Saturday, 13 July 2019

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बेड़ियाँ तोडती स्त्री : लता सिंह

लेखक अरविंद जैन बता रहे हैं लता सिंह की कहानी। लता सिंह ने अंतर जातीय विवाह किया। उनके नाराज भाईयों ने उनके पति व उनके परिजनों पर न सिर्फ बेइंतहां जुल्म ढाये बल्कि उन्हें मुकदमों के पेंच में फंसा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने लता सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया। बावजूद इसके भारतीय कानून में अब भी कई खामियां मौजूद हैं

BY ARVIND JAIN अरविंद जैन ON JULY 13, 2019 NO COMMENTSREAD THIS ARTICLE IN ENGLISH

न्याय क्षेत्रे-अन्याय क्षेत्रे


 (राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में 28 ऑनर किलिंग के मामले दर्ज किए गए, 2015 में 251 और वर्ष 2016 में 77। मतलब यह कि 2014 से 2016 के बीच तीन सालों में ही ‘ऑनर किलिंग’ के 356 मामले दर्ज किए गए। अधिकांश मामले मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र के हैं।)

अंतर्जातीय विवाह और ‘ऑनर किलिंग’

लता सिंह से लेकर बबली और अन्य जाति-धर्म की बेड़ियाँ तोड़ने वाले रोशन दिमाग युवा समाज की नायिका है, मगर परम्परावादी परिवारों में ‘खलनायिका’। लता सिंह लड़-लड़ कर जिंदा है और बबली की हत्या हो चुकी है। किसी भी हत्यारे को अभी तक फाँसी नहीं हुई…जिन्हें हुई वो उम्र कैद बदल (दी) गई।

उन्नीस साल पहले एक युवा लड़की थी लता सिंह। उम्र 27 साल, युवा महिला जो स्नातक की पढाई कर चुकी थी और प्रासंगिक समय पर लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी में परास्नातक पाठ्यक्रम कर रही थी। माता-पिता की अचानक मृत्यु के बाद वह अपने भाई अजय प्रताप सिंह के साथ एलडीए कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ में रहने लगी, जहाँ उसने 1997 में इंटरमीडिएट किया और 2000 में स्नातक की पढ़ाई की। उसी साल 2 नवम्बर को उसने अपनी मर्जी से अपने भाई का घर छोड़ दिया और दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में ब्रम्हा नंद गुप्ता से शादी कर ली। पति का दिल्ली और अन्य जगहों पर कारोबार था (और विवाह के बाद उनका एक बच्चा भी।) दो दिन बाद ही लता सिंह के भाई ने सरोजिनी नगर पुलिस स्टेशन, लखनऊ में एक गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई और इसके परिणामस्वरूप पुलिस ने लता सिंह के पति की दो बहनों और उसके पति के चचेरे भाई के साथ दो बहनों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार किए गए लोगों में ममता गुप्ता, संगीता गुप्ता (ब्रह्म नंद गुप्ता की बहनें), साथ ही राकेश गुप्ता (ममता गुप्ता के पति) और लता सिंह के पति कल्लू गुप्ता चचेरे भाई थे। ममता अपने एक महीने के बच्चे के साथ जेल में थी।


सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली


लता सिंह के भाई अजय प्रताप सिंह, शशि प्रताप सिंह और आनंद प्रताप सिंह उग्र थे, क्योंकि उसने अंतर-जातीय विवाह किया था, और इसलिए वे उसके पति के पैतृक निवास गए और उसके पति की माँ और चाचा की जमकर पिटाई की। घर से सामान, फर्नीचर, बर्तन आदि फेंक दिया और अपने ताले से बंद कर दिया। उसके पति के एक भाई को कथित रूप से भोजन और पानी के बिना चार-पांच दिनों के लिए एक कमरे में बंद कर दिया गया था। उसके पति के कृषि क्षेत्र की फसल की फसल काट ली और उसे बेच दिया, और उन्होंने खेत पर जबरन कब्जा भी कर लिया। उन्होंने पुलिस थाने सरोजनी नगर, लखनऊ में अपने पति और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ अपहरण का आरोप लगाते हुए एक झूठी पुलिस रिपोर्ट दर्ज की, जिसके कारण उसके पति और एक बहन के पति को गिरफ्तार कर लिया गया और हिरासत में लिया गया जो लखनऊ जेल में हैं। उसके भाइयों ने अवैध रूप से उसके पति की दुकान को भी अपने कब्जे में ले लिया।
उसके पति और उसके रिश्तेदारों को जान से मारने की धमकी दे रहे थे और अपहरण कर उसे भी मार सकते थे। गुप्ता परिवार के सदस्य भाइयों द्वारा हिंसा के डर से लखनऊ जाने से डरते थे, क्योंकि वो आपराधिक प्रवृत्ति के थे। उसके पति के तीन रिश्तेदारों को लंबे समय तक जमानत नहीं दी गई और उनका जीवन बर्बाद हो गया, हालांकि उनके खिलाफ कोई मामला नहीं था। अपने पति और रिश्तेदारों को उत्पीड़न से बचाने के लिए उसने राजस्थान महिला आयोग, जयपुर से संपर्क किया। आयोग ने 13 मार्च, 2001 को उसका बयान दर्ज किया और आवश्यक कार्यवाही के लिए पुलिस अधीक्षक (शहर), लखनऊ को भेज दिया। आयोग की अध्यक्ष ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को एक पत्र लिखकर आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव से इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। परिणाम स्वरूप पुलिस अधीक्षक, लखनऊ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को बाद में सूचित किया कि सभी आरोपी व्यक्तियों को 17 मई, 2001 को जमानत पर रिहा कर दिया गया।
इसके बाद (28 मई, 2001) जांच अधिकारी ने लता गुप्ता उर्फ़ लता सिंह का बयान दर्ज किया और सशस्त्र सुरक्षा प्रदान की गई। अगले दिन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने भी धारा 164[1] के तहत उसका बयान दर्ज किया। बयान में लता ने कहा कि उसने अपनी मर्जी से ब्रम्हा नंद गुप्ता से शादी की। इस कथन के बावजूद, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ ने इस तथ्य की अनदेखी करते हुए (कि पुलिस ने पहले ही मामले में अंतिम रिपोर्ट दे चुकी है) मुकदमा आगे चलने का आदेश (5 अक्टूबर, 2001) जारी कर दिया। पुलिस की अंतिम रिपोर्ट के खिलाफ एक विरोध याचिका दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि लता सिंह की मानसिक स्थिति ठीक नहीं। हालांकि, उसकी मानसिक रूप से मनोरोग केंद्र, जयपुर के बोर्ड द्वारा जांच की गई थी, जिन्होंने कहा कि वह किसी भी प्रकार की मानसिक बीमारी से पीड़ित नहीं।
फास्ट ट्रैक कोर्ट, लखनऊ (जिसके समक्ष सभी चार आरोपियों के खिलाफ मामला लंबित था) ने गैर-जमानती वारंट जारी किया गया और फास्ट ट्रैक कोर्ट के आदेश के खिलाफ, आरोपी ने धारा 482[2] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) में एक याचिका (नंबर 520/2003) दायर की।। उच्च न्यायालय ने अभियुक्तों को सत्र न्यायाधीश के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया जो स्वयं यह जांच करेगा कि आरोपी ने कोई अपराध किया है या नहीं। मामला अभी भी लंबित है।

