय करने वाला , पकाने वाला , परोसने वाला और खानेवाला इन सबको घातक कहा गया है ।

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2- ' शूद्रों की खोज '

डा. अंबेडकर- पुरूष सूक्त ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिध्दि के लिये प्रक्षिप्त किया है।कोल बुक का कथन है कि पुरूष सूक्त छंद और शैली में शेष ऋग्वेद से सर्वथा भिन्न है।अन्य भी अनेक विद्वानों का मत है कि पुरूष सूक्त बाद का बना हुआ है।

पं. शिवपूजन सिंह- आपने जो पुरूष सूक्त पर आक्षेप किया है वह आपकी वेद अनभिज्ञता को प्रकट करता है।आधिभौतिक दृष्टि से चारों वर्णों के पुरूषों का समुदाय - 'संगठित समुदाय'- 'एक पुरूष' रूप है।इस समुदाय पुरूष या राष्ट्र पुरूष के यथार्थ परिचय के लिये पुरुष सूक्त के मुख्य मंत्र ' ब्राह्मणोSस्य मुखमासीत्...' (यजुर्वेद 31/11) पर विचार करना चाहिये।

उक्त मंत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण मुख है , क्षत्रिय भुजाएँ , वैश्य जङ्घाएँ और शूद्र पैर। केवल मुख , केवल भुजाएँ , केवल जङ्घाएँ या केवल पैर पुरुष नहीं अपितु मुख , भुजाएँ , जङ्घाएँ और पैर 'इनका समुदाय' पुरुष अवश्य है।वह समुदाय भी यदि असंगठित और क्रम रहित अवस्था में है तो उसे हम पुरूष नहीं कहेंगे।उस समुदाय को पुरूष तभी कहेंगे जबकि वह समुदाय एक विशेष प्रकार के क्रम में हो और एक विशेष प्रकार से संगठित हो।

राष्ट्र में मुख के स्थानापन्न ब्राह्मण हैं , भुजाओं के स्थानापन्न क्षत्रिय हैं , जङ्घाओं के स्थानापन्न वैश्य और पैरों के स्थानापन्न शूद्र हैं । राष्ट्र में चारों वर्ण जब शरीर के मुख आदि अवयवों की तरह सुव्यवस्थित हो जाते हैं तभी इनकी पुरूष संज्ञा होती है । अव्यवस्थित या छिन्न-भिन्न अवस्था में स्थित मनुष्य समुदाय को वैदिक परिभाषा में पुरुष शब्द से नहीं पुकार सकते ।

आधिभौतिक दृष्टि से यह सुव्यवस्थित तथा एकता के सूत्र में पिरोया हुआ ज्ञान , क्षात्र , व्यापार- व्यवसाय , परिश्रम-मजदूरी इनका निदर्शक जनसमुदाय ही 'एक पुरुष' रूप है।

चर्चित मंत्र का महर्षि दयानंद जी इसप्रकार अर्थ करते हैं-

"इस पुरूष की आज्ञा के अनुसार विद्या आदि उत्तम गुण , सत्य भाषण और सत्योपदेश आदि श्रेष्ठ कर्मों से ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न होता है । इन मुख्य गुण और कर्मों के सहित होने से वह मनुष्यों में उत्तम कहलाता है और ईश्वर ने बल पराक्रम आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त क्षत्रिय वर्ण को उत्पन्न किया है।इस पुरुष के उपदेश से खेती , व्यापार और सब देशों की भाषाओं को जानना और पशुपालन आदि मध्यम गुणों से वैश्य वर्ण सिध्द होता है।जैसे पग सबसे नीचे का अंग है वैसे मूर्खता आदि गुणों से शूद्र वर्ण सिध्द होता है।"

आपका लिखना कि पुरुष सूक्त बहुत समय बाद जोड़ दिया गया सर्वथा भ्रमपूर्ण है।मैंने अपनी पुस्तक " ऋग्वेद दशम मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात " में संपूर्ण पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों के इस मत का खंडन किया है कि ऋग्वेद का दशम मण्डल , जिसमें पुरूष सूक्त भी विद्यमान है , बाद का बना हूआ है ।

डा. अंबेडकर- शूद्र क्षत्रियों के वंशज होने से क्षत्रिय हैं।ऋग्वेद में सुदास , तुरवाशा , तृप्सु,भरत आदि शूद्रों के नाम आये हैं।

पं. शिवपूजन सिंह- वेदों के सभी शब्द यौगिक हैं , रूढ़ि नहीं । आपने ऋग्वेद से जिन नामों को प्रदर्शित किया है वो ऐतिहासिक नाम नहीं हैं । वेद में इतिहास नहीं है क्योंकि वेद सृष्टि के आदि में दिया गया ज्ञान है ।

डा. अंबेडकर- छत्रपति शिवाजी शूद्र और राजपूत हूणों की संतान हैं (शूद्रों की खोज , दसवां अध्याय , पृष्ठ , 77-96)

पं. शिवपूजन सिंह- शिवाजी शूद्र नहीं क्षत्रिय थे।इसके लिये अनेक प्रमाण इतिहासों.में भरे पड़े हैं । राजस्थान के प्रख्यात इतिहासज्ञ महामहोपाध्याय डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डी.लिट् , लिखते हैं- ' मराठा जाति दक्षिणी हिंदुस्तान की रहने वाली है । उसके प्रसिद्ध राजा छत्रपति शिवाजी के वंश का मूल पुरुष मेवाड़ के सिसौदिया राजवंश से ही था।' कविराज श्यामल दास जी लिखते है - ' शिवाजी महाराणा अजय सिंह के वंश में थे। ' यही सिध्दांत डा. बालकृष्ण जी , एम. ए. , डी.लिट् , एफ.आर.एस.एस. , का भी था।

इसी प्रकार राजपूत हूणों की संतान नहीं किंतु शुध्द क्षत्रिय हैं । श्री चिंतामणि विनामक वैद्य , एम.ए. , श्री ई. बी. कावेल , श्री शेरिंग , श्री व्हीलर , श्री हंटर , श्री क्रूक , पं. नगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य , एम.एम.डी.एल. आदि विद्वान राजपूतों को शूद्र क्षत्रिय मानते हैं।प्रिवी कौंसिल ने भी निर्णय किया है कि जो क्षत्रिय भारत में रहते हैं और राजपूत दोनों एक ही श्रेणी के हैं ।

- ' आर्य समाज और डा. अंबेडकर,

डा. कुशलदेव शास्त्री

(अरुण लवानिया)

Wednesday, 24 December 2025

gaur

मैं इलाहाबाद भी रहा ताकि उसे अपने व्यवसाय की संभावनाओं के हिसाब से परख सकूँ। लेकिन वहाँ मुझे इतना बड़ा मकान नहीं मिला जो मेरी किताबों को संभाल सके, दूसरा वहाँ की दलाली व्यवस्था जिससे मुझे बड़ी घृणा थी वहाँ जड़ पकड चुकी थी। 50-50 वहाँ की सामान्य दर थी और मेरा सम्मान व स्वाभिमान मुझे इस बिरादरी से सम्बंध बनाने से रोक रहा था। मेरेक्लर्क ने मुझे सुझाव दिया कि जब तक मैं अपनी स्थानीय वकील बिरादरी के तौर तरीकों को नहीं अपनाऊँगा। मेरा यहाँ कोई भविष्य नहीं होगा और उसकी सलाह सही साबित हुई। जिसके परिणाम स्वरूप मैंने नागपुर में रहने का निर्णय लिया।

Tuesday, 23 December 2025

न त्वं ब्राह्मणः

रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च यः न भवति धूर्त हि।।rg

रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।

दाता शूरो दयालुश्च धूर्तः स्वघोषितः भुवि।।rg

ब्राह्मण


रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी
ने लिखा है कि भगवान श्री राम जी ने श्री
परशुराम जी से कहा कि  →

"देव  एक  गुन  धनुष  हमारे।
 नौ गुन  परम  पुनीत तुम्हारे।।"

हे प्रभु हम क्षत्रिय हैं हमारे पास एक ही गुण
अर्थात धनुष ही है आप ब्राह्मण हैं आप में
परम पवित्र 9 गुण है।

ब्राह्मण_के_नौ_गुण :-
रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।।

● रिजुः = सरल हो,
● तपस्वी = तप करनेवाला हो,
● संतोषी= मेहनत की कमाई पर  सन्तुष्ट,
रहनेवाला हो,
● क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो,
● जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में
रखनेवाला हो,
● दाता= दान करनेवाला हो,
● शूर = बहादुर हो,
● दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हो,
● ब्रह्मज्ञानी,

रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च यः न भवति धूर्त हि।।rg
  
 रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।।

'नौ गुन परम पुनीत तुम्हारे'
जिसे कहा जाए और उसमें वे गुन नहों तो 
यही वाक्य सामने वाले के लिए गाली हो जाती है।
जैसे किसी अज्ञानी को महापंडित कहा जाता है। तुच्छ ब्राह्मण को महाब्राह्मण कहा जाता है।

यहां परशुराम सरल नहीं,  उन्होंनें अपने मन को तपाया नहीं अन्यथा क्रोध चला जाता, वे संतोषी नहीं हैं। क्षत्रिय हन्क्षता माशील नहीं हैं, जातीय गौरव और द्वेष बने रहने से जितेन्द्रिय नहीं हैं, जाति पूछकर पढ़ाने वाले दाता नहीं हो सकते। स्त्रियों के गर्भ गिरा देने वाला शूर नहीं होता, चीखती औरतों पर रहम न करने वाला दयालु नहीं। 

 श्रीमद् भगवत गीता के 18वें अध्याय
के 42श्लोक में भी ब्राह्मण के 9 गुण
इस प्रकार बताए गये हैं-

" शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म कर्म स्वभावजम्।।"

अर्थात-मन का निग्रह करना ,इंद्रियों को वश
में करना,तप( धर्म पालन के लिए कष्ट सहना),
शौच(बाहर भीतर से शुद्ध रहना),क्षमा(दूसरों के
अपराध को क्षमा करना),आर्जवम्( शरीर,मन
आदि में सरलता रखना,वेद शास्त्र आदि का
ज्ञान होना,यज्ञ विधि को अनुभव में लाना
और परमात्मा वेद आदि में आस्तिक भाव
रखना यह सब ब्राह्मणों के स्वभाविक कर्म हैं।

पूर्व श्लोक में "स्वभावप्रभवैर्गुणै:
"कहा इसलिएस्वभावत कर्म बताया है।

स्वभाव बनने में जन्म मुख्य है।फिर जन्म के
बाद संग मुख्य है।संग स्वाध्याय,अभ्यास आदि
के कारण  स्वभाव में कर्म गुण बन जाता है।

दैवाधीनं  जगत सर्वं , मन्त्रा  धीनाश्च  देवता:। 
ते मंत्रा: ब्राह्मणा धीना: , तस्माद्  ब्राह्मण देवता:।। 

दैवाधीनं न दैत्यास्तु, मन्त्राधीनाः न ब्राह्मणाः।
मंत्राः भस्मासुराधीनाः, अतः धूर्तास्तु ब्राह्मणाः।।

धिग्बलं क्षत्रिय बलं,ब्रह्म तेजो बलम बलम्।
एकेन ब्रह्म दण्डेन,सर्व शस्त्राणि हतानि च।। 

इस श्लोक में भी गुण से हारे हैं त्याग तपस्या
गायत्री सन्ध्या के बल से और आज लोग उसी
को त्यागते जा रहे हैं,और पुजवाने का भाव
जबरजस्ती रखे हुए हैं।

 *विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या।
 *वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् l।*
 *तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं।
 *छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ll*

भावार्थ --  वेदों का ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मण
एक ऐसे वृक्ष के समान हैं जिसका मूल(जड़)
दिन के तीन विभागों प्रातः,मध्याह्न और सायं
सन्ध्याकाल के समय यह तीन सन्ध्या(गायत्री
मन्त्र का जप) करना है,चारों वेद उसकी
शाखायें हैं,तथा  वैदिक धर्म के  आचार
विचार का पालन करना उसके पत्तों के
समान हैं।

अतः प्रत्येक ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि,,
इस सन्ध्या रूपी मूल की यत्नपूर्वक रक्षा करें,
क्योंकि यदि मूल ही नष्ट हो जायेगा तो न तो
शाखायें बचेंगी और न पत्ते ही बचेंगे।। 

पुराणों में कहा गया है ---
विप्राणां यत्र पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।


जिस स्थान पर ब्राह्मणों का पूजन हो वहाँ
देवता भी निवास करते हैं।
अन्यथा ब्राह्मणों के सम्मान के बिना देवालय
भी  शून्य हो जाते हैं। 
इसलिए .......
ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति विप्रा वेद विवर्जिताः।।

 श्री कृष्ण ने कहा-ब्राह्मण यदि वेद से हीन भी हो,
तब पर भी उसका अपमान नही करना चाहिए।
क्योंकि  तुलसी का पत्ता क्या छोटा क्या बड़ा
वह हर अवस्था में  कल्याण ही करता है।

 ब्राह्मणोस्य मुखमासिद्......

