Saturday, 5 January 2019

महागठबंधन

ऐसा हो महागठबंधन
लोकहिताय हो जनबंधन

लोकमत का नित सद् मंथन
फण पूंछ का न हो कोई बंधन

मथना है समुद्र
निकलेंगे रत्न कई
और विश भी
बटेंगे सभी बराबरी से
सबमें सबका हक़ होगा
अमृत सबको
सबको बिष भी लेना होगा
न होगी कोई कुटिलता अब
वितरण भी समता से होगा
न रुंधेगा गला किसी का
न ही अब गलों का कर्तन होगा
न पियेगा सुरा कोई
न अब स्त्री नर्तन होगा
आओ करें महागठबंधन हम
लोकहित लोकतंत्र संबोधन होगा ।

जूट का बोरा

मैं किसान हूँ
उगाता हूँ रेशम
तुम्हारे लिए
तुम्हारे चमकीले वस्त्रों के लिए
तुम्हारी चमड़ी जो नाजुक है
खरोच न आये
वदन पर तुम्हारे
लालिमा धरने का हक़ जो है उसे
महंगे लेपों से सींचते हो उसे
खयाल रखो
अपनी खाल का
बाल का
और रेशमी डाॅगी का भी
मेरी फ़िक्र तुम क्यों करो
मुझे भी तो नहीं है
फ़िक्र अपनी
अपनी औलाद की
पत्नी के अरमानों की
बेटे की ख्वाहिश की
बेटी के मान की
पिता की घुटान की
मां के अरमान की
मुझे कहाँ आता है
सूट-बूट में अकड़ना
सूट मेरा,
मेरे बैलों का
मेरी गाय का
मेरे शेरू का
बिछौना यही
ओड़न यही
जूट का बोरा ही है ।
यह मेरा अपना है
छलकती है
इसी में शान मेरी
और मेरे खेत की।

Wednesday, 2 January 2019

सावित्री बाई फुले

'भगवान के लिए मुझे छोड़ दो' गिड़गिड़ाते हुए कहती है - काशी
बूढ़ी महिला- अरी कुल्टा! भगवान की दुहाई दे रही है और भगवान के ही धर्म को भ्रष्ट करने पर तुली है.----
कुछ चलावेदार लोग- पकड़ लो इसके हाथ-पैर और कर दो इसका मुंडन।
कि तभी आवाज़ आती है 'ठहरो , न चाहते हुए भी क्योँ करना चाहते हो उसका मुण्डन' 
एक वृद्ध ब्राह्मण- रे विधर्मिन! हमारे धार्मिक कर्मकांड में टांग अड़ाने की जरूरत नहीं है चल भाग यहाँ से नहीं तो-----
सावित्रीबाई- अरे पाखण्डियों! क्या यही है तुम्हारा 'यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता।'
यह भी तो ब्राह्मणी ही है।
बन्द करो नारी जाति का अपमान । जीने दो उसे भी मान के साथ।
और नाई भाईयों 'तुम कब खोलोगे अपनी अकल का ताला' फटकारती हुई।
कुछ खुसुरफुसुर के बाद
नाई मुण्डन करने से मना करते हुए सावित्रीबाई फुले तुमने तो हमारी आखें खोल दीं, अब हम लोग विधवाओं के मुण्डन की दुष्ट परम्परा में सहायक नहीं होंगे ।
कुछ दिनों के बाद
मैली- कुचैली सफेद साड़ी में मुण्डित सिर, सूखी देह वाली एक स्त्री आत्महत्या करने का प्रयास करती हुई ।
तभी आवाज़ आती है अरी! क्या करने जा रही हो! रुको ।
मुझे मर जाने दो, कैसे जीऊं इस कलंक को ढोते हुए, आर्त स्वर में कहती है काशी ।
कौन सा कलंक? पूछती है सावित्री ।
यही जो पेट में पनप रहा है । पति की मौत के बाद लाद दिया है डराकर उनके अपनों ने और कलंकिनी कह कर निकाल दिया है मुझे घर से भी - कहती है काशी ।
लड़ती क्यों नहीं तू इन अत्याचारियों से और इनके अत्याचारी ढकोसलों से - सावित्रीबाई ।
मुझ अबला के वश की बात कहाँ? - काशी ।
सावित्री बाई- चलो मेरे साथ ।
ले जाती है उसे अपने विधवा आश्रम ।
कुछ दिन बाद
सावित्रीबाई- काशी! बेटा हुआ है ।
रोते हुए कशी- कैसे पालूंगी इसे इस समाज में और कैसे जियेगा यह भी तानों को सुनते हुए ।
सावित्रीबाई- कैसे पालोगी! अरे! यह तेरा ही नहीं हमारा भी बेटा है यह।
कशी जोर-जोर से रोने लगती है ।
सावित्री बाई पति ज्योति राव के पास जाकर
अजी सुनते हो!
ज्योति राव-  हुं ।
सावित्रीबाई- काशी का बेटा ही आज से हमारा बेटा होगा।
हम अब और संतान पैदा नहीं करेंगे ।
ज्योति राव- ठीक है । आज से हमारे बेटे का नाम होगा- यशवंतराव ।
समय बीतता है । यशवंतराव पढ़ लिखकर डाॅक्टर बन जाता है ।
और एक दिन
सावित्रीबाई ज्योति राव के स्वर में स्वर मिलाते हुए- बेटा यह घर-द्वार तुम्ही संभालो। हमें समाज के लिए ही जीने दो।
यशवंतराव- ठीक है मां-बापू,  आप की खुशी में ही मेरी खुशी है ।
सावित्रीबाई एक दिन प्लैग के रोगियों की सेवा करते हुए अपना जीवन पूर्ण कर लेती हैं

