Monday, 21 July 2025

 व्याकरण में "लौकिक" शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से दो अर्थों में होता है: पहला, सामान्य बोलचाल की भाषा या संसार से संबंधित, और दूसरा, व्याकरण के नियमों के अनुसार शुद्ध भाषा या साहित्यिक भाषा के विपरीत।

1. सामान्य बोलचाल की भाषा या संसार से संबंधित:
  • लौकिक शब्द का प्रयोग उस भाषा या शब्दों के लिए होता है जो आम लोगों द्वारा दैनिक जीवन में उपयोग की जाती है, जैसे कि "लौकिक व्यवहार" या "लौकिक सुख". 
  • यह शब्द "पारलौकिक" या "अलौकिक" के विपरीत है, जो आध्यात्मिक या रहस्यमय दुनिया से संबंधित है. 
  • उदाहरण के लिए, "लौकिक संस्कृत" वह संस्कृत है जो आम लोगों द्वारा बोली जाती थी, जबकि "वैदिक संस्कृत" वह संस्कृत है जो वेदों और धार्मिक ग्रंथों में प्रयुक्त होती थी. 
2. व्याकरण के नियमों के अनुसार शुद्ध भाषा या साहित्यिक भाषा के विपरीत:
  • लौकिक शब्द का प्रयोग उन शब्दों या वाक्यों के लिए भी होता है जो व्याकरण के नियमों के अनुसार सही नहीं हैं, या जो साहित्यिक भाषा के मानकों को पूरा नहीं करते हैं. 
  • उदाहरण के लिए, "लौकिक न्याय" का अर्थ है लोक व्यवहार में प्रसिद्ध दृष्टांत, जो व्याकरणिक रूप से सटीक नहीं हो सकते हैं, लेकिन सामान्य समझ के लिए उपयोगी हैं. 
  • पाणिनि के अष्टाध्यायी जैसे व्याकरणिक ग्रंथों में, लौकिक शब्दों का प्रयोग कभी-कभी उन शब्दों के लिए किया जाता है जो व्याकरण के नियमों के अनुसार अशुद्ध हैं, लेकिन फिर भी उपयोग में हैं. 
लौकिक शब्द के प्रयोग के प्रयोजन:
  • भाषा के विकास को समझना:
    लौकिक शब्दों का अध्ययन करके, हम भाषा के विकास और परिवर्तन को समझ सकते हैं. 
  • भाषा के विविध रूपों को जानना:
    लौकिक शब्दों का प्रयोग हमें भाषा के विभिन्न रूपों, जैसे कि बोलचाल की भाषा, साहित्यिक भाषा, और व्याकरणिक रूप से अशुद्ध भाषा को समझने में मदद करता है. 
  • भाषा के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ को समझना:
    लौकिक शब्दों का प्रयोग हमें भाषा के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ को समझने में मदद करता है, जैसे कि यह कैसे उपयोग की जाती है, और यह लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करती है. 
  • भाषा के नियमों को स्पष्ट करना:
    लौकिक शब्दों का प्रयोग व्याकरणिक नियमों को स्पष्ट करने और भाषा को सही ढंग से समझने में मदद करता है. 
संक्षेप में, "लौकिक" शब्द का प्रयोग भाषा के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि बोलचाल, साहित्यिक भाषा, और व्याकरणिक रूप से अशुद्ध भाषा को संदर्भित करने के लिए किया जाता है, और इसका उपयोग भाषा के विकास, सामाजिक संदर्भ, और व्याकरणिक नियमों को समझने के लिए किया जाता है

