Sunday, 9 October 2022

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्। 
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥
¤¤
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥
¤¤

आदिकवेः महर्षिवाल्मीकेः जयन्तीम् अभिलक्ष्य उत्तर-प्रदेश-संस्कृत-संस्थानेन आयोजितासु राज्यस्तरीयप्रतियोगितासु गद्यवाचन-प्रतियोगितायां निर्णायकरूपेेण भूमिकां निर्वोढुं शुुभावसरं प्रापम्। अत्रावसरे संस्कृतजगतः अनेकैः मूर्धन्यविद्वद्भिः सह मेलनस्य सान्निध्यम् अलभे। विद्वत्परम्परायै मम अनन्ताः प्रणामाः 🙏🙏

#महर्षिवाल्मीकिजयन्ती
#उत्तरप्रदेशसंस्कृतसंस्थानलखनऊ
#जयतुसंस्कृतम् #जयतु_भारतम्

वाल्मीकियों! उठो।

वाल्मीकियों


अछूतों! उठो, 
रामायण उठाओ
पढ़ो,  
राम मंदिर जाओ,
मंदिर में बैठकर, 
रामायण पाठ करो,
भक्तों को प्रसाद 
और आशीर्वाद 
दोनों दो।
और तुम लो चढ़ावा।
इसमें भक्तों का भविष्य 
और तुम्हारा वर्तमान 
दोनों सुधर सकते हैं।

स्थाल्यां क्षीरं नभे चन्द्रः, अमृतं पाति पूर्णिमा।
मृत्युं तरति प्राज्ञः ना, सर्वे अङ्गन्तु पूर्णिमाम्। ।rg

Saturday, 8 October 2022

काव्स्यात्मा स एवार्थस्तदा चादिकवे‌: पुरा।क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थ:शोक:श्लोकत्वमागत:।।

आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं 🌸🌸
काव्स्यात्मा स एवार्थस्तदा चादिकवे‌: पुरा।
क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोत्थ:शोक: श्लोकत्वमागत:।।
दलितानां दशां दृष्ट्वा, सः आयाति कवेः न किम्।।
                      आचार्य आनन्दवर्धन ,ध्वन्यालोक /१/५
अर्थात् काव्य की आत्मा तो वही अर्थ है जब प्राचीन काल में क्रौंच पक्षी के जोड़े में से शिकारी द्वारा एक के मार दिये जाने के कारण जब दूसरा पक्षी विलाप कर रहा था उस वियोग के कारण संवेदन शीलता की पराकाष्ठा के कारण आदि कवि वाल्मीकि का हृदय का शोक श्लोक बन गया ।
यह विश्व में पहला लौकिक काव्य अभिव्यक्त होने का समय था ।यह पहला पहला संस्कृत का श्लोक था । यहां प्राचीन काव्यशास्त्र के आचार्य आनन्द वर्धन यह तो प्रमाणित कर रहे हैं कि कवि में स्वार्थ के स्थान पर परार्थ ही होता है कि वह दूसरे के दु:ख को अपना सके जिससे उसके हृदय का दु:ख ही भावनाओं में बहता हुआ वाणी का रूप ग्रहण करे । वह वाणी समाज में दुराचारी का सामुहिक बहिष्कार कर सदाचारी की प्रतिष्ठा करे
वह वाणी सत्य ,शिव और सुन्दर हो जोकि संसार में ऐसे कल्याण धारण किये हो जो कि जो किसी काल और स्थान की सीमा से दूर कालजयी समाज प्रेरक वाणी हो ।
इस श्लोक को आधार कर आदि कवि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण सनातन रूप से मानव मात्र को मार्ग दिखाती रहेगी कि" रामादिवद्वर्तितव्यं न रावणादिवत्" राम जैसा आचरण करो रावण जैसा नहीं ।इसलिये राम हमारे शाश्वत भाव है ।कहा गया है" धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां "अर्थात् धर्म का तत्व तो हमारे हृदय में रहता है वह राम का भाव ही हमारी भावनाओं में बहता ।विग्रहवान् धर्म हो जाता है इसलिये कहा है "रामस्तु साक्षाद्विग्रहवान् धर्म:"अर्थात् राम तो प्रत्यक्ष रूप से धर्म का शरीर धारण किये हैं ।
जय सियाराम 🙏
जय आदिकवि महर्षि वाल्मीकि 🙏
जय महाकवि गोस्वामी तुलसीदास 🙏

