Saturday, 25 February 2023

जैन दर्शन

 

जैन दर्शन - प्रमाण मीमांसा

उपासक तत्व चर्चा whatsapp ग्रुप में डा. मंजू जी नाहटा द्वारा लिखे गए posts का संकलन :

प्रमाण का अर्थ:-
प्रमाण का अर्थ - किसी भी पदार्थ को जानने का माध्यम या साधन। definition- "प्रमाकरणं प्रमाणं"
प्रमा का अर्थ है ज्ञान। करण का अर्थ है साधन।अत: अर्थ हुआ– ज्ञान ( प्रमा) का साधन प्रमाण है।
एक और शब्द है - न्याय । इसे भी जानें। कारण- प्रमाणप्रमेयप्रमितिप्रमाता - ये न्याय के ४ अंग हैं।– "चतुरंग: न्याय: " 
अभी हम न्याय के प्रथम अंग प्रमाण की चर्चा करेंगें।
जैनदर्शन में प्रमाण की शुरूआत:
जैनों के आगमों में पंच ज्ञान का सिद्धांत ही प्राचीन था।
जैन दर्शन में सर्वप्रथम पहली शती AD के आसपास उमास्वाति ने प्रमाण की चर्चा की।फिर भी इस प्रमाण के क्षेत्र में हम जैनों का प्रवेश बौद्धोंनैयायिकोंमीमांसकों के बहुत पश्चात् ही हुआ। पण्डित सुखलालजी के अनुसार
1/. आगम युग-1st century AD,
 2/.अनेकांतस्थापनायुग 2nd cent. AD से 8th cent.AD
3/. न्याय-प्रमाणस्थापना युग 8th cent.AD onwards.

जैनदर्शन में प्रमाण की आवश्यकता:
अनेकांतवाद जैन दर्शन का आधारभूत सिद्धांत रहा है।
आगमयुग में अनेकांत का उपयोग द्रव्य मींमांसा के लिए हुआ करता था।किंतु समय में परिवर्तन हुआ- खण्डन मण्डन का युग आया तब अनेकान्त का उपयोग क्षेत्र भी बदल गया। अब इस दर्शन युग में अनेकान्त का उपयोग विभिन्न दार्शनिक समस्याओं को सुलझाने एवं एकांतवादी दर्शनों के सिद्धान्तों के मध्य समन्वय स्थापित करने मे होने लगा। धीरे - धीरे प्रमाण व्यवस्था का विकास होने पर वहाँ भी अनेकान्त का व्यापक उपयोग होने लगा।
जैन आगम ज्ञान मीमांसा प्रधान रहे हैं किन्तु आगमोत्तर युग मे जैसे - जैसे न्याय विद्या का विकास हुआ वैसे - वैसे प्रमाण मीमांसा की आवश्यकता महसूस होने लगी।
प्रमाण के भेद :-
जैन दर्शन में प्रमाण के दो भेद माने गए हैं - प्रत्यक्ष परोक्ष । हम पदार्थ को या तो साक्षात् देखते हैं या किसी माध्यम से । अर्थात् जानने की दो पद्धतियाँ होती हैं ।

Notable:
प्रत्येक भारतीय दर्शन में प्रमाण के साथ प्रत्यक्ष शब्द का ही प्रयोग हुआ है। लेकिन जैन ज्ञानमीमांसाप्रमाण मीमांसा में प्रमाण के साथ प्रत्यक्ष शब्द के साथ परोक्ष का भी प्रयोग हुआ है।प्रमाण को बिस्तार से समझने से पहले आवश्यक है कि जैन आचार्यों द्वारा दी गई प्रमाण की परिभाषाओं को हम हृदयंगम करें।

प्रमाण की परिभाषाएँ :-

सही है कि हम किसी वस्तु को जानना चाहते हैं तो सर्वप्रथम उसकी परिभाषाओं पर दृष्टिपात करें।
आचार्य उमास्वाति ने ज्ञान को प्रमाण कह दिया। "ज्ञानं प्रमाणं"। 

लेकिन उस युग के जो न्यायविद् थे। वे इतनी सी परिभाषा से संतुष्ट नहीं हुए। अत: later दार्शनिकों की दृष्टि से प्रमाण को परिभाषित करते हुए आचार्य सिद्धसेन और आचार्य समंतभद्र कहते हैं:- "प्रमाणं स्वपरावभासिज्ञानं बाधविवर्जितं ।" अर्थात् स्वपरप्रकाशी निर्दोष ज्ञान प्रमाण हैं। 

जैनों ने बड़ी विलक्षणता से पक्ष-प्रतिपक्ष के गुण दोषों का मूल्याँकन कर अपनी अनेकान्त दृष्टि के आधार पर यह व्यापक परिभाषा बनायी । जैनों ने यह परिभाषा नैयायिक मीमांसक एवं बौद्धों के पश्चात् बनाई थी अत: अपनी तरफ़ से परिभाषाओं को ठीक करते हुए नई परिभाषा प्रस्तुत की -"प्रमाणं स्वपरावभासिज्ञानं बाधविवर्जितं ।" इस परिभाषा का अर्थ हुआ

अर्थात् जो स्वपरप्रकाशी और निर्दोष ज्ञान है - वह प्रमाण हैं। नैयायिक ज्ञान को स्व संवेदी नही मानते अर्थात् ज्ञान स्वयं अपने आपको नही जानता दूसरे ज्ञान से जाना जाता है इसी प्रकार मीमांसक भी परोक्ष ज्ञानवादी थे वे कहते हैं कि ज्ञान स्वयंस्वयं को नही जानता जिस प्रकार एक चाकू स्वयंस्वयं को नही काट सकता - एक चाक़ू  को काटने के लिए हमें दुसरे चाक़ू की आवश्यकता होती है। एक नट अपने ही कंधे पर चढ़कर नाच नही सकता। हाँदूसरे कंधों पर या रस्सी पर कहेंगे तो वह चढ़ सकता है । अब दूसरी और देखिए जो विज्ञानवादी बौद्ध हैं वे ज्ञान को स्व संवेदी ही मान रहे थे। बाह्य पदार्थो को मिथ्या कहा और परभासित्व अर्थात् दूसरों को जानने की बात को नकार दिया।जैन आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने इन दोनों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए अपने प्रमाण की परिभाषा में स्वपरावभासि एवं बाधविवर्जित (निर्दोष) इन दोनों विशेषणों का चतुराई से प्रयोग किया।

ज्ञान स्वप्रकाशी और अर्थप्रकाशी दोनों है अर्थात् जो ज्ञान अपना और पर का बोध कराएवह प्रमाण है।
 सीधे शब्दों में वही ज्ञान प्रमाण की category में सम्मिलित होगा जो स्वयं को जानने के साथ पर को भी जाने।

इनके पश्चात अकलंक आए उन्होंने सिद्धसेन द्वारा प्रयुक्त 'बाधविवर्जित शब्द को स्वीकार नहीं किया और प्रमाण उसे कहा जो अविसंवादी ( सत्य ख्यापित करने वाला) और अज्ञात अर्थ को जानने वाला हो वही ज्ञान प्रमाण है।- "प्रमाणमविसंवादीज्ञानमधिगतार्थलक्ष्णत्वात् "। इसका अर्थ हुआ - ज्ञात अर्थ को पुन: जानना प्रमाण नहीं।

इनकी परिभाषा से जो अर्थ निकलता है वह कुमारिल( एक मीमांसक आचार्य) और धर्मकीर्ति (एक बौद्ध आचार्य) का प्रभाव परिलक्षित हो रहा है।

इनके पश्चात विद्यानंदवादिदेवसूरि द्वारा दी गई परिभाषाएँ तो प्राय: आचार्य सिद्धसेन और समंतभद्र द्वारा दी गई परिभाषाओं से मेल खाती हुईं ही हैं। केवल उनके शब्दान्तर मात्र ही हैं।आचार्य सिद्धसेन और समंतभद्र ने 'अवभासपद का प्रयोग किया और और इन्होंने 'व्यवसायया निर्णीत पद का प्रयोग कर लिया। आचार्य विद्यानंद - "स्वपरव्यवसायी ज्ञानं प्रमाणम्"।

चतुर्थ वर्ग में हेमचंद्राचार्य ने 'स्वबाधविवर्जितअनधिगतया अपूर्वआदि सभी पद हटा कर एक नई परिभाषा दी – "सम्यगर्थनिर्णय:"

भिक्षुन्यायकर्णिका में आ.तुलसी ने परिभाषा दी – "यथार्थज्ञानं प्रमाणम्"-( वस्तु को जानने का साधन प्रमाण है)।

आइए अब समझें – ज्ञान और प्रमाण क्या हैंक्या दोनों में कोई समानता है?

उत्तर- हर ज्ञान प्रमाण नहीं होगा। लेकिन प्रमाण ज्ञान ही होगा।
जैन परंपरा ज्ञान को ही प्रमाण मानती है।ज्ञान को प्रमाण किस आधार पर कहा गयाऔर प्रमाण के विभाग कैसे किये गये? - आचार्य महाप्रज्ञ का उत्तर- "ज्ञान केवल आत्म का विकास है। प्रमाण पदार्थ के प्रति ज्ञान का सही व्यापार है। ज्ञान आत्मनिष्ठ है। प्रमाण का संबंध अंतर्जगत् और बहिर्जगत् दोनों से है। बहिर्जगत् की यथार्थ घटनाओं को जब अंतर्जगत् तक पहुँचाए यही प्रमाण का जीवन है। बहिर्जगत् के प्रति ज्ञान का व्यापार एक सा नहीं होता। ज्ञान का विकास प्रबल होता है तब वह बाह्य साधन की सहायता के बिना ही विषय को जान लेता है।विकास कम होता है तब वह बाह्य साधन का सहारा लेना पड़ता है।"

ज्ञान को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।
१/. यथार्थ- केवल प्रमाण
२/. अयथार्थ- प्रमाण नहींकेवल(only) ज्ञान।
अयथार्थ ज्ञान प्रमाण नहीं होता है। अयथार्थ ज्ञान तीन प्रकार का होता है।- विपर्ययसंशयअनध्यवसाय।
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भारतीय परंपरा में मात्र ज्ञान पर विश्लेषण नंदी सूत्र में ही पाया जाता है। आगमों में कहीं परोक्ष शब्द का प्रयोग  इस context में नहीं मिलता है। वहाँ ५ ज्ञान की चर्चा है।

आगम युग में ज्ञान चर्चा के विकास क्रम में तीन भूमिकाएं बनती हैं।:

१/. भगवती सूत्र में ज्ञान को ५ भेदों में विभक्त किया गया है।

२/. स्थानांगसूत्र में ज्ञान को २ भेदों में विभक्त किया गया है।प्रथम दो ज्ञान परोक्ष हैं वे इंद्रिय उत्पन्न ज्ञान हैं। द्वितीय अंतिम ३ ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान हैं। हम उन्हें आत्म -सापेक्ष ज्ञान कह सकते हैं।
यहाँ problem यह है कि जिस इंद्रिय ज्ञान को अन्य सभी दार्शनिक प्रत्यक्ष स्वीकार करते थे– वह इंद्रिय ज्ञान जैन परंपरा में परोक्ष ही रहा। यह जैनों के आगम युग की देन थी।

 ३/. नंदी सूत्र में ज्ञान को ५ भागों में विभक्त करके फिर इनका समावेश प्रथम बार प्रत्यक्ष एवं परोक्ष इन दो भेदों में किया।

यह सब बाद के दार्शनिकों ने develop कियाविस्तार किया। 'परोक्षएक ऐसा शब्द है जो जैन ज्ञान मीमांसा या प्रमाण मीमांसा में ही प्रयुक्त हुआ है। Jain Logicians का यह original contribution है– " परोक्ष की अवधारणा"।

इस विभाजन की यह विशेषता है कि इसमें इंद्रियजन्य मतिज्ञान को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष इन दोनों भेदों के अंतर्गत स्वीकार किया गया है।

इंद्रिय ज्ञान वस्तुत: तो परोक्ष ही है लेकिन लोकव्यवहार के कारण उसको प्रत्यक्ष कहा है। वास्तविक प्रत्यक्ष तो अवधिमन:पर्यव एवं केवल ज्ञान ही है।

Conclusion:

1/. अवधिमन:पर्यव एवं केवलज्ञान पारमार्थिक प्रत्यक्ष है।
2/. श्रुतज्ञान परोक्ष ही है।
3/. इंद्रियजन्य मतिज्ञान पारमार्थिक दृष्टि से परोक्ष है और व्यवहारिक दृष्टि से प्रत्यक्ष है। 
4/. मनोजन्य मतिज्ञान परोक्ष ही है।

जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ने सर्वप्रथम 'विशेषावश्यक भाष्यमें इंद्रिय ज्ञान के लिए सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष शब्द का प्रयोग किया। हालाँकि लोग इसके प्रथम उपयोग करने वाले को आचार्य अकलंक मानते हैं।
आचार्य अकलंक को मानने के कारण:-

१/. अकलंक उत्तरवर्ती आचार्य हैं।
२/. अकलंक के ग्रंथ संस्कृत में थे इसलिए लोग उन्हें आसानी से पढ़ पाते थे। इसलिए अकलंक का नाम लिया जाता है।

