Saturday, 12 January 2019

अहिंसा

*💐हिंसाभावेन वरमहिंसाभावम्
चंदनेन वरं वंदनं शीतलतरञ्च
योगीभावेन उपयोगीभावं महत्तरम्।
प्रभावेन वरं स्वभावं शीतलसरलञ्च।
मुदितमुखन्ते वर्धते तवाभाम्।
मुदित-भावेन कृत-कार्यं वर्धते ते यशम्।
एवमेव मोदेत भो अहिरवारकुलज!
मित्रन्ते गौतमरामहेत-सागरम्।

    💐 *शुभन्ते प्रभातम्* 💐

संघर्षं जयते

संघर्षमार्गमारोहति यो,
संसारम्परिवर्तते एव सो।
रंजनरणे राकां जयते यो
सूर्यो भूत्वा प्रभवति सो।

सुप्रभातम् आचार्य!
आकांक्षते आशीषं ते

गौतम-रामहेत- सागरम्

Sunday, 6 January 2019

खिचड़ी

दिल्ली में भाजपा की खिचड़ी
से एक संस्मरण हो आया जो इस प्रकार है-
सत्यनारायण की कथा
एक वार एक मित्र के घर सत्यनारायण की कथा कथा करायी जा रही थी, मित्र ने मुझे भी बुलाया । मित्र का आमंत्रण मना न कर सका , सुबह ही पहुंच गया ।
मित्र के पिता नहा धोकर तैयार होकर बोलते हैं- ए बहू! सीदौ-सामान लगा दऔ कै नईं अवेर हो रई।
बहू- बस दादा टठा लग गऔ लिया रई।
मैंने मित्र से पूछा- सीदौ-सामान क्या है?
मित्र- सत्यनारायण की कथा के लिए भोग- प्रसाद के लिए बाजार से लाकर सूखा सामान,  जो पंडित जी को देने जाना है ।
मैं- तुम अपने घर पर तैयार करके ले जाओ वह बेचारे कहाँ  बनाते फिरैंगे, तुम कथा करा रहे हो, तुम बनाओ अपने घर।
बनाना नहीं आता क्या?
मित्र- ऐसी बात नहीं है । पंडित जी हमारे हाथ का बना नहीं खाते । और न भगवान को भोग लगाते ।
मैं- जो भगवान तुम्हारे हाथ का बना या छुआ खाने से अपवित्र हो जाता है वह तुम्हारा कल्याण कैसे कर सकता है । तुम उसे दूषित करने का प्रभाव रखते हो क्या उसमें इतना सामर्थ्य नहीं कि तुम्हारे हाथ का भोजन तो क्या तुम्हें ही पवित्र बना ले।
मित्र- छोड़ो ये धर्म की बातें पंडित जी ही जानें एक दिन का ही तो काम है ।
मैं- तुम एक दिन का काम कह कर आंख बन्द करके जी रहे हो । रिस्ता बराबरी वालों होता है ।
जहाँ मान एक तरफा हो वह असन्तुलित समाज है ।
तुम इस असंतुलन को ढो रहे हो ।
मित्र- तो क्या करें । धर्म कर्म तो करना ही पड़ता है ।
'क्षमा करना' कहा
और मैं निकल आया ।
यह खिचड़ी भी सत्यनारायण की कथा के सीदौ-सामान की तरह है जो दलितों को मान नहीं दिला सकती ।

सुहाग की कोख

हे बहू! सास का सम्मान कर
तू युवती है
पर वो वृद्धा है
तेरे पास घर की चाबी है
पर उसके पास वो खजाना है
जिसे लुटाती रहती वह
हर पल तेरे पति पर
अपने पोतों पर भी
अक्षय है वह खजाना
तू भी पा सकती है वह
पर अदा करनी होगी
कुछ श्रद्धा,
कुछ भावनाएँ
कुछ मान
कुछ अभिमान
कुछ प्यारे बोल
समझनी होगा उसको
उसकी भावनाओं को
सहना होगा उसकी
साठोत्तरी हठों को
जो सही थी उसने भी
कभी तेरे सुहाग कीं
आज घर तेरा है
था जो कभी उसी का
पर वह कोख
अब भी उसी के पास है
पला था जहाँ कभी सुहाग तेरा ।
सींचा था जिसे कभी उसने
कुक्षि में रक्त से
गोदी में दुग्ध से
फिर पसीने से
और आशीषों से
मन्नतों से
टोनों टोटकों से
छाती पर काले टीके से
माथे पर तिलक और काले डठूले से
ले लेती थी सारी बलायें अपने सर
डाल दिए तेरे आंचल में उसने सारे सुख
अब बारी तेरी है
संभाल उन्हें
और सींचती रह प्रेम से
अपने सुहाग के साधन को
पाती रह सुख सुहाग से।
सुहाग के साधन से।

Saturday, 5 January 2019

महागठबंधन

ऐसा हो महागठबंधन
लोकहिताय हो जनबंधन

लोकमत का नित सद् मंथन
फण पूंछ का न हो कोई बंधन

मथना है समुद्र
निकलेंगे रत्न कई
और विश भी
बटेंगे सभी बराबरी से
सबमें सबका हक़ होगा
अमृत सबको
सबको बिष भी लेना होगा
न होगी कोई कुटिलता अब
वितरण भी समता से होगा
न रुंधेगा गला किसी का
न ही अब गलों का कर्तन होगा
न पियेगा सुरा कोई
न अब स्त्री नर्तन होगा
आओ करें महागठबंधन हम
लोकहित लोकतंत्र संबोधन होगा ।

