कादम्बरी-शुकना सोपदेशः
'उत्तमा 'मालती' संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेतः
मुक्तक
'एवं समतिक्रामत्सु केषुचित् दिवसेषु राजा चन्द्रापीडस्य 'यौव-राज्याभिषेकं चिकीर्षुः प्रतीहारानुपकरण सम्भारसंग्रहार्थमादिदेश ।।
अन्वयः- एवं समतिक्रामत्सु केषुचित् दिवसेषु चन्द्रापीडस्य यौवराज्या-भिषेकं चिकीर्षुः राजा, उपकरणसम्भारसंग्रहार्थं प्रतीहारान् अ दिदेश ।
शब्दार्थः- एवम् - इस प्रकार । समतिक्रामत्सु केषुचित् दिवसेषु - कुछ दिन बीतने पर । चन्द्रपीडस्य = 'चन्द्रापीड' का ('चन्द्रापीड' नाम के अपने पुत्र का) । यौवराज्याभिषेकं युवराज-कर्म के लिए अभिषेक को। चिकीर्षुः
१. भारतीय राज्यपरम्परा के अनुसार राजा अपने ज्येष्ठ पुत्र को युव-राज पद प्रतिष्ठित करता था। यह कार्य राजा अपनी वृद्धावस्था में करता था। इसका रहस्य यह था कि राजा अपने सामने ही अपने पुत्र को राज्य-भार देकर उसे शासन में प्रवीण बनाता था और स्वयं एक प्रकार से राज्य-भार से मुक्त होकर विश्राम लेता था। इस प्रक्रिया से वृद्ध राजा की मृत्यु के बाद युवक राजा को शासन-सूत्र संभालने में कठिनाइयों का अनुभव नहीं होता था। इस अवसर पर युवराज को मन्त्रोच्चारण के साथ तीर्थों के पवित्र जल से एक विशेष प्रकार का स्नान कराया जाता था। इसी उत्सव-विशेष को 'यौवराज्याभिषेक' या 'युवराज का राजतिलक' कहा जाता था ।
२. युवराज के राजलितक के अवसर पर तीर्थों का पवित्र जल, हवन-सामग्री समिश्रा, घृत, राजकीय वस्त्र, छत्र, चेंबर, राज्यसिहासन प्रभृति वस्तुओं को उपयोग में लाया जाता था ।
२
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
राजा करने की इच्छा वाला महाराज चन्द्रापीड का पिता तारापीड । उपकरणसम्भारसंग्रहार्थम् सामग्री समूह के संचय के लिए। प्रतीहारान् द्वारपालों को। आदिदेश आदेश दिया ।
समासः युवा चासो राजा इति युवराजः तस्य कर्म यौवराज्यम्, तद-सम्भारः, तस्य संग्रहः, धंम् अभिषेकः तं यौवराज्याभिषेकम् । उपकरणानां तस्मै अर्थम् इति उपकरणसम्भारसंग्रहार्थम् ।
सरलार्थः - राजा तारापीडः चन्द्रापीडसंज्ञकस्य आत्मजस्य यौवराज्या-भिषेकार्थम् सामग्रीसमुदायानाम् संघटनाय सेवकान् आज्ञापयामास ।
अनुवादः - इस तरह कुछ दिन बीतने के बाद चन्द्रापीड को युवराज-कर्म के लिये अभिषेक करने की इच्छा वाले महाराज तारापीड ने अभिषेक की सभी सामग्री जुटाने के लिये द्वारपालों को आदेश दिया ।
समुपस्थितयौवराज्याभिषेकञ्च तं कदाचिद्दर्शनार्थमागतमारुढ-विनयमपि विनीततरमिच्छन् कर्तुं शुकनासः सविस्तरमुवाच ।