 सारे दार्शनिक उस समय इंद्रिय से होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष मान रहे थे– वाद विवाद का समय था। तब जैनों ने जटिल परिस्थिति में स्वयं की सुरक्षा के लिए सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष को स्वीकार किया।
प्रत्यक्ष का अर्थ है -

१/. आत्मा,
२/. इंद्रिय। 

इसलिए इसका समाहार इंद्रिय-प्रत्यक्ष और आत्म-प्रत्यक्ष में करते हैं। "
आत्मा के दो गुण हैं।
१/. ज्ञान और २/. दर्शन।

दर्शन प्रमाण नहीं बनता केवल (only) ज्ञान ही प्रमाण बनता है।

प्रमाण की आवश्यकता:-
वस्तु का अर्थ स्वत: सिद्ध होता है।
ज्ञाता उसको जाने या न जाने इससे उसके अस्तित्व में अंतर नहीं पड़ता। हाँ जब वह वस्तु ज्ञाता के द्वारा जानी जाय तब वह प्रमेय बन जाती है। और ज्ञाता जिससे जानता हैवह ज्ञान यदि सम्यक् और निर्णायक होता है तो प्रमाण बन जता है।

भिक्षुन्यायकर्णिका में आ.तुलसी ने परिभाषित करते हुए लिखा है
 "युक्त्यार्थपरीक्षणं न्याय:"– युक्ति के द्वारा पदार्थ का परीक्षण करना न्याय है। यहाँ दो शब्दों को समझना ज़रूरी है– युक्ति और परीक्षा।

१/. युक्ति- साध्य और साधन के अविरोध का नाम है युक्ति।
२/. परीक्षा- एक वस्तु के बारे में अनेक विरोधी विचार सामने आते हैं। तब उनके बलाबल अर्थात् सही ग़लत के निर्णय करने के लिए जो विचार किया जाता है उसका नाम परीक्षा है।

प्रयोजन of न्याय:- पदार्थ का ज्ञानवस्तु को जानना। वस्तु को जानने के साधन: वस्तु को जानने के साधन दो हैं।

१/. लक्षण
२/. प्रमाण
१/. लक्षण:- लक्षण का अर्थ पहचान, identity, यह वस्तुगत होती है। लक्षण के दो प्रकार हैं:-
१/. आत्मभूत लक्षण
२/. अनात्मभूत लक्षण
१.आत्मभूत लक्षण:- जिस लक्षण से स्वयं को अलग न किया जा सके।जैसे- गेहूँ से लकीरजीव से चेतनागाय से सास्ना( गलकंबल)साधु से महाव्रत। intrinsic nature.
२. अनात्मभूत लक्षण:- जो लक्षण लक्ष्य से अलग किया जा सके। जैसे दण्डी से दण्डचश्मुद्दीन से चश्मालाल टोपी वाले से टोपी।
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Qu.1. प्रमाण क्या है?

Ans.1. किसी भी पदार्थ को जानने का माध्यम या साधन।

Qu.2.प्रमाण की परिभाषा क्या है

Ans.2."प्रमाकरणं प्रमाणं" 

प्रमा का अर्थ है ज्ञान। करण का अर्थ है साधन।अत: अर्थ हुआ– ज्ञान ( प्रमा) का साधन प्रमाण है।

Qu.3.न्याय क्या है।

Ans.3.युक्ति के द्वारा पदार्थ (प्रमेय) – वस्तु की परीक्षा करना । इसके चार अंग है 

i.  प्रमाण – (यथार्थ ज्ञान) – मीमांसा का मानदंड
ii.  प्रमेय – (पदार्थ) – जिसकी मीमांसा की जाए
iii. प्रमाता (आत्मा) – तत्त्व की मीमांसा करने वाला
iv. प्रमिति (हेय-ज्ञेय-उपादेय बुद्धि) – मीमांसा का फल

Qu.4.प्रमाण और न्याय में क्या कोई संबंध है?

Ans.4. प्रमाणन्याय का ही एक अंग है ।

Qu.5.जैन दर्शन में प्रमाण-मीमांसा की शुरुआत कब और कैसे हुई 

Ans.5. भगवान् महावीर के समय में भी वादी मुनि थेजो अपने मत की स्थापना व दूसरे मत का युक्ति सहित निराकरण करते थेपरन्तु आप्तपुरुष की उपस्थिति में शायद उस समय इसको प्रमाण-मीमांसा में नहीं माना गया ।  

जैन दर्शन में सर्वप्रथम पहली शती AD के आसपास उमास्वाति ने प्रमाण की चर्चा की।फिर भी इस प्रमाण के क्षेत्र में हम जैनों का प्रवेश बौद्धोंनैयायिकोंमीमांसकों के बहुत पश्चात् ही हुआ। आचार्य सिद्धसेन और आचार्य समंतभद्र और आचार्य अकलंक आदि ने इसके क्रमशः विकास में योगदान दिया।

Qu.6. जैन दर्शन में प्रमाण मीमंसा की आवश्यकता क्यों पड़ी?

Ans.6.अनेकांतवाद जैन दर्शन का आधारभूत सिद्धांत रहा है।
आगमयुग में अनेकांत का उपयोग द्रव्य मींमांसा के लिए हुआ करता था।किंतु समय में परिवर्तन हुआ- खण्डन मण्डन का युग आया तब अनेकान्त का उपयोग क्षेत्र भी बदल गया। अब इस दर्शन युग में अनेकान्त का उपयोग विभिन्न दार्शनिक समस्याओं को सुलझाने एवं एकांतवादी दर्शनों के सिद्धान्तों के मध्य समन्वय स्थापित करने मे होने लगा। धीरे - धीरे प्रमाण व्यवस्था का विकास होने पर वहाँ भी अनेकान्त का व्यापक उपयोग होने लगा।

Qu.7.प्रमाण के भेद कितने है !(मौटे तौर पर)

Ans.7.  1/प्रत्यक्ष ,
             2/. परोक्ष।

Qu.8.जैनों की प्रमाण मीमांसा में एक विशेषता क्या है  जैन आचार्यों द्वारा दी गई परिभाषाओं को क्रमश: समझें और अनुभव करें कि किसकी परिभाषा किस दर्शनमें प्रभावित है?

Answer8:

1. आचार्य उमास्वाति ने ज्ञान को प्रमाण कह दिया। "ज्ञानं प्रमाणं"। लेकिन उस युग के जो न्यायविद् थे। वे इतनी सी परिभाषा से संतुष्ट नहीं हुए।

2. तदुपरान्त दार्शनिकों की दृष्टि से प्रमाण को परिभाषित करते हुए आचार्य सिद्धसेन और आचार्य समंतभद्र कहते हैं:- "प्रमाणं स्वपरावभासिज्ञानं बाधविवर्जितं ।" अर्थात् स्वपरप्रकाशी निर्दोष ज्ञान प्रमाण हैं। जैनों ने बड़ी विलक्षणता से पक्ष-प्रतिपक्ष के गुण दोषों का मूल्याँकन कर अपनी अनेकान्त दृष्टि के आधार पर यह व्यापक परिभाषा बनायी । जैनों ने यह परिभाषा नैयायिक मीमांसक एवं बौद्धों के पश्चात् बनाई अत: इस परिभाषाओं को ठीक करते हुए नई परिभाषाएँ  प्रस्तुत की।

अर्थात् जो स्वपरप्रकाशी और निर्दोष ज्ञान है - वह प्रमाण हैं। नैयायिक ज्ञान को स्व संवेदी नही मानते अर्थात् ज्ञान स्वयं अपने आपको नही जानता दूसरे ज्ञान से जाना जाता है इसी प्रकार मीमांसक भी परोक्ष ज्ञानवादी थे वे कहते है कि ज्ञान स्वयंस्वयं को नही जानता जिस प्रकार एक चाकू स्वयंस्वयं को नही काट सकता - एक चाकु को काटने के लिए हमें दुसरे चाकु की आवश्यकता होती है। एक नट अपने ही कंधे पर चढ़कर नाच नही सकता। हाँदूसरे कंधों पर या रस्सी पर कहेंगे तो चढ़ सकता है ।

3. जो विज्ञानवादी बौद्ध हैं वे ज्ञान को स्व संवेदी ही मान रहे थे। बाह्य पदार्थों को मिथ्या कहा और परभासित्व अर्थात् दूसरों को जानने की बात को नकार दिया।जैन आचार्य सिद्धसेन दिवाकर ने इन दोनों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए अपने प्रमाण की परिभाषा में स्वपरावभासि एवं बाधविवर्जित (निर्दोष) इन दोनों विशेषणों का चतुराई से प्रयोग किया।

ज्ञान स्वप्रकाशी और अर्थप्रकाशी दोनों है अर्थात् जो ज्ञान अपना और पर का बोध कराएवह प्रमाण है।
सीधे शब्दों में वही ज्ञान प्रमाण की category में सम्मिलित होगा जो स्वयं को जानने के साथ पर को भी जाने।

4. इनके पश्चात अकलंक आए उन्होंने सिद्धसेन द्वारा प्रयुक्त 'बाधविवर्जितशब्द को स्वीकार नहीं किया और प्रमाण उसे कहा जो अविसंवादी ( सत्य ख्यापित करने वाला) और अज्ञात अर्थ को जानने वाला हो वही ज्ञान प्रमाण है।- "प्रमाणमविसंवादीज्ञानमधिगतार्थलक्ष्णत्वात् "। इसका अर्थ हुआ - ज्ञात अर्थ को पुन: जानना प्रमाण नहीं।

इनकी परिभाषा से जो अर्थ निकलता है वह कुमारिल( एक मीमांसक आचार्य) और धर्मकीर्ति (एक बौद्ध आचार्य) का प्रभाव परिलक्षित हो रहा है।

5. इनके पश्चात विद्यानंदवादिदेवसूरि द्वारा दी गई परिभाषाएँ तो प्राय: आचार्य सिद्धसेन और समंतभद्र द्वारा दी गई परिभाषाओं से मेल खाती हुईं ही हैं। केवल उनके शब्दान्तर मात्र ही हैं।आचार्य सिद्धसेन और समंतभद्र ने अवभास पद का प्रयोग किया और और इन्होंने व्यवसाय या निर्णीत पद का प्रयोग कर लिया। आचार्य विद्यानंद - "स्वपरव्यवसायी ज्ञानं प्रमाणम्"।

6. हेमचंद्राचार्य ने स्वबाधविवर्जितअनधिगतया अपूर्व आदि सभी पद हटा कर एक नई परिभाषा दी – "सम्यगर्थनिर्णय: प्रमाणम्"

7. भिक्षुन्यायकर्णिका में आ.तुलसी ने परिभाषा दी – "यथार्थज्ञानं प्रमाणम्"।

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Question:  "युक्ति- साध्य और साधन के अविरोध का नाम है युक्ति।" साध्य और साधन में अविरोध कैसे होगा कोई उदाहरण


Answer: युक्ति 

•  साध्य और साधन में अविरोध ।
•  It means there is no contradiction between probandum (साध्य) and probans (साधन) ।
•  साध्य है अग्नि और साधन है धुआं ।
•  यदि इनमें विरोध हुआ तो उसका अर्थ हुआ धुआं हैअग्नि नहीं है” । यह कोई युक्ति नहीं हुई ।
क्या कभी आग के बिना धुआं उठेगा यदि इनमें अविरोध होगा तो अर्थ होगा जहाँ- जहाँ धुआं हैवहाँ-वहाँ अग्नि है । यह युक्ति हुई ।

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मिथ्या ज्ञान को प्रमाणाभास कहते हैं। वे तीन हैं:-
 1/.  संशय
2/.  विपर्यय
3/. अनध्यवसाय

१/. संशय-विरुद्ध अनेक कोटि स्पर्श करने वाले ज्ञान को संशय कहते हैजैसे यह सीप है या चांदी। व्यक्ति doubtful रहता है।

२/. विपर्यय- विपरीत एक कोटि ज्ञान के निश्चय करने वाले ज्ञान को विपर्यय कहते है। जैसे सीप को चांदी जानना।wrong knowledge.