Sunday, 20 July 2025

व्याकरण के लौकिक (common usage) शब्द प्रयोग प्रयोजन

व्याकरण के लौकिक (common usage) शब्द प्रयोग का मुख्य प्रयोजन भाषा को स्पष्ट, सही और प्रभावी ढंग से उपयोग करना है। यह भाषा को समझने और उसका सही उपयोग करने में मदद करता है, जिससे संचार बेहतर होता है। 
व्याकरण के लौकिक शब्द प्रयोग के प्रयोजन:
स्पष्टता:
व्याकरण भाषा को स्पष्ट बनाता है, जिससे पाठक या श्रोता को आसानी से समझ में आता है कि क्या कहा जा रहा है।
शुद्धता:
व्याकरण भाषा के नियमों का पालन करने में मदद करता है, जिससे भाषा में अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है।
प्रवाह:
व्याकरण भाषा को सुगम और प्रभावी बनाता है, जिससे पढ़ने और सुनने में आसानी होती है।
प्रभावशीलता:
व्याकरण भाषा को अधिक प्रभावी बनाता है, जिससे संदेश को अधिक स्पष्ट रूप से पहुंचाया जा सकता है।
संचार:
व्याकरण भाषा को एक व्यवस्थित और संगठित तरीके से उपयोग करने में मदद करता है, जिससे संचार बेहतर होता है। 
उदाहरण:
"मैं जा रहा हूँ"
यह वाक्य व्याकरणिक रूप से सही है, जबकि "मैं जा रहा" व्याकरणिक रूप से अशुद्ध है।
"वह बहुत सुंदर है"
यह वाक्य व्याकरणिक रूप से सही है, जबकि "वह सुंदर बहुत है" व्याकरणिक रूप से अशुद्ध है। 
संक्षेप में, व्याकरण भाषा को समझने और उसका सही उपयोग करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है। यह हमें स्पष्ट, शुद्ध और प्रभावी ढंग से संवाद करने में मदद करता है। 

लौकिक संस्कृत शब्दकोश, जिसे "अमरकोश" के नाम से भी जाना जाता है, संस्कृत भाषा का एक प्रसिद्ध शब्दकोश है। यह शब्दकोश, जिसे "नामलिंगानुशासन" भी कहा जाता है, छठी या सातवीं शताब्दी में अमरसिंह द्वारा लिखा गया था। यह शब्दकोश, जो समानार्थक शब्दों का एक संग्रह है, संस्कृत साहित्य में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। 
लौकिक संस्कृत, वैदिक संस्कृत से अलग है, जो वेदों में पाई जाती है। लौकिक संस्कृत, लोक में प्रयोग होने वाली संस्कृत है, और इसका उपयोग रामायण, महाभारत, और अन्य ग्रंथों में किया गया है। 
यहाँ लौकिक संस्कृत और वैदिक संस्कृत के बीच कुछ प्रमुख अंतर दिए गए हैं:
शब्दरूप:
लौकिक संस्कृत में, कुछ शब्दरूप वैदिक संस्कृत से भिन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, वैदिक संस्कृत में "देवासः" और "जनासः" जैसे रूप होते हैं, जबकि लौकिक संस्कृत में "देवाः" और "जनाः" होते हैं। 
क्रियारूप:
वैदिक संस्कृत में क्रियारूपों की संख्या लौकिक संस्कृत से अधिक है। 
शब्दावली:
कुछ वैदिक शब्द लौकिक संस्कृत में अनुपलब्ध हैं, और कुछ नए शब्द लौकिक संस्कृत में उभरे हैं। 
शैली:
वैदिक संस्कृत में एक विशेष प्रकार की संगीतमयता और छंद होता है, जबकि लौकिक संस्कृत में अधिक सरलता और स्पष्टता होती है। 
अमरकोश, लौकिक संस्कृत का एक महत्वपूर्ण शब्दकोश है, जो समानार्थक शब्दों का एक संग्रह है और जिसका उपयोग व्यापक रूप से संस्कृत साहित्य में किया जाता है। 

Friday, 18 July 2025

कसाई

सूत कसाई सूतहि मारे
लट्टन मारे लूट कसाई।
धूर्त कसाई बातन मारे,
गौतम! बचवे में हि भलाई।।rg
 