अन्वयः - समुपस्थितयौवराज्याभिषेकं च कदाचित् दर्शनार्थम् आगतम् आरूढविनयम् अपि तं विनीततरम् कर्तुम् इच्छन् शुकनासः सविस्तरम् उवाच ।
शब्दार्थः - समुपस्थितयौवराज्याभिषेकम् शीघ्र ही युवराज कर्म के
के लिये अभिषिक्त होने वाले को। च और। कदाचित् एक बार । दर्श-नार्थम् - दर्शन के लिये। आगतम् आये हुए को। आरूढविनयम् अपि -प्रस्फुटित विनय वाले को भी। तम् उसको (चन्द्रापीड को)। विनीत-तरम् कर्तुम् इच्छन् शुकनासः और अधिक विनीत बनाने के लिये इच्छा करते हुए शुकनास ने । सविस्तरम् विस्तारपूर्वक । उवाच = कहा ।
समासः - सम्यक् उपस्थितः यौवराज्याभिषेकः यस्य, तम् समुपस्थित-यौवराज्यभिषेकम् ।
सरलार्थः - एकदा दर्शनार्थम् समुपस्थितम्, यौवराज्यार्थम् सद्यःसम्भाविताः भिषेकम्, विनीतमपि चन्द्रापीडम् विनीततरम् चिकीर्षन् शुकनासः विस्तरेण वक्तुमुपचक्रमे ।
अनुबादः - एक बार दर्शन के लिए आये हुए, निकट भविष्य में यौवराज्य
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
३
के लिए अभिषिक्त होने वाले, पहले ही से विनीत चन्द्रापीड को और अधिक विनीत बनाने की इच्छा वाले प्रधानमन्त्री शुकनास ने विस्तारपूर्वक कहा-
तात' ! चन्द्रापीड ! विदितवेदितव्यस्य अधीतसर्वशास्त्रस्य ते नाल्प-मप्युपदेष्टव्यमस्ति । केवलञ्च निसर्गत एव अभानुभेद्यमरत्नालोक-च्छेद्यमप्रदीपप्रभापनेयमतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् ।
अन्वयः- तात ! चन्द्रापीड ! विदितवेदितव्यस्य अधीतसर्वशास्त्रस्य ते अल्पम् अपि उपदेष्टव्यम् न अस्ति । केवलम् च निसर्गतः एव अतिगहनम् यौवनप्रभवम् तमः अभानुभेद्यम् अरत्नालोकच्छेद्यम् अप्रदीपप्रभापनेयम् (भवति ) ।
शब्दार्थः तात ! चन्द्रापीड ! वत्स चन्द्रापीड । विदितवेदितव्यस्य अधीतसर्वशास्त्रस्य ते ज्ञातव्य विषयों को अधिगत कर चुकने वाले, सभी शास्त्रों को पढ़ चुकने वाले तुमको । अल्पम् अपि थोड़ा भी। उपदेष्टव्यम् = उपदेश देने योग्य विषय । न अस्ति (अवशिष्ट) नहीं (रह गया) है। केवलम् = सिर्फ । निसर्गतः एव = स्वभाव से ही। अतिगहनम् यौवनप्रभवम् तमः = युवावस्था से उत्पन्न अत्यन्त सघन अन्धकार। अभानुभेद्यम् = सूर्य से भी भेदन नहीं किया जा सकने वाला। अरत्नालोकच्छेद्यम् मणियों की चमक से भी नहीं मिटने वाला । अप्रदीपप्रभापनेयम् = दीप-शिखा से भी दूर नहीं होने वाला । (भवति होता है।)
समासः - विदितम् वेदितव्यम् येन स विदितवेदितव्यः, तस्य विदितवेदित-
१. 'तात' शब्द का प्रयोग पिता के अतिरिक्त पूज्यजन, पुत्रसदृश लोगों के भी होता है :-
'तातशब्दं प्रयुञ्जन्ति पूज्ये पितरि चात्मजे' (नारद वचन )
