मेवाड़ के प्रसिद्ध शासक
राणा सांगा(संग्राम सिंह) 1482ई. 1528ई.
बेटे-7सिंह- भोजराज, कर्ण, रत्न, कर्ण, विक्रमादित्य, उदय, पर्वत, कृष्ण
सबसे बड़े पुत्र भोजराज सिंह सिसोदिया(1495-1526) की पत्नी मीराबाई थीं।
भोजराज और मीराबाई का विवाह मेवाड़(चित्तौड़गढ़) में हुआ था, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया था। मीराबाई के सांसारिक पति भोजराज, वास्तविक पति के रूप में भगवान कृष्ण को ही मानती थीं।
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई,
तात मात भ्रात बंधु, आपणो न कोई।
राणाजी थें ज़हर दियौ म्हे जाणी।
जैसे कंचन दहत अगिन में निकसत बारह बाणी।
लोक लाज कुल काण जगत की दई बहाय जसपाणी॥
अपने घर का परदा कर ले मैं अबला बौराणी।
तरकस तीर लग्यो मेरे हियरे गरक गयो सनकाणी॥
सब संतन पर तन मन वारों चरण कँवल लपटाणी।
मीरा को प्रभु राखि लई है दासी अपणी जाणी॥
मीराबाई के देवर विक्रमादित्य (राणा) ने जहर का प्याला भेजा था, जो उन्हें मारना चाहते थे क्योंकि वे मीराबाई की कृष्ण भक्ति और उनके ससुराल वालों के प्रति अनादर को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे; हालाँकि, मीराबाई ने उसे हंसकर पी लिया और भगवान श्री कृष्ण की कृपा से उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ, और वे उस विष को प्रसाद मानकर पी गईं।
"गुरु मिल्या रैदास जी
दीनी ज्ञान की गुटकी,
चोट लगी निजनाम हरी की
महारे हिवरे खटकी"
मीरा के पति की मृत्यु 'रण मुक्ति'
मीरा की मुक्ति 'तरण मुक्ति'
मीरा के गुरु की मुक्ति 'आचरण मुक्ति'
"ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट-बड़ो सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।"
बेगम पुरा शहर कौ नांउ, दुखू अंदोह नहीं तिहिं ठांउ।
नां तसवीस खिराजु न मालु, खउफु न खता न तरसु जवालु॥
न हि वेरेन वेरानि..
अब मोहि खूद वतन गह पाई, ऊंहा खैरि सदा मेरे भाई।
काइमु दाइमु सदा पातसाही, दोम न सेम एक सो आही॥
आबादानु सदा मसहूर, ऊँहा गनी बसहि मामूर।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै, महरम महल न कौ अटकावै।
कहि रैदास खलास चमारा, जो हम सहरी सु मीत हमारा॥