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लता को समझ ही नहीं आया कि कानून तो ऐसे ही अपना काम करता (रहता) है! यह सब झेलने के बाद लता सिंह ने (वरिष्ठ वकीलों की ‘कानूनी सलाह’ पर) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करना और सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना ही बेहतर समझा। उसने अपनी याचिका में उपरोक्त तथ्यों का हवाला देते कहा कि वह लखनऊ नहीं जा सकती, क्योंकि उसके अपने, अपने पति और छोटे बच्चे के जीवन के लिए खतरा है। उसने आगे आरोप लगाया है कि उसके भाइयों ने उसके पति ब्रम्हा नंद गुप्ता के पूरे परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की, अपमानित किया और अप्रासंगिक रूप से नुकसान पहुंचाया और यहां तक ​​कि दूरदराज के रिश्तेदारों को भी नहीं बख्शा और उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई। मकान और कृषि भूमि और दुकानों सहित उनकी संपत्तियों को उसके भाइयों द्वारा जबरन कब्जा कर लिया गया था और उसके और उसके पति की जान को लगातार खतरा है क्योंकि उनके भाई उन्हें धमकी दे रहे हैं।
तमाम तथ्यों का गंभीरतापूर्वक विवेचन के बाद न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और अशोक भान ने कहा “इस केस से चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता बालिग़ है और सभी प्रासंगिक समय में बालिग़ थी। इसलिए वह किसी से भी शादी करने या साथ रहने के लिए स्वतंत्र है, जिसे वह पसंद करती है। हिंदू विवाह अधिनियम या किसी अन्य कानून के तहत अंतर-जातीय विवाह पर कोई रोक नहीं है। इसलिए, हमें नहीं लगता कि याचिकाकर्ता, उसके पति या उसके पति के रिश्तेदारों ने कोई अपराध किया है।
हमारा विचार है कि किसी भी आरोपी द्वारा कोई अपराध नहीं किया गया और विचाराधीन पूरा आपराधिक मामला अदालत की प्रक्रिया के साथ-साथ याचिकाकर्ता के भाइयों के प्रभाव में प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग है, जो केवल इसलिए उग्र थे क्योंकि याचिकाकर्ता ने अपनी जाति के बाहर शादी की। हम यह सुन कर व्यथित हैं कि याचिकाकर्ता के भाइयों के खिलाफ उनके गैरकानूनी कार्यों (जिसका विवरण ऊपर सेट किया गया है) के लिए कार्रवाई करने के बजाय, पुलिस ने याचिकाकर्ता के पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ कार्यवाही की है।
चूंकि ऐसे उत्पीड़न, खतरों और युवक और युवतियों के खिलाफ हिंसा के बारे में पता चल रहे हैं, जो अपनी जाति से बाहर शादी करते हैं, इसलिए हम इस मामले पर कुछ सामान्य टिप्पणी करना आवश्यक समझते हैं। राष्ट्र हमारे इतिहास में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन अवधि (जैसे कि वर्तमान) से गुजर रहा है, और यह न्यायालय महान सार्वजनिक चिंता के मामलों में चुप नहीं रह सकता है।”[3]

जाति व्यवस्था राष्ट्र के लिए एक अभिशाप

न्यायमूर्तियों ने अपने निर्णय में उल्लेख किया “जाति व्यवस्था राष्ट्र के लिए एक अभिशाप है और जितनी जल्दी इसे नष्ट किया जाए उतना ही बेहतर है। वास्तव में, यह राष्ट्र को ऐसे समय में विभाजित कर रहा है, जब हमें एकजुट होकर राष्ट्र के समक्ष चुनौतियों का सामना करना होगा। इसलिए, अंतर-जातीय विवाह वास्तव में राष्ट्रीय हित में हैं क्योंकि इससे जाति व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। हालांकि, देश के कई हिस्सों से परेशान करने वाली खबरें आ रही हैं कि जो युवक और युवतियां अंतरजातीय विवाह से गुजरते हैं, उन्हें हिंसा की धमकी दी जाती है, या उन पर वास्तव में हिंसा की जाती है। हमारी राय में, हिंसा या धमकी या उत्पीड़न के ऐसे कार्य पूरी तरह से अवैध हैं और उन्हें करने वालों को कड़ी सजा दी जानी चाहिए। यह एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश है, और एक बार एक व्यक्ति बालिग़ हो जाता है या वह जिसे भी पसंद करता है उससे शादी कर सकता है। यदि लड़का या लड़की के माता-पिता इस तरह के अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह को मंजूरी नहीं देते हैं, तो वे अधिकतम यह कर सकते हैं कि वे बेटे या बेटी के साथ सामाजिक संबंधों को काट सकते हैं, लेकिन वे धमकी नहीं दे सकते हैं। कोई उस व्यक्ति को परेशान नहीं कर सकता है जो इस तरह के अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह से गुजरता है। इसलिए, हम यह निर्देश देते हैं कि देश भर में प्रशासन / पुलिस अधिकारी यह देखेंगे कि यदि कोई भी लड़का या लड़की एक बालिग़ महिला के साथ अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह करता है या एक बालिग़ पुरुष है, युगल हैं किसी को भी परेशान नहीं किया जाए और न ही हिंसा के खतरों या कृत्यों के अधीन, और कोई भी जो ऐसी धमकियां देता है या उत्पीड़न करता है या हिंसा का कार्य करता है या खुद अपने दायित्व पर, ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ पुलिस द्वारा आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का काम लिया जाता है और ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाती है, जो कानून द्वारा प्रदान किए गए हैं। हम कभी-कभी ऐसे व्यक्तियों के `सम्मान’ हत्या के बारे में सुनते हैं, जो अपनी मर्जी से अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह से गुजरते हैं। इस तरह की हत्याओं में कुछ भी सम्मानजनक नहीं है, और वास्तव में वे क्रूर, सामंती दिमाग वाले व्यक्तियों द्वारा किए गए हत्या के बर्बर और शर्मनाक कृत्य के अलावा कुछ नहीं हैं, जो कठोर सजा के पात्र हैं। केवल इस तरह से हम बर्बरता के ऐसे कृत्यों को समाप्त कर सकते हैं।“
माननीय न्यायमूर्तियों ने उपरोक्त परिस्थितियों में याचिका स्वीकार करते हुए मुकदमा और आरोपियों के खिलाफ वारंट भी रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि सभी संबंधित स्थानों की पुलिस को यह सुनिश्चित करना है कि याचिकाकर्ता, उसके पति और न ही किसी रिश्तेदार को परेशान किया जाए या धमकी दी जाए और न ही उनके खिलाफ हिंसा का कोई कार्य किया जाए। यदि कोई ऐसा करता हुआ पाया जाता है, तो उसे संबंधित अधिकारियों द्वारा, कानून के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
इस तरह लता सिंह ने अपने (और अपने परिवार) वैधानिक अधिकारों की रक्षा और अंतर्जातीय विवाह करने की स्वतंत्रता के लिए, जो कानूनी लड़ाई लड़ी वो आने वाले समय में युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का पाठ भी है और महतवपूर्ण नजीर भी। निसंदेह भारत में सगोत्र विवाह कानून द्वारा निषिद्ध नहीं हैं। इस संबंध में किसी भी तरह की (हर) शंका को दूर करने के लिए, कानून[4]पारित किया गया था। इस अधिनियम ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि एक ही  गोत्र या ‘प्रवर’ या एक ही जाति के विभिन्न उप-डिवीजनों से संबंधित हिंदुओं के बीच विवाह वैध माने-समझे जायेंगे। हिंदू विवाह अधिनियम[5] में भी सगोत्र या अंतरजातीय विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की पीठ (दीपक मिश्र, ए.एम. खानविलकर और धनंजय चंद्रचूड) ने 27 मार्च, 2018 को एक महत्वपूर्ण मामले[6] में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया जिसके अनुसार सम्मान आधारित हिंसा को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इस फैसले में खाप पंचायत को गैर-कानूनी घोषित किया गया। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दो वयस्क अगर शादी करते हैं तो कोई तीसरा उसमें दखल नहीं दे सकता है। इसके अलावा न्यायालय ने हिन्दू विवाह अधिनियम की (धारा 5) में एक ही गोत्र में शादी करने को उचित ठहराया है।

