जान, ज्ञान और मान
एक बार बाबा साहब काम करते-करते भूख महसूस करते हैं तो अपनी दवा और ख़ाना मंगाते हैं और कहते हैं कि मेरा सम्पूर्ण संघर्ष मान के लिए है यह प्रत्येक व्यक्ति का होना चाहिए। बार-बार सामाजिक अपमान का शिकार होने पर अपनी जान दे देने का कुविचार आता है। तत्काल सुविचार आता है कि मानसिक रोगियों से परेशान होकर स्वयं को मिटाने की अपेक्षा रोगी के रोग को मिटाना ज्यादा श्रेयशकर है। किसी भी समाज में रोगियों की अपेक्षा डाक्टर कम ही होते हैं। अगर डाक्टर ही आत्महत्या कर ले तो सम्पूर्ण समाज रोगग्रस्त होकर मिट जायेगा। मेरी समझदारी इसी में है कि स्वयं को सुरक्षित रखूं और समाज के रोग को दूर करूँ। मेरी जान समाज की जान के लिए जरूरी है। समय पर दवा और भोजन इसलिए लेता हूँ ताकि मैं अपने इस शरीर का राष्ट्र व समाज हित में अधिक-अधिक उपयोग कर सकूँ। मैं रात-रात भर इसलिए पढ़ता हूँ ताकि मैं अपने देश व समाज की बीमारी को भलीभांति जान सकूँ और समुचित प्रयास कर सकूँ। मेरा देश जिस भयानक रोग से ग्रसित है उसके आगे मेरा शारीरिक रोग कुछ भी नहीं है फिर भी मैं अपने दैहिक रोग को नजरअंदाज नहीं करता दवा लेता हूँ । और देश के रोग की दबा बनाने में लगा हूँ।
Friday, 31 May 2019
जान, ज्ञान और मान
Thursday, 30 May 2019
कालचक्र
बारह अरों का है काल चक्र
रहता है अनवरत गतिमान।
रंग भरे हर अरे में मौसम के
सृष्टि से संहृति तक संधान।
मनुष्य एक अंश है सृष्टि का
न वह मौसम है न कालचक्र
चूक सकता है निज मार्ग से
तदपि नित करता लक्षसंधान।
आरक्षण विरोधी
हमें आरक्षण से कोई आपत्ति नहीं है !
समस्या तो यह है कि ~
जिसको आरक्षण दिया जा रहा है , वो
सामान्य आदमी बन ही नहीं पा रहा है !
समय सीमा तय हो कि ~
वह सामान्य नागरिक
कब तक बन जायेगा ?
आरक्षण दिया पर पूर्णतः लागू नहीं,
क्योंकि सत्ता शोषक के हाथों में है।
जाति और शोषण समाप्ति हुई नहीं,
क्योंकि सत्ता शोषक के हाथों में है।
आरक्षण समय सीमा निश्चय हो कैसे,
क्योंकि सत्ता शोषक के हाथों में है।
किसी व्यक्ति को आरक्षण दिया गया और
वो किसी सरकारी नौकरी में आ गया !
अब उसका वेतन ₹5500 से ₹50000 व
इससे भी अधिक है , पर जब उसकी
संतान हुई तो वह भी पिछडी ही पैदा हुई ,
और ... हो गई शुरुआत !
उसका जन्म हुआ प्राईवेट अस्पताल में ~
पालन पोषण हुआ राजसी माहोल में ~
फिर भी वह गरीब पिछड़ा और
सवर्णों के अत्याचार का मारा हुआ ?
उसका पिता लाखों रूपए सालाना कमा
रहा है , तथा उच्च पद पर आसीन है !
सारी सरकारी सुविधाएं ले रहा है !
वो खुद जिले के ...
सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है , और
सरकार ... उसे पिछड़ा मान रही है !
सदियों से सवर्णों के ...
अत्याचार का शिकार मान रही है !
आपको आरक्षण देना है , बिलकुल दो
पर उसे नौकरी देने के बाद तो ...
सामान्य बना दो ! ये गरीबी ओर पिछड़ा
दलित आदमी होने का तमगा तो हटा दो !
यह आरक्षण कब तक मिलता रहेगा उसे ?
इसकी भी कोई समय सीमा तय कर दो ?
या कि ~ बस जाति विशेष में पैदा हो गया
तो आरक्षण का हकदार हो गया , और
वह कभी सामान्य नागरिक नही होगा !
दादा जी जुल्म के मारे !
बाप जुल्म का मारा !
अब ... पोता भी जुल्म का मारा !
आगे जो पैदा होगा वह भी ~
जुल्म का मारा ही पैदा होगा !
ये पहले से ही तय कर रहे हो ?
वाह रे मेरे देश का दुर्भाग्य !
वाह रे महान देश !