३/. अनध्यवसाय- यह क्या है! ऐसे प्रतिभास को अनध्यवसाय कहते हैं जैसे-मार्ग में चलते हुए तृण का ज्ञान करना। actually अनध्यवसाय आलोचना मात्र होता है। किसी पक्षी को देखाऔर एक आलोचना शुरू हो गयी -इस पक्षी का नाम क्या हैचलते चलते किसी पदार्थ का स्पर्श हुआ। यह जान लिया स्पर्श हुआ है किन्तु किस वस्तु का हुआ हैयह नहीं जाना। इस ज्ञान की आलोचना में ही परिसमाप्ति हो जाती हैकोई निर्णय नहीं निकलता। इसमें वस्तु स्वरूप का अन्यथा (उलटा-पुल्टा) ग्रहण नहीं होता इसलिए यह विपर्यय से भिन्न है और यह विशेष का स्पर्श नहीं करताइसलिए संशय से भिन्न है।

Conclusion:

1.यथार्थ ज्ञान=यह रस्सी है।
2.विपर्ययज्ञान =यह साँप है।
3.संशय ज्ञान =यह रस्सी हैया साँप है।
4.अनध्यवसाय ज्ञान= रस्सी को दैख कर भी पता नहीं चलता कि यह किया हैविषय का स्पर्श मात्र हुआनामोल्लेख नहीं होता। अगर यह आगे बढ़े तो अवग्रह के अंतर्गत आ जाएगा।
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प्रत्यक्ष प्रमाण

प्रत्यक्ष प्रमाण की चर्चा :-

जैन दर्शन के अनुसार आत्मा से होने वाला ज्ञान प्रमाण है जबकि प्रायः सभी दार्शनिक प्रत्यक्ष शब्द की व्युत्पत्ति में 'अक्षपद का अर्थ इन्द्रिय मानकर कर रहे थे । उनमें से किसी दर्शन ने भी 'अक्षशब्द का 'आत्माअर्थ मानकर व्युत्पत्ति नहीं की ।

न्याय- वैशेषिकसांख्य-योगमीमांसा आदि दर्शनों के अनुसार इन्द्रिय और मन की सहायता से होने वाला ज्ञान प्रत्यक्ष है ।

इन दर्शनों में प्रसिद्ध प्रत्यक्ष-प्रमाण जैन आगमिक परम्परा के अनुसार परोक्ष-प्रमाण कहलाता है । जैन दार्शनिकों ने इस विरोध को दूर करने के लिए और अन्य दर्शनों के साथ समन्वय करने की दृष्टि से प्रत्यक्ष की परिभाषा में कुछ परिवर्तन किया और कहा 'विशदः प्रत्यक्षम्' -विशद् (स्पष्ट) ज्ञान प्रत्यक्ष है ।

प्रत्यक्ष के उन्होंने दो भेद कर दिये-१/. पारमार्थिक प्रत्यक्ष और  २/. सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष।
सर्व प्रथम जिनभद्रगणी क्षमाश्रमण और आचार्य अकलंक ने सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष के रूप में इन्द्रिय प्रत्यक्ष को प्रतिष्ठापित कर आगमिक और दार्शनिक युग का समन्वय किया । इस प्रकार जैन दृष्टि से सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष अन्य दर्शनों के साथ समन्वय का फलित रूप है।

जैन दर्शन में प्रत्यक्ष के दो प्रकार माने गए हैं।

1/ पारमार्थिक प्रत्यक्ष,
2/ सांव्यव्हारिक प्रत्यक्ष।

1/. पारमार्थिक प्रत्यक्ष                  (transcendent)
जिस ज्ञान में इन्द्रिय,मन या किसी अन्य प्रमाणों की सहायता की अपेक्षा नहीं होती तथा जो आत्मा से सीधा होता हैउसे पारमार्थिक प्रत्यक्ष कहते हैं।

इसके तीन प्रकार है-

1. अवधिज्ञान,
2. मनः पर्यवज्ञान,
3. केवलज्ञान।

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परोक्ष प्रमाण

जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में प्रत्यक्ष प्रमाण समझने के पश्चात् हम परोक्ष प्रमाण को समझें

Qu. परोक्ष प्रमाण के भेद?

Ans. मुख्य ५ हैं।

१/. स्मृति
२/. प्रत्यभिज्ञा
३/. तर्क
४/. अनुमान
५/. आगम

१/. स्मृति  हम अपना अधिकांश व्यवहार स्मृति के आधार पर ही चलाते हैं। पानी पीते हैं और प्यास बुझ जाती है। यह हमारा जो अनुभव किया हुआ है उसकी स्मृति के आधार पर ही हमें जब-जब प्यास लगती है हम पानी पीते हैं। और पाते हैं कि easily प्यास बुझ जाती है। अत: जैन स्मृति को प्रमाण मानते हैं।
लेकिन कुछ लोग ऐसा तर्क भी देते हैं कि कभी कभी स्मृति गलत भी हो जाती है। ऐसी अयथार्थ स्मृति को प्रमाण कैसे समझा जाय?
इस आरोप का जैन कुछ इस तरह समाधान देते हैं– जैसे कभी उड़ती हुई धूल को दूर से देख कर प्रत्यक्ष लगता है कि धुंआ उठ रहा है। अत: ऐसे अयथार्थ ज्ञान कभी कभी प्रत्यक्ष में भी हो जाते हैं। ऐसे ही कभी स्मृति से भी ऐसे अयथार्थ ज्ञान होने की संभावना हो सकती है। प्रमाणयुग में अन्य दार्शनिकों ने  जैनों द्वारा स्मृति को प्रमाण मानने की युक्तियों पर आक्षेप लगाए गए। जैनों द्वारा दूसरों के द्वारा लगाए हुए आक्षेपों की समीक्षाओं के उत्तर में ये युक्तियाँ दी गईं।

Question:

अन्य दार्शनिकों द्वारा जैनों के परोक्ष प्रमाण स्मृति पर लगाए गए आक्षेप क्या थेऔर जैनों द्वारा स्मृति को परोक्ष प्रमाण सिद्ध करते हुए क्या उत्तर दिए गए?

1/ बौद्ध: 
बौद्धो ने स्मृति को प्रमाण नहीं माना। उसे प्रमाण न मानने के पीछे उनका यह तर्क था की स्मृति पूर्व अनुभव के अधीन होती है इसीलिए वह अपूर्व नहीं होती अत: वह प्रमाण नहीं हो सकती । इनके अनुसार प्रमाण वह ज्ञान होता है जो अपूर्व अर्थ को जानता है (अपूर्व= पहले  कभी न जाना गयावह ) स्मृति में अपूर्वता नहीं होती अतः वह प्रमाण नहीं।

2/ मीमांसक:
कुमारिल (एक आचार्य) आदि मीमांसक ने स्मृति को प्रमाण नहीं माना। इनका कहना है की स्मृति गृहीतग्राही ज्ञान है। (गृहीतग्राही ज्ञान का अर्थ है ग्रहण किये हुए ज्ञान को पुनः ग्रहण करना)और   गृहीतग्राही ज्ञान कभी प्रमाण नहीं बन सकता।मीमांसक बौद्ध आदि के अनुसार स्मृति गृहीतग्राही होने के कारण या आप यू कह दे की अपूर्व अर्थ का प्रकाशन न होने के कारण अप्रमाण हैं।
अब इस आपेक्ष के उपरांत स्मृति को प्रमाण साबित करते हुए जैन अपने पक्ष को पुष्ट इस प्रकार करते हैं:-जैन कहते हैं की पहले से गृहीतग्राही हर ज्ञान अप्रमाण कहा जाए तब तो फिर यदि किसी व्यक्ति ने पहले पर्वत पर उठते हुए धुंए को देख कर वहां अग्नि है ऐसा अनुमान से जाना और फिर वहां on the spot जाकर अनुमान से जानी हुई अग्नि को प्रत्यक्ष से जाना तो वह प्रत्यक्ष भी अप्रमाण कहलाएगा।
क्योंकि यहाँ पर भी गृहीतग्राही होने के कारण अपूर्वता नहीं हैं।क्योंकि जिस अग्नि को अनुमान से जाना उस अग्नि को ही प्रत्यक्ष से जाना गया हैं।जैनो का कहना हैं की अनुमान से जानी हुई अग्नि को प्रत्यक्ष से जानने पर उस में कुछ अपूर्वता रहती हैं।अतः जब प्रत्यक्ष प्रमाण हैं तो स्मृति को अप्रमाण क्यों माने ?

3/नैयायिक :

ये स्मृति को प्रमाण नहीं मानतेइसका कारण हैं यह कहते हैं की स्मृति पदार्थ जन्य नहीं हैं।अब जैन कहते हैं की यदि नैयायिक स्मृति को प्रमाण नहीं मानते तो उन्हें अनुमान को भी प्रमाण मानने में कठिनाई होगी(जबकि नैयायिक अनुमान को प्रमाण मानते हैं-इसकी हम आगे चर्चा करेंगे)।
एक उदहारण से जैन अपने पक्ष पुष्ट करते हैं-जैसे सुबह नदी में बाढ देख कर रात में वर्षा होने का अनुमान किया जाता हैं।
यहाँ पर भी रात्रि में हुई वर्षा को हमने प्रत्यक्ष नहीं देखा था,फिर भी वर्षा का अनुमान कर लियातो यह  अनुमान जिसे नैयायिक  प्रमाण मानते हैं,ये कैसे संभव होगा ?
अतः जैन कहते हैं की स्मृति अर्थ जन्य (पदार्थजन्य) न होने पर भी प्रमाण हैं।

Conclusion:

जैनो के अनुसार स्मृति प्रमाण हैंक्योंकि उसका अपना स्वरुपकारणविषय एवं प्रयोजन हैं।
प्रमाण का आधार  अपूर्वता ,अगृहीतग्राहिता या अर्थ जन्य नहीं अपितु  प्रमाण की कसोटी हैं -
अविसंवादिता (यथार्थ ज्ञान) हैं।और यह अविसंवादीता स्मृति में पायी जाती हैं।अत:स्मृति प्रमाण हैं।

'प्रत्यभिज्ञा'
2/ प्रत्यभिज्ञा :- स्मृति के पश्चात् यह परोक्ष प्रमाण का दूसरा भेद है।
प्रत्यभिज्ञा अनुभव और स्मृति के योग से उत्पन्न होता है । जैसे:- यह वही हैयह उसके समान हैयह उससे भिन्न हैविलक्षण है,
प्रतियोगी है आदि।
अर्थात् की यह एक संकलनात्मक ज्ञान हुआ।
A/.स्मृति का कारण जहाँ धारणा हैवहाँ  प्रत्यभिज्ञा के दो कारण है- प्रत्यक्ष और स्मृति।

B/.  स्मृति का विषय जहाँ अनुभूत पदार्थ हैवहाँ प्रत्यभिज्ञा का स्वरूपस्मृति और प्रत्यक्ष इन दोनों अवस्थाओं के बीच रहा एकत्व है।

C/.  स्मृति का स्वरूप जहाँ 'वह मनुष्य है' ; वहाँ प्रत्यभिज्ञा का स्वरूप, 'यह वही मनुष्य हैहै।

conclusion:  'यहमनुष्य इन्द्रिय प्रत्यक्ष का विषय हैऔर 'वहीस्मृति में है।
इन दोनों का प्रत्यक्ष और स्मृति का योग हो जाने पर जो ज्ञान होता है वह प्रत्यभिज्ञा है।

जैनों के अतिरिक्त अन्य किसी ने भी प्रत्यभिज्ञा के स्वतन्त्र प्रमाण्य को स्वीकार नहीं किया। एक उदाहरण से समझें– किसी एक व्यक्ति ने किसी व्यक्ति को बतायाजो दूध और पानी को अलग करेवह हंस होता है। वक्ता के ये दो शब्द उसके मन में संस्कार स्वरूप निर्मित हो गए। एक दिन उसने देखा की पक्षी की चोंच प्याले में पड़ी और दूध फट गया। क्षीरनीर अलग हो गए।
यहाँ उस व्यक्ति के प्रत्यक्ष और स्मृति दोनों का योग हुआऔर वह हंस नामक पक्षी को जान गया।
 इस प्रकार स्मृति और प्रत्यक्ष के निमित्त से होने वाले जितने संकलनात्मक ज्ञान हैंवे सब प्रत्यभिज्ञा के ही प्रकार हैं।

जैनों के अनुसार प्रत्यभिज्ञा ज्ञान परोक्ष प्रमाण हैक्योंकि उसका अपना स्वरूपकारण तथा विषय है। प्रत्यभिज्ञा में भी यथार्थ ज्ञान होता है,अतः वह भी प्रमाण है।

'तर्क'

3/. परोक्ष  प्रमाण का तीसरा प्रकार 'तर्कहै ।
इसका अपना स्वतन्त्र कार्य है। चिंतन के क्षेत्र में तर्क का महत्व बहुत पहले से है और न्याय शास्त्र में इसकी विशेष भूमिका रही है। अब मुझे आप लोगो को दो नए शब्दों से परिचित करवाना होगा-अन्वय और व्यतिरेक । अन्वय और व्यतिरेक के निर्णय को तर्क कहा जाता है।

A/ अन्वय: " यत्र यत्र धूमः तत्र- तत्र वह्नि"। जहाँ जहाँ धुँआ होता हैवहाँ- वहाँ अग्नि होती है। अब देखिये यहाँ दो चीजे हैं -
1/ साधन और 2/ साध्य

इस उपरोक्त पंक्ति में साधन "धुँआ" है (साधन= medium)। और
साध्य अग्नि हैअर्थात् हमारा लक्ष्य अग्नि को जानना है और अग्नि को जानने के लिए साधन धुँआ होता है।
अब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे की जहाँ-जहाँ धूम (साधन) हैवहाँ-वहाँ अग्नि (साध्य) है।
अर्थात् साधन के होने पर साध्य के होने को अन्वय कहते हैं।इसे तर्क की भाषा में अन्वय व्याप्ति भी कह देते हैं।