यही तो है धर्मनिरपेक्षता!

मगर दुर्भाग्य से, भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में विशेष विवाह कानून[7] के तहत अंतर्जातीय विवाह को संचालित करने वाले बुनियादी कानून प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में इस कानून के तहत शादी के अंजाम संबंधी चौथे अध्याय में अंतर्जातीय विवाह को हतोत्साहित करते हैं। धारा-19 के मुताबिक, इस कानून के तहत शादी किसी अविभक्त हिंदू, बौद्ध, सिख या जैन अन्य धर्मावलंबी परिवार में आयोजित होती है, तो ऐसे परिवार से उन्हें अलग कर दिया जाएगा। कानून ऐसे हिंदू बौद्ध, सिख या जैन को आजादी देता है, जो अविभक्त परिवार के सदस्य हैं। ऐसे लोग अन्य धर्मो में शादी करते हैं तो शादी के दिन से उनके अपने परिवार के साथ रिश्ते अपने आप टूट जाएंगे। यह परोक्ष रूप से अवरोध निर्मित करता है और ऐलान करता है कि हम आपको गैर हिंदू पत्नी या पति को अपने परिवार में कबूल नहीं करेंगे। आप अपने अविभक्त परिवार की संपत्ति में अपना हिस्सा, यदि कोई हो, लेते हैं तो परिवार से भी हाथ धोना पड़ेगा। विशेष कानून भी मानता है कि हिन्दू परिवार में विधर्मी बहू या दामाद का क्या काम!
सुप्रीम कोर्ट ने (लता सिंह केस) भी इस बात को रेखांकित किया है कि अगर लड़के या लड़की के माता-पिता ऐसी अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक शादी को मंजूरी नहीं देते, तो वे अपने पुत्र या पुत्री से सामाजिक रिश्ते तोड़ सकते हैं। कोर्ट ने ठीक ही आगाह किया है कि ऐसी शादियां कर चुके लोगों को घर वाले किसी तरह की न तो धमकी दे सकते हैं और न ही मारपीट कर सकते हैं। वे इन्हें यातना भी नहीं दे सकते।

बदलते समय में सामाजिक न्याय के बीज

जाति व्यवस्था वाले ऐसे पारंपरिक समाज में, शादी के लिए चुनाव काफी अहम हो जाता है। ऐसे में, अपनी जाति या धर्म से हटकर शादी के बारे में सोच पाना आसान नहीं। हालांकि, भारत में शादी के तरीके में आया हाल का बदलाव अंतर्जातीय शादियों, खासकर आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग के चलते बढ़त दर्शा रहा है। पंजाब, हरियाणा, असम और महाराष्ट्र में फिर भी अंतर्धार्मिक शादियों को अब भी प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में पारंपरिक और सामंती मानसिकता में बदलाव काफी कम देखा गया है। इसलिए हमें निर्दोष युवा लड़के और लड़कियों को ‘ऑनर किलिंग’ से बचाने के लिए एकजुट होने की अधिक जरूरत है। ये वे युवा हैं, जो जाति और वर्ग रहित समाज में जीने की कामना रखते हैं। अगर न्यायिक व्याख्याएं लैंगिक न्याय को स्वीकार नहीं करतीं, तो बदलते समय में सामाजिक न्याय के बीज कैसे अंकुरित होंगे?
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मार्कडेय काटजू और न्यायमूर्ति अशोक भान ने (लता सिंह केस) में व्यवस्था दी कि अंतर्जातीय विवाह से ही जाति नष्ट होगी दूसरी ओर, सर्वोच्च अदालत ने कहा कि भारत में जाति व्यवस्था भारतीयों के दिमाग में रचा-बसा है। किसी कानूनी प्रावधान के न होने की सूरत में अंतर्जातीय शादियों होने पर कोई भी व्यक्ति अपने पिता की जाति का सहारा विरासत में लेता है, न कि मां का।[8] सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एच. के. सीमा और डॉ. ए आर लक्ष्मणन ने अर्जन कुमार मामले में स्पष्ट कहा कि ‘यह मामला आदिवासी महिला की एक गैर आदिवासी पति से शादी करने का है। पति कायस्थ है, इसलिए वह अनुसूचित जनजाति के होने का दावा नहीं कर सकता।’[9] एक भारतीय बच्चे को जाति उसके पिता से विरासत में मिलती है, न कि मां से। अगर वह बिन ब्याही है और बच्चे के पिता का नाम नहीं जानती, तो वह क्या करे? महिला अपने पिता की जाति से होगी और शादी के बाद पति की जाति की। आपकी जाति और धर्म, आपके पिता के धर्म/ जाति से जुड़ी होती है। कोई अपना धर्म बदल सकता है, लेकिन जाति नहीं।
लता सिंह केस के कुछ साल बाद अरुमुगम सर्वई बनाम तमिलनाडु राज्य[10] में, न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र ने लता सिंह के मामले में की गई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए आगे कहा “हमने हाल के वर्षों में “खाप पंचायतों” (तमिलनाडु में “कट्टा पंचायत” के रूप में जाना जाता है) के बारे में सुना है, जो अक्सर विभिन्न जातियों और धर्मों के लड़कों और लड़कियों को जो विवाह करना चाहते हैं या विवाहित हैं, पर संस्थागत तरीके से ऑनर किलिंग या अन्य अत्याचार करने या उसे प्रोत्साहित करते हैं, या लोगों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। इसके अलावा, जो कानून को अपने हाथों में लेते हैं, वो कंगारू अदालतें हैं,जो पूरी तरह से अवैध हैं।“