वेदों ने कहा है की ब्राह्मण विराट पुरुष भगवान
के मुख में निवास करते हैं।

मिथ्यावादिः मुखमलम्।

इनके मुख से निकले हर शब्द भगवान का ही
शब्द है, जैसा की स्वयं भगवान् ने कहा है कि,

विप्र प्रसादात् धरणी धरोहमम्।
विप्र प्रसादात् कमला वरोहम्।
विप्र प्रसादात् अजिता जितोहम्।
विप्र प्रसादात् मम् राम नामम् ।।

 ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मैंने
धरती को धारण कर रखा है।
अन्यथा इतना भार कोई अन्य पुरुष
कैसे उठा सकता है,इन्ही के आशीर्वाद
से नारायण हो कर मैंने लक्ष्मी को वरदान
में प्राप्त किया है,इन्ही के आशीर्वाद से मैं
हर युद्ध भी जीत गया और ब्राह्मणों के
आशीर्वाद से ही मेरा नाम राम अमर हुआ है,
अतः ब्राह्मण सर्व पूज्यनीय है।

Thursday, 18 December 2025

तीन -तेरह

ब्राह्मणों में तीन-तेरह का प्राचीन प्रचलन तमाम तर्कों से आज तक जूझ रहा है| लोगों का तर्क- कुतर्क बहस का क्षणिक मुद्दा बन, बिना आधार के चलता रहता है|  महान ऋषियों की संतान ब्राह्मण वंश आदि काल से अपनी परम्परा पर अपने - अपने वंश-गोत्र पर आज भी कायम है|  पूर्वजों की परम्परा को देखें तो गर्ग, गौतम, श्री मुख शांडिल्य गोत्र को तीन का तथा अन्य को तेरह में बताया जाता है|  गर्ग से शुक्ल, गौतम से मिश्र, श्री मुख शांडिल्य से तिवारी या त्रिपाठी बंश प्रकाश में आता है| 

गर्ग (शुक्ल- वंश)

गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल वंशज  कहा जाता है जो तेरह गांवों में विभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|

(१) मामखोर (२) खखाइज खोर  (३) भेंडी  (४) बकरूआं  (५) अकोलियाँ  (६) भरवलियाँ  (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार  गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|

उपगर्ग (शुक्ल-वंश) 

उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|

बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार

यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल वंश का उदय माना जाता है यही से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल वंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|

गौतम (मिश्र-वंश)

गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जाते हैं जो इन छ: गांवों के वासि थे|

(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी

इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रिय, त्रि-प्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारिण ब्राह्मण हैं|

उप गौतम (मिश्र-वंश)

उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|

(१)  कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े  (६) कपीसा

इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति  मानी जाती है|

वत्स गोत्र  ( मिश्र- वंश)

वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|

(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा

बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|

कौशिक गोत्र  (मिश्र-वंश)

तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है|

(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी

वशिष्ठ गोत्र (मिश्र-वंश)

इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है|

(१) बट्टूपुर  मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी

शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी -वंश) 

शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बारह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं|

(१) पिंडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ  (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है

इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं| इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य- त्रि -प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे  राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा- गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है| 

उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश)

इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं|

(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा

भार्गव गोत्र (तिवारी  या त्रिपाठी वंश)

भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें  चार गांवों का उल्लेख मिलता है जो इस प्रकार है|

(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक  (३) चेतियाँ  (४) मदनपुर

 भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश)

भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र पाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|

(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार

कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन  इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा  बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें| 

सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है|

सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)

सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| 

(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) 

सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)

सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं|

(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ

कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)

इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|

(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ  (३) ढडमढीयाँ 

ओझा वंश 

इन तीन गांवों से बताये जाते हैं|

(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां 

चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)

इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है|

(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां 

एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है| 

नोट:- खास कर लड़कियों की शादी- ब्याह में तीन तेरह का बोध किया और कराया जाता है|  पूर्वजों द्वारा लड़कियों की शादीयाँ गर्ग, गौतम, और श्री मुख शांडिल्य गोत्र में अपने गाँव को छोड़ कर की जाती रहीं हैं|  

इटार के पाण्डेय व सरार के दुबे के वहां भी यही क्रम रहा है इन पाँचों में लड़कियों की शादी का आदान-प्रदान होता रहा है, इतर गोत्रो में लड़को की शादियाँ होती रहीं हैं|  आज- कल यह अपवाद साबित होने लग पड़ा है| 

ये सारे गाँव जो बताये गये हैं वें गोरखपुर, देवरियां, बस्ती जनपद में खास कर पाए जातें हैं या तो आस-पास के जिले भी हों सकतें हैं, यें सब लोग सरयूपारिण, कूलीन ब्राह्मण की श्रेणी में आते हैं|  .       संकलन   

Friday, 5 December 2025

अम्बेडकर ने क्या किया?

अम्बेडकर ने क्या किया?

कसत कसौटी गुणन की, परखत पण्डित लोग।

जात कसौटी जन कसें, गौतम! धूरत लोग।।  

पितृसत्ता को चुनौति देकर स्त्री की आवाज को ताकत प्रदान की।

नारीवाद का चेहरा है अम्बेडकर।

मैटरनिटी लीव- कामकाजी महिलाओं के लिए।

महिला शिक्षा- 1913 न्यूयार्क अमेरिका भाषाण-

माँ बाप बच्चों को जन्म देते हैं, कर्म नहीं देते। माँ बच्चों के जीवन को उचित मोड़ दे सकती है। यह बात अपने मन पर अंकित कर यदि हम लोग अपने लड़को साथ अपनी लड़कियों को भी शिक्षित करें तो हमारे समाज की उन्नति और तेज होगी।

आज द्रोपदी मुर्मू राष्ट्रपति हैं।

अपने पिता के एक करीबी दोस्त को मंत्र में लिखा था-

बहुत जल्द भारत प्रगति की दिशा स्वयं तय करेगा लेकिन इस चुनौती को पूरा करने से पहले हमें भारतीय स्त्रियों की शिक्षा की दिशा में सकारात्मक कदम उठाने होंगे।

कल्पना चावला, इंदिरा, माया

18.07.1927 तीन हजार महिलाओं की गोष्ठी को संबोधित करने हुए बाबा साहब ने कहा-

आप अपने बच्चे स्कूल भेजिए। शिक्षा महिलाओं के लिए भी उतनी ही जरूरी है जितनी कि पुरुषों के लिए। यदि आपको लिखना पढ़ना आता है तो समाज में आपका उद्धार संभव है।

सावित्री बाई, रमा बाई, भागवती देवी इसके उदाहरण हैं।

17.07.1927 को ही बाबा साहब कहते हैं कि –

एक पिता का पहला काम अपने घर में स्त्रियों को शिक्षा से वंचित न रखने के संबन्ध में होना चाहिए। शादी के बाद महिलाएं खुद को गुलाम की तरह महसूस करती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण निरक्षरता है। यदि स्त्रियाँ भी शिक्षित हो जाएं तो उन्हें ये कभी महसूस नहीं होगा।

महिलाओं की शिक्षा की आजादी के लिए प्रयास किये।

जड़-मूर्ख कपटी मानने वाले शास्त्रों तक का विरोध व खण्डन किया।

स्त्री-शूद्रो न धीयतांके सिद्धान्त को उखाड़ फेका।

मैटरनिटी लीव(26 हफ्तों की)

18.11.1938 को बाम्बे लेजिलेटिव असेंबली में महिलाओं के मुद्दे उठाते हुए प्रसव के दौरान स्वास्थ्य जुड़ी चिन्ता व्यक्ति की।

1942 में सबसे पहले मैटरनिटी बैनिफिट बिल असेम्बली में लाये।

1948 के कर्मचारी वीमा अधिनियम के माध्यम से मातृत्व अवकाश मिला। जबकि अमेरिका में यह 1987 में कोर्ट के दखल के बाद मिला।

अमेरिका ने 1993 में परिवार और चिकित्सा अवकाश अधिनियम बनाया।

भारत में 1940 के दशक में ही बाबा साहब कर दिये।

लैंगिक समानता- स्त्री-पुरुष समानता-

आर्टिकल 14-16 में स्त्री समान अधिकार - किसी भी महिला को सिर्फ महिला होने की बजह से किसी अवसर से वंचित नहीं रखा जायेगा। और न ही उसके साथ लिंग के आधार पर कोई भेदभाव किया जा सकता है।

स्त्री-खरीद-फरोख्त व शोषण के विरुद्ध कानून-

स्त्री की पीठ पर नहाता ब्राह्मण

महिलाओं व बच्चों के लिए विशेष कदम उठाने के लिए राज्यों को संवैधानिक स्वीकृति प्रदान की।

मताधिकार-

दोयम दर्जे से निकालकर बराबरी से मताधिकार –

मनुस्मृति 9.2-3 में स्त्री की पराधीनता

स्विटजरलैंड 1971 स्त्री को मताधिकार मिला वहीं भारत में 26.01.1950 से ही असमानता की खायी को पाटा गया।

स्वरा भास्कर का वीडियो लगायें।

हिन्दू कोड बिल- तलाक, संपत्ति, बच्चे गोद लेने का अधिकार


'जिस दिन सम्राट असोक बौद्ध धम्म में बाकायदे दीक्षित हुए थे, ठीक उसी दिन बाबा साहब भी बौद्ध धम्म में बाकायदे दीक्षित हुए.


बाबा साहब ने धम्मदीक्षा के लिए प्राचीन बौद्ध - स्थल नागपुर को चुना.

बाबा साहब ने पुस्तकालय का नाम प्रथम बौद्ध संगीति स्थल राजगृह के नाम पर रखा.

बाबा साहब ने अपनी आखिरी किताब लिखने के लिए बुद्ध और उनके धम्म को चुना.

बाबा साहब ने धम्म पर लिखी किताब को अष्टांगिक मार्ग की भाँति आठ खंडों में विभाजित किया.

बाबा साहब को बौद्ध परंपराओं की बेहद गंभीर समझ थी.

भारत के राजनेताओं में सर्वाधिक पुस्तकें लिखने और पढ़ने का श्रेय बाबा साहब अंबेडकर को है.

उनका ज्ञान समुद्र की भाँति गहरा और आसमान की भाँति विस्तृत था.

पुरानी बाइबिल में 5642, नई बाइबिल में 4800, मिल्टन में 8000 और 

डाॅ. अंबेडकर की अंग्रेजी में लगभग 8500 शब्दों का प्रयोग हुआ है.'

आज बोधिसत्व बाबा साहब को विनम्र श्रद्धांजलि!

Friday, 14 November 2025

दलित

विस्तृत जानकारी
शब्द दलित

दलित शब्द का सही अर्थ क्या है?
दलित (संस्कृत: दलित, रोमानी: डैलिट), जिसका अर्थ संस्कृत और हिंदी में "टूट / बिखरा हुआ" है, भारत में जातियों से संबंधित लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक शब्द है जो अस्पृश्यता के अधीन है। [१] दलितों को हिंदू धर्म की चार गुना वर्ण व्यवस्था से बाहर रखा गया था और उन्हें पंचम वर्ण के रूप में देखा जाता था, जिसे पंचम के नाम से भी जाना जाता है। दलित अब हिंदू, बौद्ध, सिख, ईसाई, इस्लाम और विभिन्न अन्य विश्वास प्रणालियों सहित विभिन्न धार्मिक विश्वासों को स्वीकार करते हैं।

दलित शब्द 1935 से पहले डिप्रेस्ड क्लासेस के ब्रिटिश राज जनगणना वर्गीकरण के लिए एक अनुवाद के रूप में इस्तेमाल किया गया था। इसे अर्थशास्त्री और सुधारक बीआर अंबेडकर (1891-1956) द्वारा लोकप्रिय बनाया गया था, जिन्होंने अपनी जाति के सभी अवसादग्रस्त लोगों को परिभाषा में शामिल किया था। दलितों के। [२] इसलिए उन्होंने जो पहला समूह बनाया, उसे "लेबर पार्टी" कहा गया और इसके सदस्यों में समाज के सभी लोगों को शामिल किया गया, जिन्हें महिलाओं, छोटे पैमाने पर किसानों और पिछड़ी जातियों के लोगों सहित, उदास रखा गया। कन्हैया कुमार जैसे वामपंथी "दलितों" की इस परिभाषा का समर्थन करते हैं; इस प्रकार एक ब्राह्मण सीमांत किसान जीवित रहने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ऐसा करने में असमर्थ भी "दलित" श्रेणी में आता है। [३] [४] अम्बेडकर स्वयं एक महार थे, और 1970 के दशक में दलित पैंथर्स एक्टिविस्ट ग्रुप द्वारा अपनाया जाने पर "दलित" शब्द के इस्तेमाल को हटा दिया गया था। धीरे-धीरे, राजनीतिक दलों ने इसका उपयोग लाभ प्राप्त करने के लिए किया।

भारत का राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग दलित के आधिकारिक उपयोग को "असंवैधानिक" मानता है क्योंकि आधुनिक कानून अनुसूचित जातियों को पसंद करता है; हालाँकि, कुछ सूत्रों का कहना है कि दलित ने अनुसूचित जातियों के आधिकारिक कार्यकाल की तुलना में अधिक समुदायों को शामिल किया है और कभी-कभी भारत के सभी उत्पीड़ित लोगों का उल्लेख किया जाता है। नेपाल में ऐसी ही एक सर्वव्यापी स्थिति बनी हुई है।

अनुसूचित जाति समुदाय पूरे भारत में मौजूद हैं, हालांकि वे ज्यादातर चार राज्यों में केंद्रित हैं; वे एक भी भाषा या धर्म साझा नहीं करते हैं। 2011 की भारत की जनगणना के अनुसार, उनमें भारत की 16.6 प्रतिशत आबादी शामिल है। इसी तरह के समुदाय पूरे दक्षिण एशिया में, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में पाए जाते हैं, और वैश्विक भारतीय प्रवासी का हिस्सा हैं।

1932 में, ब्रिटिश राज ने सांप्रदायिक पुरस्कार में दलितों के लिए नेताओं का चयन करने के लिए पृथक निर्वाचकों की सिफारिश की। यह अंबेडकर का पक्षधर था लेकिन जब महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया तो इसका परिणाम पूना पैक्ट हुआ। बदले में, भारत सरकार अधिनियम, 1935 से प्रभावित हुआ, जिसने डिप्रेस्ड क्लास के लिए सीटों का आरक्षण शुरू किया, जिसे अब अनुसूचित जाति के रूप में बदल दिया गया।

