Saturday, 25 April 2026

आवेशावतार परशुराम

आप तो विद्वान है प्रभु। आवेश यो क्षणिक होता है फिर चिरंजीवी भगवान परशुराम आवेशावतार कैसे हो गये ? नृसिंह भगवान को तो आवेशावतार कहा जा सकता है किन्तु पूरी पृथ्वी पर गौ, ब्राह्मण और देव निंदक सहसभुज तथा उसके समर्थकों का समूल नाश करने वाले, भगवान राम तथा कृष्ण को सारंग धनुष तथा वज्रनाभ नामक चक्र सुदर्शन प्रदान कर उन्हें विष्णुजी के पहिचान चिन्ह सौंपने वाले, गुरु द्रोण, भीष्म, कर्ण, बलदाऊ आदि के आचार्य गुरु, भगवान भोलेनाथ के एकमात्र शिष्य, अपने पराक्रम से समुद्र को सर्वदा के लिए पीछे धकेलकर मर्यादित करने वाले, कलियारपट्टू नामक एकल युद्ध विद्या के आविष्कारक, अत्रि की पत्नी अनुसूया एवं अगस्त की पत्नी लोपमुद्रा के साथ एकल विवाह का अभियान चलाने वाले, ब्रह्म पुत्र एवं राम गंगा नदियों को पृथ्वी पर लाने वाले आज भी उडीसा के गजपति जिले के महेन्द्रगिरि पर्वत पर तपस्यारत रत भगवान कलि के आचार्य बनने वाले भगवान को आवेशावतार कैसे कह सकते हैं ?

डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित हिंदू कोड बिल

डॉ. बी.आर. अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित हिंदू कोड बिल भारतीय कानून के इतिहास में महिलाओं की मुक्ति और समानता का एक मील का पत्थर था। इसे 24 फरवरी, 1949 को संविधान सभा के समक्ष पेश किया गया था।
बाबा साहब का मानना था कि किसी भी समाज की प्रगति उस समाज की महिलाओं की प्रगति से मापी जानी चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने इस बिल के माध्यम से सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती दी थी।
हिंदू कोड बिल के मुख्य प्रावधान इस प्रकार थे:
1. संपत्ति का अधिकार (Right to Property)
इस बिल से पहले महिलाओं को संपत्ति में केवल 'सीमित अधिकार' प्राप्त थे। बाबा साहब ने प्रस्ताव दिया कि:
• बेटियों को बेटों के बराबर संपत्ति का अधिकार मिलना चाहिए।
• विधवाओं को अपने पति की संपत्ति पर पूर्ण अधिकार होना चाहिए, जिसे वे अपनी मर्जी से बेच या हस्तांतरित कर सकें।
2. विवाह और तलाक (Marriage and Divorce)
प्राचीन व्यवस्था में विवाह को एक 'संस्कार' माना जाता था जिसे तोड़ा नहीं जा सकता था, भले ही महिला का उत्पीड़न हो रहा हो। बाबा साहब ने इसे 'कानूनी संविदा' (Legal Contract) के रूप में देखा और प्रस्तावित किया:
• एकविवाह (Monogamy): एक समय में केवल एक ही पत्नी रखने का नियम, ताकि पुरुषों द्वारा किए जाने वाले बहुविवाह को रोका जा सके।
• तलाक का अधिकार: महिलाओं को विशेष परिस्थितियों (जैसे क्रूरता या परित्याग) में वैवाहिक बंधन से मुक्त होने का कानूनी अधिकार दिया गया।
3. गोद लेने का अधिकार (Adoption)
पुराने नियमों के अनुसार, केवल पुरुष ही गोद ले सकते थे। बाबा साहब ने व्यवस्था दी कि:
• एक हिंदू महिला को भी बच्चा गोद लेने का स्वतंत्र अधिकार होना चाहिए।
• गोद लेने की प्रक्रिया में केवल जाति या कुल को आधार न बनाकर कानूनी पात्रता को महत्व दिया गया।
4. अंतर्जातीय विवाह (Inter-caste Marriage)
बाबा साहब जाति व्यवस्था को तोड़ने के पक्षधर थे। उन्होंने इस बिल में अंतर्जातीय विवाहों को कानूनी मान्यता प्रदान करने का प्रावधान रखा, ताकि सामाजिक असमानता को कम किया जा सके।
बिल का विरोध और इस्तीफा
इस क्रांतिकारी बिल का तत्कालीन रूढ़िवादी नेताओं और धार्मिक समूहों ने कड़ा विरोध किया। संसद के भीतर और बाहर भारी हंगामे के कारण यह बिल समय पर पास नहीं हो सका।
इस विरोध और सरकार के ढुलमुल रवैये से आहत होकर बाबा साहब ने सितंबर 1951 में कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने त्यागपत्र में स्पष्ट रूप से कहा था कि हिंदू कोड बिल को पारित न कर पाना उनके लिए सबसे बड़ी निराशा है।
बिल का भविष्य
हालांकि मूल बिल एक साथ पास नहीं हुआ, लेकिन बाद में प्रधानमंत्री नेहरू के कार्यकाल में इसे चार अलग-अलग हिस्सों में तोड़कर पारित किया गया:
1. हिंदू विवाह अधिनियम (1955)
2. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956)
3. हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम (1956)
4. हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम (1956)
आज भारतीय महिलाओं को जो भी कानूनी अधिकार प्राप्त हैं, उनकी नींव बाबा साहब के इसी विजन ने रखी थी।