शिक्षा, संस्कार और जातीय ‘सम्मान’ की अवधारणा

विकास यादव बनाम उत्तर प्रदेश और अन्य[11] मामले में जहां बहन द्वारा (विवाह के लिए) चुने गए युवक की हत्या उसके ही भाई द्वारा की गई थी। भाई जिसने अच्छे शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त की थी। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र और सी नाग्पप्प्न ने सज़ा के सवाल पर विचार करते समय पाया कि आरोपी व्यक्तियों ने सदियों से अपूरणीय भावनाओं और दृष्टिकोण को त्यागने की क्षमता हासिल नहीं कर पाए। शायद, उनकि इस परिकल्पना ने परेशान किया था कि यह वही विचार है जो इस समय में अनादिकाल से यहाँ पहुंचे हैं और अनंत काल तक बने रहना चाहते थे। आगे बढ़ते हुए, न्यायालय ने कहा: –
“कोई भी यह महसूस कर सकता है कि ‘मेरा सम्मान ही मेरा जीवन है’ लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे की कीमत पर एक का सम्मान बनाए रखा जाए। स्त्री की स्वतंत्रता, आज़ादी, संवैधानिक पहचान, व्यक्तिगत पसंद और विचार, वो एक पत्नी हो या बहन या बेटी या मां, निश्चित रूप से शारीरिक बल या धमकी या अपने स्वयं के नाम पर मानसिक क्रूरता से नहीं रोका जा सकता है। इसके अलावा, न तो परिवार के सदस्यों और न ही सामूहिक सदस्यों को लड़की द्वारा चुने गए लड़के पर हमला करने का कोई अधिकार है। उसकी व्यक्तिगत पसंद उसका स्वाभिमान है और उसमें सेंध लगाना उसके सम्मान को नष्ट करना है। और उसकी अपनी पसंद को खत्म करके तथाकथित भाईचारे या पितृ सम्मान या वर्ग सम्मान को थोपना अति क्रूरता का अपराध है। इससे भी अधिक जब यह एक (सम्मान) आड़ में किया जाता है। यह “सम्मान” की एक निंदनीय धारणा है, जो मध्ययुगीन जुनूनी दावे के बराबर है।”
आशा रंजन बनाम बिहार राज्य[12] में और अन्य, सर्वोच्च न्यायालय ने एक अलग संदर्भ में लिखा “जीवन में महिला को अपनी पसंद का साथी चुनने का वैध संवैधानिक अधिकार है। यह व्यक्तिगत पसंद पर आधारित है जिसे अनुच्छेद 19 के तहत संविधान में मान्यता प्राप्त है, और इस तरह के अधिकार को “वर्ग सम्मान” या “समूह सोच” की अवधारणा से आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं की सकती। ऐसा इसलिए है क्योंकि सामूहिक सम्मान की धारणा या भावना की कोई वैधता नहीं है, भले ही उसे सामूहिक रूप से लोग सही मानते हों।”

‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ न्यायिक विवेक

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश राज्य बनाम कृष्ण मास्टर और अन्य[13] में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति हरजीत सिंह बेदी और जे. एम. पंचाल ने 3 अगस्त, 2010 को उच्च न्यायालय द्वारा बरी होने के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी व्यक्तियों को आजीवन कारावास और 25,000 रुपये जुर्माने के साथ दोषी ठहराया। छह लोगों की हत्या और लगभग पूरे परिवार को मिटा देना और वह भी किसी सम्मान की फ़िल्मी कल्पना से इस अदालत द्वारा विकसित ‘दुर्लभतम’ मामले में आएगी इसलिए, ट्रायल कोर्ट द्वारा उम्र कैद की सज़ा उचित है। हालांकि, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि घटना बीस साल से पहले हुई थी, उसने मौत की सजा नहीं पारित की लेकिन आजीवन कारावास की सजा सुनाई। उक्त निर्णय “सम्मान हत्या” के कारण होने वाले अपराध की गंभीरता को दर्शाता है।“
अदालतें कहती रही (हैं) कि गांव के बुजुर्गों या परिवार के बुजुर्गों के विचारों को मानने के लिए, दंपति को मजबूर नहीं किया जा सकता है और किसी को भी बल का उपयोग करने या सामुदायिक सम्मान या पारिवारिक सम्मान के नाम पर दूरगामी प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है। ऐसी खबरें हैं कि गलत कारावास, लगातार उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना, गंभीर शारीरिक हानि या धमकी सहित कठोर कार्रवाई या तो निकट संबंध या कुछ तीसरे पक्षों द्वारा तथाकथित गलत जोड़े के खिलाफ या तो कुछ या सभी के उद्बोधन का सहारा लिया जाता है। पंचायतदारों या उनकी मिलीभगत से। एक या दूसरे जोड़े की हत्या के बहुत से उदाहरण खबरों में रहे हैं। सामाजिक बहिष्कार और युवा जोड़े को प्रभावित करने वाले अन्य अवैध प्रतिबंधों में परिवारों और यहां तक ​​कि स्थानीय निवासियों का एक वर्ग अक्सर इसका सहारा लेता है। यह सब परंपरा और सम्मान के नाम पर किया जाता है। ऐसे सभी अवैध कृत्यों का प्रभाव मूलतः सार्वजनिक व्यवस्था के आयाम भी हैं। दरअसल यही सब अन्तर्विरोध हैं, जो कानून और सामजिक मानसिकता के बीच बार-बार अवरोधक बन आ खड़े होते हैं। युवा स्त्रियों, युवकों. युगलों की बर्बर हत्या कि अनेक खौफनाक कहानियाँ हमारे आसपास बिखरी हैं और राष्ट्रीय अपराध के आंकड़े हमारे सामने है!
अंत में सिर्फ एक स्थाई स्मृति कि हरियाणा राज्य के जिला कैथल के करोरा गाँव के दो युवा (मनोज और बबली) एक ही गोत्र के थे। उनका कसूर था प्रेम करना और अपराध एक ही गांव-गोत्र के होते हुए विवाह करना। जून 2007 में बबली के रिश्तेदारों ने खाप पंचायत के आदेश पर उनकी हत्या कर दी थी। मार्च 2010 में करनाल की जिला अदालत ने तो बबली के परिवार के पांच सदस्यों- उसके भाई सुरेश, चाचा राजेंदर और बरू राम और चचेरे भाई सतीश और गुरदेव को मौत की सजा सुनाई थी, मगर मार्च 2011 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के विद्वान् न्यायाधीशों ने मनोज-बबली सम्मान हत्या मामले में चार दोषियों की मौत की सजा को उम्रकैद की सजा में बदल दिया। अपराध में इस्तेमाल किए गए वाहन के चालक मनदीप सिंह को अपहरण और साजिश के लिए सात साल की जेल की सजा सुनाई गई। इस फैसले के बाद मनोज की मां चंद्रपती, कानून के राज और न्याय व्यवस्था में कैसे विश्वास करे! तबाही के बाद उसकी चिता और तनाव कैसे कम होगा! क्या यही रास्ता है कि उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करे और कुछ साल और इंसाफ का इंतज़ार! दो मासूम युवाओं को निर्दयतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया मगर अपराध ‘दुर्लभतम में  दुर्लभ’ नहीं (माना-समझा जाता) है। क्या खाप पंचायतें और बहुमत (हिन्दू समाज) कानून से ऊपर हैं? अगर न्याय के प्रहरियों और कानून के बीच टकराहट होती रहेगी, तो जाति और धर्म की बेड़ियों में जकड़ी स्त्री-पुरुष आजाद कैसे हो पायेगे? अराजक निजी कानूनों और न्यायिक व्याख्याओं में आमूल-चूल बदलावों के बिना, अंतर्जातीय/अंतर्धार्मिक शादियों से जुड़े सामाजिक-आर्थिक राजनीति का मनोविज्ञान तेजी से नहीं बदल रहा…नहीं बदल सकता। कहां हैं सर्वोच्च न्यायालय के संविधानिक अधिकारों पर लिखे आदर्श वाक्य या सर्वश्रेष्ठ प्रवचन?
(कॉपी संपादन : नवल)
संदर्भ:-
[1] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973
[2] आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता,1973
[3]  लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2006 (5) एससीसी  475)
[4]  हिंदू विवाह अक्षमता निवारण अधिनियम,1946
[5]  हिंदू विवाह अधिनियम,1955
[6]  शक्तिवाहिनी बनाम भारत संघ, 2018 (7) एससीसी 192
[7]  विशेष विवाह कानून[7],1954
[8]  2003 एआईआर सुप्रीम कोर्ट, 5149
[9]  2006 एआईआर सुप्रीम कोर्ट, 1177
[10]  2011 (6) एससीसी 405
[11]  2016 (9) एससीसी 541
[12]  2017) 4 एससीसी 397
[13]  2010 (12) एससीसी 324