अलंकारः- यहाँ पर 'विदित' से 'अस्ति' पर्यन्त में चन्द्रापीड के दो विशेषणों का अर्थ उपदेश के अभाव में कारण है। अतः यहाँ पर पदार्थहेतुक ग काव्यलिग अलङ्कार है। 'केवलम्' से यौवनप्रभवम् तक अतिशयोक्ति, समुच्चय और पदार्थहेतुक, काव्यलिङ्ग के परस्पर एक-दूसरे के अङ्ग होने से यहाँ 'संकर' अलङ्कार है।
Y
कादम्बरी-धुकनासोपदेशः
व्यस्य। भानूगा भेद्यम इति भानुभेद्यम् न भान्भेयम् इति अभानुमेयम। श्रौषमम् प्रभवः (= उत्पत्तिस्थानं) यस्य तत् यौवनप्रभवम् ।
शरणार्थ: सर्वस्य ते किमपि वक्तव्यम् नास्ति । किन्तु प्रकृत्यैव गहनतमः यौनजन्यान्धकारः सहसरश्मेः रश्मिभिः, मणीनाम् तेजोभिः
कोपानां प्रकाशेनापि च दूरीकर्तुमशक्य एव ।
अनुवादः- वत्स चन्द्रापीड । ज्ञातव्य विषयों के ज्ञाती, सभी शास्त्रों में निष्णात तुमको कुछ भी कहना शेष नहीं है। फिर भी बात यह है कि युवा-बस्था का चनीभूत अन्धकार सहस्ररश्मि के आलोक, मणियों की कान्ति और दीपक के प्रकारापुञ्ज से भी दूर नहीं किया जा सकता है।
अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः । कष्टमनञ्जन'तिसाध्य-
१. अनेक प्रकार के नेत्ररोगों में 'तिमिररोग' को बहुत हानिकारक बताया गया है। किन्तु वह भी 'चन्द्रोदयाति' के सेवन से ठीक हो जाता है। वैद्यक में बताया गया कि :-
दशंखनाभि, बहेड़े के बीज की गिरि, हरड़ का बकला, शुद्ध मैनसिल, पिप्पली, काली मिर्च, तथा वच समभाग लेकर खरल में डाक बकरी का दूध दे-देकर घोटे। जब अत्यन्त श्लक्ष्ण होकर 'वति' बनाने योग्य हो जाय, तब जो जितनी बड़ी बत्तियाँ बनाकर छाया में सुखाकर रख ले। इस 'वति' में से मसूर जितना लेकर स्वच्छ पत्थर पर जल से घिसकर 'अंजन' करे तो तिमिर, मांसवृद्धि, कांच, पटल, अर्बुद रतौंधी तथा एक वर्ष तक का पुराना पुष्प नष्ट हो जाता है। यह 'चन्द्रोदयाति' है।
यह तीक्ष्णाङ्जन होने से रात को लगायी जाती है, रात को प्रयुक्त होने के कारण तथा तिमिर आदि दूर करने से ही इसका नाम 'चन्द्रोदयावति' पड़ा है:-
शंखनाभिर्भावभीतस्य मज्जा पथ्या मनःशिला ।
पिप्ली मरिचं कुष्ठं वचा चेति समांशकम् ।। छागीक्षीरेण संपिष्य वर्वात कृत्वा
हरेणुमात्रा संघुष्य जलैः
यवोन्मिताम् ।
कुर्यादथाञ्जनम् ।।
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
५
मपरम् ऐश्वर्यतिमिरान्धत्वम्' । अशिशिरोपचारहार्योऽतितीव्रः दर्प-दाहज्वरोष्मा ।
तिमिरं मांसवृद्धि च कार्च पटलमर्बुदम् । राज्यान्ध्यं वाषिकं पुष्पं वतिश्चन्द्रोदया जयेत् ।।
शार्ङ्गधरसंहिता, उत्तर खण्ड, अध्याय १३, श्लोक ७५, ७६, ७७ ।
१. वैद्यकशास्त्रों में नेत्ररोगों के अनेक भेद हैं, जिनमें से 'तिमिर रोग'