एडवोकेट रितु चौधरी जी ।

Saturday, 11 April 2026

पत्रकारिता का लोकधर्म

तीन तलाक के बराबर भी फारमल्टी की जरुरत नहीं समझते समाचार एजेन्सयों के मालिक। 
राय- 
संविधान की अनकही कहानी
संविधान सभा के पांव लड़खड़ा रहे थे।
मन में कुछ और था बना कुछ और
तीली लगाना चाहते है।
संतुलन ही लोकधर्म है।
अपने समय की सबसे बड़ी समस्या के समाधान में अपना दायित्व निर्वहन ही उसका लोकधर्म। 
पत्रकार की छवि पुलिस जैसी क्यों है?
माधव सप्रे पेंण्ड्रा हिंदी के प्रथम पत्रकार। 
स्वतन्त्रता संग्राम में हिन्दी पत्रकारिता 
अखवार वही निकाल सकता है जो धनी हो।
प्रेस आयोग 1975
2nd press
1983 
2009 m.m.joshi

पेड न्यूज 
कमाई बसूल लेना पत्रकारों ने की
हिन्दी और भाषाई पत्रकारिता ने BP singh 1989 PM बनाया।
संपादक का क्षरण लोभ-लालच संपत्ति विस्तार 
स्वयं संपादक बनने लगे।
आज संपादक नहीं प्रबंधक हैं।
स्रोत पवित्र नहीं तो परम्परा नहीं
राजेन्द्र माथुर की अकाल मृत्यु संपादकीय भष्टाचार 
मीडिया काउंसिल नहीं बन रहा क्योंकि
मीडिया घराने और सरकार में सांठगांठ हो गई है।
मीडिया के लिए नियम और नियमन होना चाहिए। 
पत्रकार संस्थान भ्रष्ट हो गये हैं।
नागरिक के पास फोरम नहीं है।

मीडिया में रोजगार के अवसर बढ़ें।





Monday, 6 April 2026

युधिष्ठिरस्य या कन्या नकुलेन विवाहिता। पूजिता सहदेवेन सा कन्या वरदा भवेत्।।

युधिष्ठिरस्य या कन्या नकुलेन विवाहिता। पूजिता सहदेवेन सा कन्या वरदा भवेत्।। द्ववीअर्थी श्लोक

युधिष्ठिर की जिस पुत्री का विवाह नकुल के साथ हुआ था, और सहदेव के द्वारा जिसकी पूजा की गयी, वह कन्या हमारे लिए वरदायिनी हो।
इस श्लोक का सही अर्थ निम्न है। यहाँ पर्यायवाची और व्याकरण की सुंदरता को बड़ी कुशलता से रखा गया है।
युधिष्ठिर नाम हिमालय का भी है। वे सदा अविचल भाव से खड़े रहते हैं। अतः पर्वतों को संस्कृत में भूधर, अचल, महीधर, युधिष्ठिर आदि के नाम से भी कहा गया है। यहाँ युधिष्ठिर का अर्थ पर्वत (हिमालय) है।
नकुल शब्द पर आईये। यहाँ पर नञ् तत्पुरुष समास का नियम लगा है। जिसका कोई कुल नहीं, वही नकुल है। अर्थात्, शिव जी। उनका कोई जनक नहीं। वे अनादि अजन्मा महादेव हैं, अतः न कुल हैं।
सहदेवेन। इस शब्द का दो अर्थ है। शब्दरूप के अनुसार, सहदेव के द्वारा। और कर्मधारय समास तथा तृतीया कारक के अनुसार अर्थ होगा, देव के साथ। तो अर्थ हुआ देव के साथ । यहाँ देव भी महादेव(शिव) के अर्थ में आया है।

अब सही तरीके से सही अर्थ लगाईये...