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बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 
दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 
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महिषासुर : मिथक व परंपराए
जाति के प्रश्न पर कबी
चिंतन के जन सरोकार


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ABOUT THE AUTHOR

Arvind Jain अरविंद जैन

अरविंद जैन (जन्म- 7 दिसंबर 1953) सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं। भारतीय समाज और कानून में स्त्री की स्थिति संबंधित लेखन के लिए जाने-जाते हैं। ‘औरत होने की सज़ा’, ‘उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार’, ‘न्यायक्षेत्रे अन्यायक्षेत्रे’, ‘यौन हिंसा और न्याय की भाषा’ तथा ‘औरत : अस्तित्व और अस्मिता’ शीर्षक से महिलाओं की कानूनी स्थिति पर विचारपरक पुस्तकें। ‘लापता लड़की’ कहानी-संग्रह। बाल-अपराध न्याय अधिनियम के लिए भारत सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के सदस्य। हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 1999-2000 के लिए 'साहित्यकार सम्मान’; कथेतर साहित्य के लिए वर्ष 2001 का राष्ट्रीय शमशेर सम्मान

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REPLY

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Thursday, 11 July 2019

रिश्ते

रिश्ते शीशे से भी नाजुक होते हैं,
प्यार से धूल झाड़ते रहना होता है।
अनदेखी से धूल-धूसरित हो जाते हैं
फिर उन्हें यूँ कोसने से क्या होता है?

डाॅ रामहेत गौतम सहायक प्राध्यापक,

Wednesday, 3 July 2019

World peace and security

World peace, or peace on Earth, is the concept of an ideal state of happiness, freedom and peace within and among all people and nations on earth. This idea of world non-violence is one motivation for people and nations to willingly cooperate, either voluntarily or by virtue of a system of governance that objects it will be solved by love and peace. Different cultures, religions, philosophies and organisations have varying concepts on how such a state would come about.

Various religious and secular organisations have the stated aim of achieving world peace through addressing human rights, technology, education, engineering, medicine or diplomacy used as an end to all forms of fighting. Since 1945, the United Nations and the 5 permanent members of its Security Council (the US, Russia, China, France and the UK) have operated under the aim to resolve conflicts without war or declarations of war. Nonetheless, nations have entered numerous military conflicts since then.

World peace theoriesEdit


Many theories as to how world peace could be achieved have been proposed. Several of these are listed below.

Peace through strengthEdit

Main article: Peace through strength

The term is traced back to the Roman Emperor Hadrian (reigned AD 117 – 138) but the concept is as old as the recorded history. In 1943, at the peak of World War II, the founder of the Paneuropean UnionRichard von Coudenhove-Kalergi, argued that after the War the United States is bound to take "command of the skies" to ensure the lasting world peace:

But the inauguration of such a glorious century of peace demands from us abandonment of old conceptions of peace. The new Angel of Peace must no longer be pictured as a charming but helpless lady with an olive branch in her hand, but like the Goddess of Justice with a balance in her left and a sword in her right; or like the Archangel Michael, with a fiery sword and wings of steel, fighting the devil to restore and protect the peace of heaven.[1]


In fact, near the entrance to the headquarters of the SAC at Offutt Air Base stands a large sign with a SAC emblem and its motto: "Peace is our profession."[2] The motto "was a staggering paradox that was also completely accurate."[3] One SAC Bomber—Convair B-36—is called Peacemaker and one inter-continental missile-LGM-118-Peacekeeper.
In 2016, former US Secretary of Defense Ash Carter envisaged that the rebalance to the Asia-Pacific will make the region "peaceful" through "strength":

You, and your fellow soldiers, sailors, airmen, and Marines will solidify the rebalance, you will make this network work, and you will help the Asia-Pacific ... realize a principled and peaceful and prosperous future. And play the role only America can play ... You'll do so with strength.[4]


Introduction to US National Security and Defense Strategies of 2018 states: The US force posture combined with the allies will "preserve peace through strength." The document proceeds to detail what "achieving peace through strength requires."[5]
Associated with peace through strength are concepts of preponderance of power (as opposed to balance of power), hegemonic stability theoryunipolar stability, and imperial peace (such as Pax RomanaPax Britannica, or Pax Americana).