मोह माया का भक्षण

उसने सुनाया 
पहाड़ के एक पत्थर पर रहने वाले बन्दर ने पहाड़ उठाया।
लोग बोले अद्भुत। 
उसने सुनाया,
किसी झील के किनारे रहने वाला आदमी समुद्र पी गया।
लोग बोले अद्भुत। 
उसने सुनाया,
पृथ्वी के गड़खोले में लोटने वाला वराह समुद्र में से पृथ्वी निकाल लाया।
लोग बोले अद्भुत। 
उसने सुनाया,
आदमी मुख, बाजू, जंघा व पैर से पैदा होते हैं।
लोग बोले अद्भुत। 
उसने सुनाया,
बातूनी सबका बाप, हूंकाबाज सब मूर्ख। 
लोग बोले, वो कैसे?
वह बोला, 
परमात्म ने ऐसा ही लिखा है।
अतः सबका मालिक एक है।
जाओ, परमात्मा की व्यवस्था का पालन करो।
नहीं तो परलोक बिगड़ जायेगा।
लोग परलोक सुधारने में व्यस्त हैं। और वह मायाजाल के संसाधनों का भोग नहीं कर रहा वह तो इस मोहमाया का भक्षण करके लोगों की रक्षा कर रहा है।
रामहेत मत पड़ बीच में।

अज्ञानी

👉🏻 तुमने बोला *बिना पंख के बंदर उड़ गया .*
 ◆ हमने मान लिया
👉🏻 तुमने बोला *बन्दर ने उड़कर आग के विशाल गोले (सूर्य )को निगल लिया*
◆ हमने बोला हां ठीक है।
👉🏻 तुमने बोला *पृथ्वी गाय के सिंग पर टिकी है*
◆ हमने बोला हां ठीक है...|
👉🏻 तुमने बोला *पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है*
◆हमने बोला हां ठीक है...|
👉🏻 तुमने बोला, *ब्राम्हण ब्रम्हा के मुँह से निकला है, इसलिए श्रेष्ठ ह*
◆ हमने कहा ठीक है...।
👉🏻 तुमने बोला, *शुद्र ब्रम्हा के पैर से पैदा हुये है*
◆ हमने मान लिया...।
👉🏻 तुमनें बोला, *कौरव घी के डिब्बों से पैदा हो गए.*
◆ हमनें यह भी मान लिया।
👉🏻 तुमनें बोला, *सीताजी खेत में हल चलाते समय जमीन से निकल आयी*
◆ हमनें यह भी मान लिया...|
👉🏻 तुमने बोला, *हनुमान कान से पैदा हो गए*
◆ हमनें यह भी मान लिया...।
👉🏻 तुमने बोला, *श्रृंगी ऋषि हिरनी से पैदा हो गए*
◆ हमने यह भी मान लिया.
👉🏻 तुमने बोला, *मकरध्वज मछली से पैदा हुआ*
◆ मैंने यह भी मान लिया.
👉🏻 तुमनें बोला, *हिरण्याक्ष पृथ्वी को उठाकर समुद्र में घुस गया*
◆ हमने यह भी मान लिया.
👉🏻 तुमने बोला, *विष्णू ने वराह (सुवर)का अवतार धारण कर पृथ्वी को हिरण्याक्ष से छुड़ा लिया*
◆ हमने यह भी मान लिया.
👉🏻 *तुमने हत्यारे, लुटेरे, व्यभिचारी, धोखेबाज, बलात्कारी लोगो को भगवान-देवी-देवता बताया*
◆ हमने वह भी मान लिया.
👉🏻 *तुमने बंदरो से पत्थर तैराकर समुद्र में पूल बनवा दिया*
◆ हमने वह भी मान लिया.
👉🏻 *तुमने जिस शेषनाग के फन पर पृथ्वी टिकी थी, उसी सांप को रस्सी बनाकर समुद्रमंथन करा दिया*
◆ हमने वह भी मान लिया.
👉🏻 *तुमने एक बन्दर से सोने (धातु) की लंका (पूरा नगर) को जलवा दिया*
◆ हमने वह भी मान लिया.
👉🏻 तुमने बोला, *ब्रम्हा के मुख से पैदा हुआ ब्राम्हण ही सर्वेसर्वा भूदेव है*
◆ हमने मान लिया.
👉🏻 तुमने बोला, *यह पूरी दुनियाँ एक ईश्वर चलाता है, जो खुद ब्राम्हणों के कहने पर चलता है*
◆ हमने फिर भी मान लिया.
👉🏻 तुमने बोला, *यहां के हर पत्थर में भगवान है*
◆ हम आजतक उसे भी मानते रहे.
👉🏻 तुमने बोला, *तुम ब्रम्हा के पैरों से पैदा हुये हो इसलिए तुम्हे कोई भी अधिकार नहीं हैं*
◆ मैंने वह भी मान लिया...।
*ऐसे और भी हजारों, ऐसे तथ्य है जिन्हें तुमने हमें मानने पर मजबूर किया और हमने चाहे, न चाहे मान लिया....।*