1947 में अपनी स्वतंत्रता के तुरंत बाद, भारत ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने और नौकरी और शिक्षा प्राप्त करने के लिए दलितों की क्षमता बढ़ाने के लिए एक आरक्षण प्रणाली की शुरुआत की। [स्पष्टीकरण की आवश्यकता] 1997 में, भारत ने अपना पहला दलित राष्ट्रपति, के आर नारायणन को चुना। कई सामाजिक संगठनों ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के माध्यम से दलितों के लिए बेहतर परिस्थितियों को बढ़ावा दिया है। बहरहाल, जबकि भारत के संविधान द्वारा जाति-आधारित भेदभाव को निषिद्ध और अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया गया था, इस तरह की प्रथाएं अभी भी व्यापक हैं। इन समूहों के खिलाफ उत्पीड़न, हमले, भेदभाव और इसी तरह के कृत्यों को रोकने के लिए, भारत सरकार ने 31 मार्च 1995 को अत्याचार निवारण अधिनियम, जिसे SC / ST अधिनियम भी कहा जाता है, लागू किया।

बॉम्बे उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार, भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय (I & B मंत्रालय) ने सितंबर 2018 में सभी मीडिया चैनलों को एक सलाह जारी की, जिसमें उन्हें "दलित" शब्द के बजाय "अनुसूचित जाति" का उपयोग करने के लिए कहा गया। "। [5]

व्युत्पत्ति और उपयोग संपादित करें

मुख्य लेख: दलित अध्ययन

दलित शब्द संस्कृत के दलित (दलित) का एक शाब्दिक रूप है। शास्त्रीय संस्कृत में, इसका अर्थ है "विभाजित, विभाजित, टूटा हुआ, बिखरा हुआ"। इस शब्द का 19 वीं शताब्दी के संस्कृत में अर्थ "एक व्यक्ति" था जो चार ब्राह्मण जातियों में से एक से संबंधित नहीं था। "[6] संभवतः इस अर्थ में पहली बार पुणे स्थित समाज सुधारक ज्योतिराव फुले ने अन्य हिंदुओं की तत्कालीन "अछूत" जातियों द्वारा उत्पीड़न के संदर्भ में इसका इस्तेमाल किया था। [in]

दलित का उपयोग ज्यादातर उन समुदायों का वर्णन करने के लिए किया जाता है जो अस्पृश्यता के अधीन हैं। [mostly] [९] ऐसे लोगों को हिंदू धर्म के चार गुना वर्ण व्यवस्था से बाहर रखा गया था और खुद को पंचम के रूप में वर्णित करते हुए खुद को पांचवा वर्ण बनाने के बारे में सोचा था। [१०]

यह शब्द ब्रिटिश राज की जनगणना के लिए 1935 से पहले के वर्गीकरण के अनुवाद के रूप में इस्तेमाल किया गया था। [8] यह अर्थशास्त्री और सुधारक बी। आर। अम्बेडकर (1891-1956) द्वारा लोकप्रिय था, जो खुद एक दलित थे, [11] और 1970 के दशक में जब दलित पैंथर्स एक्टिविस्ट ग्रुप द्वारा इसे अपनाया गया था, तब इसका उपयोग बंद कर दिया गया था। [8]

दलित एक राजनीतिक पहचान बन गया है, उसी तरह जैसे कि एलजीबीटीक्यू समुदाय ने एक तटस्थ या सकारात्मक स्व-पहचानकर्ता के रूप में और एक राजनीतिक पहचान के रूप में अपने पीजोरेटिव उपयोग से कतार को पुनः प्राप्त किया। [१२] सामाजिक-कानूनी विद्वान ओलिवर मेंडेलसोहन और राजनीतिक अर्थशास्त्री मारिका विस्ज़नी ने 1998 में लिखा था कि यह शब्द "अत्यधिक राजनीतिक हो गया था ... जबकि शब्द का उपयोग अछूत राजनीति के समकालीन चेहरे के साथ एक उचित एकजुटता व्यक्त करने के लिए हो सकता है, इसमें प्रमुख समस्याएं हैं।" इसे एक सामान्य शब्द के रूप में अपनाते हुए। हालांकि यह शब्द अब काफी व्यापक है, लेकिन बीआर अंबेडकर की छवि से प्रेरित राजनीतिक कट्टरपंथ की परंपरा में अभी भी इसकी जड़ें गहरी हैं। " उन्होंने इसके उपयोग का सुझाव दिया कि भारत में अछूतों की पूरी आबादी को एक कट्टरपंथी राजनीति द्वारा एकजुट करने के लिए गलत तरीके से लेबल लगाने का जोखिम है। आनंद तेलतुम्बडे भी राजनीतिक पहचान को नकारने की दिशा में एक प्रवृत्ति का पता लगाते हैं, उदाहरण के लिए शिक्षित मध्यवर्गीय लोग, जिन्होंने बौद्ध धर्म में धर्मांतरण किया है और तर्क देते हैं कि, बौद्ध होने के नाते वे दलित नहीं हो सकते। यह उनकी सुधरी हुई परिस्थितियों के कारण हो सकता है कि जिस इच्छा के साथ वे विचार कर रहे हैं उससे संबंधित होने की इच्छा को जन्म दिया जाए, जो कि जनता को अपमानित करने वाला है। [१३]

अन्य शर्तें

आधिकारिक शब्द संपादित करें

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति (एनसीएससी) के लिए भारत के राष्ट्रीय आयोगों की राय में दलितों के लिए आधिकारिक शब्द है, जिन्होंने कानूनी सलाह ली जो संकेत देती है कि आधुनिक कानून दलित को संदर्भित नहीं करता है और इसलिए, यह कहता है, यह आधिकारिक दस्तावेजों के लिए "असंवैधानिक" है। ऐसा करने के लिए। 2004 में, NCSC ने उल्लेख किया कि कुछ राज्य सरकारों ने दस्तावेज़ों में अनुसूचित जातियों के बजाय दलितों का इस्तेमाल किया और उन्हें हटाने के लिए कहा।

कुछ स्रोतों का कहना है कि दलित आधिकारिक अनुसूचित जाति की परिभाषा की तुलना में समुदायों की व्यापक श्रेणी को शामिल करता है। इसमें खानाबदोश जनजातियों और एक अन्य आधिकारिक वर्गीकरण शामिल हो सकता है, जो 1935 में अनुसूचित जनजाति होने के नाते ब्रिटिश राज सकारात्मक भेदभाव प्रयासों के साथ उत्पन्न हुआ था। [15] यह कभी-कभी भारत के उत्पीड़ित लोगों की संपूर्णता को भी संदर्भित करता है, [8] जो कि नेपाली समाज में इसके उपयोग पर लागू होता है। [९] अनुसूचित जाति श्रेणी की सीमाओं का एक उदाहरण यह है कि भारतीय कानून के तहत, ऐसे लोग केवल बौद्ध, हिंदू या सिख धर्म के अनुयायी हो सकते हैं, [16] फिर भी ऐसे समुदाय हैं जो दलित ईसाई और मुस्लिम होने का दावा करते हैं, [17] आदिवासी समुदाय अक्सर लोक धर्मों का पालन करते हैं। [१ practice]

हरिजन संपादित करें

महात्मा गांधी ने 1933 में अछूतों की पहचान करने के लिए भगवान के लोगों के रूप में अनूदित रूप से अनुवादित हरिजन शब्द को गढ़ा। इस नाम को अंबेडकर ने नापसंद किया क्योंकि इसने दलितों को मुसलमानों की तरह एक स्वतंत्र समुदाय होने के बजाय ग्रेटर हिंदू राष्ट्र से संबंधित माना। इसके अलावा, कई दलितों ने इस शब्द को संरक्षण और अपमानजनक माना। कुछ ने यह भी दावा किया है कि यह शब्द वास्तव में देवदासियों, दक्षिण भारतीय लड़कियों के बच्चों को संदर्भित करता है, जिनकी शादी एक मंदिर में हुई थी और सवर्ण हिंदुओं के लिए वेश्या और वेश्या के रूप में सेवा की गई थी, लेकिन इस दावे को सत्यापित नहीं किया जा सकता है। [१ ९] [२०] जरूरत है]। जब भारतीय स्वतंत्रता के बाद छुआछूत को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था, तो पूर्व-अछूतों का वर्णन करने के लिए हरिजन शब्द का उपयोग स्वयं दलितों की तुलना में अन्य जातियों में अधिक आम था। [२१]

क्षेत्रीय शब्द संपादित करें

दक्षिणी भारत में, दलितों को कभी-कभी आदि द्रविड़, आदि कर्नाटक और आदि आंध्र के रूप में जाना जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है पहले द्रविड़, कन्नडिगा और अंधरा। इन शब्दों का पहली बार 1917 में दक्षिणी दलित नेताओं द्वारा उपयोग किया गया था, जो मानते थे कि वे भारत के मूल निवासी थे। [22] ये शब्द क्रमशः तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश / तेलंगाना राज्यों में दलित जाति के किसी भी व्यक्ति के लिए एक सामान्य शब्द के रूप में उपयोग किए जाते हैं। [उद्धरण वांछित] [स्पष्टीकरण की आवश्यकता]

महाराष्ट्र में, इतिहासकार और महिला अध्ययन अकादमिक शैलजा पाइक के अनुसार, दलित एक शब्द है जिसका इस्तेमाल ज्यादातर महार जाति के सदस्यों द्वारा किया जाता है, जिसमें अंबेडकर का जन्म हुआ था। अधिकांश अन्य समुदाय अपनी जाति के नाम का उपयोग करना पसंद करते हैं। [२३]

नेपाल में, हरिजन से अलग और, आमतौर पर, दलित, हरिस (मुसलमानों के बीच), अचूत, बहिष्कृत और नीच जाति जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। [११]

Thursday, 13 November 2025

खरोष्ठीतील

खरोष्ठी लिपि : खरोष्ठी लिपीचे नाव अन्वर्थक आहे. गाढवाच्या ओठासारखी लपेटी असलेली ही लिपी, नॉर्थ सेमिटिक लिपीतून उत्पन्न झालेल्या ⇨ ॲरेमाइक लिपीपासून उत्पन्न झाली, असे ब्यूलर इ. विद्वानांचे मत आहे. कनिंगहॅम व इतर काही तज्ञांच्या मते खरोष्ठो हे नाव फा-वान-शु-लिन (६६८) या चिनी कोशात आणि इ. स. पू. तिसऱ्या शतकातील ललितविस्तार या बौद्ध ग्रंथात उल्लेखिलेले आहे. सेस्तान, कंदाहार, अफगाणिस्तान, स्वात, लडाख, चिनी तुर्कस्तान, तक्षशिला या भागांत खरोष्ठी लिपीतील लेख सापडतात. हिंदुकुश पर्वताच्या उत्तरेला मात्र या लिपीचा प्रसार झालेला दिसून येत नाही. तिच्या या मर्यादित क्षेत्रामुळे संशोधकांनी तिला निरनिराळी नावे दिली आहेत. सी. लासेन (१८००-७६) याने ‘काबुली लिपी’, विल्सन याने ‘ॲरिॲनियन लिपी’ आणि ए. कनिंगहॅम याने ‘गांधार लिपी’ असे तिचे नामकरण केले. खरोष्ठी लिपीतील लेख प्राकृत भाषेत असल्यामुळे ‘बॅक्ट्रा-पाली’ किंवा ‘ॲरिॲनो-पाली’ ही नावेसुद्धा तिला मिळाली आहेत. बॅक्ट्रियन-ग्रीक राजांच्या नाण्यांवर ही लिपी आढळून आल्यामुळे तिला ‘बॅक्ट्रियन लिपी’, ‘इंडो-बॅक्ट्रियन लिपी’ अशीही नावे मिळाली आहेत. फ्रेंच प्रवासी द्यूत्र्य द रॅन्स (१८४६-९४) तसेच स‌र आउरेल स्टाइन (१८६२-१९४३) आणि स्टेन कॉनॉव्ह (१८६७-१९४८) यांना खरोष्ठी लिपीतील लेख सापडले. स्टेन कॉनॉव्ह याने खरोष्ठीतील लेख कॉर्पस इन्स्क्रिप्शनम् इंडिकॅरम (खंड दुसरा, भाग पहिला, १९२९) या ग्रंथात प्रसिद्ध केले. पश्चिम पाकिस्तानमधील हझार जिल्ह्यातील मानसेहरा व पेशावर जिल्ह्यातील शाहबाझगढी येथे अशोकाचे खरोष्ठीमधील लेख सापडले असून हे लेख स‌र्वांत जुने (इ. स‌. पू. तिसरे शतक) आहेत. कंदाहारजवळ खरोष्ठी आणि ॲरेमाइक अशा दोन लिपींत असलेला अशोकाचा लेख सापडला आहे. कुशाणांच्या राजवटीतील खरोष्ठी-लेख मथुरेला सापडले आहेत. खरोष्ठी लिपी क्षत्रपांच्या नाण्यांवर तसेच शहरात राजांच्या नाण्यांवर आढळून येते. हूणांच्या स्वाऱ्यांनंतर (इ.स. पाचवे शतक) मात्र खरोष्ठीचा भारतात मागमूसही उरला नाही.