B/ व्यतिरेक:- साध्य के अभाव में साधन का अभाव होना व्यतिरेक है। जैसे- जहाँ-जहाँ अग्नि का अभाव हैवहाँ-वहाँ धूम का भी अभाव है । हम यह न भूलें अग्नि साध्य हैधूम साधन है। धुँआ देखकर ही हम अग्नि के होने को जानते हैंअग्नि के अभाव में धुँए का भी अभाव होता है। अतः साध्य के न होने पर साधन के न होने को व्यतिरेक कहा जाता है । इसे तर्क की भाषा में व्यतिरेक व्याप्ति  कहते हैं।

अन्वय और व्यतिरेक के सम्बन्ध का ज्ञान तर्क से होता है।अतः तर्क का विषय है व्याप्ति को ग्रहण करना। अनुमान के लिए व्याप्ति की अनिवार्यता होती हैऔर व्याप्ति के लिए तर्क की अनिवार्यता होती है।क्योंकि तर्क के बिना व्याप्ति की सत्यता निर्णय नहीं किया जा सकता। प्रायः सभी परम्पराएँ  जो तर्क शास्त्रीय हैंइसके महत्व को स्वीकार करती हैं। इनमें यदि मतभेद होतो वह अपने प्रामाण्य के विषय में है। अर्थात् कि कोई उसे प्रमाण और कोई उसे अप्रमाण मानता है।

तर्क प्रमाण या अप्रमाण:  जैन परम्परा में तर्क प्रमाण रूप से स्वीकृत है। जहाँ-जहाँ धूम होता हैवहाँ-वहाँ अग्नि होती है- यह व्याप्ति है। यह व्याप्ति का ज्ञान हमें तर्क प्रमाण के द्वारा होता है।

'अनुमान'

4/. अनुमान: यह न्याय शास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। चार्वाक के
अतिरिक्त अन्य सभी भारतीय दर्शन
'अनुमान प्रमाणको स्वीकार करते हैं।
अनु +मान= अनुमान।
अनु का अर्थ है पश्चात् और मान का अर्थ है ज्ञान। अर्थात् बाद मे होने वाला ज्ञान अनुमान है।

भिक्षुन्याय कर्णिका में अनुमान की परिभाषा है– 'साधनात् साध्यज्ञानमनुमानम्। साधन से साध्य का ज्ञान करना अनुमान है।
इस परिभाषा से यह फलित होता है कि अनुमान के मुख्य दो अंग है 
 1/ साधन और 2/ साध्य।

1/. साधन प्राय: प्रत्यक्ष होता है और साध्य परोक्ष होता है। हम सबसे पहले साधन को (धूम को) प्रत्यक्ष देखते हैं।
फिर जहाँ-जहाँ धुआँ होता है वहाँ-वहाँ अग्नि होती है। इस व्याप्ति की स्मृति करते हैं और उसके बाद साध्य
अग्नि) का ज्ञान करते हैं।

उदाहरण स्वरुप: पर्वत पर धुआँ है क्योंकि वहाँ पर अग्नि है। इस अनुमान वाक्य मे धूम साधन है।  और अग्नि साध्य है। और जिससे सिद्ध किया जाता हैं वह साधन कहलाता है। पर्वत पर उठता हुआ धुआँ जो कि साधन हैवह हमें प्रत्यक्ष दिखाई देता है और उस धुएँ को देखकर हम पर्वत पर अग्नि होने का अनुमान कर लेते हैं।
जैन दर्शन में 'अनुमान' (परोक्ष प्रमाण) के दो भेद हैं।

A/  स्वार्थानुमान: जो अपने अज्ञान की निवृति करने में समर्थ होवह स्वार्थानुमान है ।
B/  जो दुसरों के अज्ञान को दूर करने में समर्थ होवह परार्थानुमान है।

1/. दूसरे शब्दों में अनुमान के मानसिक क्रम को स्वार्थानुमान और वाचिक क्रम को परार्थानुमान कहते हैं।
2/. स्वार्थानुमान में अनुमान करने वाला स्वयं अपने संशय की निवृति करता है और परार्थानुमान में दुसरों की संशय निवृति के लिए कुछ वाक्यों का प्रयोग करता है जिसे पंच अवयव वाक्य कहते हैं।

उदाहरण स्वरुप : स्वार्थानुमान में व्यक्ति स्वयं धुएँ को देख कर अनुमान
कर लेता है। उसे किसी प्रकार के वचनों की सहायता लेनी नहीं पड़ती।
पर जब उसी बात का किसी दूसरे को अनुमान करवाना होता है तो उसे कुछ वाक्य बोलकर ही समझाया जा सकता है। ये वाक्य ही अनुमान के अवयव कहलाते हैं। ये पांच अवयव निम्न हैं।

1/ प्रतिज्ञा:- पर्वत अग्नि से युक्त है।
2/ हेतु:-  क्योंकि वहाँ धुँआ है।
3/  उदाहरण:- जहाँ जहाँ धुँआ होता है वहाँ वहाँ अग्नि होती है। जैसे - रसोई घर।
4/  उपनय:  क्योंकि पर्वत पर धुँआ है।
5/  निगमन:  इसीलिए पर्वत पर अग्नि है।

Notable words:
1. व्याप्ति: किसी एक पदार्थ में दूसरे पदार्थ का मिला होना
2. अन्वयी : पाया जाने वाला
3. व्यतिरेकी: न पाया जाने वाला

प्रश्न - परोक्ष प्रमाण के सारे भेद क्या मति के भेद ही हैसिर्फ आगम को छोड़कर जो कि श्रुतज्ञान का भेद लग रहा है ।
Answer: - मति श्रुत दोनों मिले जुले से ही होंगें।
Question - अगर हाँ - तो क्या अवग्रहइहाअवायधारणा आदि के साथ स्मृति आदि का कोई सम्बन्ध है?
Answer -स्मृति का संबंध धारणा के साथ है। धारणा पक्की हो कर स्मृति बन जाती है।
Question - जैसे ये साँप ही हैयहां यथार्थ ज्ञान में आया ज्ञान मीमांसा में ऐसा निश्चयात्मक ज्ञान अवाय में आता है  ।
Answer - आ सकता है।
Question - ऐसे ही अनुमान यहां ईहा जैसा लग रहा है । दोनों वर्तमान में ही है । स्मृति भूतकाल से है ।
Answer अनुमान पक्का करके आप धारणा भी बना सकते हैं। स्मृति तो definitely भूतकाल है।

5/  आगम यह परोक्ष प्रमाण का अंतिम भेद है।
 जैन आगमिक परम्परा में इसका आगमिक नाम श्रुत है। जैसे – जैन आगमिक परम्परा का मतिज्ञान जैन तार्किक परम्परा में  सांव्यावहारिक प्रत्यक्ष के नाम से अभिहित हुआ।वैसे ही श्रुत भी आगम के नाम से अभिहित हुआ।

Actually- आगम श्रुत ज्ञान या शब्द ज्ञान है।  उपचार से आप्त वचन या द्रव्य श्रुत को भी आगम कहा जाता हैं।
 किन्तु वास्तव में आगम वह ज्ञान हैजो श्रोता या पाठक को आप्त वचन की मौखिक या लिखित वाणी से होता है।

जैन दर्शन सम्मत श्रुत ज्ञान का क्षेत्र काफी व्यापक है।  यह सभी असर्वज्ञ प्राणियों में होने वाला वाच्यवाचक संबंधात्मक ज्ञान हैजो शब्दसंकेत आदि माध्यमों से होता है।

चार्वाक दर्शन के अनुसार कोई आप्त नहीं ,अतः किसी के वचन प्रमाण नहीं हो सकते। वैशेषिक दर्शन और बौद्ध दर्शन के अनुसार शब्द प्रमाण अनुमान का ही रूप है। जैन दर्शन को ये दोनों ही मत मान्य नहीं हैं ।  शब्द सुनते ही श्रोता उसका अर्थ समझ जाता हैं ।  अतः उसे घट शब्द सुनने के बाद 'घटशब्द और 'घटपदार्थ में व्याप्ति सम्बन्ध नहीं जोड़ना पड़ता।  अतः शब्द स्वतंत्र प्रमाण है,अनुमान के अधीन नहीं है। शब्द सुनने पर यदि अवबोध ना हो ,उसके लिए  व्याप्ति का सहारा लेना पड़े तो आप शब्द को प्रमाण कहना उचित नहीं,- ऐसा कह सकते हैं। actually वह अनुमान के अंतर्गत नहीं गिना जा सकता।
जैन दृष्टि के अनुसार आगम स्वतः प्रमाणपौरुषेय तथा आप्त  प्रणीत होता है। ये दो प्रकार के हैं।
1.लौकिक आगम
2.लोकोत्तर आगम

1. लौकिक आगम:-  जो जिस समय जिस लौकिक विषय  का यथार्थ  ज्ञान एवं यथार्थ वक्ता होता हैवह आप्त है। उसके वचन लौकिक आगम हैं।
2.लोकोत्तर आगम:- आत्माकर्मपुनर्जन्म का यथार्थ ज्ञान रखने वाला तथा यथार्थवादी महापुरुष लोकोत्तर आप्त कहलाता है।  उसके द्वारा प्रतिपादित सत्य लोकोत्तर आगम के विषय हैं।

 वस्तुतः जैन दृष्टि  से पुस्तकग्रन्थ ,आदि उस ज्ञान के साधन होने से उपचारतः आगम हैं।
मुख्य आगम तो वह आप्त स्वयं हैं।
अतः आगम पुरुष हैग्रन्थ नहीं।
जिन ग्रंथों में प्रत्यक्ष,  युक्ति तथा तर्क नहीं चल सकतेउन परोक्ष और अहेतुगम्य विषयों में आगम ही एक मात्र ज्ञान का साधन है।  अतः आगम को प्रमाण  न मानने वाले दार्शनिक प्रस्थानों के समक्ष उन विषयों को जानने का कोई आधार नहीं।

Conclusion: जैन परोक्ष प्रमाण केस्मृतिप्रत्यभिज्ञातर्कअनुमान,
और आगमये पाँच भेद हैं।

Friday, 17 February 2023

लिपि हरिनारायण ठाकुर

भाषा और साहित्य के विकास में पिछड़ों-दलितों का अहम योगदान

उल्लेखनीय है कि लिपियों का आविष्कार विद्वानों ने नहीं, चित्रकार और मूर्तिकारों ने किया। भारत ही नहीं, दुनिया की किसी भी सभ्यता में लिपि के निर्माण के पहले चित्र और मूर्तियों का निर्माण हुआ। ये मूर्तिकार और चित्रकार कौन थे? भारतीय संस्कृति और शास्त्रों ने इन्हें शूद्र कहा है। जितने भी कामगार अथवा शिल्पकार हैं, भारत में उन्हें शूद्र श्रेणी में रखा गया। बता रहे हैं हरिनारायण ठाकुर

जब हम हिंदी भाषा की बात करते हैं, तो इसके अंतर्गत खड़ीबोली के साथ-साथ वे तमाम बोलियां, उप-भाषाएं और लोकभाषा आ जाती हैं, जिन्हें हिंदी क्षेत्र में बोला और समझा जाता है। इस अध्ययन में संस्कृत को भी रखा जा सकता है, क्योंकि इससे लिपि के साथ-साथ शब्द और शास्त्र का भी संबंध है। भाषा और लिपि के संबंध में यह धारणा है कि यह विद्वानों की चीज है। लेकिन यह धारणा भ्रामक है। भाषा का अर्थ ही है– भाष अर्थात् बोलना। यह आमजनों के बोलचाल की भाषा से बनी है। इसके साहित्य जनता की जुबान पर सदियों से बिखरे और संचित रहे हैं। जब हम हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में दलित-पिछड़ों के योगदान की बात करते हैं, तो लोकभाषा में इन्हीं संचित और बिखरे पड़े भाषा और साहित्य की बात करते हैं, जिनसे मानक भाषा और साहित्य बने हैं। साथ ही, आदिवासियों के योगदानों को भी इससे अलग रखकर नहीं देखा जा सकता।

हिंदी की विकास यात्रा में उर्दू, संस्कृत, अरबी-फारसी, प्राकृत, पालि, अपभ्रंश और हिंदी की लोकभाषाओं का योगदान है। इसकी देवनागरी लिपि के विकास में चित्रलिपि, ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का योगदान है। विषय पर विचार करने के लिए प्राचीन काल से अब तक इन सभी बातों पर विचार करना होगा।