युधिष्ठिर (हिमालय) की जिस पुत्री का विवाह नकुल (शिव) के साथ हुआ, तथा (महा)देव के साथ जिसकी पूजा हुई, वह कन्या (पार्वती) हमारे लिए वरदायिनी हो।


यह श्लोक एक बहुत ही सुंदर शब्द-क्रीड़ा (Wordplay) या पहेली का उदाहरण है। पहली बार पढ़ने पर यह अर्थ का अनर्थ जैसा प्रतीत होता है, लेकिन व्याकरण की दृष्टि से इसका अर्थ बहुत ही आध्यात्मिक और सरल है।
​प्रचलित (गलत) व्याख्या
​यदि हम शब्दों का सीधा विच्छेद करें, तो ऐसा लगता है जैसे:
​"युधिष्ठिर की कन्या का विवाह नकुल से हुआ..." — जो कि पौराणिक रूप से पूर्णतः असत्य है।
​वास्तविक और सही अर्थ (संधि-विच्छेद के साथ)
​इस श्लोक का रहस्य 'नकुलेन' और 'सह देवेन' शब्दों के संधि-विच्छेद में छिपा है।
​1. नकुलेन (न + कुलेन):
यहाँ 'नकुल' पाण्डव नकुल नहीं हैं। इसका विच्छेद है: न + कुलेन।
​कुलेन = उच्च कुल या खानदान में।
​न = नहीं।
​अर्थात: वह कन्या जिसका विवाह किसी (साधारण) कुल में नहीं हुआ।
​2. सह देवेन (सहदेवेन):
यहाँ 'सहदेव' पाण्डव सहदेव नहीं हैं। इसका विच्छेद है: सह + देवेन।
​देवेन सह = देवता के साथ (भगवान के साथ)।
​3. युधिष्ठिरस्य कन्या:
महाभारत के पात्र युधिष्ठिर की कोई ऐसी कन्या नहीं थी। यहाँ 'युधिष्ठिर' का अर्थ है— 'युद्ध में स्थिर रहने वाला' या स्वयं धर्मराज। लेकिन लोक परंपरा में यहाँ 'गंगा' की ओर संकेत किया जाता है (जो शिव यानी महादेव के साथ पूजी जाती हैं)।
​श्लोक का भावार्थ
​"वह कन्या जिसका विवाह किसी मानवीय कुल में नहीं हुआ (न-कुलेन), अपितु जिसका मेल स्वयं महादेव/परमात्मा (सह-देवेन) के साथ हुआ है; वह पूजनीय कन्या हम सबको वरदान देने वाली हो।"
​आसान शब्दों में:
यह श्लोक किसी पारिवारिक रिश्ते को नहीं, बल्कि एक दैवीय स्थिति को दर्शाता है। यहाँ मुख्य चातुर्य यह है कि सुनने वाले का ध्यान पाण्डवों (नकुल-सहदेव) की ओर जाए, जबकि वास्तविक अर्थ "बिना कुल के" और "देवता के साथ" है।
​यह संस्कृत साहित्य की 'प्रहेलिका' (पहेली) शैली का एक उत्कृष्ट नमूना है।

Sunday, 5 April 2026

विवाह वचन

हिन्दू विवाहके सात वचन :
भारतीय नारीaहिन्दू धर्ममें विवाहके समय वर-वधूद्वारा सात वचन लिए जाते हैं । इसके पश्चात् ही विवाह संस्कार पूर्ण होता है । विवाहके पश्चात् कन्या वरसे पहला वचन लेती है कि-

प्रथम वचन इस प्रकार है –

तीर्थव्रतोद्यापनयज्ञ दानं मया सह त्वं यदि कान्तकुर्या:।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद वाक्यं प्रथमं कुमारी।।

अर्थ – इस श्लोकके अनुसार कन्या कहती है कि स्वामी तीर्थ, व्रत, उद्यापन, यज्ञ, दान आदि सभी शुभ-कर्म तुम मेरे साथ ही करोगे तभी मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूं अर्थात् तुम्हारी पत्नी बन सकती हूं। वाम अंग पत्नी का स्थान होता है.