ब्राह्मीप्रमाणेच खरोष्ठीचे लेख प्रस्तर, धातूचे पत्रे, नाणी, उंटाचे कातडे, भूर्जपत्र यांवर सापडतात. खोतान येथे दुसऱ्या शतकातील खरोष्ठी लिपीत लिहिलेले भूर्जपत्रावरील हस्तलिखित सापडले आहे. कोरणे आणि लेखणीने उंटाच्या कातड्यावर अगर भूर्जपत्रावर लिहिणे, अशा खरोष्ठी लेखनाच्या दोन पद्धती आहेत. खरोष्ठी लिपीच्या अभ्यासावरून असे दिसते, की तीत एक प्रकारचा साचेबंदपणा आहे. एकच ठरीव साच्याची अक्षरवटिका खरोष्ठीमध्ये असली, तरी कोणत्याही भाषेतील उच्चारवैचित्र्य अक्षरांकित करण्याचे सामर्थ्य या लिपीत आहे. या लिपीतील उच्चारचिन्हांमुळे कोणत्याही शब्दातील ध्वनीची अभिव्यक्ती करण्याचे सामर्थ्य तिच्यात असल्याचे दिसून येते. ती उजवीकडून डावीकडे लिहिली जाई. धातूमध्ये फरक पडला, तर अक्षरवटिकेत थोडाफार फरक आढळतो परंतु एकदा एखाद्या धातूवर लिहिण्याची पद्धत पडून गेली, तर तीच पद्धत कसोशीने पाळली जाई. त्यामुळे खरोष्ठी लेखांची कालानुरूप परंपरा लावणे कठीण आहे. ब्यूलरच्या मते खरोष्ठी लिपी ब्राह्मी लिपीपेक्षाही अधिक लोकप्रिय होती. ती तत्कालीन ग्रांथिक लिपी होती. १८३३ मध्ये जनरल व्हेंटुरा यांनी माणिक्याल स्तूपाचे उत्खनन केले. त्यात खरोष्ठी आणि ग्रीक या दोन्ही लिपींमध्ये नावे असलेली इंडो-ग्रीक राजांची नाणी सापडली. ती ई. नॉरिस, कर्नल मॅसन, कनिंगहॅम व जेम्स प्रिन्सेप यांनी वाचली आणि अशा तऱ्हेने खरोष्ठी लिपी वाचण्याची गुरुकिल्ली इंडो-ग्रीक राजांच्या द्वैभाषिक नाण्यांमुळे उपलब्ध झाली.

संदर्भ : 1. Buhler, George, Indian Palaeography, Calcutta, 1962.

          2. Dani, A. H. Indian Palaeography, Oxford, 1963.

          3. Dasgupta, C. C. Development of the Kharosthi Script, Calcutta, 1958.

          4. ओझा, गौरीशंकर, भारतीय प्राचीन लिपिमाला, दिल्ली, १९५९.                         

गोखले, शोभना ल.

पाण्डुलिपि

शिलालेखाचा नमुना : पळसदेव (ता. दौंड, जि. पुणे) येथील सरडेश्वराच्या देवळातील खांबावर खोदलेला मराठी शिलालेख, शक १०७९ (इ. स. ११५७).
लेखनसाहित्य : ज्यावर, वा ज्याच्या साहाय्याने लेखन केले जाते, अथवा कोरले जाऊ शकते, असे

लेखनसाहित्य : ज्यावर, वा ज्याच्या साहाय्याने लेखन केले जाते, अथवा कोरले जाऊ शकते, असे साहित्य वा सामग्री. लेखन हे केवळ विचारप्रकटनाचे साधन नसून भाषाप्रसाराचे माध्यम मानले जाते. लेखनासाठी प्राचीन काळापासून निरनिराळी माध्यमे वारपलेली आढळतात. प्रारंभी लेखन भूर्जपत्र, कातडी, शंख, मातीच्या विटा, कापड, प्रस्तर, लोखंड, कथिल, कासे, रुपे, सुवर्णपत्र, पितळ इत्यादींवर केले जाई. पुढे लेखणी, शाई यांच्या साहाय्याने कागदावर लेखन केले जाऊ लागले व मुद्रणकलेचा शोध लागून त्याचा प्रसार झाला. अशा लेखनावरून तत्कालीन साहित्याचा व विकासाचा आढावा घेता येतो.

प्राचीन लेखनसाहित्यांत प्रस्तराचे अनन्यसाधारण महत्त्व आहे, याचे कारण त्याचे चिरस्थायित्व. धातू झिजतात ऊन, वारा व पाऊस यांमुळे ते गंजतात. प्रस्तर गंजत नाहीत धातूंच्या तुलनेत त्यांची झीज अत्यल्प असते. त्यामुळे प्राचीन कालीन प्रस्तराची लोकप्रिय लेखन साहित्यांत गणना करावी लागेल. दगडावर लेख लिहिण्यापूर्वी तो गुळगुळीत करण्यात येई. त्यावर काळ्या शाईने अगर खडूने मजकूर लिहीत. नंतर कोरक्या छणीने खोदून तो मजकूर पक्का केला जाई. अशा तऱ्हेने लेखरचना करणारा विद्वान, अक्षरे वळणदार काढणारा आणि कोरक्याचे काम करणारा, अशी तीन माणसे शिलालेखासाठी लागत. 
भारतातील सर्वांत प्राचीन शिलालेख सम्राट अशोकाचे आहेत. शैलस्तंभांवरही त्याचे लेख आढळतात. देवळासमोर स्तंभ उभारतात, त्याला ध्वजस्तंभ किंवा दीपमाळ म्हणतात. बेसनगर येथील ध्वजस्तंभावर हेलिओडोरस या ग्रीक राजदूताचा लेख आहे. प्राचीन काळी दिग्विजयानंतर राजे कीर्तिस्तंभ उभारीत. मंदसोर व ताळगुंद येथील अनुक्रमे यशोधर्मा आणि कदंबराज काकुस्थवर्मा यांचे कीर्तिस्तंभ प्रसिद्ध आहेत. अलाहाबाद येथे अशोकस्तंभावरच समुद्रगुप्ताचा दिग्विजय लेख आहे. अशा कीर्तिलेखास ‘प्रशस्ति’ म्हणतात. एखादा शूर वीर युद्धात मारला गेल्यास, त्याच्या नावाने त्याच्या गावी शिला उभारली जात असे तीवर त्याचे नाव, कालखंड कोरलेले असत. अशा शिलेला ‘वीरगळ’ म्हणतात. मृत वीराची पत्नी सती जात असे. तिच्यासाठी उभारलेल्या शिळेवर पति-पत्नींची नावे कोरली जात. त्या शिळेस ‘सतीचा दगड’ असे संबोधतात. तीर्थक्षेत्राच्या ठिकाणी यात्रेकरू पुण्यप्राप्तीसाठी स्तंभावर आपली नावे कोरवीत त्याला ‘दानस्तंभ’ म्हणतात. नागार्जुनकोंडा, भारहूत येथील बौद्धकालीन स्तूपांच्या भग्नावशेषांत अशा तऱ्हेचे स्तंभ सापडतात. मृत नातेवाईकांच्या नावानेही स्तंभ उभारले जात त्यांना ‘गोत्रशैलिका’ म्हणतात. काही वेळा स्तंभावर मृताची प्रतिकृती दाखविलेली असते त्या स्तंभास ‘छायास्तंभ’ म्हणतात. यज्ञस्तंभावर लेख असतात त्या स्तंभास ‘यूप’ असे संबोधतात. एका अक्षरापासून सबंध ग्रंथ दगडांवर कोरल्याची उदाहरणे आहेत. मेवाडमध्ये विजौत्याच्या जैन मंदिराजवळ १२२६ मध्ये उन्नतपुराण कोरलेली एक शिला आहे. शिलालेखामध्ये लेखाच्या आंरभी आणि शेवटी एखादे मंगलसूचक स्वस्तिकासारखे चिन्ह असते. तसेच इष्ट देवतेला वंदन केलेले असते. कित्येक वेळा ‘सिद्धम्’ हा शब्द सुरुवातीला आढळतो. विषय समाप्तीनंतर कमळ, वर्तुळही दाखविण्याची प्रथा होती. शिलालेखाचे दोन प्रकार आहेत : एक खोदलेल्या अक्षरांचे आणि दोन उठावाच्या अक्षरांचे. अरबी, फार्सी लेख उठावाच्या अक्षरांनी लिहिलेले असतात. दगडी भांडी, मूर्तीची आसनपट्टी, विहिरीची अगर मंदिराची कोनशिला यांवर लेख आढळून येतात. 

ताम्रपटावरील कोरीव लेखनाचा नमुना : सामंत नागदेव याचा पल्लिका (गाव) संस्कृत-मराठी ताम्रपट (पत्रा दुसरा), शक १२७४ (इ. स. १३५२). 
ताम्रपटावरील कोरीव लेखनाचा नमुना : सामंत नागदेव याचा पल्लिका (गाव) संस्कृत-मराठी ताम्रपट (पत्रा दुसरा), शक १२७४ (इ. स. १३५२).
ताम्रपट : प्रस्तराप्रमाणेच प्राचीन काळात ताम्रपट अतिशय
 शय लोकप्रिय असल्याचे दिसून येते. बौद्धविहारांत ताम्रपत्रे असल्याचा चिनी यात्रेकरू फाहियान याने उल्लेख केलेला आहे. ताम्रपत्रांचे आकार लहानमोठे असले, तरी लांबट-चौकोनी आकार वैशिष्ट्यपूर्ण आढळतो. राजमुद्रा ओतीव असून तिची कडी शासनपत्राच्या बाजूला असलेल्या वर्तुळाकार छिद्रांतून घातलेली असते. राज्यशासनाची पत्रे तीन असली, तर पहिल्या पत्राच्या आतील बाजूस लिहीत असत वरची बाजू तशीच मोकळी ठेवीत. मधल्या पत्रावर दोन्ही बाजूंनी लिहीत.तिसऱ्या पत्रावरील बाहेरील बाजूला लिहीत नसत. त्यामुळे लिहिलेला मजकूर सुरक्षित राही. पत्राच्या कडा बाजूने थोड्या वर करीत त्यामुळे अक्षरे झिजत नसत. ताम्रपटावर शाईने किंवा कोरणीने लेख लिहीत नंतर छणीने ते लेख कोरीत. कित्येक वेळा भांड्यांवर नावेघातल्याप्रमाणे वरील लेख लिहिले जात. लेखनातील अक्षरांची चूक छणीने रेघा ओढून बरोबर करण्यात येई. एखादे अक्षर गळले, तर ते समासात लिहीत. केवळ राजेलोक ताम्रपटावर लिहीत असे नाही, तर ब्राह्मणांची आणि जैनांची यंत्रे ताम्रपटांवर आढळतात. कुशाणराजा कनिष्काने बौद्ध धर्मग्रंथ ताम्रपटांवर कोरवून घेतले होते. ते लेख आज अस्तित्वात नाहीत. ताम्रपत्राचा आकार ताडपत्राप्रमाणे लांबट-चौकोनी असला, तरी त्रिकोणाकृती आणि चतुष्कोणाकृती आकारांचीही ताम्रपत्रे आढळतात. त्यांचे वजन सु. ५०० ग्रॅम असे. पूर्वीचे धर्मशील राजे सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, मकरसंक्रांत, कर्कसंक्रांत अशा पर्वकाली विद्वान ब्राह्मणांना जमिनी दान करीत, त्याचा सर्व तपशील या ताम्रपटांत असे. राजाची वंशावळ, दान दिलेल्या ब्राह्मणांची वंशावळ दानप्रसंगी उपस्थित असलेल्या सरदारांची नावे-गावे इ. माहिती त्या तपशिलात असे. ताम्रमूर्तीच्या आसनपटावर वरील लेख आढळून येतात. सोने व रूपे या धातूंप्रमाणे तांबे दुर्मिळ नसल्यामुळे ताम्रपट लेखनसाहित्य म्हणून लोकप्रिय झाले.

भुर्जपत्र : लेखनासाठी भूर्जपत्राचा उपयोग करण्याची कला भारतात फार प्राचीन काळापासून आहे. स्वारीच्या वेळी सिकंदरासोबत आलेल्या क्यू कर्टिअस ह्या सेनापतीने भारतीय लोक भूर्जपत्रांचा लेखनासाठी उपयोग करीत असल्याचे नमूद केले आहे. हिमालयामध्ये भूर्जवृक्ष विपुलतेने आढळतात. भूर्जवृक्षाच्या अंतर्साली काढून त्या घासून गुळगुळीत करण्याची, त्यांना चकाकी आणण्याची कला काश्मिरी पंडितांना अवगत होती. संस्कृत वाङ्मयामध्ये भूर्जपत्राचे कितीतरी उल्लेख आहेत. चीनमधील खोतान येथे दुसऱ्या शतकातील खरोष्ठी लिपीत भूर्जपत्रावर लिहिलेली धम्मपदाची पोथी आहे. ताडपत्राच्या पोथीप्रमाणेच मध्यभागी गोल भोक पाडून दोन लाकडी पाट्यांत भूर्जपत्रांची ही पोथी ठेवीत. बक्शाली येथे सापडलेले अंकगणिताचे पुस्तक आठव्या शतकातील असून ते भूर्जपत्रावर लिहिलेले आहे. व्हिएन्ना, बर्लिन तसेच पुणे येथील भांडारकर प्राच्यविद्या संशोधन मंदिरात आणि डेक्कन कॉलेजमध्ये भूर्जपत्रांवरील पंधराव्या शतकातील पोथ्या आढळतात.

ताडपत्र : ताडपत्रांचा लेखनासाठी प्रामुख्याने दक्षिण भारतात उपयोग केला जाई. तक्षशिला येथे पहिल्या शतकातील ताम्रपट सापडला. त्याचा आकार ताडपत्रासारखा होता. गौतम बुद्धाच्या मृत्यूनंतर लगेच भरलेल्या मेळाव्यातील विधिनियम ताडपत्रांवर लिहिले होते, असे चिनी यात्रेकरू ह्युएनत्संगने आपल्या प्रवासवृत्तातलिहून ठेवले आहे. ताडपत्रांचा उपयोग करण्यापूर्वी ती वाळवीत नंतर पाण्यात उकळून काढून पुन्हा वाळवीत. पानाला गुळगुळीतपणा येण्यासाठी शंखाने अगर दगडाने घासून ते योग्य आकाराचे कातरीत असत. काश्मीर आणि पंजाबचा काही भाग सोडला, तर भारतात ताडपत्रांचा लेखनासाठी बराच उपयोग लोक करीत असत. दक्षिण भारतात ताडपत्रांवर लोखंडी अणकुचीदार सुईने टोचून अक्षरे लिहीत नंतर त्यावर कोळसा अगर शाई लावीत. ताडपत्रांच्या पोथीला पानांच्या मध्यभागी गोल भोक पाडीत. त्यामध्ये दोरा ओवून लिहिलेली सर्व पाने एकत्र बांधीत. पानांची लांबी जास्त असेल, तर दोन भोके ठेवीत. त्याच आकाराच्या दोन लाकडी पाट्या करून त्यांमध्ये पोथी ठेवीत असत. नेपाळच्या ताडपत्राच्या पोथीसंग्रहात सातव्या शतकातील स्कंदपुराण आणि लंकावतार या प्राचीन पोथ्या आहेत.