Friday, 7 October 2022

अयि गिरिनन्दिनिमहिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम्

अयि गिरिनन्दिनि
महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् 
कनकमंजरी छन्द 
कनक मंजरी छंद मिलकर साथ सभी चलते
*कनक मंजरी छंद*

शिल्प~4लघु+6भगण(211)+1गुरु]=23 वर्ण
 चार चरण समतुकांत]
 {1111+211+211+211 
                      211+211+211+2}

मिलकर साथ सभी चलते , 
    नित सर्जन देश तभी सजते ।
खिलकर साथ तरु फलते, 
     नव पुष्पित बाग सभी सजते ।
बढ़कर राह रहें चलते,
     सत लक्ष्य सही तब ही मिलते ।
गढ़कर प्रीत नई गढ़ते ,
      नव गीत सदा जब ही मिलते । 

बढ़ चल तू चलता चल ,
     साथ सभी कम ही बढ़ते चलते ।
थक कर तू थमता कब ,
     पाँव नही अब ये मुड़ते चलते ।
पग पग उठा पथ पे रखना ,
      पथ पे पग चिन्ह यही बनते ।
अभय सदा चल तू चलना ,
     भय ज़ीवन लक्ष्य नही बनते ।

.... विवेक दुबे"निश्चल"@....

कनक-मंजरी छन्द विधान : 
यह वार्णिक छन्द है। गुरु का अर्थ गुरु, लघु का अर्थ लघु [ चार लघु + ६ भगण (२११)+ १ गुरु ] = २३ वर्ण , चार चरण, सभी समतुकान्त [ मापनी ११११,२११,२११,२११, २११,२११,२११,२ ]
यह वर्णिक छन्द 'शैलसुता' है। इसके लघु-गुरु का क्रम निम्न प्रकार है -
लललल गालल गालल गालल गालल गालल गालल गालल गा
यदि मदिरा सवैया छन्द के प्रथम गुरु को दो लघु में बदल दिया जाये तो शैलसुता छन्द बन जाता है! उदाहरण -
परिणय का अति पावन बंधन, बंधन जीवन-जीवन का,
सुख दुख में अनुरूप रहे यह, बंधन है तन का मन का।
निरख बुरे दिन छोड़ सभी चलते पर दम्पति साथ निभाते,
जब तन जर्जर हो चलता तब भी बन सम्बल हाथ मिलाते।
- आचार्य ओम नीरव


उदाहरण : 

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
Iii. Isi.    
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥



iii.         Isi.     Isi.       Isi.     Isi.        Isi.     Isi. Is
अयिज+नजागृ+तलोक+समावृ+तविस्मि+तवाच+नदीप्ति+कृते
किमधिकसुन्दरविश्वकलेवरसंस्कृतशासनसारधृते ।
कलितमनोरमरूपगणावृतकोटिदिवाकरपारमिते
जय जय हे सुरभारति वैष्णवि झंकडचारिणि हासरते ॥
नन्दप्रदीप्तकुमारः

Thursday, 6 October 2022

अंग्रेज कादम्बरी में भी लिख गए-मातंगजातिस्पर्शदोषभयादस्पृश्यतेयमत्पादिता प्रजापतिना

अंग्रेज कादम्बरी में भी लिख गए-
मातंगजातिस्पर्शदोषभयादस्पृश्यतेयमत्पादिता प्रजापतिना

Wednesday, 5 October 2022

दशहरे का सम्बन्ध न राम से है न रावण से

दशहरे का सम्बन्ध न राम से है न रावण से
दशहरा शक्ति पूजा का पर्व है बस
नव दिन की शक्ति आराधना के बाद दसवे दिन शस्त्र पूजा करके विजय की कामना हेतु देवी के रूप विजया का पूजन किया जाता है और यह दसमी के दिन होता है इसलिये इसे विजया दशमी कहते है
दस दिशाओ से शक्ति का पूजन करने के कारण विजय दशमी कहते है
दशहरा शब्द आधुनिक पत्रकारों एव लेखकों ने जोड़ दिया
बाकी राम रावण युध्द का पूरा विवरण सन्दर्भ सहित नीचे लिखा है