द्वितीय वचन इस प्रकार है-

हव्यप्रदानैरमरान् पितृश्चं कव्यं प्रदानैर्यदि पूजयेथा:।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं द्वितीयकम्॥

अर्थ – इस श्लोकके अनुसार कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम हव्य देकर देवताओंको और कव्य देकर पितरोंकी पूजा करोगे तब ही मैं तुम्हारे वाम अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।

तृतीय वचन इस प्रकार है-

कुटुम्बरक्षाभरंणं यदि त्वं कुर्या: पशूनां परिपालनं च।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं तृतीयम्॥

अर्थ – इस श्लोकके अनुसार कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम मेरी तथा परिवारकी रक्षा करो तथा घर के पालतू पशुओंका पालन करो तो मैं तुम्हारे वाम अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं।

चतुर्थ वचन इस प्रकार है –

आयं व्ययं धान्यधनादिकानां पृष्टवा निवेशं प्रगृहं निदध्या:।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं चतुर्थकम्॥

अर्थ – चौथे वचनमें कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम धन-धान्य आदिका आय-व्यय मेरी सहमतिसे करो तो मैं तुम्हारे वाग अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।

पंचम वचन इस प्रकार है –

देवालयारामतडागकूपं वापी विदध्या:यदि पूजयेथा:।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं पंचमम्॥

अर्थ – पांचवें वचनमें कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम यथाशक्ति देवालय, उद्यान, कुआं, तालाब, बावडी बनवाकर पूजा करोगे तो मैं तुम्हारे वाग अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।

षष्ठम(छठा) वचन इस प्रकार है –

देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदा विदध्या:क्रयविक्रये त्वम्।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं षष्ठम्॥

अर्थ – इस श्लोकके अनुसार कन्या वरसे कहती है कि यदि तुम अपने नगरमें या विदेशमें या कहीं भी जाकर व्यापार या सेवा(नौकरी) करोगे और घर-परिवारका पालन-पोषण करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।

सप्तम(सातवां) वचन इस प्रकार है –

न सेवनीया परिकी यजाया त्वया भवेभाविनि कामनीश्च।

वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं सप्तम्॥

अर्थ – इस श्लोकके अनुसार सातवां और अंतिम वचन यह है कि कन्या वरसे कहती है यदि तुम जीवनमें कभी पराई स्त्रीको स्पर्श नहीं करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंगमें आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं ।

शास्त्रोंके अनुसार पत्नीका स्थान पतिके वाम अंगकी ओर अर्थात् बाएं हाथकी ओर रहता है । विवाहसे पूर्व कन्याको पतिके सीधे हाथ अर्थात् दाएं हाथकी ओर बिठाया जाता है और विवाहके उपरांत जब कन्या वरकी पत्नी बन जाती है तब उसे बाएं हाथकी ओर बिठाया जाता है ।

विवाह के सात वचन (संस्कृत और अर्थ):
प्रथम वचन (भोजन/तीर्थ): तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप यदि कभी तीर्थयात्रा, व्रत या यज्ञ करें तो मुझे साथ लेकर जाएं, तब मैं आपके वाम अंग में आऊंगी।
द्वितीय वचन (शक्ति): पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयं।
अर्थ: कन्या कहती है कि जैसे आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, वैसे ही मेरे माता-पिता का भी सम्मान करेंगे, तब मैं आपके वाम अंग में आऊंगी।
तृतीय वचन (समृद्धि): जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात, वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयम्।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवा, प्रौढ़, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करेंगे, तब मैं आपके वाम अंग में आऊंगी।
चतुर्थ वचन (पारिवारिक उत्तरदायित्व): कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ।
अर्थ: कन्या कहती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिंता से मुक्त थे, लेकिन अब मेरे परिवार की जिम्मेदारी भी आप उठाएंगे।
पंचम वचन (कार्य/व्यापार): स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं पञ्चम।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप अपने घर के कार्यों या व्यापार में जो भी व्यय या कर्म करें, उसमें मेरी सलाह भी लेंगे।
षष्ठ वचन (साथ/सामुदायिक मेलजोल): देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदा विदध्या:क्रयविक्रये त्वम्, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं षष्ठ।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप मुझे सखियों या अन्य स्त्रियों के बीच नहीं ले जाएंगे और न ही पराई स्त्री के प्रति आकर्षित होंगे।
सप्तम वचन (प्रेम/पति-पत्नी निष्ठा): परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तमत्र कन्या।
अर्थ: कन्या कहती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और हमारे आपसी प्रेम के बीच किसी तीसरे को नहीं आने देंगे।

इन वचनों के बाद ही विवाह संपन्न माना जाता है।