कातडी : भारतामध्ये कातड्यांवर लिहिलेले लेख अद्याप सापडले नाहीत. धार्मिक दृष्ट्या कातडे निषिद्ध मानल्यामुळे कदाचित त्याचा लेखनासाठी फारसा उपयोग करीत नसत. सुबंधूच्या (इ. स. सू. आठव्या शतकाचा पूर्वार्ध) वासवदत्ता नाटकात कातड्याचा लेखनासाठी उपयोग करीत, असा उल्लेख आहे. उंटाच्या कातड्यावर खरोष्ठीतील लेख आढळतात. कातड्यावरील लेख प्रामुख्याने पश्र्चिम आशिया आणि यूरोपमध्ये सापडतात.

कापड : इ. स. पू. तिसऱ्या शतकात भारतातील लोक कापडाचा लेखनासाठी उपयोग करीत, असा उल्लेख नीआर्कसने केला आहे. लेखनाच्या कापडाला पट, पटिका आणि कार्पासिक पट असे संबोधतात. कर्नाटकातील काही व्यापारी अजूनही कापडावर लिहितात. प्राचीन काळी कापडाला चिंचोक्याची अगर कणकेची पातळ खळ लावून शंखाने गुळगुळीत करीत आणि त्यावर खडूने अगर काळ्या पेन्सिलीने लिहीत असत. ह्युएनत्संगाच्या प्रवासवृत्तात व हर्षचरितात कापडावरील लेखाचा उल्लेख आहे. अशा तर्‍हेची कापडी पुस्तके शृंगेरीच्या मठात उपलब्ध आहेत. सुती कापडाप्रमाणेच रेशमी कापडाचा लेखनासाठी उपयोग करीत असल्याचे दिसून येते. अर्थात रेशमी कापडाचा सर्रास उपयोग करीत नसत. जैसलमीर येथे चौदाव्या शतकातील रेशमी कापडावर लिहिलेली जैन सूत्रांची यादी सापडलेली आहे [→ कापड उद्योग].

फलक : लाकडी फळ्यांवर लिहिण्याचा फार प्राचीन काळापासून प्रघात आहे. विनयपिटकात धर्मसंमत देहत्यागाचे विधिनियम काष्ठफलकावर लिहू नयेत, असे सांगितले आहे. क्षहरातराजा नहपान याच्या नासिक येथील लेखात लाकडी फळ्यांचा उल्लेख आहे. दंडीच्या दशकुमारचरितात अपहारवर्म्याने गुळगुळीत केलेल्या लाकडी फळ्यांचा उल्लेख आहे. शाळेत जाणारी मुले प्रारंभी धुळपाटीचा उपयोग करीत. मध्य आशियात खरोष्ठी लिपी असलेल्या लाकडी फळ्या सापडलेल्या आहेत. भाजे येथे लाकडी तुळईवर ब्राह्मी लिपीतील लेख आढळले आहेत.

सुवर्णपत्र : प्राचीन काळी श्रीमंत, सावकार आपला कुलवृत्तांत, महत्वाच्या घटना सुवर्णपत्रांवर लिहीत. धार्मिक नीतिनियमही त्यांवर कोरवून घेत. सुवर्ण अतिशय दुर्मिळ असल्यामुळे सुवर्णपत्राचे नमुने सुलभतेने आढळत नाहीत. तक्षशिलेजवळील गंगू येथील स्तूपात सुवर्णपत्रावर खरोष्ठी लिपीत लिहिलेले दानपत्र सापडले आहे.

रुपे : सोन्याप्रमाणेच रौप्यपत्रे दुर्मिळ आहेत. भट्टिप्रोलू येथील स्तूपात आणि तक्षशिला येथे रौप्यपत्रावरील लेख असून जैनमंदिरांतून रौप्यपत्रांवरील यंत्रेही आढळून येतात. 

लोखंड : लोखंड गंजत असल्यामुळे लोहपत्रे आढळत नाहीत. दिल्लीजवळ मेहरोली येथे चंद्र नावाच्या राजाचा लेख सापडलेला आहे तो बहूधा द्वितीय चंद्रगुप्तकालीन असावा, असा विद्वानांचातर्क आहे अबूपासून ६ किमी.वर असलेल्या अचलगढ येथील अचलेश्र्वराच्या मंदिरात लोंखडी त्रिशूलावर पंधराव्या शतकातील लेख असून त्यापुढील काळात लोखंडी तोफांवर लेख आढळून येतात.

 

कथिल : या धातूचा उपयोग क्वचितच आढळतो, ब्रिटिश संग्रहालयात कथिलाच्या पत्र्यांवरील लेख आहेत.

पितळ : पितळी पत्र्याचा लेखनासाठी होत असलेला उपयोग प्राचीन नाही. पितळी घंटांवर आजही देणगीदारांची नावे आढळून येतात.

कासे (ब्राँझ) : पितळेप्रमाणे काशाच्या घंटा करीत व त्यांवर देणगीदारांची नावे लिहीत. काशाच्या मूर्तीच्या आसनपटावर मूर्तीचे नाव, लेख किंवा कोरक्याचे नाव लिहिलेले असते. मणिक्यला येथे कुशाणकाळातील खरोष्ठी लिपी असलेला काशाचा लहान करंडक सापडला आहे. सोहगौरा येथे सापडलेला लेख काशाच्या पातळ पत्र्यावर लिहिलेला आहे तो लेख सम्राट अशोकपूर्व-काळातील आहे, असे काही विद्वानांचे मत आहे.

शंख : आंध्र प्रदेशात श्रीकाकुलम जिल्ह्यातील शालिहुडंम येथे सापडलेल्या बौद्ध अवशेषांत शंखावरील लेख आढळतो. तसेच हस्तिदंताच्या पट्ट्या, कासवाची पाठ यांचाही लेखनासाठी उपयोग केल्याचे प्रत्ययास येते.

मातीच्या विटा : मातीच्या विटांवर लिहिण्याचा प्रघात भारतात फार प्राचीन काळापासून आहे. बौद्ध धर्मीय सूत्रे विटांवर लिहिलेली आढळून येतात. पहिल्या शतकातील राजे दाममित्र आणि शीलवर्मा यांनी यज्ञ केल्याचा लेख मातीच्या विटेवर आहे व दाममित्राचा लेख असलेली वीट लखनौ येथे संग्रहालयात आहे. मातीच्या विटांवर लिहिलेले लेख भिंतीमध्ये किंवा यज्ञवेदीवर बसवीत असत. मृत्कुंभ ओले असताना त्यांवर कुंभार एखादे वेळी आपले नाव लिहीत किंवा एखादी खूण करीत. तक्षशिला, कौशाम्बी आणि नालंदा येथील उत्खननांत मृण्मय मुद्रा सापडलेल्या आहेत. या मुद्रांवर व्यक्तिनामे, बोधशब्द अथवा वाक्ये असत. मातीच्या विटांवर अगर दानमुद्रांवर त्या ओल्या असताना वरील बोधशब्द लिहीत व नंतर त्या भाजून काढीत.

कागद : चिनी इतिहासातील नोंदीप्रमाणे कागद तयार करण्याच्या कृतीचा शोध इ. स. १०५ साली त्साइ लुन यांनी लावला. पुढे चिनी प्रवाशांच्याबरोबर ही कला भारतात आली. परंतु ख्रि. पू. ३२७ च्या सुमारास अलेक्झांडरबरोबर हिंदुस्थानात आलेल्या नीआर्कसने भारतीय लोक कापसाचा लगदा करून कागद तयार करीत, असे नमूद केले आहे. हातकागद तयार करण्याची कला भारतीयांना अवगत होती. या कागदाला तांदळाची खळ लावून शंखाने घोटीत असत. भोज राजाच्या कारकीर्दीत (१०००-१०५५) माळव्यात कागदाच्या कलेचा प्रसार झाला होता, असे काही संशोधकांचे मत आहे. काश्मीरमध्ये अकराव्या शतकातील आणि गुजरातेत तेराव्या शतकातील कागदांवरील हस्तलिखिते सापडली आहेत. मध्य आशियात यार्कंद येथे पाचव्या शतकातील कागदावरील लेख सापडला आहे. एवढे मात्र खरे, की मुसलमानी अमदानीपासून भारतात प्रसाद जादा प्रमाणात झाल्याचे आढळते. [→ कागद].

शाई : प्राचीन काळापासून लेखनासाठी शाईचा उपयोग होत असल्याचे दिसून येते. झाडाच्या अंतर्सालींचा लिहिण्यासाठी उपयोग केला जाई,असे कर्टिअस याने स्पष्टपणे नमूद केले आहे. इ. स. पू. ४ पासून लोक शाईचा उपयोग करीत, असा काही संशोधकांचा तर्क आहे. पक्की शाई तयार करण्यासाठी पिंपळाच्या डिंकाची बारीक भुकटी पाण्यात मिसळून व ती मडक्यात घालून उकळीत. नंतर त्यात टाकणखार आणि लोघ्र मिसळून फडक्याने गाळीत. भूर्जपत्रावर लिहिण्यासाठीबदामाच्या साली जाळून त्यांची वस्त्रगाळ पूड करीत व ती गोमूत्रात उकळून शाई तयार करीत. या शाईने लिहिलेला मजकूर पाण्याने नाहीसा होत नसे. मोहरीच्या तेलाच्या दिव्याची काजळी धरून काळी शाई तयार करीत. अलित्यापासून लाल शाई आणि हरताळापासून पिवळी शाई तयार करीत. सोनेरी आणि रूपेरी शाईसाठी सोन्याची आणि रुप्याची भुकटी शाईत मिसळीत. पाणिनीच्या अष्टाध्यायीमध्ये आणि अशोकाच्या शिलालेखांत ‘लिपि’ हा शब्द आलेला आहे. त्यावरून शाईने लिहिण्याची प्रथा फार प्राचीन होती, असे स्पष्ट होते. अजिंठ्याच्या लेण्यांतून पाचव्या शतकातील रंगाने लिहिलेली अक्षरेआहेत.

लेखणी : या शब्दात कोरणी, कुंचला, बोरू या सर्वांचा अंतर्भाव केलेला दिसून येतो. ललितविस्तरमध्ये ‘वर्णक’ हा शब्द आलेला आहे. दशकुमारचरितामध्ये ‘वर्णवर्तिका’ हा रंगीत लेखनीसाठी शब्द आढळतो. राजशेखराच्या काव्यमीमांसेत लिहिण्यासाठी लोहकंटकाचा, लाकडी फळ्याचा आणि खडूचा उपयोग करीत असल्याचा स्पष्ट उल्लेख आहे. अजिंठ्याच्या गुंफांत कुंचल्याने रंगीत अक्षरे लिहिली आहेत.

रेखापाटी : ओळी सरळ येण्यासाठी लोक रेखापाटीचा उपयोग करीत. लाकडी पाटीवर एका बाजूला दोरे बांधून समांतर ओळी तयार करीत. त्याच्या मध्यभागी एक पट्टी घालीत. ती पट्टी फिरविली, की समांतर रेषा तयार होत. कित्येक वेळा पाटीच्या दोन्ही बाजूंना छिद्रे पाडून व त्यांत दोरा ओवून समांतर रेषा तयार करीत. शाईच्या रेघा ओढण्यासाठी आजही लोक रूळाचा अगर पट्टीचा उपयोग करतात.

पहा : कोरीव लेख.

संदर्भ : 1. Britt, K. W. Ed. Handbook of Pulp and Paper Technology, New York, 1964. 2. Dani, A. H. Indian Palaeography, Oxford, 1963.

           3. Diringer, David, Writing, New York, 1962. 4. Driver, Godfrey R. Semitic Writing from Pictograph to Alphabet, London, 1976.

           5. Hall, A. J. A Handbook of Textile Dyeing and Printing, London, 1955.

           6. Hawkes, Jaquetta Woolley, Leonard, Ed. History of Mankind, Vol. 1, London, 1963.

           7. Hultzsch, E. Corpus Inscriptionium Indicarum, Vol. 1, Varanasi, 1969.

           8. Mcmurtrie, D. C. The Book, The Printing and Bookmaking, London, 1957.  

           ९. ओझा, गौरीशंकर, भारतीय प्राचीन लिपिमाला, दिल्ली, १९५९.  