जूट का बोरा

मैं किसान हूँ
उगाता हूँ रेशम
तुम्हारे लिए
तुम्हारे चमकीले वस्त्रों के लिए
तुम्हारी चमड़ी जो नाजुक है
खरोच न आये
वदन पर तुम्हारे
लालिमा धरने का हक़ जो है उसे
महंगे लेपों से सींचते हो उसे
खयाल रखो
अपनी खाल का
बाल का
और रेशमी डाॅगी का भी
मेरी फ़िक्र तुम क्यों करो
मुझे भी तो नहीं है
फ़िक्र अपनी
अपनी औलाद की
पत्नी के अरमानों की
बेटे की ख्वाहिश की
बेटी के मान की
पिता की घुटान की
मां के अरमान की
मुझे कहाँ आता है
सूट-बूट में अकड़ना
सूट मेरा,
मेरे बैलों का
मेरी गाय का
मेरे शेरू का
बिछौना यही
ओड़न यही
जूट का बोरा ही है ।
यह मेरा अपना है
छलकती है
इसी में शान मेरी
और मेरे खेत की।

Wednesday, 2 January 2019

सावित्री बाई फुले

'भगवान के लिए मुझे छोड़ दो' गिड़गिड़ाते हुए कहती है - काशी
बूढ़ी महिला- अरी कुल्टा! भगवान की दुहाई दे रही है और भगवान के ही धर्म को भ्रष्ट करने पर तुली है.----
कुछ चलावेदार लोग- पकड़ लो इसके हाथ-पैर और कर दो इसका मुंडन।
कि तभी आवाज़ आती है 'ठहरो , न चाहते हुए भी क्योँ करना चाहते हो उसका मुण्डन' 
एक वृद्ध ब्राह्मण- रे विधर्मिन! हमारे धार्मिक कर्मकांड में टांग अड़ाने की जरूरत नहीं है चल भाग यहाँ से नहीं तो-----
सावित्रीबाई- अरे पाखण्डियों! क्या यही है तुम्हारा 'यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता।'
यह भी तो ब्राह्मणी ही है।
बन्द करो नारी जाति का अपमान । जीने दो उसे भी मान के साथ।
और नाई भाईयों 'तुम कब खोलोगे अपनी अकल का ताला' फटकारती हुई।
कुछ खुसुरफुसुर के बाद
नाई मुण्डन करने से मना करते हुए सावित्रीबाई फुले तुमने तो हमारी आखें खोल दीं, अब हम लोग विधवाओं के मुण्डन की दुष्ट परम्परा में सहायक नहीं होंगे ।
कुछ दिनों के बाद
मैली- कुचैली सफेद साड़ी में मुण्डित सिर, सूखी देह वाली एक स्त्री आत्महत्या करने का प्रयास करती हुई ।
तभी आवाज़ आती है अरी! क्या करने जा रही हो! रुको ।
मुझे मर जाने दो, कैसे जीऊं इस कलंक को ढोते हुए, आर्त स्वर में कहती है काशी ।
कौन सा कलंक? पूछती है सावित्री ।
यही जो पेट में पनप रहा है । पति की मौत के बाद लाद दिया है डराकर उनके अपनों ने और कलंकिनी कह कर निकाल दिया है मुझे घर से भी - कहती है काशी ।
लड़ती क्यों नहीं तू इन अत्याचारियों से और इनके अत्याचारी ढकोसलों से - सावित्रीबाई ।
मुझ अबला के वश की बात कहाँ? - काशी ।
सावित्री बाई- चलो मेरे साथ ।
ले जाती है उसे अपने विधवा आश्रम ।
कुछ दिन बाद
सावित्रीबाई- काशी! बेटा हुआ है ।
रोते हुए कशी- कैसे पालूंगी इसे इस समाज में और कैसे जियेगा यह भी तानों को सुनते हुए ।
सावित्रीबाई- कैसे पालोगी! अरे! यह तेरा ही नहीं हमारा भी बेटा है यह।
कशी जोर-जोर से रोने लगती है ।
सावित्री बाई पति ज्योति राव के पास जाकर
अजी सुनते हो!
ज्योति राव-  हुं ।
सावित्रीबाई- काशी का बेटा ही आज से हमारा बेटा होगा।
हम अब और संतान पैदा नहीं करेंगे ।
ज्योति राव- ठीक है । आज से हमारे बेटे का नाम होगा- यशवंतराव ।
समय बीतता है । यशवंतराव पढ़ लिखकर डाॅक्टर बन जाता है ।
और एक दिन
सावित्रीबाई ज्योति राव के स्वर में स्वर मिलाते हुए- बेटा यह घर-द्वार तुम्ही संभालो। हमें समाज के लिए ही जीने दो।
यशवंतराव- ठीक है मां-बापू,  आप की खुशी में ही मेरी खुशी है ।
सावित्रीबाई एक दिन प्लैग के रोगियों की सेवा करते हुए अपना जीवन पूर्ण कर लेती हैं

डाॅ रामहेत गौतम सहायक प्राध्यापक, संस्कृत विभाग , डाॅ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर मप्र ।