डाॅ रामहेत गौतम सहायक प्राध्यापक, संस्कृत विभाग , डाॅ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर मप्र ।

Monday, 31 December 2018

भोर की नव किरण

नव भोर की नव किरण
आलोकित रहे
आपके जीवन नभ में
गुंजन भौरों सी,
फुदकन चिड़ियों सी
गुंजित हो कानों में
नव वर्ष की अठखेलियां
व्यापें आपके आँगन में
मुदित रहें मित्र आपसे
धर्म कर्म के प्रांगण में
शहद घोले जीवनसाथी
हर पल तव जीवन में
वरद हस्त मां बाप के
थामें तुम्हें ज्यों पतंग गगन में
नव वर्ष नव रस भरे तव जीवन में ।

स्त्री

चंचल चेतन पुरुष, स्थिरा तू स्त्री,
गुणहीन पुरुष, गुणसाम्या तू स्त्री,
बहुरूप पुरुष, अद्वितीया तू स्त्री,
दर्शक बनता है पुरुष, नटी तू स्त्री,
विकारी है पुरुष, निर्विकार तू स्त्री,
विन्धता है पुरुष, निर्विन्ध्या तू स्त्री,
दुःखित होता पुरुष, निर्वाण तू स्त्री।

बीतता हुआ वर्ष

जाता हुआ दिसम्बर समेट रहा है अम्बर,
संबरकर उतरेगी आसमां से नव लालिमा
बदल जायेगा दिन, महीना और साल भी,
कामना है कि ओढ़ लो तुम सुख लालिमा।

नव वर्ष

ऐ आते नये साल! बता
क्या दे पायेगा बो सब
जो नहीं दे सके
बीते वर्ष कई ।
भूखे को रोटी
नंगे को वस्त्र
स्त्री को इज्ज़त
शोषित को मान
कल्लू को शिक्षा
मुन्नी को जीवन
बंधुआ को मुक्ति
किसान को कीमत
मजदूर को काम
बेरोजगार को रोजगार
रिस्तों की उमंग और बहुत कुछ ।
ऐ नये साल बता क्या हर पायेगा तू
मनचलों की कुदृष्टि,
धार्मिक द्वेष
जाति के बंधन
नेताओं का झूठ
आफिस से रिश्वत खोरी
लिंग भेद
शहरों से धुआं
गांवों से गरीबी
सड़कों से घटनाएं
गलियों की लूट
दुकानों के धोखे
रिस्तों से शक और बहुत कुछ ।