गोखले, शोभना

Tuesday, 4 November 2025

शूद्रनाम

Shashikant Mishra 
माङ्गल्यं ब्राह्मणस्योक्तं क्षत्रियस्य बलान्वितम्।
वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम्॥

ये थोड़ा विवादित श्लोक हो जाता है क्योंकि इसका सतही अर्थ लगाना थोड़ा अनुचित होता है। यह श्लोक भविष्य पुराण में आधा, मनुस्मृति में थोड़ा परिवर्तित और विष्णुधर्मोत्तरपुराण में भी आया है। 

ब्राह्मण का नाम मंगलवाचक, क्षत्रिय का नाम बलसम्बन्धी, वैश्य का नाम धन सम्बन्धी होना चाहिए। शूद्र का नाम जुगुप्सा सम्बन्धी होना चाहिए। जुगुप्सा का सामान्य अर्थ निंदनीय या घृणित होता है, किन्तु साहित्य दर्पण के अनुसार दोषेक्षणादिभिर्गर्हा जुगुप्सा विषयोद्भवा। भौतिक विषय वासना में लिप्त दोषदृष्टि के कारण जन्य अनुचित बात को जुगुप्सा कहते हैं।

शूद्र चतुर्थ वर्ण में आते हैं, उन्हें आगे अभी और उन्नति की आवश्यकता है। दोषयुक्त जीव को शूद्रयोनि मिलती है, उसे कर्मशीलता से शुद्ध होते रहने की आवश्यकता है, शुद्ध होने पर जब उसे ऊपर के वर्ण मिलेंगे तो वेदाध्ययन आदि से सम्पन्न होकर और भी श्रेष्ठता को प्राप्त करेगा। 

पाराशर गीता में वर्णन है,

विकर्मावस्थिता वर्णाः पतन्ति नृपते त्रयः।
उन्नमन्ति यथा सन्तमाश्रित्येह स्वकर्मसु॥
शेष तीन वर्ण अपने कर्म से भ्रष्ट होने पर नीचे गिर जाते हैं। वैसे ही वर्णगत कर्म में स्थित शेष वर्ण की वर्णोन्नति भी होती है।

न चापि शूद्रः पततीति निश्चयो
न चापि संस्कारमिहार्हतीति वा।
श्रुतिप्रवृत्तं न च धर्ममाप्नुते
न चास्य धर्मे प्रतिषेधनं कृतम्॥

शूद्र का पतन भी नहीं होता और उसे शूद्रयोनि में रहते हुए (उपनयन आदि) संस्कारों की भी आवश्यकता नहीं है, इसीलिए वेदाध्ययन से उसे धर्म की प्राप्ति नहीं होती, और वेदरहित होकर भी वह धर्म से निष्कासित नहीं होता, उसका निषेध नहीं है।

जुगुप्सा से युक्त नाम रहेगा तो उसे दोष का बोध होता रहेगा, इससे वह कठोर सदाचरण करेगा और आगे उन्नति होगी। यह तात्पर्य है। वैसे शूद्रों के नाम भी कोई निंदनीय नहीं रहे हैं इतिहास में, उदाहरण धर्मव्याध, गुह (स्वामी कार्तिकेय का भी यही नाम है), शबरी, कर्णोदर, सुवर्णकार, आदि।

कलाज्ञः स तु शूद्रो हि
(भविष्य पुराण)
शूद्र को सभी कलाओं में दक्ष होना चाहिए, ऐसे निर्देश हैं।

Friday, 31 October 2025

चमार संघर्ष

Rishikant Pandey जी अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते है कि समय के साथ खुद को इवॉल्व करने के मामले में अगर मैं सर्वाधिक किसी जाति से प्रभावित हूं तो चमार जाति( जिसमें उनकी जाटव ,कुरील ,अहिरवार ,मेघवाल आदि सभी उपजातियां शामिल हैं ) से । 
 शिक्षा , राजनीतिक समझ , सामाजिक उत्थान,आर्थिक विकास इन सभी मामलों उन्होंने खुद को समय के साथ बहुत तेजी से अपडेट किया है ।  
  शिक्षा पर सर्वाधिक ध्यान दिया । शिक्षा के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से शहर की तरफ प्रवास किया । आर्थिक कष्ट उठाये।दिहाड़ी मजदूर के तौर पर भी कार्य किया ,मगर अपनी आने वाली पीढ़ी को शिक्षित बनाने पर जोर दिया । आज शिक्षा का जो प्रसार इनमें है वो तारीफ के काबिल है ।
  सामाजिक आत्मसम्मान के लिए उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़ी । अपना जमा जमाया पुश्तैनी चमड़े का व्यवसाय छोड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण था आत्म सम्मान की लड़ाई । सामाजिक अत्याचारों के मामले में भी डटकर प्रत्युत्तर देने की सफल रणनीति उन्होंने अपनाई । और ऐसा नहीं है कि उन्होंने ये लड़ाई गैर कानूनी तरीके से लड़ी हो । ज्यादातर मामलों में उन्होंने कानूनी तरीके से ही इस लड़ाई को जीता है । धर्म के मामले में भी उन्होंने उत्पीड़न का रोना रोने और दूसरों को गाली देने कि जगह बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी द्वारा दिखाए गये रास्ते पर चलते हुए बौद्ध मत की तरफ रुख कर लिया । कोई चिक-चिक झिक झिक नहीं। समाज में अन्य जातियों के साथ भी उन्होंने समानता के साथ बेहतर सामाजिक संबंध बनाये। 
  
 आर्थिक तौर पर रोजगार के नये साधन अपनाये। आर्थिक उन्नति पर ध्यान दिया । और सबसे बड़ी बात की जुआ शराब सट्टा जैसी उन कुरीतियों से दूरी बनाई जो आर्थिक रूप से आदमी को पंगु बनातीं हैं ।

 सबसे ज्यादा जो बात मुझे प्रभावित करती है वो है उनकी राजनीतिक समझ । भारतीय राजनीति में बहुजन विचारधारा की न सिर्फ उन्होंने स्थापना की अपितु उस विचारधारा को एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर खड़ा करके दिखाया । दलितों की एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान खड़ी की । कांग्रेस की तरफ से ब्राह्मण दलित मुस्लिम समीकरण के अंतर्गत ब्राह्मण डॉमिनेशन की पॉलिटिक्स की जा रही थी जिसमें दलितों को मात्र वोट बैंक के तौर पर यूज किया जा रहा था । उन्होंने बहुजन राजनीति के माध्यम से इस समीकरण को हमेशा के लिए खत्म करके दलितों को वोट बैंक पॉलिटिक्स से आजादी दिलाई । मगर ऐसा भी नहीं होने दिया कि बहुजन के नाम पर कोई और फायदा उठाकर उनका शोषण करने लगे । 
   जब उन्होंने देखा कि जमींदार जातियां बहुजन राजनीति के नाम पर उन्हें मात्र यूज करना चाह रहीं हैं तो उन्होंने इसका भी प्रतिकार किया । बहुजन राजनीति को उन्होंने जड़ता का शिकार नहीं होने दिया । जिन प्रतीकों और नारों के साथ उन्होंने इस राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की समय आने पर उनमें बदलाव भी किया। हमेशा टकराव की राजनीति न करके सत्ता में आने पर सृजनात्मक राजनीति को बढ़ावा दिया ।आज आम्बेडकरवादी राजनीतिक विचारधारा पूरे देश में मजबूती से खड़ी दिखाई दे रही है जो उसका श्रेय चमार जाति को ही जाता है ।
  अपनी जाति ब्राह्मण को मैं यही सलाह दूंगा कि इन मामलों में इनसे सीख लेने की कोशिश करनी चाहिए।

आलोक महान की फेसबुक वॉल से

Friday, 24 October 2025

दलितः

पाणिनीय धातुवृत्तिः-
दलँ (दल्) विशरणे
मूलधातुः - दलँ
धातुः - दल्
अर्थः -विशरणे
गणः - भ्वादिः
पदि - परस्मैपदी
इट्से - ट्

मानवीयता 336
दल 
विशरणे
 (दलति णौ घटादित्वात (दलयति) दाडिमम् दालशब्दात् घञन्तात्तेन निवृत्तमित्यत्र विषये [ भावचप्रत्ययान्तादिमज्वक्तव्यः ] इतीमच् इलयोश्चाभेदः कुं दलतीति (कुद्दालः) पृषोदरादिः अयं घटादावपि 541

क्षीरतरङ्गिणी

 
352
दल
 
विशरणे
 - दलति उषिकुटिदलिकचिखजिभ्यः कपन् (उ0 3142) दलपः दलम् मित्त्वाद् (धा0 सू0 1553 व्याख्याने) दलयति चुरादौ (10199) दालयति 537

धातुप्रदीपः
 
354
दल
 
विदारणे
 - दलति । ददाल । दालः । दलनम् । दाडिनम् (68) । कुद्दालः (69)।। 549 ।।

दलँ (दल्) विशरणे
मूलधातुः
दलँ

धातुः
दल्

अर्थः
विशरणे

गणः
भ्वादिः

पदि
परस्मैपदी

इट्
सेट्

वृत्तयः

माधवीयधातुवृत्तिः
 
336
दल
 
विशरणे
 (दलति णौ घटादित्वात (दलयति) दाडिमम् दालशब्दात् घञन्तात्तेन निवृत्तमित्यत्र विषये [ भावचप्रत्ययान्तादिमज्वक्तव्यः ] इतीमच् इलयोश्चाभेदः कुं दलतीति (कुद्दालः) पृषोदरादिः अयं घटादावपि 541

क्षीरतरङ्गिणी
 
352
दल
 
विशरणे
 - दलति उषिकुटिदलिकचिखजिभ्यः कपन् (उ0 3142) दलपः दलम् मित्त्वाद् (धा0 सू0 1553 व्याख्याने) दलयति चुरादौ (10199) दालयति 537

धातुप्रदीपः
 
354
दल
 
विदारणे
 - दलति । ददाल । दालः । दलनम् । दाडिनम् (68) । कुद्दालः (69)।। 549 ।।
तिङन्त-रूपाणि

कर्तरि
लट् (वर्तमान)
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम दलति दलतः दलन्ति
मध्यम दलसि दलथः दलथ
उत्तम दलामि दलावः दलामः
लिट् (परोक्ष)
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम ददाल देलतुः देलुः
मध्यम देलिथ देलथुः देल
उत्तम ददाल/ददल देलिव देलिम
लुट् (अनद्यतन भविष्यत्)
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम दलिता दलितारौ दलितारः
मध्यम दलितासि दलितास्थः दलितास्थ
उत्तम दलितास्मि दलितास्वः दलितास्मः
लृट् (अद्यतन भविष्यत्)
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम दलिष्यति दलिष्यतः दलिष्यन्ति
मध्यम दलिष्यसि दलिष्यथः दलिष्यथ
उत्तम दलिष्यामि दलिष्यावः दलिष्यामः
लोट् (आज्ञार्थ)
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम दलतु/दलतात् दलताम् दलन्तु
मध्यम दलतात्/दल दलतम् दलत
उत्तम दलानि दलाव दलाम
लङ् (अनद्यतन भूत)
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम अदलत् अदलताम् अदलन्
मध्यम अदलः अदलतम् अदलत
उत्तम अदलम् अदलाव अदलाम
विधिलिङ्
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम दलेत् दलेताम् दलेयुः
मध्यम दलेः दलेतम् दलेत
उत्तम दलेयम् दलेव दलेम
आशीर्लिङ्
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम दल्यात् दल्यास्ताम् दल्यासुः
मध्यम दल्याः दल्यास्तम् दल्यास्त
उत्तम दल्यासम् दल्यास्व दल्यास्म
लुङ् (अद्यतन भूत)
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम अदालीत् अदालिष्टाम् अदालिषुः
मध्यम अदालीः अदालिष्टम् अदालिष्ट
उत्तम अदालिषम् अदालिष्व अदालिष्म
लृङ् (भविष्यत्)
परस्मै एक द्वि बहु
प्रथम अदलिष्यत् अदलिष्यताम् अदलिष्यन्
मध्यम अदलिष्यः अदलिष्यतम् अदलिष्यत
उत्तम अदलिष्यम् अदलिष्याव अदलिष्याम

कर्मणि
लट् (वर्तमान)
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम दल्यते दल्येते दल्यन्ते
मध्यम दल्यसे दल्येथे दल्यध्वे
उत्तम दल्ये दल्यावहे दल्यामहे
लिट् (परोक्ष)
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम देले देलाते देलिरे
मध्यम देलिषे देलाथे देलिध्वे/देलिढ्वे
उत्तम देले देलिवहे देलिमहे
लुट् (अनद्यतन भविष्यत्)
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम दलिता दलितारौ दलितारः
मध्यम दलितासे दलितासाथे दलिताध्वे
उत्तम दलिताहे दलितास्वहे दलितास्महे
लृट् (अद्यतन भविष्यत्)
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम दलिष्यते दलिष्येते दलिष्यन्ते
मध्यम दलिष्यसे दलिष्येथे दलिष्यध्वे
उत्तम दलिष्ये दलिष्यावहे दलिष्यामहे
लोट् (आज्ञार्थ)
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम दल्यताम् दल्येताम् दल्यन्ताम्
मध्यम दल्यस्व दल्येथाम् दल्यध्वम्
उत्तम दल्यै दल्यावहै दल्यामहै
लङ् (अनद्यतन भूत)
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम अदल्यत अदल्येताम् अदल्यन्त
मध्यम अदल्यथाः अदल्येथाम् अदल्यध्वम्
उत्तम अदल्ये अदल्यावहि अदल्यामहि
विधिलिङ्
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम दल्येत दल्येयाताम् दल्येरन्
मध्यम दल्येथाः दल्येयाथाम् दल्येध्वम्
उत्तम दल्येय दल्येवहि दल्येमहि
आशीर्लिङ्
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम दलिषीष्ट दलिषीयास्ताम् दलिषीरन्
मध्यम दलिषीष्ठाः दलिषीयास्थाम् दलिषीध्वम्/दलिषीढ्वम्
उत्तम दलिषीय दलिषीवहि दलिषीमहि
लुङ् (अद्यतन भूत)
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम अदालि अदलिषाताम् अदलिषत
मध्यम अदलिष्ठाः अदलिषाथाम् अदलिध्वम्/अदलिढ्वम्
उत्तम अदलिषि अदलिष्वहि अदलिष्महि
लृङ् (भविष्यत्)
आत्मने एक द्वि बहु
प्रथम अदलिष्यत अदलिष्येताम् अदलिष्यन्त
मध्यम अदलिष्यथाः अदलिष्येथाम् अदलिष्यध्वम्
उत्तम अदलिष्ये अदलिष्यावहि अदलिष्यामहि
वृत्तिषु पाठितानि कानिचन कृदन्त-प्रातिपदिकानि

Thursday, 23 October 2025

‎आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
‎मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

आइए महसूस करिए जिन्दगी के रौब को
मैं वामनों की गली में ले चलूंगा आपको।rg
‎जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
‎मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर

जिस गली में पांड़े पड़े छप्पन भोग भोग कर
चार-छह जनमान बैठे हुए भेंट का संयोग पर।rg
‎है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
‎आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
‎चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
‎मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
‎कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
‎लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
‎कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
‎जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
‎थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
‎सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
‎डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
‎घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
‎आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
‎क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
‎होनी से बेखबर कृष्णा बेख़बर राहों में थी
‎मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
‎चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
‎छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
‎दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
‎वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
‎और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
‎होश में आई तो कृष्णा थी पिता की गोद में
‎जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
‎जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
‎बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
‎पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
‎कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
‎कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
‎कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
‎और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
‎बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
‎बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
‎पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
‎वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
‎दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
‎देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
‎क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
‎कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
‎कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
‎सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
‎देखिए ना यह जो कृष्णा है चमारो के यहाँ
‎पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ
‎जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
‎हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है
‎भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
‎फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
‎आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
‎जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
‎वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
‎वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
‎जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
‎हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
‎कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
‎गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी
‎बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
‎हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था
‎क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
‎हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
‎रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
‎भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
‎सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
‎एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
‎घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
‎"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
‎निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
‎एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
‎गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
‎सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
‎"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
‎एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा
‎होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
‎ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
‎"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
‎आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
‎और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
‎बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
‎दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
‎वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
‎घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
‎कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे
‎"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
‎हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
‎ 
‎यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
‎आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
‎फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
‎ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा
‎इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
‎होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
‎बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
‎होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
‎ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
‎ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"
‎पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
‎"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्णा का हाल"
‎ 
‎उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
‎सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
‎धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
‎प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
‎मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
‎तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
‎गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
‎या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
‎हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
‎बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए!
‎- अदम गोंडवी 
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Tuesday, 21 October 2025

आदेश (10.07.2025 को सुरक्षित) (12.08.2025 को सुनाया गया) वर्तमान याचिका 14.11.2022 के अनुलग्नक पी-11 की बैठक के कार्यवृत्त को चुनौती देते हुए दायर की गई है जिसके तहत प्रतिवादी संख्या 1-विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने मद संख्या ECXXVIII-(iv)-(xiv) में प्रस्ताव पारित किया है। 2. याचिकाकर्ता के विद्वान वकील ने दृढ़ता से तर्क दिया है कि उपरोक्त प्रस्ताव पारित करने में विश्वविद्यालय की कार्रवाई कानून में अत्यधिक अनुचित है और यह उन सहायक प्रोफेसरों को अनुचित लाभ प्रदान करने के समान है, जिन्हें कानून की किसी भी ज्ञात प्रक्रिया का पालन किए बिना अवैध रूप से विश्वविद्यालय में नियुक्त किया गया है। याचिकाकर्ता के विद्वान वकील ने प्रस्तुत किया कि प्रारंभ में 30.10.2010 का एक विज्ञापन (अनुलग्नक पी-1)
प्रतिवादी नंबर 1-विश्वविद्यालय में विभिन्न संकाय पदों पर नियुक्ति के लिए जारी किया गया था और केवल उक्त विज्ञापन में विषयों का उल्लेख किया गया था और प्रत्येक विषय के खिलाफ कोई उपलब्ध पद नहीं था और प्रत्येक पद का उल्लेख किया गया था। प्रत्येक विषय या अनुशासन में पदों की संख्या या प्रत्येक विषय के तहत सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर या प्रोफेसर जैसे पदों की संख्या का उल्लेख किए बिना इसे केवल एक रोलिंग / खुला विज्ञापन बताया गया था। कुल पदों की संख्या का भी खुलासा नहीं किया गया था। इसके बाद 02.11.2012 को एक शुद्धिपत्र जारी किया गया (अनुलग्नक पी -2) जिसमें सहायक प्रोफेसरों, एसोसिएट प्रोफेसरों और प्रोफेसरों के कुल पदों का खुलासा किया गया था। इसमें से सहायक प्रोफेसरों की रिक्तियों की संख्या 76 बताई गई थी, जिनमें से 9 यूआर थीं, 15 एससी थीं, 10 एसटी थीं, 42 ओबीसी के लिए थीं और 02 पीडब्ल्यूडी के लिए थीं। 3. चूंकि याचिका केवल सहायक प्रोफेसर के पद पर रिक्तियों को भरने के संबंध में दायर की गई है, इसलिए इस आदेश में तथ्य और विचार केवल सहायक प्रोफेसर के पद तक ही सीमित होंगे। 4. यह तर्क दिया गया है कि हालांकि अधिसूचित रिक्तियां सहायक प्रोफेसर के 76 पदों के लिए थीं, लेकिन यह उल्लेख न करके कि किस विषय में प्रत्येक श्रेणी के अंतर्गत कितनी रिक्तियां हैं, विश्वविद्यालय ने अपने हाथों में एक बड़ी छूट रख ली और जहां भी वे किसी विशेष श्रेणी के उम्मीदवार को लाभ पहुंचाना चाहते थे तो उक्त पद को उस श्रेणी में परिवर्तित कर दिया गया क्योंकि विज्ञापन में ऐसा स्पष्ट नहीं किया गया था। यह भी तर्क दिया गया है कि यूजीसी द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता पर यूजीसी विनियम और उच्च शिक्षा में मानकों के रखरखाव के उपाय, 2010 (संक्षेप में
विनियम 2010'), खंड 6.0.0 के अनुसार चयन प्रक्रिया निर्धारित की गई है और परिशिष्ट (iii) के अनुसार, तालिका ii (सी) सहायक प्रोफेसर के लिए चयन मानदंड न्यूनतम योग्यता है जैसा कि विनियमों में निर्धारित है और चयन समिति द्वारा मूल्यांकन के लिए एक विशेष पद्धति निर्धारित की गई है, जो निम्नानुसार है: - चयन समिति मानदंड / वेटेज (कुल वेटेज = 100) (ए) शैक्षणिक रिकॉर्ड और अनुसंधान प्रदर्शन (50%) (बी) डोमिन ज्ञान और शिक्षण कौशल का आकलन (30%) (सी) साक्षात्कार प्रदर्शन (20%) 5. यह तर्क दिया जाता है कि तीन मापदंडों के अनुसार उम्मीदवारों का कोई मूल्यांकन नहीं किया गया था, जिसके आधार पर चयन समिति को उम्मीदवारों का आकलन करना था। 6. यह आगे तर्क दिया गया है कि नियुक्त उम्मीदवारों की वास्तविक संख्या 76 रिक्तियों के मुकाबले 156 थी। जब कुछ अभ्यर्थियों ने न्यायालय में यह कहते हुए याचिका दायर की कि विश्वविद्यालय ने उन्हें सेवा में स्थायीकरण का लाभ नहीं दिया है, तो विश्वविद्यालय ने याचिका संख्या 2372/2017 में अपना बचाव प्रस्तुत किया कि यूजीसी विनियम, 2010 के अनुसार कोई अंक प्रदान नहीं किए गए थे और इसलिए चयन समिति द्वारा कोई मेरिट सूची तैयार नहीं की गई थी, इसलिए चयन प्रक्रिया इतनी अवैधताओं से दूषित और दूषित है कि चयनित अभ्यर्थियों की सेवाओं को स्थायी करना संभव नहीं है। तत्पश्चात, इस न्यायालय की खंडपीठ ने अपने आदेश (अनुलग्नक P-6) दिनांक 08.03.2018 के तहत उक्त याचिका का निपटारा कर दिया और न्यायालय ने इसमें विस्तृत निर्देश पारित किए। निर्देशों का सार यह था कि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि चयन प्रक्रिया
अत्यधिक प्रदूषित और अवैध है और याचिकाकर्ताओं ने अपनी नियुक्ति के मामले में किसी भी जांच को रोकने के लिए याचिका दायर की है ताकि वे अपनी अवैध नियुक्ति को जारी रख सकें। इस न्यायालय ने उक्त आदेश के पैरा-13 में स्पष्ट रूप से माना है कि बिना आवेदन के भी नियुक्तियां की गई हैं और यहां तक ​​कि साक्षात्कार भी ठीक से नहीं हुए हैं। विज्ञापित 82 पदों के मुकाबले 157 नियुक्तियां की गई हैं। 7. यह भी तर्क दिया गया है कि इसके बाद इस मामले को विश्वविद्यालय ने अपने हाथ में लिया और मामले को मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार को पत्र अनुलग्नक पी-8 के जरिए विजिटोरियल जांच समिति गठित करने की सिफारिश के साथ भेज दिया गया यानी विजिटर को विश्वविद्यालय में अवैध तरीके से अतिरिक्त सहायक प्रोफेसरों के चयन की प्रक्रिया में अनियमितताओं की जांच के लिए एक जांच समिति गठित करने की आवश्यकता थी। 8. यह भी तर्क दिया गया है कि हालांकि विजिटोरियल जांच रिपोर्ट रिकॉर्ड में नहीं है लेकिन विजिटोरियल जांच की सिफारिश प्रतिवादी संख्या 5 से 11 (दस्तावेज संख्या 5977/2025) के जवाब के साथ रिकॉर्ड में है और उक्त सिफारिशों के अनुसार विजिटोरियल जांच समिति ने मुद्दों को हल करने के लिए चार वैकल्पिक सुधारात्मक उपाय सुझाए थे। 9. इसके बाद विश्वविद्यालय ने 18.02.2020 की कार्यकारी परिषद की बैठक में इस मामले को उठाया और इसे एजेंडा आइटम संख्या ECXXVI (III)-(vi) के रूप में माना गया जो कि रिट याचिका पेपर बुक के पृष्ठ 70 पर है। यह तर्क दिया गया है कि कार्यकारी परिषद के उक्त प्रस्ताव द्वारा विश्वविद्यालय ने निर्णय लिया कि एक नई मेरिट सूची तैयार की जाए जिसके आधार पर सहायक प्रोफेसरों की रिक्तियों की सीमा तक सिफारिशें की जा सकें यह भी निर्णय लिया गया कि जो संकाय पहले से ही पिछली भर्ती प्रक्रिया के अनुसार काम कर रहे हैं, उन्हें जारी रखने की अनुमति दी जा सकती है और यदि वे अभी भी नई प्रक्रिया में चयनित होते हैं तो उन्हें सेवा में निरंतरता का लाभ दिया जा सकता है।

high court orders

परिणामस्वरूप, याचिका विचारणीय है और इसके द्वारा अनुमति दी जाती है। कार्यकारी परिषद की दिनांक 14.11.2022 की बैठक (अनुलग्नक पी/11) में लिए गए विवादित निर्णय को रद्द किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप, पहले का निर्णय (अनुलग्नक पी/9) दिनांक 07.02.2020 बहाल रहेगा। प्रक्रिया को तीन महीने की अवधि के भीतर पूरा किया जाए, यदि प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी नहीं होती है तो 2010 की प्रक्रिया के अनुसरण में वर्ष 2013 में नियुक्त सहायक प्रोफेसर 15.11.2025 से अपने पद पर नहीं रहेंगे। यदि प्रक्रिया उस तिथि से पहले पूरी हो जाती है, तो केवल उन सहायक प्रोफेसरों को रखा जाएगा जो कार्यकारी परिषद की दिनांक 07.02.2020 की बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार आयोजित किए जाने वाले पुनर्मूल्यांकन और पुनः साक्षात्कार में योग्य पाए जाते हैं। 46. ​​चूंकि यह पाया गया है कि विश्वविद्यालय ने इस मामले में पूरी तरह से अवैधानिक तरीके से काम किया है, इसलिए, छूटे हुए उम्मीदवारों के अधिकारों को हराने और अवैध रूप से चयनित उम्मीदवारों को बचाने और बचाने की कोशिश करने के लिए विश्वविद्यालय पर उचित लागत लगाई जानी चाहिए। इसलिए, प्रतिवादी संख्या 3 और 4 पर संयुक्त रूप से और अलग-अलग 5.00 लाख रुपये (केवल पाँच लाख रुपये) का अनुकरणीय जुर्माना लगाया जाता है, जिसे विश्वविद्यालय द्वारा इस आदेश की तारीख से 45 दिनों की अवधि के भीतर निम्नलिखित तरीके से जमा किया जाएगा:- मप्र पुलिस कल्याण निधि राष्ट्रीय रक्षा निधि सशस्त्र सेना झंडा दिवस निधि मप्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन, जबलपुर 2,00,000.00 रुपये 1,00,000.00 रुपये 1,00,000.00 रुपये 50,000.00 रुपये