Marxism: World peace via world revolutionEdit

World peace would be a consequence of the anarchist or communist world. According to the dialectic materialist theory of Karl Marx, the humanity is divided in just 2 classes in capitalism, the proletarians -that do not possess the means of production- and the bourgeoisie -that possesses the means of production-, once that the communist revolution, that shall abolish the private propriety of the means of production, have happened, humanity will not be divided anymore and a lot of changes will happen. Through a period called socialism the rule of the proletariat will take charge of getting rid of the last vestiges of capitalism, and help to make the revolution worldwide. Once the private propriety have been abolished worldwide, the state will not longer be useful and will disappear, because the government only exists to protect the dominant class, effectively dominating with violence and fear the submitted class, but there will not be classes anymore, and therefore none will require to dominate anyone. Instead organisations of workers will manage the production of things, but no organisation will have any military power, neither police force or prisons.
The main principle of Marx's theory is that the material conditions limit the spiritual conditions. People will not be violent but respecting, peaceful and altruistic, because the material conditions will finally allow them to be so. They do not longer need to live just aiming to earn money, but they live to develop themselves spiritually. With the material problems solved, and everyone receiving education and being provided the appropriate circumstances for their intellectual development, there will not any problem, and society will work getting from each one what one has the capacity to give, and providing to each one what one need.
Leon Trotsky argued that a proletariat world revolution would lead to world peace.[6]

Democratic peace theoryEdit

Proponents of the democratic peace theoryclaim that strong empirical evidence exists that democracies never or rarely wage war against each other.[7][8][9][10]
There are, however, several wars between democracies that have taken place, historically.

Capitalism peace theoryEdit

In her essay "The Roots of War", Ayn Randheld that the major wars of history were started by the more controlled economies of the time against the freer ones and that capitalism gave mankind the longest period of peace in history—a period during which there were no wars involving the entire civilized world—from the end of the Napoleonic wars in 1815 to the outbreak of World War I in 1914, with the exceptions of the Franco-Prussian War (1870), the Spanish–American War(1898), and the American Civil War (1861–1865), which notably occurred in perhaps the most liberal economy in the world at the beginning of the industrial revolution.

CobdenismEdit

Proponents of Cobdenism claim that by removing tariffs and creating international free trade wars would become impossible, because free trade prevents a nation from becoming self-sufficient, which is a requirement for long wars.
However, free trade does not prevent a nation from establishing some sort of emergency plan to become temporarily self-sufficient in case of war or that a nation could simply acquire what it needs from a different nation. A good example of this is World War I, during which both Britain and Germany became partially self-sufficient. This is particularly important because Germany had no plan for creating a war economy.
More generally, free trade—while not making wars impossible—can make wars, and restrictions on trade caused by wars, very costly for international companies with production, research, and sales in many different nations. Thus, a powerful lobby—unless there are only national companies—will argue against wars.

Mutual assured destructionEdit

Mutual assured destruction is a doctrine of military strategy in which a full-scale use of nuclear weapons by two opposing sides would effectively result in the destruction of both belligerents.[11][12] Proponents of the policy of mutual assured destruction during the Cold War attributed this to the increase in the lethality of war to the point where it no longer offers the possibility of a net gain for either side, thereby making wars pointless.

United Nations Charter and international lawEdit

After World War II, the United Nations was established by the United Nations Charter to "save successive generations from the scourge of war which twice in our lifetime has brought untold sorrow to mankind" (Preamble). The Preamble to the United Nations Charter also aims to further the adoption of fundamental human rights, to respect obligations to sources of international law as well as to unite the strength of independent countries in order to maintain international peace and security. All treaties on international human rights law make reference to or consider "the principles proclaimed in the Charter of the United Nations, recognition of the inherent dignity and of the equal and inalienable rights of all members of the human family is the foundation of freedom, justice and "peace in the world".

GlobalizationEdit

Gordon B. Hinckley saw a trend in national politics by which city-states and nation-stateshave unified and suggests that the international arena will eventually follow suit. Many countries such as China, Italy, the United States, Australia, Germany, India and Britain have unified into single nation-states with others like the European Union following suit, suggesting that further globalization will bring about a world state.

Self-organized peaceEdit

World peace has been depicted as a consequence of local, self-determined behaviors that inhibit the institutionalization of power and ensuing violence. The solution is not so much based on an agreed agenda, or an investment in higher authority whether divine or political, but rather a self-organizednetwork of mutually supportive mechanisms, resulting in a viable politico-economic social fabric. The principal technique for inducing convergence is thought experiment, namely backcasting, enabling anyone to participate no matter what cultural background, religious doctrine, political affiliation or age demographic. Similar collaborative mechanisms are emerging from the Internet around open-source projects, including Wikipedia, and the evolution of other social media.

Economic norms theoryEdit

Economic norms theory links economic conditions with institutions of governance and conflict, distinguishing personal clientelisteconomies from impersonal market-oriented ones, identifying the latter with permanent peace within and between nations.[13][14]
Through most of human history societies have been based on personal relations: individuals in groups know each other and exchange favors. Today in most lower-income societies hierarchies of groups distribute wealth based on personal relationships among group leaders, a process often linked with clientelism and corruption. Michael Mousseau argues that in this kind of socio-economy conflict is always present, latent or overt, because individuals depend on their groups for physical and economic security and are thus loyal to their groups rather than their states, and because groups are in a constant state of conflict over access to state coffers. Through processes of bounded rationality, people are conditioned towards strong in-group identities and are easily swayed to fear outsiders, psychological predispositions that make possible sectarian violence, genocide, and terrorism.[15]
Market-oriented socio-economies are integrated not with personal ties but the impersonal force of the market where most individuals are economically dependent on trusting strangers in contracts enforced by the state. This creates loyalty to a state that enforces the rule of law and contracts impartially and reliably and provides equal protection in the freedom to contract – that is, liberal democracy. Wars cannot happen within or between nations with market-integrated economies because war requires the harming of others, and in these kinds of economies everyone is always economically better off when others in the market are also better off, not worse off. Rather than fight, citizens in market-oriented socio-economies care deeply about everyone's rights and welfare, so they demand economic growth at home and economic cooperation and human rights abroad. In fact, nations with market-oriented socio-economies tend to agree on global issues[15] and not a single fatality has occurred in any dispute between them.[13]
Economic norms theory should not be confused with classical liberal theory. The latter assumes that markets are natural and that freer markets promote wealth.[16] In contrast, Economic norms theory shows how market-contracting is a learned norm, and state spending, regulation, and redistribution are necessary to ensure that almost everyone can participate in the "social market" economy, which is in everyone's interests. One proposed mechanism for world peace involves consumer purchasing of renewable and equitable local food and power sources involving artificial photosynthesis ushering in a period of social and ecological harmony known as the Sustainocene.