पद्म पुराण के पातालखंड इसका विवरण है ‘‘युद्धकाल पौष शुक्ल द्वितीया से चैत्र कृष्ण चौदस तक (87 दिन)’’ 15 दिन अलग अलग युद्धबंदी 72 दिन चले महासंग्राम में लंकाधिराज रावण का संहार क्वार सुदी दशमी को नहीं चैत्र वदी चतुर्दशी को हुआ।

घन घमंड गरजत चहु ओरा।
प्रियाहीन डरपत मन मोरा।।

रामचरित मानस हो बाल्मीकि रामायण अथवा ‘रामायण शत कोटि अपारा’ हर जगह ऋष्यमूक पर्वत पर चातुर्मास प्रवास के प्रमाण मिलते हैं। पद्मपुराण के पाताल खंड में श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के प्रसंग में अश्व रक्षा के लिए जा रहे शत्रुध्न ऋषि आरण्यक के आश्रम में पहुंचते हैं। परिचय देकर प्रणाम करतेे है।
शत्रुघ्न को गले से लगाकर प्रफुल्लित आरण्यक ऋषि बोले- गुरु का वचन सत्य हुआ। सारूप्य मोक्ष का समय आ गया। उन्होंने गुरू लोमश द्वारा पूर्णावतार राम के महात्म्य का उपदेश देते हुए कहा था कि जब श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा आश्रम में आयेगा, रामानुज शत्रुघ्न से भेंट होगी। वे तुम्हें राम के पास पहुंचा देंगे।
इसी के साथ ऋषि आरण्यक रामनाम की महिमा के साथ नर रूप में राम के जीवन वृत्त को तिथिवार उद्घाटित करते है- जनक पुरी में धनुषयज्ञ में राम लक्ष्मण कें साथ विश्वामित्र द्वारा पहुचना और राम द्वारा धनुषभंग कर राम- सीता विवाह का प्रसंग सुनाते हुए आरण्यक ने बताया तब विवाह राम 15 वर्ष के और सीता 06 वर्ष की थी विवाहोपरांत वे 12 वर्ष अयोध्या में रहे 27 वर्ष की आयु में राम के अभिषेक की तैयारी हुई मगर रानी कैकेई के वर मांगने पर सीता व लक्ष्मण के साथ श्रीराम को चौदह वर्ष के वनवास में जाना पड़ा।
वनवास में राम प्रारंभिक 3 दिन जल पीकर रहे चौथे दिन से फलाहार लेना शुरू किया। पांचवें दिन वे चित्रकूट पहुंचे, वहां पूरे 12 वर्ष रहे। 13वें वर्ष के प्रारंभ में राम लक्ष्मण और सीता के साथ पंचवटी पहुचे। जहां सुर्पनखाॅ को कुरूप किया।
माघ कृष्ण अष्टमी को वृन्द मुहूर्त में लंकाधिराज दशानन ने साधुवेश में सीता का हरण किया। श्रीराम व्याकुल होकर सीता की खोज में लगे रहे। जटायु का उद्धार व शबरी मिलन के बाद ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे, सुग्रीव से मित्रता कर बालि का बध किया। आषाढ़ सुदी एकादशी से चातुर्मास प्रारंभ हुआ। शरद ऋतु के उत्तरार्द्ध यानी कार्तिक शुक्लपक्ष तें वानरों ने सीता की खोज शुरू की समुद्र तट पर कार्तिक शुक्ल नवमी को संपाती नामक गिद्ध ने बताया सीता लंका की अशोक वाटिका में हैं।
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थानी) को हनुमान ने छलांग लगाई , रात में लंका प्रवेश कर खोजवीन करने लगे। कार्तिक शुक्ल द्वादशी को अशोक वाटिका में शिंशुपा वृक्ष पर छिप गये और माता सीता को रामकथा सुनाई। कार्तिक शुक्ल तेरस को वाटिका विध्वंश किया, उसी दिन अक्षय कुमार का बध किया। कार्तिक शुक्ल चौदस को मेघनाद ब्रह्मपाश में बांधकर दरवार में ले गये और लंकादहन किया। हनुमानजी कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को वापसी में समुद्र पार किया। प्रफुल्लित सभी वानरों ने नाचते गाते 5 दिन मार्ग में लगाये और अगहन कृष्ण षष्ठी को मधुवन में आकर वन ध्वंस किया
हनुमान की अगवाई में सभी वानर अगहन कृष्ण सप्तमी को श्रीराम के समक्ष पहुचे। हालचाल दिये।
अगहन कृष्ण अष्टमी उ. फाल्गुनी नक्षत्र विजय मुहूर्त में श्रीराम ने वानरों के साथ दक्षिण दिशा को कूच किया और 7 दिन में किष्किंधा से समुद्र तट पहुचे। अगहन शुक्ल प्रतिपदा से तृतीया तक विश्राम किया।
अगहन शुक्ल चतुर्थ को रावणानुज श्रीरामभक्त विभीषण शरणागत हुआ। अगहन शुक्ल पंचमी को समुद्र पार जाने के उपायों पर परिचर्चा हुई। सागर से मार्ग याचना में श्रीराम ने अगहन शुक्ल षष्ठी से नवमी तक 4 दिन अनशन किया। सप्तमी को अग्निवाण का संधान हुआ तो रत्नाकर प्रकट हुए और सेतुबंध का उपाय सुझाया। अगहन शुक्ल दशमी से तेरस तक 4 दिन में श्रीराम सेतुबनकर तैयार हुआ।