प्राचीन भारत के राजवंश, वर्ण और धर्म
भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता हड़प्पा या सिंधुघाटी की सभ्यता है। “इसका काल लगभग ई.पू. 3000 से ई.पू. 1300 या 1500 माना जाता है। इस सभ्यता के लोग पढ़ना-लिखना जानते थे। इनकी लिपियां चित्रलिपि या कीलाक्षर हैं, जो आज तक नहीं पढ़ी जा सकी हैं। इसके बाद वैदिक या ब्राह्मण सभ्यता शुरू होती है। इसका काल लगभग 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक है।”[1] असल में इन सालों या अवधियों की गणना नंद राजा घननंद (घनानंद) के समय भारत पर सिकंदर के आक्रमण 326 ई.पू. से शुरू होती है। उसी वर्ष को आधार वर्ष मानकर भारत की प्राचीन सभ्यता और राजवंशों की कालावधि का अनुमान लगाया गया। भारतीय ग्रंथों में किस राजा ने कितना वर्ष शासन किया, यह तो लिखा था, लेकिन कब से कब तक शासन किया, इसका उल्लेख नहीं है। क्योंकि ईस्वी सन या संवत का प्रचलन नहीं शुरू हुआ था। आर्य या ब्राह्मण सभ्यता आरंभ में सप्तसिंधु (पंजाब, कश्मीर, पाकिस्तान आदि), उत्तरापथ (उत्तर-पश्चिम) या आर्यावर्त (आर्यों से घिरा हुआ स्थान) में फैली। लगभग 600 ई.पू. से भारत में राजवंश और गणतंत्रों का इतिहास मिलने लगता है। इसी काल में महावीर जैन और गौतम बुद्ध का जन्म और उनके धर्मों का प्रचार होता है। कालांतर में बौद्ध धर्म विश्वव्यापी बन जाता है। मगध साम्राज्य में 544 ई.पू. से लेकर 647 ई. तक क्रमश: शिशुनाग वंश, नन्द वंश, मौर्य वंश, शुंग वंश, कण्व वंश, गुप्त वंश, शक, कुषाण और वर्द्धन राजवंशों का शासन रहता है। इसमें गुप्त राजवंश को छोड़कर लगभग सभी राजवंश के राजा जैन या बौद्ध धर्मावलंबी थे। हर्षवर्द्धन (647-590 ई.) अंतिम बौद्ध राजा थे। लगभग इसी काल से धार्मिक ग्रंथों की रचना होती है।

प्राचीन भारत में बौद्ध राजा अक्सर ब्राह्मण और क्षत्रिय नहीं होते थे। उपरोक्त सूची में एक हर्षवर्द्धन को छोडकर प्राय: सभी राजा ब्रह्मणेतर या क्षत्रियेतर वर्ण के हैं। रोमिला थापर लिखती हैं– “इसके (नंदोंके) बाद उत्तर भारत के अधिकांश प्रमुख राजवंश क्षत्रियेतर वर्णों के हुए और यह क्रम एक हज़ार वर्ष पश्चात् राजपूतों के आगमन तक चलता रहा।”[2] रोमिला थापर नंद वंश के बारे में लिखती हैं– “यह बड़ी विचित्र बात है कि क्षत्रियेतर वंशों की श्रृंखला में नन्दों का राजवंश पहला था। नंद लोग, जिन्होंने शिशुनाग वंश से सिंहासन छीना था, नीच कुल के थे। कुछ स्रोतों का कथन है कि नंदवंश का संस्थापक महापद्मनंद एक शूद्र माता का पुत्र था। कुछ दूसरे स्रोतों का कथन है कि वह एक नाई और वेश्या के संयोग से पैदा हुआ था।”[3] पुराणों में महापद्मनंद को चक्रवर्ती सम्राट, एकराट और सर्व क्षत्रांतक (सभी क्षत्रियों को नाश करनेवाला) कहा गया है, “संस्कृत व्याकरण के प्रसिद्ध आचार्य ‘पाणिनी’ महापद्मनंद के मित्र और उनके दरबारी विद्वान थे। नंद के दरबार में ही उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ की रचना की। उसी प्रकार वर्ष, उपवर्ष, वररुचि कात्यायन जैसे विद्वान भी नंद दरबार में ही थे। शाकटाय और स्थूलभद्र घनानंद के जैन आमात्य और विद्वान थे। ये सभी आचार्य बौद्ध या जैन मत से प्रभावित और प्राय: नास्तिक थे।”[4] यही कारण है कि घनानंद ने तक्षशिला के वैदिक आचार्य ब्राह्मण चाणक्य को अपने दरबार में सम्मान नहीं दिया। उसे बाहर निकाल दिया।

उसी प्रकार मौर्यों का वंश भी शूद्र राजवंश था। इसका संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य था। “चंद्रगुप्त का संबंध मोरिया जन से था, लेकिन वह निम्न वर्ग का था।”[5] पं. रेवती प्रसाद शर्मा ने विशाखदत्त के संस्कृत नाटक ‘मुद्राराक्षस’ आदि ग्रंथों का हवाला देते हुए बताया है कि “मौर्यवंश के प्रथम राजा चंद्रगुप्त की माता ‘मुरा’ नाम की एक नाईन (दासी) थी, उसी के नाम पर इस वंश का नाम मौर्यवंश पड़ा।… दासी पुत्र होने के कारण मगध नरेश महानंद (घननंद) अपने ज्येष्ठ पुत्र चंद्रगुप्त को राजा नहीं बनाकर अपने छोटे पुत्र को राजा बनाना चाहते थे। इसीलिए वे रुष्ट होकर राजदरबार से बाहर चले गये और चाणक्य की मदद से मगध की गद्दी पर विराजमान हुए। एक दूसरी कथा के अनुसार रानी ने एक नाई से आसक्त होकर चंद्रगुप्त को जन्म दिया। फिर वृद्ध राजा को मारकर उसके पुत्र घननंद से राज्य छीना और चंद्रगुप्त को राजा बनाया।”[6] अन्य प्रमाण चंद्रगुप्त को कुर्मी या कुशवाहा सिद्ध करते हैं। सच्चाई चाहे जो भी हो, इतना तो तय है कि मौर्यवंश शूद्रों का राजवंश था और अशोक सहित इसके सभी राजे बौद्ध या जैन मतावलंबी थे।


सम्राट अशोक द्वारा स्थापित एक स्तंभ पर मुद्रित ब्राह्मी लिपि
प्राचीन भारत में भाषा और लिपि के विकास में दलित–पिछड़ों का योगदान
यह शास्त्र और परंपरा दोनों से प्रचलित है कि संस्कृत भाषा भारत की सबसे पुरानी भाषा है। कोई-कोई पंडित तो इसे दुनिया की सबसे पुरानी भाषा बता देते हैं। यह भी कहा जाता है कि भारत की सभी भाषाएं इसी संस्कृत से निकली है। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। ये भाषाविज्ञान के सबसे बड़े दो झूठ हैं, जिन्हें भाषाविज्ञान ने कब का ख़ारिज कर दिया, लेकिन इन्हें आज तक ढोया जा रहा है। संस्कृत जब सबसे पुरानी भाषा है, तो इसकी लिपि भी सबसे पुरानी होनी चाहिए। मगर ऐसा नहीं है। इसकी लिपि नागरी या देवनागरी है, जो हिंदी, मराठी, गुजराती, नेपाली सहित हिंदी प्रदेश की तमाम लोकभाषाओं की है। यह अपेक्षाकृत नई लिपि है। तो भारत की सबसे पुरानी लिपि क्या है?

अब तक के ऐतिहासिक पुरातात्त्विक प्रमाणों से सिद्ध है कि भारत की सबसे प्राचीन लिपि ब्राह्मी और खरोष्ठी है। ये लिपियां अशोक (ई.पू. 269-232) के शिलालेखों की लिपि हैं। और नगरी या देवनागरी लिपि इसी ब्राह्मी लिपि से निकली है। इसीलिए सबसे पुरानी नहीं है। इन लिपियों में लिखी गयी भाषाएं पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, तमिल आदि हैं। शिलालेखों के अतिरिक्त अन्य अभिलेख और जैन-बौद्ध साहित्य भी इसके प्रमाण हैं। इन लिपियों में संस्कृत का एक भी ग्रंथ उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उस ज़माने में संस्कृत भाषा थी ही नहीं। इसीलिए संस्कृत सबसे पुरानी भाषा नहीं है। जब हम लिपि पर विचार करते हैं, तो अब तक उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार लिपि की जानकारी देनेवाला सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘ललित विस्तर’ है, जिसकी रचना तीसरी शताब्दी में बतायी जाती है। यह बुद्ध के जीवन चरित को विस्तार से चित्रित करनेवाला संस्कृत का पहला ग्रंथ भी है। इसमें भारत और एशिया में प्रचलित 64 लिपियों का वर्णन है, जिनमें पहले और दूसरे स्थान पर क्रमश: ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि है। इस लिपि को ब्रह्मा ने बनाया, ऐसा मानकर केवल संस्कृत ग्रंथों में ही इसे ब्राह्मी कहा गया है, अन्यथा जैन-बौद्धों के पालि-अपभ्रंश ग्रंथों में इसे ‘बम्भी’ और अशोक के शिलालेखों में इसे ‘धम्म लिपि’ कहा गया है। इस प्रकार इसका प्राचीन नाम ‘बम्भी’ या ‘धम्म लिपि’ है। ‘ललित विस्तर’ में चीनी लिपि का भी वर्णन है। किन्तु देवनागरी या नागरी का नाम कहीं नहीं है। छब्बीसवें क्रम पर देव लिपि का नाम है। लेकिन इसके आगे-पीछे हूण लिपि, नाग लिपि, यक्ष लिपि, गंधर्व लिपि, किन्नर लिपि, असुर लिपि आदि लिपियों के नाम भी हैं। इसीलिए यह लिपि देवनागरी या नागरी नहीं है। इसका मतलब है बुद्ध के समय तक न लोग इस लिपि का नाम जानते थे, न इसका प्रयोग ही होता था। इसीलिए देवनागरी लिपि उसके बाद ही निकली होगी अथवा उसका नाम कुछ और रहा होगा। ब्राह्मणों ने ब्राह्मी की तरह देवनागरी लिपि को भी देवताओं की लिपि बना दिया है। क्योंकि उनके सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद इसी लिपि में है और वेद को वे अपौरुषेय (देवताकृत) मानते हैं। वेदों का रचनाकाल ई.पू. 5200-5500 माना जाता है। माना वेद स्मृति ग्रंथ हैं, इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद करके सुरक्षित रखा गया होगा और लिपि का आविष्कार होने पर लिखा गया होगा। पुराण स्पष्ट तौर पर बाद की रचना है। लेकिन दर्जनों वेदांग, उपनिषद् और अरण्यक? इन्हें बुद्ध के समकालीन ईसा पूर्व की रचना बताया जाता है। परंतु लिपि इनके पुराना होने से इनकार करती है। इसिलिए निश्चय ही इनका रचनाकाल तीसरी सदी के बाद का ठहरता है।

दूसरा बड़ा झूठ है कि हिंदी और बांग्ला सहित भारत की सभी भाषाएं संस्कृत से निकली है। इसकी भी पड़ताल करते हैं।

किसी भी भाषा की पहचान उसके वाक्य और पदविन्यास से होती है। संस्कृत के वाक्य में पदक्रम का कोई महत्त्व नहीं है। कोई भी शब्द कहीं भी रखा जा सकता है। जैसे – अस्ति गोदावरी तीरे एको तरु:। एको तरु गोदावरी तीरे अस्ति। तरु अस्ति एको तीरे गोदावरी। लेकिन दूसरी भाषाओं में पदक्रम का कड़ा नियम है। कर्त्ता, कर्म, क्रिया या कर्त्ता, क्रिया, कर्म। उर्दू, फारसी में तो नुक्ता के फेर से खुदा जुदा हो जाते हैं। फिर व्याकरण से देखें। अन्य भाषाओं में दो वचन हैं– एकवचन और बहुवचन, संस्कृत में तीन वचन हैं– एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। अन्य भाषाओं में दो या तीन लिंग हैं– स्त्रीलिंग, पुल्लिंग, उभयलिंग, पर संस्कृत में चार लिंग हैं। अन्य भाषाओं में तीन काल हैं– भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्यत काल, पर संस्कृत में पांच से दस काल हैं– लट लकार, लंग लकार, …। केवल शब्दों की बहुलता से कोई भाषा किसी की जननी नहीं हो सकती। संधि के नियम भी केवल संस्कृत शब्दों पर ही लागू होते हैं। इस प्रकार संस्कृत सभी भाषाओं की जननी नहीं है। इसलिए बच्चन सिंह लिखते हैं कि “संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से उत्तर भारत की आधुनिक आर्यभाषाओं का विकास हुआ। ऐसा विश्वास किया जाता रहा है और इसके लिए सिद्धांत भी गढ़े गये थे। लेकिन अब यह धारणा कि हिंदी या बंगला आदि अपभ्रंश से निकली, खंडित हो चुकी है।”[7]

