Friday, 17 July 2026

21st Faculty Induction Programme (online during 8 July to 4 August 2026)
Google Meet joining link: https://meet.google.com/pky-mvmc-rxq
Session Arrangement for
20 July 2026

Session I
Inaugural session 
10.00 to 11.30
Speaker 
Dr Neelam Panchal ji
(Ahmadabad)
Session coordinator 
Dr. Meena Singh
Introduction by 
Dr. Megha Paraste
Vote of thanks by
Dr. Mohammed Sohel Kantilal Azizi

Session II
(11.45 to 1.15pm)

Speaker 
Dr Naresh Sukhani ji
(Mumbai)
Session coordinator 
Dr. Monika Patel
Introduction to the speaker 
Dr. Mukti Jain
Vote of thanks by
Dr. Neha Solanki

Session III
(2.00 to 3.30 pm)

Speaker 
Prof Mohd Atique ji
(Amravati)
Session coordinator 
Dr. Pallavi Saxena
Introduction to the speaker 
Pankaj Kumar Das
Vote of thanks 
Dr. Patel Aishwarya Suryakant

Session IV
3.45 to 5.15 pm

Speaker 
Dr Pooja Kapoor ji

Session coordinator 
Dr. Prajapati Damini
Introduction by..
Dr. Prakash Mawi
Vote of thanks by
Dr. Pramod Kumar

Regards 
Dr. R. T. Bedre,
Director 

Dr. RAMHET GAUTAM 
Course coordinator



21st Faculty Induction Programme (online during 8 July to 4 August 2026)
Google Meet joining link: https://meet.google.com/pky-mvmc-rxq

Session Arrangement for
18 July 2026

Session I
Inaugural session 
10.00 to 11.30

Speaker 
Dr Rupendra Chourasia ji
(Sagar )

Session coordinator 
Dr. Jetendra Bhatele
Introduction by 
Dr. Jyothi Gedela
Vote of thanks by
Dr. Jyoti Gaikwad


Session II
(11.45 to 1.15pm)

Speaker 
Dr. CG Dethe ji
(Nagpur )

Session coordinator 
Dr. Kailas Bhalerao Patil
Introduction to the speaker 
Dr. Khandu Murlikar
Vote of thanks by
Dr. Madhuri Jadhav

Session III
(2.00 to 3.30 pm)

Speaker 
Prof Harel Thomas ji
(Prayagaraj)
Session coordinator 
Dr. Madhuri Satish Patil
Introduction to the speaker Madhuri Shivram Mogal
Vote of thanks 
Dr. Mahendra Kumar Talware

Session IV
3.45 to 5.15 pm

Speaker 
Dr S B Kishor ji (Chandrapur)

Session coordinator Dr. Manzoor Khan
Introduction by Dr. Meena Kumari
Vote of thanks by Meena Prabhakar Giradkar

Regards 
Dr. R. T. Bedre,
Director 

Dr. RAMHET GAUTAM 
Course coordinator

Wednesday, 8 July 2026

"मरणसति"

बौद्ध धर्म में ध्यान का मतलब केवल आँखें बंद करके बैठ जाना नहीं है। ध्यान का असली उद्देश्य जीवन के सच्चे सत्य को समझना है। ऐसे ही महान ध्यानों में से एक है "मरणसति"।

"मरणसति" दो पाली शब्दों से मिलकर बना है। "मरण" का अर्थ है मृत्यु और "सति" का अर्थ है जागरूकता या निरंतर स्मरण। अर्थात, यह याद रखते हुए जीवन जीना कि मृत्यु कभी भी आ सकती है।

इस ध्यान का उद्देश्य लोगों को डराना नहीं है। इसका उद्देश्य यह समझाना है कि मृत्यु निश्चित है, इसलिए हर क्षण का सदुपयोग करें, अच्छे कार्यों को टालें नहीं, और लोभ, द्वेष तथा अहंकार को कम करें।

बुद्ध ने बताया कि मृत्यु केवल बूढ़ों या बीमार लोगों के लिए नहीं है। यह हर जीव के लिए कभी भी आ सकती है। जो व्यक्ति इस सत्य को हमेशा याद रखता है, वह अपना जीवन लापरवाही से नहीं बिताता। यही मरणसति का वास्तविक उद्देश्य है।

अब आइए समझते हैं कि बुद्ध ने मरणसति के बारे में क्या-क्या सिखाया।

1. मृत्यु कभी भी आ सकती है

अंगुत्तर निकाय के मरणसति सुत्त (AN 6.19) में बुद्ध भिक्षुओं से पूछते हैं, "तुम मृत्यु को कितनी बार याद करते हो?" कोई कहता है, "यदि मैं एक दिन और जीवित रहूँ।" कोई कहता है, "यदि एक भोजन करने तक जीवित रहूँ।" लेकिन बुद्ध कहते हैं कि जो व्यक्ति यह सोचकर जीता है कि अगली साँस लेने से पहले भी मृत्यु आ सकती है, वही सही अर्थ में मरणसति का अभ्यास करता है।