Tuesday, 2 July 2019

Article 15 समीक्षा

आर्टिकल 15 : एक पुलिस प्रोसीजरल कहानी के बहाने जातिवाद की बारीक चीरफाड़ करती फिल्म

जैसे ‘जूठन’ और ‘मुर्दहिया’ हिंदी साहित्य की धरोहर हैं और वैसे ही जातिवाद की सड़ांध दिखाने वाली ‘आर्टिकल 15’ को हिंदी सिनेमा की धरोहर माना जा सकता है

शुभम उपाध्याय

29 जून 2019

'आर्टिकल' 15 के एक दृश्य में आयुष्मान खुराना

निर्देशक : अनुभव सिन्हा
लेखक : अनुभव सिन्हा, गौरव सोलंकी

कलाकार : आयुष्मान खुराना, ईशा तलवार, कुमुद मिश्रा, मनोज पाहवा, मोहम्मद जीशान अय्यूब, शायोनी गुप्ता
रेटिंग : 4/5
हिंदुस्तानियों से जाति नहीं जाती! ‘स्वदेश’ फिल्म का एक संवाद है जिसमें गांव का एक प्रभावशाली बुजुर्ग शाहरुख के किरदार मोहन भार्गव द्वारा जाति व्यवस्था की आलोचना करने पर भड़क उठता है और पलटकर कहता है - ‘और सुनो! जो कभी नहीं जाती उसी को जाति कहते हैं.’ यह संवाद मुख्यधारा के सिनेमा में जाति व्यवस्था की दलदल में धंसे हिंदुस्तान की मानसिकता का सच दिखाने वाली शायद अब तक की सबसे सटीक व्याख्या रही है.
अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15’ इसी ‘मानसिकता’ की नए सिरे से चीर-फाड़ करती है और एक मनोरंजक व दिल थमा देने वाली पुलिस प्रोसीजरल थ्रिलर के बहाने जातिवाद के मवाद का सूक्ष्मतम निरीक्षण करने का बीड़ा उठाती है. जाति व्यवस्था नामक सामाजिक सड़ांध पर इतनी बेबाकी से बात करने वाली फिल्म शायद हिंदी सिनेमा में इससे पहले कभी नहीं बनी. हमें तो याद नहीं आ रही।

दलित उत्पीड़न पर बनी फिल्मों की बात करते वक्त हम ‘अछूत कन्या’, ओम पुरी की ‘आक्रोश’, श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ से लेकर मौजूदा समय की ‘सैराट’, ‘न्यूटन’ और पा.रंजीत की ‘काला’ की बात करते हैं. इन फिल्मों ने जाति व्यवस्था को एक सच्चाई मानकर अपनी आगे की कहानी कही थी, कभी-कभी क्रांतिकारी तरीकों से भी कही थी, लेकिन ‘आर्टिकल 15’ तो मूलत: जाति व्यवस्था की ही कहानी कहती है. यह एक ‘आउटसाइडर पर्सपेक्टिव’ के साथ बनी फिल्म है जिसमें विदेश से पढ़कर आए नायक को जाति व्यवस्था का पता तो है, लेकिन उसकी जड़ें कितनी गहरी हमारे समाज में उतरी हैं इसका भान नहीं है.
इस ‘बाहरी दृष्टिकोण’ की कई लोग ट्रेलर देखने के बाद आलोचना कर रहे थे. लेकिन फिल्म देखते वक्त आपको समझ आता है कि यह एप्रोच ही मौजूदा समय में इस फिल्म को किस तरह घोर प्रासंगिक बना देती है. यह हमारे वक्त का कड़वा सच है कि ऊंची जाति का अर्बन शहरी जातिवाद से उपजी असमानता और अत्याचार के प्रति उदासीन है और दलित-पिछड़ी जातियों को सिर्फ रिजर्वेशन के चश्मे से देखता है. इस चश्मे पर भी इतनी धुंध चढ़ी है कि उसे दलित मुद्दे नजर ही नहीं आते और समाज में धर्म के नाम पर कटुता फैलने के साथ-साथ रिजर्वेशन के नाम पर भी जहर बोने की सियासत खूब फल-फूल रही है.
ऐसे में अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी की लिखी ‘आर्टिकल 15’ की एप्रोच एकदम साफ है कि वह देहात की जातिगत संरचना दिखाकर हर उस अर्बन शहरी तक पहुंचना चाहती है जो जाति व्यवस्था के सच को स्वीकारता नहीं है, या फिर स्वीकारता भी है तो उसकी वीभत्सता से अंजान बना हुआ है. चाहे जानकर या फिर अनजाने में ही.
दिलचस्प यह है कि इस अलहदा एप्रोच को फिल्म में खुलते हुए देखते वक्त बरबस ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘जूठन’ और डॉ तुलसी राम की ‘मुर्दहिया’ नामक दलित साहित्य याद आ जाता है! हिंदी साहित्य की ये दोनों आत्मकथाएं हर उस ऊंची जाति के शख्स को पढ़नी चाहिए जो जाति व्यवस्था नामक सामाजिक सड़ांध को बेहतर समझना चाहता है. उन ऊंची जात वालों को भी जो जातिवाद को पसंद करते हैं और अपनी ऊंची जातियों के नेरेटिव को ही पूरा सच मानकर बरसों पहले निगल चुके हैं.

कई दफा हो चुका है कि आप ‘जूठन’ किसी प्रिवलेज्ड जाति के युवा पाठक को पढ़ने को दो तो उसे लौटाते वक्त वह आश्चर्य से पूछता जरूर है कि क्या सच में ऐसा ‘इन लोगों’ के साथ हुआ होगा? पिछली पीढ़ी के ऊंची जाति के ही किसी रिश्तेदार या जान-पहचान वाले को दो तो वह पढ़कर कहता है कि हां ‘उन लोगों’ पर अत्याचार होता तो था, लेकिन इतना भी नहीं यार!
प्रिवलेज्ड लोगों की यह जो अज्ञानता है, जो नादानी है, इसे दूर करने के लिए ‘जूठन’ और ‘मुर्दहिया’ जैसा हिंदी साहित्य आज के दौर में बहुत काम की किताबें हैं. और आज के दौर में अगर हिंदी सिनेमा में ऐसी कोई फिल्म ढूंढ़ें जो इन किताबों के आसपास की जागरूकता लाने का काम कर सकती है तो वो ‘काला’ या ‘न्यूटन’ नहीं, शर्तिया ‘आर्टिकल 15’ है. ‘जूठन’ और ‘मुर्दहिया’ अगर हिंदी साहित्य की धरोहर हैं तो यह साहसिक फिल्म हिंदी सिनेमा की धरोहर जरूर बननी चाहिए.
पुलिस प्रोसीजरल सब-जॉनर को उसके पूरे नियम-कायदों के साथ अपनाने वाली यह फिल्म 2014 के बदायूं रेप केस को आधार बनाकर एक काल्पनिक कहानी कहती है जिसे देखकर लगता है कि जैसे दुनिया का सबसे खौफनाक यथार्थ यही है. जो ट्रेलर दिखा चुका है उसकी तफ्तीश करने का जिम्मा आयुष्मान खुराना के प्रिवलेज्ड आईपीएस अफसर किरदार अयान रंजन को मिलता है और यह ब्राह्मण नायक लड़कियों के कातिल का पता लगाने की कोशिश में जाति व्यवस्था के दुश्च्रक में भी फंसता चला जाता है.
ऐसा नहीं है कि फिल्म का पुलिस प्रोसीजरल वाला यह एलीमेंट बेहद उम्दा हो और कुछ भौचक कर देने वाला अप्रत्याशित ही हमारी नजर कर देता हो. यह फिल्म एक दर्शनीय, मनोरंजक, आखिर तक बांधकर रखने वाला इनवेस्टिगेटिव ड्रामा जरूर है जो कि अपना वातावरण बेहद कुशलता से रचने की वजह से खासी प्रभावी बनती है. लेकिन बदायूं रेप केस के बारे में अगर आप सबकुछ जानते हैं तो ज्यादातर वक्त मोटा-मोटा अंदाजा आपको रहता है कि फिल्म कहां जाएगी और क्या दिखाएगी. हालांकि, ये भी सच है कि जब-जब अंदाजा नहीं रहता, तब यह फिल्म जैसे आत्मा पर हथौड़ा मारकर दहला देती है.

