मैं इलाहाबाद भी रहा ताकि उसे अपने व्यवसाय की संभावनाओं के हिसाब से परख सकूँ। लेकिन वहाँ मुझे इतना बड़ा मकान नहीं मिला जो मेरी किताबों को संभाल सके, दूसरा वहाँ की दलाली व्यवस्था जिससे मुझे बड़ी घृणा थी वहाँ जड़ पकड चुकी थी। 50-50 वहाँ की सामान्य दर थी और मेरा सम्मान व स्वाभिमान मुझे इस बिरादरी से सम्बंध बनाने से रोक रहा था। मेरेक्लर्क ने मुझे सुझाव दिया कि जब तक मैं अपनी स्थानीय वकील बिरादरी के तौर तरीकों को नहीं अपनाऊँगा। मेरा यहाँ कोई भविष्य नहीं होगा और उसकी सलाह सही साबित हुई। जिसके परिणाम स्वरूप मैंने नागपुर में रहने का निर्णय लिया।
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