अगहन शुक्ल चौदस को श्रीराम ने समुद्रपार सुवेल पर्वत पर प्रवास किया, अगहन शुक्ल पूर्णिमा से पौष कृष्ण द्वितीया तक 3 दिन में वानरसेना सेतुमार्ग से समुद्र पार कर पाई। पौष कृष्ण तृतीया से दशमी तक एक सप्ताह लंका का घेराबंदी चली। पौष कृष्ण एकादशी को सुक सारन वानर सेना में घुस आये। पौष कृष्ण द्वादशी को वानरों की गणना हुई और पहचान करके उन्हें अभयदान दिया।
पौष कृष्ण तेरस से अमावस्या तक रावण ने गोपनीय ढंग से सैन्याभ्यास किया। पौष शुक्ल प्रतिपदा को अंगद को दूत बनाकर भेजा गया। इसके बाद पौष शुक्ल द्वितीया से अष्टमी तक वानरों व राक्षसों में घमासान युद्ध हुआ।
पौष शुक्ल नवमी को मेघनाद द्वारा राम लक्ष्मण को नागपाश में बांध दिया गया। श्रीराम के कान में कपीश द्वारा पौष शुक्ल दशमी को गरुड़ मंत्र का जप किया गया, पौष शुक्ल एकादशी को गरुड़ का प्राकट्य हुआ और उन्होंने नागपाश काटा और राम लक्ष्मण को मुक्त किया।
पौष शुक्ल द्वादशी को ध्रूमाक्ष्य बध, पौष शुक्ल तेरस को कंपन बध, पौष शुक्ल चौदस से माघ कृष्ण प्रतिपदा तक 3 दिनों में कपीश नील द्वारा प्रहस्तादि का बध, माघ कृष्ण द्वितीया से चतुर्थी तक राम रावण में तुमुल युद्ध हुआ और रावण को भागना पड़ा।
रावण ने माघ कृष्ण पंचमी से अष्टमी तक 4 दिन में कुंभकरण को जगाया। माघ कृष्ण नवमी से शुरू हुए युद्ध में छठे दिन चौदस को कुंभकरण को श्रीराम ने मार गिराया।
कुंभकरण बध पर माघ कृष्ण अमावस्या को शोक में रावण द्वारा युद्ध विराम किया गया। माघ शुक्ल प्रतिपदा से चतुर्थी तक युद्ध में विसतंतु आदि 5 राक्षसीें का बध हुआ। माघ शुक्ल पंचमी से सप्तमी तक युद्ध में अतिकाय मारा गया।
माघ शुक्ल अष्टमी से द्वादशी तक युद्ध में निकुम्भ-कुम्भ बध, माघ शुक्ल तेरस से फागुन कृष्ण प्रतिपदा तक युद्ध में मकराक्ष बध हुआ।
फागुन कृष्ण द्वितीया को लक्ष्मण मेघनाद युद्ध प्रारंभ सप्तमी को लक्ष्मण मूच्र्छित हुए उपचार हुआ। इस घटना के कारण फागुन कृष्ण तृतीया से सप्तमी तक 5 दिन युद्ध विराम रहा।
फागुन कृष्ण अष्टमी को वानरों ने यज्ञ विध्वंस किया, फागुन कृष्ण नवमी से तेरस तक चले युद्ध में लक्ष्मण ने मेघनाद को मार गिराया।
इसके बाद फागुन कृष्ण चौदस को रावण की यज्ञ दीक्षा ली और फागुन कृष्ण अमावस्या को युद्ध के लिए प्रस्थान किया। फागुन शुक्ल प्रतिपदा से पंचमी तक भयंकर युद्ध में अनगिनत राक्षसों का संहार हुआ।
फागुन शुक्ल षष्टी से अष्टमी तक युद्ध में महापाश्र्व आदि का राक्षसों का बध हुआ। फागुन शुक्ल नवमी को पुनः लक्ष्मण मूच्र्छित हुए, सुखेन बैद्य के परामर्श पर हनुमान द्रोणागिरि लाये और लक्ष्मण पुनः चेतन्य हुए।
राम-रावण युद्ध फागुन शुक्ल दशमी को पुनः प्रारंभ हुआ। फागुन शुक्ल एकादशी को मातलि द्वारा श्रीराम को विजयरथ दान किया।
फागुन शुक्ल द्वादशी से रथारूढ़ राम का रावण से तक 18 दिन युद्ध चला। चैत्र कृष्ण चौदस को दशानन रावण को मौत के घाट उतारा गया
युद्धकाल पौष शुक्ल द्वितीया से चैत्र कृष्ण चतुर्दशी तक (87 दिन) 15 दिन अलग अलग युद्धबंदी रही 72 दिन चला महासंग्राम और श्रीराम विजयी हुए, चैत्र कृष्ण अमावस्या को विभीषण द्वारा रावण का दाह संस्कार किया गया।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नव संवत्सर) से लंका में नये युग का प्रारंभ हुआ। चैत्र शुक्ल द्वितीया को विभीषण का राज्याभिषेक किया गया।
अगले दिन चैत्र शुक्ल तृतीया का सीता की अग्निपरीक्षा ली गई और चैत्र शुक्ल चतुर्थी को पुष्पक विमान से राम, लक्ष्मण, सीता उत्तर दिशा में उड़े। चैत्र शुक्ल पंचमी को भरद्वाज के आश्रम में पहंचे। चैत्र शुक्ल षष्ठी को नंदीग्राम में राम-भरत मिलन हुआ।
चैत्र शुक्ल सप्तमी को अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक किया गया। यह पूरा आख्यान ऋषि आरण्यक ने शत्रुघ्न को सुनाया फिर शत्रुघ्न ने आरण्यक को अयोघ्या पहुंचाया जहां अपने आराध्य पूर्णावतार श्रीराम के सान्निध्य में ब्रह्मरंध्र द्वारा सारूप्य मोक्ष पाया।