नंद और मौर्य काल से पहले भी लिच्छवी गणतंत्र काल में 16 महाजनपद हैं और अधिकांश जनपदों के राजा या मुख्य सभासद शूद्र हैं। अब प्रश्न उठता है कि जब प्राचीन भारत मुख्यत: बौद्धों और शूद्रों का भारत है, तो उनकी कोई भाषा, कोई लिपि और साहित्य भी रहे होंगे। निश्चित रूप से उनकी भाषा प्राकृत, पालि और अपभ्रंश हैं और लिपि ब्राह्मी और खरोष्ठी। यह भी उल्लेखनीय है कि लिपियों का आविष्कार विद्वानों ने नहीं, चित्रकार और मूर्तिकारों ने किया। भारत ही नहीं, दुनिया की किसी भी सभ्यता में लिपि के निर्माण के पहले चित्र और मूर्तियों का निर्माण हुआ। ये मूर्तिकार और चित्रकार कौन थे? भारतीय संस्कृति और शास्त्रों ने इन्हें शूद्र कहा है। जितने भी कामगार अथवा शिल्पकार हैं, भारत में उन्हें शूद्र श्रेणी में रखा गया। लोक प्रचलित नृत्य, गीत, भाव और भंगिमाओं के आधार पर उन्होंने चित्र और मूर्तियों को उकेरा। सभी जानते हैं कि लोकभाषा और लोकगीत इन्हीं कामगार/शिल्पकार वर्गों के घर-परिवार और समाज से निकले हैं। लिपि से पहले भाषा बनी और भाषा का निर्माण किसी एक व्यक्ति अथवा समूह ने नहीं किया। यह मनुष्य के स्वत:स्फूर्त ध्वनि प्रवाह से विचार-विनिमय का माध्यम बनी। जिस तरह कथा-कहानी, संगीत-नृत्य का उन्होंने भाव मूर्तन किया, उसी तरह भाव और ध्वनियों को उन्होंने पहले चित्र लिपि में, फिर ध्वनि लिपि में मूर्तिमान किया। एक-एक ध्वनि के लिए अलग-अलग संकेत या चिन्ह बनाये गये, जिसे वर्णमाला कहा गया। विद्वानों ने बाद में लिपियां सीखीं। पहले विद्वान बोलते थे और ये चित्रकार लिखते थे। और मूर्तिकार, चित्रकार सहित सभी कामगार, कलाकार शास्त्र से शूद्र हैं।

अशक्नुवंस्तु शुश्रूषां शूद्रः कर्तुं द्विजन्मनाम्।
पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत्कारुककर्मभिः॥10.99॥ – मनुस्मृति

यदि द्विजातियों की सेवा करने में शूद्र असमर्थ हो और उसके बीबी-बच्चे अन्नादि का कष्ट पा रहे हों तो वह कारीगरी का काम करके जीविका चला कर सबका भरण-पोषण करे।

यैः कर्मभिः प्रचरितैः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः।
तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च॥10.100॥ – मनुस्मृति

अर्थात, जिन प्रचलित कार्यों द्वारा द्विजातियों की सेवा की जा सकती है, वे अनेक प्रकार के शिल्प और कारीगरी के काम हैं।

शास्त्रीय प्रमाण भी सिद्ध करते हैं कि अभिजन विद्वान पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। उनके पास ज्ञान था, भाषा थी, पर उसे लिपिबद्ध करने का तरीका उन्हें मालूम नहीं था। विद्वान बोलते थे और दूसरा कोई लिखता था। कहा जाता है कि व्यास के ग्रंथों को लिपिबद्ध करनेवाले गणेश हैं और गणेश कौन थे? शास्त्रों से ही सिद्ध है कि पूरा का पूरा शिव परिवार शूद्र परिवार है। इतिहास इन्हें अनार्य बताते हैं। इसीलिए लिपियों का आविष्कार शूद्रों ने किया। “मनुस्मृति में गणपति को स्पष्ट रूप में शूद्रों का देवता कहा गया है और गणयोग को निषिद्ध माना गया है।”[8] उन्हें देवता के रूप में आर्यों ने बाद में स्वीकार किया। इसीलिए उनकी पूजा से पहले उन्हें जल और बेलपत्र से शुद्ध किया जाता है। शिव के सिवा बाकी किसी देवता पर जल और बेलपत्र नहीं चढ़ते। आज भी लिखने-पढ़ने में सबसे तेज कायस्थ समाज है और कायस्थ शास्त्र से शूद्र हैं। इसके अनेक प्रमाण दिये जा सकते हैं। आज भी कायस्थों की शादी शूद्रों की तरह समगोत्रीय होती है, अन्य सवर्णों की तरह विगोत्रीय नहीं। इसीलिए शूद्रों की तरह कायस्थों का भी नस्ल सुधार नहीं हुआ।

भाषाविज्ञान में भाषा उत्पत्ति के अनेक सिद्धांतों में प्रमुख सिद्धांत हैं– ‘अनुकरण’, ‘श्रम-परिहार’ और ‘या-हो-हे’ सिद्धांत। भाषा हवा, पानी की हलचल और पशुओं की बोली के अतिरिक्त श्रमिकों द्वारा थकावट दूर करने के लिए हियो-हियो, हैचो, मछुआरों के हैया-हो, आंटा-चावल पिसती-कूटती ग्रामीण स्त्रियों के गीत, ठठेरों के ठकठक, आदिवासियों के स्वर-व्यंजनमय गीत, वर्षा और झरनों के रिमझिम, ग्रामीण ललनाओं के ठुमक और गीत और स्वरों के अनुकरण पर भाषा और शब्दों का निर्माण हुआ। ये कामगार वर्ग शूद्र-अतिशूद्र वर्ग ही थे। इसीलिए भाषा, ध्वनि, शब्द और अक्षरों के निर्माण में दलित-पिछड़ों का सीधा योगदान है। इन्हीं शब्द और भाषाओं से परिनिष्ठित शब्द और भाषा बने। विकास-क्रम का नियम भी बताते हैं कि चीजें कम विकसित से अधिक विकसित और अशिष्ट से शिष्ट की ओर जाती हैं। इसीलिए संस्कृत जैसी शिष्ट और समृद्ध भाषा से अपेक्षाकृत कम विकसित प्राकृत, अपभ्रंश और लोकभाषाओं का निर्माण होना अवैज्ञानिक और नियम विरुद्ध है। बल्कि तथ्य इसके उलट हैं। विकास-क्रम में लोकभाषा, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत बनी होगीं। अयोध्या प्रसाद खत्री ने खड़ीबोली हिंदी की कोटियों में ‘मौलवी स्टाइल’ की बोली को सर्वाधिक सशक्त और सुंदर माना है। उन्होंने खड़ीबोली को पांच भागों में विभक्त किया था– “ठेठ हिंदी, पंडितजी की हिंदी, मुंशीजी की हिंदी, मौलवी साहिब की हिंदी और यूरेशियन हिंदी।”[9] यह ठेठ हिंदी क्या है? यही हिंदी सर्वसाधारण और शूद्रों की बोलचाल की भाषा है।

प्राचीन भारत साहित्य के विकास में दलित–पिछड़ों का योगदान
“प्राकृत, पालि और अपभ्रंश भाषा और साहित्य लोकसाहित्य का विषद और विपुल भंडार हैं, जो जैन और बौद्ध धर्मों से प्रेरित और प्रभावित हैं। लोककथाओं का प्राचीनतम और विशालतम संग्रह गुणाढ्य की ‘बृहत्कथा’ (बड्डकहा) है, जो पैशाची प्राकृत में लिखी गयी थी। इसका रचना काल पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार प्रथम या द्वितीय शताब्दी ई. है। इस कथा की लोकप्रियता को देखकर बाद में इसके अंशो के कई संस्कृत अनुवाद हुए, जिसमें ‘कथा सरित्सागर’, ‘बृहत्कथामंजरी’, ‘वेतालपंचविंशति’, ‘सिंहासनद्वात्रिंशिका’, ‘शुकसप्तति’ आदि प्रसिद्ध हैं। इसी परंपरा और प्रभाव में ‘पंचतंत्र’, ‘हितोपदेश’, ‘जातकमाला’ आदि नीतिकथाओं का अनुवाद और प्रणयन भी हुआ। प्राकृत, अपभ्रंश और तद्जनित लोकभाषाएं और लोकसाहित्य शूद्रों की देन और धरोहर हैं।”[10]

विश्वप्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी बिहार में ही थे, जिन्हें ब्राह्मण-श्रमण विवाद में जलाकर नष्ट कर दिया गया। इन विश्वविद्यालयों का विस्तृत विवरण चीनी बौद्ध यात्री और नालंदा विश्विद्यालय के छात्र और शिक्षक ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा-वृतांतों में मिलता है। राजा जैन-बौद्ध धर्म के माननेवाले हों या ब्राह्मण धर्म के, शुरू के शुंग आदि राजवंशों को छोड़कर किसी भी राजवंश में जैन-बौद्ध और ब्राह्मण धर्म के विवाद को बढ़ावा नहीं दिया गया था। यहां तक कि गुप्त राजाओं ने भी बौद्धों के लिए बिहार और शिक्षा केंद्र बनवाये। केवल ब्राह्मण गुरु, पुरोहित और पंडितों को ही जैन-बौद्ध श्रमणों से चिढ़ थी, क्योंकि वे ईश्वर, वेद, जन्मना जाति-वर्ण और यज्ञादि कर्मकांडों को नहीं मानते थे और सबको समानता की शिक्षा देते थे, जिससे पुरोहितों के यज्ञादि कर्म प्रभावित होते थे। इसीलिए ब्राह्मण-पुरोहित हमेशा से बौद्ध केंद्रों को नष्ट करना चाहते थे, लेकिन राजाओं के संरक्षण के कारण वे ऐसा नहीं कर पाते थे। इन स्थापित और समृद्ध विश्वविद्यालयों को ब्राह्मण धर्म माननेवाले राजाओं ने भी समृद्ध और संरक्षित किया। हां, उन्होंने इतना जरूर किया कि इनमें जहां केवल बौद्ध-जैन धर्म और ग्रंथों की शिक्षा दी जाती थी, वहां उन्होंने वेदों की शिक्षा की भी व्यवस्था कर दी। पालि, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के अलावा वहां संस्कृत में भी पढ़ाई होने लगी। गुप्त राजाओं ने ऐसा ही किया। फिर भी प्रधानता बौद्ध शिक्षा की ही थी। इसीलिए भारतीय राजवंशों के शासनकाल में तो ये बौद्ध विश्वविद्यालय सुरक्षित और संरक्षित रहे। लेकिन ज्योंहि तुर्क-अफगान शासन आया और गुलाम वंश के सेनापति और सूबेदार बख्तियार खिलजी का बिहार पर शासन शुरू हुआ, ब्राह्मणों ने उनसे मिलकर इन विश्वविद्यालयों को नष्ट करवा दिया। स्मरण रहे बख्तियार खिलजी ने मंदिरों को नष्ट नहीं किया, केवल बौद्ध विश्वविद्यालयों को ही नष्ट किया। उसने ऐसा क्यों किया? इस संबंध में कहा जाता है कि “तराईन के युद्ध के बाद थके बख्तियार बीमार पड़ गये। उसकी बीमारी वैद्यराज ब्राह्मण राहुल श्रीभद्र ने ठीक की। राजा को कुरान पढ़ने के लिए दिया गया। वैद्यराज ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था। वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया और ठीक हो गया। उसने इस एहसान का बदला नालंदा को जलाकर दिया।”[11]

कुछ लोग इस वैद्य को नालंदा का आचार्य बताते हैं, तो कुछ लोग पूर्ववर्ती हिंदू राजा का राजवैद्य। लेकिन राजा का राजवैद्य होना ही अधिक अनुमान्य है। चूंकि वैद्य ब्राह्मण थे, इसीलिए ईनाम में नालंदा, विक्रमशिला जैसे बौद्ध विश्वविद्यालयों को जलाना मांगा होगा। भारतेंदु ने भी अपने ‘भारत दुर्दशा’ नाटक में लिखा है– “लरि वैदिक जैन डुबाई पुस्तक सारी / करि कलह बुलाई जवन सैन पुनि भारी/ तिन नासी बुधि, बल, विद्या बहु वारी।” ज्ञातव्य हो कि बख्तियार खिलजी के समय मौलवियों के साथ-साथ दरबार में संस्कृत पंडितों को भी संरक्षण मिलता रहा। यह परंपरा पूरे मुगलकाल तक जारी रही। “यहां तक कि औरंगजेब जैसे इस्लाम के कट्टर शासक के शासनकाल में भी मुगल दरबार में संस्कृत पंडितों को संरक्षण मिलता रहा। ‘रस सिद्धांत’ के प्रतिपादक पंडित राज जगन्नाथ शाहजहां के दरबारी कवि और विद्वान थे। बाबर, हुमायूं, अकबर और जहांगीर सबके दरबार में संस्कृत कवि और विद्वानों की भरमार थी। संस्कृत साहित्य के अधिकांश ‘काव्यशास्त्र’ और ‘काव्य सिद्धांत’ मुगल दरबार में ही लिखे गये।”[12] मुगलकाल में प्राकृत, पालि, अपभ्रंश आदि भाषाओं के कवि और विद्वानों को राजकीय संरक्षण नहीं मिला, इसीलिए ये भाषा और साहित्य उपेक्षित रहे। यही कारण है कि जब अंग्रेजों ने 1800 ई. में कलकत्ते के फोर्ट विलियम कॉलेज में प्राचीन भारतीय भाषाओं और साहित्य की खोज, अनुवाद और छपाई के लिए भाषा मुंशियों को रखकर काम शुरू किया, तो इन भाषाओं के जाननेवाले मिले ही नहीं। इसीलिए संस्कृत ग्रंथों पर ही काम हुआ।