जिस आरक्षण से उच्च पदस्थ अधिकारी ,
मन्त्री , प्रोफेसर , इंजीनियर, डॉक्टर भी
पिछड़े ही रह जायें, गरीब ही बने रहेंगे ,
ऐसे असफल अभियान को
तुरंत बंद कर देना चाहिए !
क्या जिस कार्य से कोई आगे न बढ़ रहा हो
उसे जारी रखना मूर्खतापूर्ण कार्य नहीं है ?
हम में से कोई भी आरक्षण के खिलाफ नहीं,
पर आरक्षण का आधार जातिगत ना होकर
आर्थिक होना चाहिए !
सबका साथ सबका विकास ~
अन्त्योदय योजना लाओ ~
अंत को सबल बनाओ !
और तत्काल प्रभाव से ...
प्रमोशन में आरक्षण तो बंद होना ही चाहिए !
नैतिकता भी यही कहती है , और
संविधान की मर्यादा भी !
क्या कभी ऐसा हुआ है कि ~
किसी मंदिर में प्रसाद बँट रहा हो तो
एक व्यक्ति को चार बार मिल जाये ,और
एक व्यक्ति लाइन में रहकर अपनी बारी का
इंतजार ही करता रहेगा ?
आरक्षण देना है तो उन गरीबों ,लाचारों को
चुन चुन के दो जो बेचारे दो वक्त की रोटी को
मोहताज हैं... चाहे वे अनपढ़ ही क्यों न हों !
चौकीदार , सफाई कर्मचारी ,सेक्युरिटी गार्ड
कैसी भी नौकरी दो !
हमें कोई आपत्ति नहीं है और ना ही होगी !
ऐसे लोंगो को मुख्य धारा में लाना ...
सरकार का ~
सामाजिक व नैतिक उत्तरदायित्व भी है !
परन्तु भरे पेट वालों को बार बार
56 व्यंजन परोसने की यह नीति
बंद होनी ही चाहिए !
जिसे एक बार आरक्षण मिल गया , उसकी
अगली पीढ़ियों को सामान्य मानना चाहिये
और आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये !
🙏 अगर सहमत हो तो जन-जन तक पहुचायें, धन्यवाद🙏
Wednesday, 29 May 2019
आरक्षण
आरक्षित सामान्य नहीं बन पा रहा,
क्योंकि जाति कायम है।
धनवान हो गया फिर भी है पिछड़ा,
क्योंकि जाति कायम है।
राजसी भोजन-कपड़े फिर भी पिछड़ा,
क्योंकि जाति कायम है।
उच्च पदस्थ है फिर भी पिछड़ा,
क्योंकि जाति कायम है।
नौकरी मिल गई मान न मिला,
क्योंकि जाति कायम है।
आरक्षण नहीं प्रतिनिधित्व चाहिए,
क्योंकि भेद क़ायम है।
प्रतिनिधित्व चाहिए तब तक,
जब तक भेद कायम है।
पीढ़ियां बदलीं मान न मिला,
क्योंकि जाति कायम है।
दलन का आधार अर्थ नहीं,
भेद में जाति कायम है।
धनी हैं पर मंदिर प्रवेश नहीं,
क्योंकि जाति कायम है।
धन-ज्ञान मिला मान न मिला,
क्योंकि जाति कायम है।
बन्धु़! जहर उगलते मान न देते,
क्योंकि जाति कायम है।
Monday, 27 May 2019
मशीन
हाथों ने बनायी थी मशीन
निज क्षमता बढ़ाने के लिए,
एक मशीन क्या आयी यहाँ
हजार हाथ बेकार हो गए।
हमने खोजी थी एक मशीन
लोकतंत्र को सजाने के लिए,
संदेह की घटाएँ भीषण उठीं
बन काल लोकतंत्र के लिए।
Friday, 17 May 2019
Thursday, 16 May 2019
नीर
हे नीर! ये तो बताओ
कहाँ से पायी है तुमने यह सरलता
नहीं है कणमात्र की कर्कशता।
कहाँ से पायी है तुमने यह तरलता
हर आकार में ढल जाते हो।
कहाँ से लाये हो यह रूप,
जिस रंग में मिलते हो वही हो जाते हो।
कहाँ से पाये हो यह ढलने की कला,
आग में हवा, शीत में पत्थर, धरा पे पानी।
कहाँ से पाये हो यह वाक्-चातुर्य,
सागर में मौन, सरित में कलकल, झरने पर गीत।
कहाँ से सीखा है कर्म-कौशल,
दे देते हो आकार मनचाहा तड़ाग को, नदी को, रत्नाकर को भी।
सरल हो, तरल हो, सहज भी हो
पर देखा है दुनियां ने तुम्हें चट्टानों को भेदते हुए।
तुम सुधीर हो, तुम सुतीर हो, तुम नीर हो।