*आखिर क्यों ...?*

*क्योंकि, तुमने हमारे सोचने-समझने-जानने की ताकत (शिक्षा) तर्क, बुद्धि और विज्ञान छीनकर हमें अँधा बनाकर अपाहिज बना दिया था...।*

*पर आज हमारी आँखें खुल चूकी हैं*
*हमारे पास आज ताकत है, ''फुले, साहू, पेरियार, अम्बेडकरी विचारधारा कि और सिद्धांतों के कलम के ताकत की, जिसमे स्याही भरी है इन्ही महापुरुषों के तर्क, बुद्धि, विवेक और विज्ञान की...।*

*और आज हमारे पास ताकत है, महामानव बोधिसत्व बाबासाहब डाॅ. भीमराव अंबेडकर के संविधान की जिसमे अपार क्षमता है महाकारुणिक तथागत बुद्ध के प्राकृतिक विज्ञान की.*

इसलिये, आज मैं इन काल्पनिकताओं को मानने के बजाय जानना चाहता हूँं, 
👉🏻 *_इन सभी का सच...!_*👈🏻

और, पूँछना चाहता हूं एक मात्र तार्किक सवाल....???

*''कि आजतक जो तुमने हमे बताया आखिर वह सब होता कैसे था...?''*
*''और, वह सब आज क्यों नही कर पा रहे हो...?...*

*तो फिर, करिए न मंत्र जाप...*
*और, दिखाइए न ऐसे चमत्कार जो बड़े-बड़े ग्रंथो में ठूँस-ठूँस कर भरे हुए है...।*

_*अब मूर्खता, पाखंड, अंधविश्वास के लिए यहां कोई भी जगह नहीं है...।*_

*क्योंकि, यह कोई रामराज, यमराज और धर्मराज का राज नही...,*
*_''बल्कि, अत्याधुनिक तर्क, बुद्धि, विवेक और विज्ञान से लैस वैज्ञानिक इक्कीसवी सदी के विज्ञान का राज है जय भीम नमो बुद्धाय💙💙