ऐसे में नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों में सुरक्षित और संरक्षित प्राकृत और अपभ्रंश की लाखों पुस्तकों पर विचार करने की जरूरत है, जो जैन-बौद्ध की ही नहीं, शूद्रों की भी संपदा थी। इन्हें बेरहमी से जला दिया गया। अपभ्रंश भाषा में लिखे सिद्ध और नाथ साहित्य भी नालंदा विश्वविद्यालय की धरोहर थे। “चौरासी सिद्धों में अधिकांश इसी विश्विद्यालय के छात्र और शिक्षक थे, जिनमें अधिकांश शूद्र थे। डोम्भीप्पा तो जाति के डोम ही थे। प्रमुख सिद्ध-संतो में सरहप्पा, लुइप्पा, शबरप्पा, कण्हप्पा, भुसुकप्पा, कंवणप्पा, कम्बलप्पा, गुंडरिप्पा, जालन्धरिप्पा, दारीकप्पा, धामप्पा थे, जिनके लिखे मोटे-मोटे ग्रंथ थे, उनके अंश आज भी उपलब्ध हैं।”[13]

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन भारत में भाषा, लिपि के अतिरिक्त साहित्य के विकास में भी शूद्रों (दलित-पिछड़ों) का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

संस्कृत साहित्य के विकास में दलित–पिछड़ों का योगदान
चूंकि शब्द और रचना को लेकर हिंदी का संस्कृत से गहरा संबंध है, इसलिए संस्कृत साहित्य पर भी विचार करना आवश्यक है। संस्कृत के आदिकवि वाल्मीकि हैं और महाभारत और वेद-वेदांगों की रचना करनेवाले ‘वेदव्यास’। और दोनों को शूद्र माना गया है, एक दलित और दूसरा पिछड़ा। इसीलिए इनके ऊपर विचार करना आवश्यक है।

वाल्मीकि और व्यास
शास्त्र-पुराण और परंपरा से प्रचलित है कि ‘रामायण’ के रचयिता वाल्मीकि दलित (भंगी या चांडाल) और ‘महाभारत’ के रचयिता व्यास पिछड़े (निषाद) थे। वाल्मीकि ने ‘रामायण’ और ‘योग बशिष्ठ’ सहित कई ग्रंथ लिखे और व्यास ने ‘महाभारत’ सहित गीता, वेद, तमाम वेदांग (ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद), शास्त्र और पुराण लिखे। फिर वैदिक साहित्य में बच क्या जाता है? जब तमाम वैदिक ग्रंथों के रचयिता ये ही दोनों दलित-पिछड़े कवि हैं, जो वैदिक, ब्राह्मण या सनातन धर्म के आधार हैं। फिर झगड़ा किस बात का? हम क्यों बेचारे ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद को दोष देते हैं, उन्हें बदनाम करते हैं? हम मान क्यों नहीं लेते कि वैदिक, ब्राह्मण या सनातन धर्म और दर्शन के प्रवर्त्तक हमारे ही पूर्वज थे, इसीलिए यह धर्म, दर्शन और विचारधारा हमारी है।

चलिए हम मान लेते हैं, तो फिर बुद्ध, कबीर से लेकर फुले, आंबेडकर, पेरियार और आज तक जो आंदोलन चले और चल रहे हैं, उनका क्या होगा? क्या सभी बेकार थे और हैं? ऐसा कतई नहीं है। यह दर्शन और समाजशास्त्र का बहुत बड़ा प्रश्न है। इस पर विचार होना चाहिए। डाकू रत्नाकर वाली कथा खुद वाल्मीकि ही ‘अध्यात्म रामायण’, ‘आनंद रामायण’ और ‘कीर्तिवास रामायण’ में कहते हैं। ऐसी ही कथा ‘स्कंद पुराण’ में भी है। ‘रामचरितमानस’ में भी तुलसी कहते हैं– “उल्टा नाम जपत हरि नामा। वाल्मीकि भये ब्रह्म सामना।।” वाल्मीकि की माता चार्षिणी और पिता प्रचेता दोनों ब्राह्मण थे। वाल्मीकि को बचपन में भीलनी उठाकर ले गई थी और उनका पालन-पोषण उसी ने किया। फिर वे लुटेरे भीलों की तरह डाकू बन गये। इसीलिए वे इस नई माता की ओर से और कर्म से अतिशूद्र (भंगी, चांडाल) ठहरते हैं। लेकिन ‘वाल्मीकि रामायण’ में वाल्मीकि आश्रम में वनवास के बाद राम दरबार में जब सीता की दोबारा अग्नि-परीक्षा होती है, तो वाल्मिक कहते हैं कि मैं प्रचेता (ब्राह्मण) पुत्र सत्यवादी वाल्मीकि शपथ लेकर कहता हूं कि “सीता अग्नि की तरह पवित्र है।”

उसी प्रकार व्यास ब्राह्मण ऋषि पराशर के पुत्र हैं। उनकी माता निषाद कन्या सत्यवती है। व्यास भी केवल माता की ओर से शूद्र (पिछड़ा) है। उस समय अनुलोम-विलोम विवाह प्रचलित था और अनुलोम-विलोम विवाह के संबंध में शास्त्र कहता है कि उच्च वर्ण के पिता और निम्न वर्ण की माता से उत्पन्न संतान पिता के वर्ण की होगी। इसके विपरीत उच्च वर्ण की माता और निम्न वर्ण के पिता से उत्पन्न संतान शूद्र होगी। उपर्युक्त कथा को मान भी लें, तो वाल्मीकि और व्यास दोनों ब्राह्मण वर्ग के ठहरते हैं। उनकी विचारधारा भी वही ब्राह्मणवादी है। इसीलिए उनका दलित और पिछड़ा होना संदिग्ध है। उनके ग्रंथ और मान्यताओं पर अनेक सवाल उठाये जा सकते हैं। वाल्मीकि को आदिकवि माना गया गया है और व्यास को वेद के रचयिता। तो कायदे से वेद रामायण से बाद की रचना होनी चाहिए, लेकिन वेद पहले की रचना है। इसीलिए दोनों की स्थिति विवादास्पद है। इसीलिए हम वाल्मीकि और व्यास को दलित-पिछड़ा नहीं मान सकते।

फिर भी ‘मनुस्मृति’ सहित अनेक स्मृति और पुराणों में कहीं-कहीं ब्राह्मण पिता और शूद्र माता से उत्पन्न संतान को शूद्र ही माना गया है। इस दृष्टि से व्यास शूद्र ठहरते हैं। कुछ विद्वानों ने वाल्मीकि के पिता प्रचेता का संबंध वरुण से जोड़ने की कोशिश की है, तो कुछ ने ऋषि च्यवन से। और वैदिक परंपरा से हम जानते हैं कि भृगुओं का संबंध रथ या गाड़ी बनानेवाले वर्ण से था, अतः वे शूद्र थे। फिर उनकी दोनों ही पत्नियां क्रमशः हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या और पुलोमा की पुत्री पौलोमी राक्षस वंश की थीं, इसलिए भी वे अनार्य (राक्षस) श्रेणी के हुए। दिव्या से च्यवन ऋषि और पौलोमी से शुक्राचार्य की उत्पत्ति हुई। च्यवन जन्मकाल से ही प्रकृष्ट चेतनायुक्त थे, इसलिए उनका दूसरा नाम प्रचेता हुआ। इस बात की पुष्टि अश्वघोष का ‘बुद्ध चरितं’ ग्रंथ से भी होती है।”[14] इस प्रकार जन्म और वंश परंपरा से भी वाल्मीकि दलित या शूद्र ही ठहरते हैं। दलित लेखक और विचारक कंवल भारती का कहना है– “जहां तक वाल्मीकि की पौराणिक रामकथा ‘रामायण’ का प्रश्न है, उसे पूरी तरह सामंती मूल्यों का साहित्य नहीं कहा जा सकता। क्रौंच के जोड़े में एक पक्षी को मारे जाने में बहेलिया को शाप दिया गया है, तो यह समझा जा सकता है कि उसमें सामंती व्यवस्था पर आक्रोश किस कदर व्यक्त हुआ है। राम के द्वारा शंबूक के वध की घटना भी दलित अस्मिता की दृष्टि से काफ़ी महत्त्व रखती है। वाल्मीकि सामंती युग के कवि थे। वे राज्याश्रित रहे होंगे। ऐसे में व्यवस्था का पूर्ण विरोध वाल्मीकि के लिए राजद्रोह हो सकता था, जिसका दंड निश्चित रूप से मृत्यु था। इसलिए वाल्मीकि ने सामंतों की भाषा में ही सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता का बोध कराया है। हम रामायण को दलित साहित्य नहीं कह सकते, लेकिन हम वाल्मीकि को सर्वथा सामंती मूल्यों का पक्षधर भी नहीं कह सकते।”[15]

इसी प्रकार यदि व्यास को शूद्र कन्या की शूद्र (पिछड़ा वर्ग) संतान मान लेते हैं, तो उनकी महाभारत कथा तो पूरी तरह वर्ण-संकरों की कथा है। महाभारत के प्राय: सभी पुरुष पात्रों का जन्म या तो नियोग से होता है या कुंवारी अवस्था में अवैध संबंध (देव आह्वान) से। महाभारत में जाति और वर्ण-व्यवस्था अत्यंत ही उदार है। इसमें ऐसे स्थलों के वर्णन में अन्य ब्राह्मणवादी ग्रंथाें की अपेक्षा अधिक उदारता बरती गयी है। व्यास ने कई बार युधिष्ठिर के मुख से जाति और वर्ण-व्यवस्था के जन्मना-सिद्धांत का खंडन करवाया है। वाल्मीकि और व्यास के उद्भव और विकास की चाहे जो भी कथा हों, लेकिन इतना तो तय ही है कि रामायण और महाभारत की मूल कथा में जाति-भेद और वर्ण-व्यवस्था वैसी दृढ़ और संकीर्ण नहीं दिखाई पड़ती, जैसी कालांतर में देखने को मिली। वाल्मीकि और व्यास की परंपरा भले ही दलित या बहुजन परंपरा न हो, लेकिन बहुत हद तक उन्होंने जाति और वर्ण-व्यवस्था को उदार बनाने की कोशिश की है। इस दृष्टि से संस्कृत साहित्य के विकास में भी दलित-पिछड़ों के योगदान को रेखांकित किया जा सकता है।

संस्कृत के प्रसिद्ध नाटक ‘मृच्छकटिकम्’ के लेखक शूद्रक को भी शूद्र कहा जाता है। ‘मृच्छकटिकम्’ की गैर-सामंती लोकतांत्रिक कथा भी उन्हें शूद्र सिद्ध करती है। कहा जाता है कि कालिदास भी गड़ेरिया जाति के थे। लेकिन उनकी रचनाओं में सामंतवादी प्रवृतियां भरी पड़ी हैं। वेदों के अनेक मंत्र और ऋचाएं शूद्र ऋषियों के नाम पर हैं। ऋग्वेद के अनेक मंत्रों के रचयिता कवष ऐलुष को शूद्र कहा गया है। अश्विनी कुमारों को सोमपान का अधिकार नहीं था, क्योंकि वे शूद्र थे। वेदों में शूद्र ऋषि रैक्व और महिदास चर्चित नाम हैं। महिदास राजा भी थे। एक और शूद्र राजा जनश्रुति का नाम आता है, जिसे ऋषि रैक्व ने वेद पढ़ाया था। महिदास ‘एतेरेय ब्राह्मण’ और उपनिषदों के रचयिता भी बताये जाते हैं। ऐसे अनेक छोटे-छोटे राजा और ऋषि हैं। लेकिन उनकी परंपरा दलित या बहुजन परंपरा नहीं है।

