Saturday, 3 October 2026

आदिवासी कविता का संस्कृत अनुवाद- डा. जानी

वनेभ्यो बिभीमः?

कस्माज्जाताः

सुहृदो नो व्याघ्राः

शत्रवः?

कस्मान्न दृश्यन्ते

परिचिताः जना

ये

गता नगरमायाबद्धाः?



   आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी प्रस्तुत संकलन की शुभाशंसा में इन कविताओं को आरण्यकगीतों का नवीन रूप बतलाते हुए कहते हैं कि प्रकृति से ऐसा तादात्म्य अब दुर्लभ हो गया है- एताः कविताः क्वचित् ऋग्वेदस्य अरण्यानीसूक्तं स्मारयन्ति क्वचित् पर्जन्यसूक्तम्। वन्यजीवनेन एतादृशं तादात्म्यं साम्प्रतिके जीवने सर्वथा स्पृहणीयं जातम्। वनवासिनो जानाति यदहं वनस्यैवविस्तारोऽस्मि-एतादृश्यः अनुभूतयोऽन्यत्र दुर्लभाः सन्ति।

    संग्रह का नामकरण अनुवादक ने सम्भवतः ऋग्वेद के वाक्सूक्त के एक मंत्र के आधार पर किया है- अहं रुद्राय धनुरातनोमि-----आदिवासियों का धनुष से गहन सम्बन्ध है| आदिवासी कविता वाग्देवी के बाण है । वाग्देवी ही कदाचित् प्रकृति के रूप में कल्पित है और आदिवासी उसके रक्षक| प्रकृति विकृत किये जाने पर रौद्र रूप भी धारण कर लेती है|

        इस संग्रह में कविताओं के साथ उनके भावों के अनुरूप कुछ चित्र भी दिये गये हैं, जो स्वयं अनुवादक ने बनाये हैं। ये चित्र वारली चित्रशैली में है, जो महाराष्ट्र की वारली जनजाति में प्रचलित है। निश्चित ही यह संग्रह संस्कृत साहित्य में विमर्श के नवीन वातायन उद्घाटित करेगा।