Sunday, 12 October 2025

हिन्दी समास

समास

समास का शाब्दिक अर्थ है छोटा रूप। अतः जब दो या दो अधिक शब्द अपने बीच की विभक्तियों का लोप कर जो छोटा रूप् बनाते है, उसे समास, सामाजिक शब्द समास पर कहते है।
सामाजिक पदों को अलग करना समास विग्रह कहलाता है।
समास छः प्रकार के होते है –
1.अव्यवी समास
2.तत्पुरूष समास
3.द्वन्द्व समास
4.बहुव्रीहि समास
5.द्विगुसमास
6.कर्म धारय समास
1. अव्ययी समास:- प्रथम पद प्रधान होता है या पूरा पद अव्यय होता है। यदि शब्दों की पुनरावृति हो।
उदाहरण:-
सामाजिक शब्द/पद समास विग्रह
यथा शक्ति – शक्ति के अनुसार
यथा क्रम – क्रम के अनुसार
यथेच्छा – इच्छा के अनुसार
प्रतिदिन – प्रत्येक दिन
प्रत्येक – हर-एक
प्रत्यक्ष – अक्षि के समान
यथार्थ – जैसा वास्तव में अर्थ है
आमरण – मरण तक
आजीवन – जीवन भर
प्रतिदिन – प्रत्येक दिन
प्रतिक्षण – प्रत्येक क्षण
यावज्जीवन – जब तक जीवन है
लाजवाब – जिसका जबाब न हो
भर तक – सक भर
दुस्तर – जिसको तैराना कठिन हो
अत्यधिक – उत्तम से अधिक
प्रतिशत – प्रत्येक सौ पर
प्रत्याघात – घात के बदले आघात
मरणोपरांत – मरण के उपंरात
दिन भर – पूरे दिन
भर पेट – पेट भरकर
अवसरानुसार – अवसर के अनुसार
सशर्त – शर्त के अनुसार
हरवर्ष – प्रत्येक वर्ष
नीरव – बिना ध्वनि के
सपत्नीक – पत्नी के साथ
पहले पहल – सबसे पहल
चेहरे चेहरे – हर चेहरे पर
– वे उदाहरण जिसमें पहला पद उपसर्ग या अव्यय न होकर संज्ञा या विषेषण शब्द होता है, ये संज्ञा विषेषण शब्द अन्यत्र तो लिंग वचन कारक में अपना रूप लेते है किंतु समास में आने पर उनका रूप स्थिर रहता है।
विवेक-पूर्ण – विवेक के साथ
भागम भाग – भागने के बाद भाग
मंद भेद – मंद के बाद मंद
हाथों हाथ – हाथ ही हाथ में
कुशलतापूर्वक – कुशलता के साथ
घर-घर – घर के बाद घर
दिनों- दिन – दिन के बाद दिन
घड़ी-घड़ी – घड़ी के बाद घड़ी
2. तत्पुरूष समासः-में दूसरा प्रधान होता है इसमें प्रथम पद विशेषण व दुसरा शब्द विशेष्य का कार्य करता है।
लुप्त-कारक समास में कारक की विभक्तियों का लोप होता है सिर्फ कर्ता व सम्बोधन को छोड़कर शेष सभी कारक की विभक्तियों का लोप हो जाता है।
कर्म तत्पुरूष समास ( को विभक्ति का लोप) –
स्वर्गप्राप्त – स्वर्ग को प्राप्त
चिड़ीमार – चिड़ी को मारने वाला
तिलकुटा – तिल को कूटकर बनाया हुआ
प्राप्तोदक – उदक को प्राप्त
कृष्णार्पण – कृष्ण को अर्पण
जेबकतरा – जेब को कतरने वाला
हस्तगत – हस्त को गया हुआ
गिरहकट – गाँठ को काटने वाला
गगन चुंबी – गगन को चूमने वाला
कर्णतत्पुरूष:- ‘सेः का लोप या द्वारा का लोप, जुड़ने का भाव। हस्त लिखित, रेखांकित, अकाल पीड़ित, रत्नजड़ित, बाढ़ग्रस्त, तुलसीकृत, ईष्चरदत्त, नीतियुक्त।
सम्प्रदान तत्पुरूष:- ‘ के ‘ लिए ‘ का ‘ लोप ।
देषभक्ति, रसोईद्यर, गुरूदक्षिणा, सत्याग्रह, दानपात्र, डाकद्यर, छात्रावास, चिकित्सालय।
अपादन तत्पुरूष:- ‘ से ‘ (अलग होना) का लोप।
गुणरहित, देषनिकाला, पथभ्रष्ट, पापमुक्त, धर्मविमुख, नगरागत ।
सम्बन्ध तत्पुरूषः- ‘ का, की, के ‘ का लोप ।
राजपुत्र, सूर्यास्त, संसदसदस्य, गंगाजल, दीपषिखा, शास्त्रानुकूल ।
अधिकरण तत्पुरूष:- ‘ में ‘ पर का लोप ।
रथारूढ़, आपबीति, पदासीन, शीर्षस्थ, स्वर्गवास, लोकप्रिय, ब्रह्मलीन, देषाटन, शरणागत।
अन्य भेद
अलुक तत्पुरूष:- कारक चिह्न या विभक्ति का किसी न किसी रूप में मौजूद रह जाना । जैसे:- धनंजय, मृत्युंजय, मनसिज ।
नञ तत्पुरूष:- अंतिम शब्द प्रत्यय होता है और इस प्रत्यय का स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं होता है। जलज – जल ़ ज
लुप्तपद तत्पुरूष/मध्यपद लोपी तत्पुरूष:- कारक चिह्नों के साथ शब्दों का भी लोप हो जाता है ।
दही बड़ा:- दही में डूबा हुआ बड़ा,
मालगाड़ी:- माल ले जाने वाली गाड़ी
पवनचक्की:- पवन से चलने वाली चक्की
3. कर्मधारय समास:- इसमें दूसरा पद प्रधान होता है तथा दोनों पदों में उपमेय-उपमान अथवा विषेषण-विषेष्य का सम्बन्ध होता है।
नीलकमल में – नील (विषेषण) तथा कमल (विषेष्य) है।
महासागर, महापुरूष, शुभागमन, नवयुवक, अल्पाहार, भलामानुष, बहुसंख्यक(हिन्दु), बहुमूल्य, भ्रष्टाचार, शीतोष्ण- शीत है जो उष्ण है।
उपमेय-उपमान:- चन्द्रमुख, कमलनयन, मृगनयनी-मृग, के नयनों के समान नयन है जिसके, कंजमुख
4. द्विगु समास:-इसमें एक पद संख्यावाची विषेषण होता है तथा शेष पद समूह का बोध कराता है, इसमें दूसरा पद प्रधान होता है, ऐसे समास में एक ही संख्या वाले शब्द सम्मिलित होते है जैसे:-
एकांकी:- एक अंक का
इकतारा:- एक तार का
चौराहा:- चार राहों का समाहार, सप्तर्षि, नवरत्न, सतसई, अष्टाध्यायी, पंचामृत(घी, दूध, दही, शहद)
5. द्वन्द्व समास:- इसमें दोनों पद प्रधान होते है, दोनों पदो ंके मध्य ‘ और ‘ या ‘ या ‘ आदि का लोप होता है। जैसे:- माता-पिता, अन्नजल, गुरू-षिष्य
पच्चीस:- पाँच और बीस अड़सठ:- आठ और सा�
धनुर्बाण, धर्माधर्म, हरिहर, दाल रोटी- दाल रोटी आदि ।
भला बुरा- बुरा आदि, अडौसी-पड़ौसी:- पड़ौसी आदि ।
एक-दो:- एक या दो, दस-बारह:- दस या बारह, दस से बारह तक।
6. बहुव्रीहि समास:-दोनों पक्षों में से कोई पद प्रधान नहीं होता है, अपितु तीसरे पद की कल्पना की जाती है। जैसे:- लम्बोदर, दषानन, पवनपुत्र, भालचंद्र(षिव), चन्द्रमौलि, सूपकर्ण(गणेष), षडानन (कार्तिकेय)

Sunday, 5 October 2025

 

संस्कृत, अम्बेडकर और भारतीय

गया 

20 जुलाई 2019 को, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बाबासाहेब आंबेडकर का स्मरण करते हुए कहा: "संस्कृत के बिना भारत को पूरी तरह से समझा नहीं जा सकता। 30% भारतीय भाषाएँ संस्कृत से ली गई हैं। आंबेडकर ने कहा कि उन्हें दुख है कि वे संस्कृत नहीं सीख पाए और उन्हें पश्चिमी अनुवादित संस्करणों से पढ़ना पड़ा, जो शायद गलत भी हों। उन्होंने संस्कृत को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाने का समर्थन किया।"

हालाँकि किसी नेता के लिए यह राय रखना कोई समस्या नहीं है कि कोई विशेष भाषा अन्य भाषाओं से ज़्यादा महत्वपूर्ण है, लेकिन अपने तर्कों को पुष्ट करने के लिए बाबासाहेब का नाम संदर्भ से बाहर, सफ़ेद झूठ के साथ उछालना निंदनीय है। दक्षिणपंथी या मध्य-दक्षिणपंथी नेताओं को बाबासाहेब आंबेडकर का ज़िक्र करते देखना हमेशा दिलचस्प होता है। वे लगभग हर उस बात के पक्ष में खड़े होते हैं जिसका उन्होंने कड़ा विरोध किया था।

श्री भागवत के इस बयान के पीछे कई धारणाएं और तथ्य हैं जिन्हें संदर्भ से बाहर लिया गया है, जिन्हें कुछ तथ्यों और कुछ प्रश्नों के माध्यम से दूर किया जा सकता है।


कुछ तथ्य:

1. अंबेडकर संस्कृत (हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती और पाली सहित) में धाराप्रवाह थे और उन्होंने 'रिडल्स इन हिंदूइज़्म' लिखी है । यह पुस्तक अंबेडकर की मृत्यु के 3 दशक बाद प्रकाशित हुई थी। मराठा मंडल ने इसकी प्रतियां जलाईं और शिवसेना ने 'राम और कृष्ण' पर एक अध्याय को हटाने के लिए अदालतों में रैली की। अंबेडकर ने अपनी पुस्तक में वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत से सटीक छंद उद्धृत किए हैं। यह खोजना मुश्किल है कि अंबेडकर ने पश्चिमी विद्वानों को पढ़ने के लिए अपना अफसोस कहां व्यक्त किया है; जो उनके जैसे ही वेदों की ब्राह्मण व्याख्याओं के आलोचक थे। वह उद्धृत करते हैं (पृष्ठ 18) प्रोफेसर मैक्स मुलर (प्राचीन संस्कृत साहित्य का इतिहास): "ब्राह्मण ग्रंथों में वैदिक भजनों के मूल उद्देश्य की पूरी तरह से गलतफहमी है

2. अंबेडकर ने पहले लालकृष्ण मैत्रा के संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था, लेकिन युवा सदस्यों के असहमत होने के कारण इसे छोड़ दिया। 1950 में, जब राष्ट्रभाषा के लिए अंतिम बहस हुई, तो हिंदी बनाम अंग्रेजी का मामला था। नेहरू हिंदी के पक्ष में थे और अंबेडकर अंग्रेजी के।

3. इस तथ्य की क्या प्रासंगिकता है कि आंबेडकर ने 60 साल पहले संस्कृत का समर्थन किया था, जबकि भारत (2011) का 0.00198% हिस्सा संस्कृत समझता है। दरअसल, आंबेडकर की पुस्तक 'द अनटचेबल्स एंड पैक्स ब्रिटानिका' में , उन्होंने 1840 में बॉम्बे के सरकारी स्कूलों में संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या के स्पष्ट आँकड़े उद्धृत किए हैं। यह संख्या 12170 में से 283 थी। वे इस बात के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि कैसे इस पहलू में भी निचली जातियों का व्यवस्थित बहिष्कार किया गया था।

4. वे कौन से स्रोत हैं जो साबित करते हैं कि 30% भारतीय भाषाओं में संस्कृत है? मुझे एक भी ऐसा स्रोत नहीं मिला जो यह आँकड़ा दे सके।

कुछ प्रश्न:

1. क्या संस्कृत समझने से भारत की स्पष्ट समझ की गारंटी मिल सकती है? एक ऐसी भाषा जो लगभग 100% भारतीयों द्वारा बोली या लिखी भी नहीं जाती, भारत को समझने का पैमाना कैसे हो सकती है? हो सकता है कि हिंदू धर्मग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हों। लेकिन हमारी कोई भी पाठ्यपुस्तक - इतिहास, विज्ञान, कुछ भी उस भाषा में नहीं है। 2019 में संस्कृत कैसे प्रासंगिक है?

2. हालाँकि मैंने दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में संस्कृत में 97/100 अंक प्राप्त किए थे, फिर भी आज मैं संस्कृत का एक शब्द भी नहीं बोल सकता। मैंने संस्कृत (ज़्यादातर दूसरे छात्रों की तरह) इसलिए चुनी क्योंकि इसमें हिंदी (दूसरा विकल्प) से ज़्यादा अंक मिल सकते थे। ज़ाहिर है कि आज मुझे संस्कृत बोलना या लिखना नहीं आता। ऐसा इसलिए नहीं है कि मैं संस्कृत का अनादर करता हूँ, बल्कि इसलिए कि मुझे संस्कृत में न तो कुछ बोलना है और न ही पढ़ना/देखना है।

3. किसान आत्महत्याएँ, बाढ़, गिरती मुद्रा, बढ़ती बेरोज़गारी, फ़ेक न्यूज़, महिला सुरक्षा, मॉब लिंचिंग। संस्कृत का राष्ट्रीय भाषा न होना आज भारत के सबसे बड़े मुद्दों में से एक कैसे है? ऐसा नहीं है। लेकिन यह ऊपर बताए गए विषयों से ध्यान भटकाने का एक अच्छा ज़रिया है।

4. मान लीजिए कि मैं भारत को ठीक से नहीं समझ पाता क्योंकि मैं संस्कृत नहीं जानता, तो क्या इससे मैं भारतीय नागरिक नहीं रह जाता?

5. भारतीय भाषाएँ भी उर्दू और फ़ारसी से काफ़ी कुछ उधार लेती हैं। तो?

6. अगर अंबेडकर जिस बात का समर्थन करते थे, वह इतनी ही महत्वपूर्ण है, तो उनकी सबसे बड़ी इच्छा भारत से 'जाति व्यवस्था' (जाति का विनाश) को हटाकर सभी असमानताओं को दूर करना था । यह कैसा रहेगा?

ये विचार एक ऐसे व्यक्ति के हैं, जो न तो सत्ता का साधन रहा है और न ही महानता का चापलूस। ये विचार एक ऐसे व्यक्ति के हैं, जिसका लगभग पूरा सार्वजनिक परिश्रम गरीबों और शोषितों की मुक्ति के लिए एक सतत संघर्ष रहा है और जिसका एकमात्र प्रतिफल राष्ट्रीय पत्रिकाओं और राष्ट्रीय नेताओं द्वारा निरंतर निंदा और गाली-गलौज की बौछार रहा है, और इसका कोई और कारण नहीं, बल्कि केवल यही है कि मैं उनके साथ उस चमत्कार—मैं इसे चाल नहीं कहूँगा—को करने में शामिल होने से इनकार करता हूँ, जिसमें अत्याचारी के सोने से शोषितों को मुक्ति दिलाई जाती है और अमीरों के धन से गरीबों को ऊपर उठाया जाता है।

—डॉ. अम्बेडकर, 'जाति का विनाश'