मगर, फिल्म की सबसे खास बात है कि वह मुख्यधारा के दर्शकों को लुभाने का माद्दा रखने वाली दर्शनीय पुलिस प्रोसीजरल कहानी के बहाने हमारे वक्त की बेहद प्रभावी सामाजिक और राजनीतिक कमेंट्री करती है. इवान मुलीगन की सिनेमेटोग्राफी तो इस कदर उच्च की है कि धुंध, धूसर रंगों और मुर्दा सन्नाटे का उपयोग कर ऐसा अतीत में अटका देहात रच देती है जहां जैसे कभी सूरज उगा ही न हो और केवल अंधेरे व अन्याय का वास हो.
उनके द्वारा गंदगी से लबालब भरे मेनहोल में से एक सफाई कर्मचारी के बार-बार बाहर आने और अंदर जाने का बेहद प्रभावी तरीके से फिल्माया गया सीन तो इस कदर हृदयविदारक है कि लगता है जैसे निर्देशक ने ‘जूठन’ पढ़ने के ठीक बाद ही इसे गढ़ा होगा. फिल्म की सबसे पावरफुल और लंबे समय तक याद रहने वाली इमेजरी यही सीन देता है.
जाति व्यवस्था की कुरूपता को चेहरा देने के लिए अनुभव सिन्हा ने कमाल के अभिनेताओं का चयन किया है. कुमुद मिश्रा से लेकर सुशील पांडे, शुभ्रज्योति भारत, आशीष वर्मा और मनोज पाहवा अलग-अलग जातियों से ताल्लुक रखते हैं और इनके आपसी समीकरण देखकर आपको पटकथा की महीन लिखाई का अंदाजा होता है. वह सीन तो शायद इस फिल्म का सर्वश्रेष्ठ सीन है जब सभी अपनी-अपनी जाति बताते हैं और चमार जाति वाला भी खुद को एक दूसरी जाति से ऊंचा बताकर खुश होता है. कसम से, जाति को लेकर समाज ने जो हमारी ‘कंडीशनिंग’ की है न, वह वाकई अविश्वसनीय है!
मनोज पाहवा यहां ‘मुल्क’ से एकदम मुख्तलिफ भूमिका में हैं और इतना शानदार अभिनय करते हैं कि ‘मुल्क’ वाले स्तर को ही छूते हैं. रियल लगते दलित किरदारों के बीच मेकअप के साथ खड़ी शायोनी गुप्ता शुरुआत में थोड़ा संशय पैदा करती हैं लेकिन जल्द ही अपने अभिनय से सारी शंकाएं दूर कर देती हैं. दलित और महिला उत्पीड़न को उनकी बड़ी-बड़ी आंखें जिस तरह एक्सप्रेस करती हैं वह अद्भुत है.

बहुत छोटे-से रोल में होने के बावजूद मोहम्मद जीशान अय्यूब भी अद्भुत हैं. उनके मोनोलॉग, वॉयस-ओवर, दूसरों को दी गई समझाइश और फिर शायोनी गुप्ता की गोदी में फफकते हुए कहना कि मैंने कभी प्रेम का इजहार नहीं किया, चांद टकटकी लगाकर नहीं देखा, न सिर्फ मजबूत लिखाई है बल्कि एक अभिनेता के उस लिखाई के पीछे की भावना को समझने का दुर्लभ गुण भी है.
आयुष्मान खुराना जाहिर तौर पर फिल्म की रीढ़ हैं, जो आखिर तक सीधी रहती है. अब तक बिंदास और हाजिरजवाब युवा की भूमिकाएं निभाने वाला यह अभिनेता अपने करियर की इस पहली गंभीर, मैच्योर और आक्रोश व हताशा की सतत अभिव्यक्ति मांगने वाली भूमिका निभाते वक्त अपनी इंटेन्सिटी से हतप्रभ कर देता है. लगता ही नहीं कि मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा का कोई स्थापित हीरो अयान रंजन बना है. लगता है जैसे थियेटर बैकग्राउंड से आने वाला कोई नवोदित परिपक्व अभिनेता है जिसकी शारीरिक मुरकियों से लेकर सारी अभिव्यक्तियां हमें पहली बार परदे पर देखने को मिल रही हैं.
आपकी सारी लिखाई और निर्देशकीय क्षमता पानी में बह जाती है, अगर अभिनेता आपकी कहानी और उस कहानी के पीछे की ईमानदारी को परदे पर सही तरीके से अभिव्यक्त न कर सके तो. आयुष्मान खुराना ने सही तो छोड़िए, सबसे उम्दा तरीके से जातिवाद से घिरे अयान रंजन को ‘आर्टिकल 15’ में जीवंत किया है. इतनी साहसी फिल्म करने के लिए उन्हें सलाम!
‘आर्टिकल 15’ को अनुभव सिन्हा के साथ गौरव सोलंकी ने लिखा है. ऐसा भान होता है कि उनके होने की वजह से ही शायद फिल्म को पाश मिले होंगे, भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद रावण से प्रभावित एक दलित नायक मिला होगा, उसके कई सारे कंटीले मोनोलॉग मिले होंगे और मौजूदा राजनीति से जुड़ी ढेर सारी मारक पॉलिटिकल कमेंट्री मिली होगी. दो लेखकों के होने से समझना मुश्किल हो जाता है कि किसने क्या और कितना लिखा, लेकिन इस सजग गीतकार और कहानीकार के पुराने काम से इत्तेफाक रखने वाले दर्शक और पाठक उनकी छाप फिल्म में साफ देख पाएंगे.

‘आर्टिकल 15’ एक मजबूत दलित सह-नायक गढ़कर खुद ही एक सवाल भी छोड़ जाती है. क्या होता अगर इस फिल्म का मुख्य नायक प्रिवलेज्ड ब्राह्मण न होकर शहरी दलित होता और उसे गांव के जातिवाद से जूझना पड़ता?
ऐसी पटकथा लिखना मुश्किल और चुनौतीपूर्ण जरूर होता लेकिन वह फिल्म भी कमाल ही बनती! हॉलीवुड को अक्सर ‘व्हाइट सेवियर कॉम्पलेक्स’ के चलते आलोचनाओं से दो-चार होना पड़ता है और इस बार के ऑस्कर्स में एक बार फिर यह विषय बेहद चर्चामें रहा था. बॉलीवुड को इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि दलित अस्मिता की कहानियां कहते वक्त वह भी ऐसी आलोचनाओं से पार पाने की कोशिश करे और दलित नायकों का मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में प्रतिनिधित्व बढ़ाता चले.

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