Saturday, 11 April 2026

पत्रकारिता का लोकधर्म

तीन तलाक के बराबर भी फारमल्टी की जरुरत नहीं समझते समाचार एजेन्सयों के मालिक। 
राय- 
संविधान की अनकही कहानी
संविधान सभा के पांव लड़खड़ा रहे थे।
मन में कुछ और था बना कुछ और
तीली लगाना चाहते है।
संतुलन ही लोकधर्म है।
अपने समय की सबसे बड़ी समस्या के समाधान में अपना दायित्व निर्वहन ही उसका लोकधर्म। 
पत्रकार की छवि पुलिस जैसी क्यों है?
माधव सप्रे पेंण्ड्रा हिंदी के प्रथम पत्रकार। 
स्वतन्त्रता संग्राम में हिन्दी पत्रकारिता 
अखवार वही निकाल सकता है जो धनी हो।
प्रेस आयोग 1975
2nd press
1983 
2009 m.m.joshi

पेड न्यूज 
कमाई बसूल लेना पत्रकारों ने की
हिन्दी और भाषाई पत्रकारिता ने BP singh 1989 PM बनाया।
संपादक का क्षरण लोभ-लालच संपत्ति विस्तार 
स्वयं संपादक बनने लगे।
आज संपादक नहीं प्रबंधक हैं।
स्रोत पवित्र नहीं तो परम्परा नहीं
राजेन्द्र माथुर की अकाल मृत्यु संपादकीय भष्टाचार 
मीडिया काउंसिल नहीं बन रहा क्योंकि
मीडिया घराने और सरकार में सांठगांठ हो गई है।
मीडिया के लिए नियम और नियमन होना चाहिए। 
पत्रकार संस्थान भ्रष्ट हो गये हैं।
नागरिक के पास फोरम नहीं है।

मीडिया में रोजगार के अवसर बढ़ें।





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