मध्यकालीन साहित्य के विकास में दलित–पिछड़ों का योगदान
मध्यकाल का साहित्य दो भागों में विभाजित है– भक्तिकाल और रीतिकाल। रीतिकाल तो सामंतो का काल है और उसका साहित्य भी सामंती साहित्य है। वहीं भक्तिकाल शुद्ध रूप से शूद्रों का काल है। भक्तिकाल का आरंभ कबीर आदि निर्गुण संतों की वाणी से होता है। उसके बाद दक्षिण भारत से आ रही पूजा-कीर्तन की सगुण भक्तिधारा की परंपरा में तुलसी, सूर आदि कवियों का जन्म होता है। निर्गुण साहित्य दो वर्गों में विभाजित है– ज्ञानाश्रयी शाखा और प्रेमाश्रयी शाखा। ज्ञानाश्रयी में कबीर, नानक, रैदास, पीपा, दादूदयाल, सुंदरदास, मलूकदास, अमीर खुसरो आदि आते हैं। प्रेमाश्रयी शाखा के कवि थे– जायसी, कुतुबन, मंझन, मुल्ला दाऊद, उस्मान, शेख नबी, कासिमशाह, नूर मुहम्मद आदि। सगुण भक्तिधारा की रामभक्ति शाखा में तुलसी के अलावा अग्रदास, नाभादास, प्राणचंद, हृदयराम, केशवदास आदि है और कृष्ण भक्तिधारा के कवियों में सूरदास के अलावा कुंभनदास, परमानंद दास, कृष्णदास, नंददास, छीतस्वामी, गोविंद दास, रसखान, मीराबाई आदि। निर्गुण भक्तिधारा की दोनों शाखाओं के कवि या तो शूद्र हैं या मुसलमान। सगुण भक्तिधारा में भी नाभादास, कुंभनदास दास आदि शूद्र बताये जाते हैं। हम जानते है कि निर्गुण की चेतना गैर-वैदिक परंपरा सिद्ध-नाथ और सूफियों से प्रभावित है, जबकि सगुण भक्तिधारा वैदिक-पौराणिक परंपरा से प्रभावित है। कबीर, रैदास, नानक आदि की रचनाओं में सामाजिक सरोकार से सीधा संवाद है। वे ऊंच-नीच, भेदभाव, धार्मिक आडंबर नहीं मानते और समानता की बात करते हैं, जबकि सगुण भक्तिधारा के कवि ईश्वर के अवतार, वर्ण-व्यवस्था और ऊंच-नीच की बातें करते हैं। जाहिर है निर्गुण भक्तिधारा में दलित-पिछड़ी चेतना को महत्त्व दिया गया है, जबकि सगुण भक्तिधारा में ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद की। यह भी स्मरणीय है कि निर्गुण भक्तिधारा में कवियों की संख्या सगुण से अधिक है। एक बात और स्मरणीय है कि भक्तिकाल के इन कवियों की सारी रचनाएं लोकभाषा में रची गयी हैं। निर्गुण साहित्य अवधि, भोजपुरी, उर्दू अथवा मिश्रित लोकभाषा में, तो सगुण अवधि या ब्रजभाषा में। इसका कारण यह है कि ये भक्त और कवि अपनी बातों को जनता के बीच दूर-दूर तक पहुंचाना चाहते हैं।

इस प्रकार भाषा और साहित्य दोनों ही दृष्टियों से भक्ति साहित्य दलित-पिछड़ों के करीब है और उनके रचनाकार अधिकतर दलित-पिछड़े ही हैं। मुसलमान कवि भी पसमांदा हैं, जो आजकल पिछड़े वर्ग की श्रेणी में आते हैं। इसीलिए मध्यकाल के साहित्य के विकास में दलित-पिछड़ों का सीधा योगदान है।

आधुनिक साहित्य के विकास में दलित–पिछड़ों का योगदान
मध्यकाल जहां भारतीय इतिहास में तुर्क-अफगान और मुगलों का काल है, वहीं आधुनिक काल अंग्रेजों का। अंग्रेजी भाषा के अध्ययन से भारत में नवजागरण काल आता है और अनेक समाज सुधारक और चिंतक पैदा होते हैं। ब्रह्मसमाज, प्रार्थना समाज, सत्यशोधक समाज, आर्यसमाज आदि के बैनर तले राजाराम मोहनराय, केशवचंद, ईश्वरचंद विद्यासागर, जोतीराव फुले, क्षत्रपति शाहूजी महाराज, दयानंद सरस्वती, विवेकानंद आदि के शिक्षा और सुधार आंदोलन शुरू होते हैं। आगे चलकर बाल गंगाधर तिलक, आगरकर, रानाडे, गांधी, पेरियार और आंबेडकर आदि आते हैं। अब तक जो शिक्षा गुरुकुल और मदरसों में थी, अब स्कूल-कॉलेजों में आ जाती है। विधिवत शिक्षा देने का काम शुरू होता है। शिक्षा के सार्वजनिक हो जाने पर भी आरंभ में आम दलित-पिछड़े और स्त्रियां शिक्षा से वंचित ही रहती हैं। विभिन्न आंदोलन और प्रयासों से सबको शिक्षा का अधिकार मिलता है। इस बीच शिक्षा में वही ब्राह्मणवादी विचार और सोच भर दिये जाते हैं। धीरे-धीरे दलित-पिछड़े और स्त्रियों के शिक्षित होने और फुले-आंबेडकर आदि के आंदोलन के कारण कालांतर में शिक्षा और साहित्य में परिवर्तन होता है। प्रगतिवादी-जनवादी साहित्य का सृजन होता है। स्त्री, दलित और पिछड़े भी सम्मान के साथ साहित्य और इतिहास में शामिल होते हैं। आज का दलित-बहुजन साहित्य शिक्षा और साहित्य की विचारधारा के केंद्र में स्थापित है।

इस बीच कड़ीबोली की कविता और आरम्भ की कथा-कहानी जैसे लोकप्रिय साहित्य को साहित्य में जगह नहीं दी गयी। इसके लिए अयोध्या प्रसाद खत्री जैसे हिंदी के विद्वानों को आंदोलन करने पड़े। देवकीनंदन खत्री, गोपाल राम गहमरी (साहू), इब्ने सफी, कुशवाहा कांत, गुलशन नंदा आदि के लोकप्रिय साहित्य को साहित्य का दर्जा नहीं दिया गया। अब उन्हें भी साहित्य माना जाने लगा है। आधुनिक काल के आरंभिक साहित्य के पिछड़ने का एक कारण यह भी रहा कि प्राचीन काल के गुरुकुलों की तरह शिक्षालयों में प्रवेश या तो विप्र कुमार या राजकुमारों (सामंतवर्ग) को ही मिलता रहा। कायस्थ और खत्री समाज यद्यपि हर तरह से शिक्षित और कुलीन हैं। उनके राजवंश भी रहे हैं। लेखन उनकी परंपरा और विरासत है। फिर भी अकादमिक जगत में उन्हें महत्त्व तभी मिला, जब प्रेमचंद जैसे दिग्गज साहित्यकार उर्दू से हिंदी में आये। अन्यथा शूद्रों की तरह उन्हें अश्रेष्ठ माना जाता रहा। खत्रीजी के ‘चंद्रकांता’ संतति पर कई टीवी सीरियल और फ़िल्में बनीं, कुशवाहा कान्त और गुलशन नंदा के उपन्यासों पर ‘काजल’, ‘कटी-पतंग’, ‘नीलकमल’, ‘खिलौना’, ‘परदेशी’, ‘नागिन’ जैसी दर्जनों हिट फ़िल्में बनीं। पर उन्हें अकादमिक जगत में स्वीकृति नहीं मिली। दूसरी ओर भारतेंदु हरिश्चंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, गिरिराज किशोर, चन्द्रकिशोर जायसवाल आदि के अलावा चौथीराम यादव, रामधारी सिंह दिवाकर, राजेंद्र प्रसाद सिंह, प्रेमकुमार मणि आदि ऐसे अनेक उल्लेखनीय नाम हैं, जो हिंदी साहित्य में मानक बन चुके हैं। वहीं दलित साहित्य के चर्चित रचनाकारों में हीरा डोम, अछूतानंद, ओमप्रकाश वाल्मीकि, कंवल भारती, मोहनदास नैमिशराय, श्यौराज सिंह बेचैन, मलखान सिंह, बुद्ध शरण हंस, जयप्रकाश कर्दम, तुलसीराम, आदि अनेक कवि-कथाकार हैं। साथ ही आदिवासी साहित्यकारों की बात करें तो रामदयाल मुंडा, वंदना टेटे, महादेव टोप्पो और अनुज लुगून सरीखे साहित्यकारों ने उल्लेखनीय योगदानों से भाषा और साहित्य को समृद्ध किया है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में दलित-पिछड़ों की महत्त्वपूर्ण भूमिका हैं। साथ ही आवश्यकता है कि इस भूमिका के विस्तार के लिए आपसी समन्वय हेतु प्रयास हों तथा सामूहिकता का विकास प्रसार हो।

संदर्भ

[1] रोमिला थापर, भारत का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली और विकिपीडिया के आधार पर
[2] रोमिला थापर, भारत का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ- 50
[3] वही
[4] विकीपीडिया और गुणाकर मुले की पुस्तक ‘इतिहास, संस्कृति और साम्प्रदायिकता, यात्री प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ-133 के आधार पर
[5] रोमिला थापर, भारत का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ- 61
[6] नाई वर्ण-निर्णय, लेखक- पं. रेवती प्रसाद शर्मा, उपेक्षित समुदायों का आत्म इतिहास, सं- बद्री नारायण, विष्णु महापात्र, अनंत राम मिश्रा, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ-80-81 के आधार पर
[7] हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास: डॉः बच्चन सिंह- राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-15
[8] इतिहास, संस्कृति और सांप्रदायिकता, गुणाकर मुले, यात्री प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ-95
[9] अयोध्या प्रसाद खत्री: ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मारक ग्रंथ’, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना, पृष्ठ-203
[10] संस्कृत साहित्य का इतिहास: डॉ राजकिशोर सिंह एवं देवीशंकर मिश्र, प्रकाशन केन्द्र लखनऊ के आधार पर
[11] विकिपीडिया व अन्य ब्लॉग
[12] संस्कृत साहित्य का इतिहास: डॉ राजकिशोर सिंह एवं देवीशंकर मिश्र एवं विकिपीडिया व कुछ ब्लॉगों पर आधारित
[13] चर्या पद एवं विकिपीडिया
[14] दलित देवो भव: भाग-1, किशोर कुणाल, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नयी दिल्ली के आधार पर
[15] दलित साहित्य कुछ आलोचनाएँ: कंवल भारती, संकल्पिका, पटना, सित- 1997, पृष्ठ-29

(संपादन : नवल/अनिल)

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लेखक के बारे में

हरिनारायण ठाकुर
एम.एस. कॉलेज, मोतिहारी (बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फ़रपुर, बिहार) के अवकाश प्राप्त प्राचार्य हरिनारायण ठाकुर सुविख्यात साहित्य समालोचक हैं। इनकी प्रकाशित कृतियों में ‘बिहार में अति पिछड़ा वर्ग आंदोलन’ (2007, हिमाचल प्रेस, पटना), ‘हिंदी की दलित कहानियां’ (2008, समीक्षा प्रकाशन, मुज़फ्फरपुर-दिल्ली), ‘दलित साहित्य का समाजशास्त्र’ (2009, भारतीय ज्ञानपीठ; पांचवां पेपरबैक संस्करण 2022, वाणी प्रकाशन समूह; देश के सभी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में), ‘भारत में पिछड़ा वर्ग आंदोलन और परिवर्तन का नया समाजशास्त्र’ (2009, अद्यतन-2022, कई संस्करण, ज्ञान बुक्स, नयी दिल्ली), ‘भारतीय साहित्य का शूद्र-पाठ (शुद्ध-पाठ)’ (2017, समीक्षा प्रकाशन, मुज़फ्फरपुर-दिल्ली; दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया के पाठ्यक्रम में) शामिल हैं। वहीं आत्मकथा ‘आकुल उड़ान’ वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशनाधीन है।

अयोग्यता

अयोग्यता भवतीर्श्यालुः

Monday, 6 February 2023

लीपा पोती

साफ-सफाई
टाल टकोरा।
खून दबाई
लीपा पोती।

Sunday, 5 February 2023

ऐक्य की बात

असत् सत्ता के शतरंज में, 
सत्य दांव पर लगा हुआ।
जन-जन व परिवेश देश है, 
यह देश दांव पर लगा हुआ।
पल-पल विखरते विश्वास, 
ऐक्यभाव नित दरक रहा।
भाँति भाँति के नवफूल धरे
बाग-सा महकता देश रहा।
सीमाएं नित्-नित् बदलीं हैं 
सीमाओं से कब देश रहा?
ऐक्य न होगा देश न होगा
सदा ऐक्य की बात हो यहाँ।
06-02-2020

रैदास

आयोजनों का औचित्य 
देव वाक्य/ब्रह्म वाक्य?
ब्रह्म असीम?
भगवान ने सबको बनाया?

रैदास के राम
भक्ति के बल पर 
मन चंगा
समरसता या समता
शिकारी दाना पानी का प्रयोग फंसाने
भक्त 
तीर्थ के भाव 
चरण/शरण 
आयोजनों से बचना?

रैदास एक लंगोट 

बिना नाम लिये कहने की कला
हाथों की कमाई बातों ने खाई।

वेद ब्राह्मण गाय वर्णाश्रम 





Saturday, 4 February 2023

जगत के ठगिया

जगत के ठगिया वेई हैं निकरे,
हम तो लग्घर समझ रए। 
का रक्खौ है जा माया मोह में, 
ऐसी वे हमसें कअत रए।
सई तौ कए रए ऐसी सोच कैं, 
हम देत रए वे लेत रए।
आज उनकें हैं अटा हमएं टटा, 
वे स्वामी हम दास भए। 
अब वे ढंग सें बोलत नौं नैंया,
न चितावें हम रोउत रएं। 
बूझे! मीठीं-मीठीं ठगिआ कीं,
अब न सुन हैं कउत रएं। 
कान खोल कैं सुन लो ठग जू!,
हम ताल ठोक कए रए।
जित्तौ जो दैहौ उत्तौ ओई लैहौ,
मुफत में तो दैवे सें रए।
पैसा, संग, इज्जत सब मिल है,
इतै भी तो चानें कए रए। 
जो तुम करौ ताखों विसार दै हैं, 
अब वो बंद करो कए रए। 
नैंतर तुमई तुम जानो हमई हम,
तुमईं बातन में आबे सें रए।