उदाहरण: सड़क पर चलते समय हमें नहीं पता कि दुर्घटना कब हो जाए। इसलिए हम हेलमेट पहनते हैं। उसी तरह हमें नहीं पता कि मृत्यु कब आएगी, इसलिए हर दिन सावधानी और सदाचार के साथ जीना चाहिए।

2. अच्छे कामों को कल पर नहीं टालना चाहिए

जब यह पता नहीं कि मृत्यु कब आएगी, तो अच्छे कामों को "कल करूँगा" कहकर टालना ठीक नहीं। बुद्ध ने सिखाया कि धर्म का पालन करने का सबसे सही समय आज और अभी है।

उदाहरण: जिस विद्यार्थी की परीक्षा कल है, वह आज पढ़ाई को नहीं टालता। उसी प्रकार हमें भी अच्छे कार्यों को भविष्य पर नहीं छोड़ना चाहिए।

3. अहंकार और लोभ कम हो जाते हैं

जो व्यक्ति मृत्यु को याद रखता है, वह "यह सब मेरा है", "मैं सबसे बड़ा हूँ", "मुझे और धन चाहिए" जैसी सोच से दूर हो जाता है। क्योंकि उसे पता होता है कि मृत्यु के समय कुछ भी साथ नहीं जाएगा।

उदाहरण: यात्रा पूरी होने के बाद कोई भी होटल के कमरे की चीज़ों को अपना नहीं मानता। उसी तरह धन, पद और संपत्ति भी हमेशा हमारे साथ नहीं रहने वाले हैं।

4. दूसरों के प्रति करुणा बढ़ती है

जब हमें यह एहसास होता है कि हर व्यक्ति एक दिन इस संसार से चला जाएगा, तो हमारे मन में द्वेष कम होने लगता है और करुणा बढ़ने लगती है।

उदाहरण: यदि हमें पता हो कि आज किसी प्रिय व्यक्ति से हमारी आख़िरी मुलाकात है, तो हम उससे गुस्से में नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान से बात करेंगे।

5. शरीर स्थायी नहीं है

मज्झिम निकाय के सतिपट्ठान सुत्त (MN 10) और दीर्घ निकाय के महासतिपट्ठान सुत्त (DN 22) में बुद्ध ने श्मशान ध्यान की शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि भिक्षु शव, हड्डियों और खोपड़ी को देखकर यह चिंतन करे कि "एक दिन मेरा शरीर भी इसी अवस्था में पहुँच जाएगा।"

उदाहरण: आज पेड़ का पत्ता हरा है, लेकिन कुछ दिनों बाद सूखकर गिर जाएगा। उसी तरह हमारा शरीर भी हमेशा रहने वाला नहीं है।

6. खोपड़ी को प्रतीक क्यों बनाया गया?

बौद्ध धर्म में खोपड़ी डर का प्रतीक नहीं है। यह अनित्यता का प्रतीक है। कभी इस खोपड़ी के भीतर भी इच्छाएँ, सपने और विचार रखने वाला एक इंसान जीवित था। आज केवल हड्डी बची है। यह हमें जीवन का वास्तविक सत्य समझाती है।

उदाहरण: कभी एक भव्य महल समय के साथ खंडहर बन जाता है। उसी तरह कितना भी सुंदर और शक्तिशाली शरीर हो, एक दिन प्रकृति में विलीन हो जाएगा।

7. मरणसति का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

मरणसति का अभ्यास करने वाला व्यक्ति हर दिन को अपने जीवन का सबसे मूल्यवान दिन मानता है। वह समय बर्बाद नहीं करता, अच्छे कार्य करता है, दूसरों की सहायता करता है और जीवन के वास्तविक महत्व को समझता है।

उदाहरण: यदि आपको पता हो कि आपके बैंक खाते में केवल एक दिन के लिए ही पैसे रहेंगे, तो आप उन्हें बहुत सोच-समझकर खर्च करेंगे। उसी तरह जीवन भी सीमित है। इसलिए हर दिन को सार्थक बनाना ही बुद्ध का संदेश है।

आधार ग्रंथ

अंगुत्तर निकाय – मरणसति सुत्त (AN 6.19)

मज्झिम निकाय – सतिपट्ठान सुत्त (MN 10)

दीर्घ निकाय – महासतिपट्ठान सुत्त (DN 22)

विसुद्धिमग्ग – आचार्य बुद्धघोष द्वारा मरणसति और अशुभ भावना पर विस्तृत व्याख्या।

✍️ Bandapalli Shiva Reddy