विकाश श्योराण जी
उत्तर भारत में विशेषकर उत्तर प्रदेश बिहार का जो क्षेत्र है वहां पर नवरात्रि के अंतर्गत रामलीला का मंचन नौ दिवसीय होता है और रावण वध के बाद रावण जलाने की परंपरा एक षड्यंत्र के तहत अंग्रेजों द्वारा काशी में आरंभ की गई।
और उस उत्सव को आगे बढ़ाते हुए दीपावली जोकि विशेष रूप से पितरों की विदाई का पर्व है। उसे भगवान श्री राम के आगमन से जोड़ दिया गया हालांकि भगवती लक्ष्मी का प्राकट्य भी उस दिन नहीं है

दशहरा

आओ बड्डे
लोंग, सुपारी, पान पा लो,
भूलें बिसरा दो
गले लगा लो।
ऐसौ हतौ दशहरा रीत कौ, 
होत हतौ व्यवहार प्रीत कौ।
मारा मूरी, जला-जलोई से 
दुशमनियाँ नोईं मिटत हैं,
वे तौ मिटत हैं
आवे-जावे सें,
मिले-मिलाये सें,
 लैवे-दैवे सें,
खावे-खवाय सें,
सो आओ भज्जा, 
बैठो थाई पै, 
खोलो मुँह
लोंग, सुपारी, 
पान खा लो।
खोलो हाथ 
गौतम को 
गरें लगा लो।