दलित वर्ण-व्यवस्था से बाहर के लोग हैं।

दलित वर्ण-व्यवस्था से बाहर के लोग हैं। वे उत्पादक लोग रहे हैं। उनके संस्थान, मान व प्रतिष्ठा को सैन्य बल से रोंद कर दुवारा पनपने नहीं देते। सवर्णों को उनके उत्पाद चाहिए जिन्हें कुछ बूंदें छिड़क कर पवित्र मान कर उपयोग में लेते हैं। उत्पादक वर्ग के दलन की आदत हो चली है। दलितों को रौंदने में गौरव का अनुभव किया जाता हो जहाँ वहाँ जुड़कर कैसे रहा जा सकता है। जिन पर वर्णव्यवस्था थोपी गई उन्होंने भी नहीं मानी तो दलित कैसे मान लें। जिन लोगों ने ग्रन्थों में वर्णव्यस्था ठूँसी उन्होंने स्वयं कभी नहीं मानी। मानी होती तो 99% ब्राह्मण सांसारिक भोग विलास के संसाधनों पर कब्जा करके न बैठे होते। 
आसमान में बैठकर गर्त गिराये गये समाज को कैसे साथ रखा जा सकता है।
इसके लिए तो धरातल पर उतरना पड़ेगा। दलित को भी धरातल पर आने में हाथ थामना होगा। 
अछूत का हाथ थामने के लिए इतना आत्मबल चाहिए कि स्वघोषित पवित्र लोगों का धर्म भ्रष्ट न होकर अछूत पवित्र होकर इनके जैसे हो जाएं तब आपके जैसे लोगों को मंच से गला फाड़ने की जरूरत ही नहीं रहेगी। 
शास्त्र ही तो कहते हैं कि संतजनों से स्नेह व भरोसा पाकर जानवर भी साथ आ जाते हैं। पर संत के आवरण में बहेलिए द्वारा पीड़ित जानवर संतो से भी बचते हैं। 
कोई दलित मंदिर जाए तो ब्राह्मण मारे, घोड़ी चढ़े तो ठाकुर मारे, दुकान खोले तो बनिया मारे। इन घटनाक्रमों पर आप जैसे लोग मौन रहें तो राजनीति को दोष देकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। 
दलित फुसलाने से नहीं अपनापन, विश्वास, सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा आदि में समान अवसर देखकर ही साथ आयेंगे। आप अनके प्रतिनिधित्व को स्वीकार किये बिना साथ लाने का दिवास्वप्न देख रहे हैं।❤

Thursday, 17 July 2025

ग्रामसूकरः

"धूम्रपान करने वाले को दान देना — नरकीय दुःख का कारण बन सकता है .. 

(पद्म पुराण का उपदेश)

जब भी कोई श्रद्धालु अपने पुण्यवर्धन हेतु किसी ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देता है, तो शास्त्र यह अपेक्षा करता है कि वह ब्राह्मण शुद्धाचारी, वेदमार्ग का अनुगामी, संयमी और सदाचारी हो। परंतु यदि कोई ब्राह्मण धूम्रपान करता हो — यज्ञीय अग्नि के समीप रहकर भी अग्निविरुद्ध आचरण करता हो — तो उसे दान देना न केवल निष्फल, बल्कि घोर अधर्म का कारण बन जाता है।

पद्म पुराण में कहा गया है—

> धूम्रपान रते विप्रे दानं कुर्वन्ति यो नराः ।
ते नरा नरकं यान्ति ब्रह्माणौ ग्रामशूकराः ॥

अर्थ:
जो व्यक्ति धूम्रपान करने वाले ब्राह्मण को दान देता है, वह स्वयं भी नरक में जाता है, और वह ब्राह्मण — जो वेदमार्ग से च्युत होकर धूम्रपान जैसा तमोगुणी आचरण करता है — मृत्यु के उपरांत गांव-गांव में भटकने वाला शूकर (सुअर) बनता है।

यह केवल ब्राह्मणों के लिए नहीं, अपितु क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — सभी वर्णों में यह नियम समान रूप से लागू होता है। जो भी व्यक्ति व्यसनी, अधार्मिक, नास्तिक या शास्त्रविरोधी आचरण करने वाले को दान देता है, उसका पुण्य नष्ट होकर उसे पाप का भागी बनाता है।

इसलिए—
दान देते समय केवल जाति नहीं, पात्रता भी जांचें।
धर्म केवल भावना नहीं, विवेक की परीक्षा भी है।

#राधेराधे