- लिङ्गनाश, अभिष्यन्दादि नामों से पुकारा जाता है। इसमें त्रिदोष तो कारण है ही, साथ ही मोतियाबिन्द के दोष नेत्र के चतुर्थ पटल में जब आ जाते हैं, तब तिमिररोग होता है (तिमिराख्यः स वै दोषः चतुर्थ पटलं गतः) । वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, संसर्गज, रक्तज तथा सन्निपातज नाम से
'तिमिर' के छः भेद होते हैं:-
'तिमिराणि षडेव स्युर्वातपित्तकफैस्त्रिधा । संसर्गेण च रक्तेन षष्ठं स्यात्सन्निपाततः ।।'
- शाङ्गधरसंहिता अध्या० ७, श्लोक १६७ ।
यह बहुत भयंकर नेत्ररोग है। आँखों के आगे अँधेरा छाया रहता है। यह दर्शन-शक्ति संहारक बताया गया है, किन्तु यह भी चिकित्सा से साध्य है:-
'मूलं दृष्टिविनाशस्य तिमिरं समुदाहृतम् । ऋषिभिस्त्वरितं तस्मात् तस्य कुर्याच्चिकित्सितम् ।।'
२. यदि प्रकुपित वायु और कफ त्वचा में स्थिर रहते हैं तो ज्वर के बादि में ठंड लगती है और उसका वेग शान्त होने पर अन्त में पित्त के कारण दाह का अनुभव होता है। अत्यन्त दाह के कारण ही इसे 'दाहज्वर' कहा गया है। यह संसर्गज (अर्थात् सन्निपातज) होता है। दाहज्वर रोगी को अत्यधिक कष्ट देने वाला एवं कृच्छ्रसाध्य होता है :-
'त्वक्स्यो श्लेष्मानिलौ शीतमादौ जनयतो ज्वरे । तयोः प्रशान्तयोः पित्तमन्ते दाहं करोति च ।।
करोत्यादौ तथा पित्तं त्वक्स्थं दाहमतीव च ।'
- माधवनिदान, ज्वरनिदान, श्लोक ४५, ४६ ।
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
अन्वयः लक्ष्मीमदः अपरिणामोपशमः अत एव दारुणः । ऐश्वर्य तिमिरान्धत्वम् अनञ्जनवतिसाध्यम् (अतएव इदम् ) अपरम् कष्टम् । दर्पदाह-ज्वरोष्मा अशिशिरोपचारहार्यः (अतएव) अतितीव्रः ।
शब्दार्थः लक्ष्मीमदः धन का उन्माद। अपरिणामोपशमः चूदा बस्था में भी शान्त नहीं होने वाला है। इसीलिए वह दारुणः भीषण ( होता है) । ऐश्वर्यतिमिरान्धत्वम् ऐश्वर्यरूपी 'तिमिर' (नेत्ररोग) का अन्धापन। अनञ्जनवतिसाध्यम् अञ्जन की शलाका से भी नहीं छूटने वाला (है)। (इसीलिए) अपरम् कष्टम् (यह) उससे भी बढ़कर दुःखद है। दर्पदाहज्वरोष्मा = अहङ्कार रूपी दाहज्वर की गर्मी । अशिशिरोपचारहार्यः = शीतोपचार से भी नहीं शान्त होने वाली ( है ) । (इसीलिए वह) अति. तीव्रः = बहुत तीक्ष्ण (कही जाती है)।
समासः - परिणामे उपशमः यस्य स परिणामोपशमः, नः परिणामोपशमः इति अपरिणामोपशमः । अञ्जनस्य वतिः इति अञ्जनतिः, तया साध्यम् इति अञ्जनवतिसाध्यम्, न अञ्जनवतिसाध्यम् इति अनञ्जनवतिसाध्यम् । ऐश्वर्यम् एव तिमिरं तेन अन्धत्वम् इति ऐश्वर्यतिमिरान्धत्वम् । दर्प एव दाह-ज्वरः, तस्य ऊष्मा इति दर्पदाहज्वरोष्मा ।
सरलार्थः - अन्येषां मदानां कालान्तरे स्वयमेव उपशमो भवति, धनोन्मा-दस्य तु जीवनपर्यन्तमपि नोपशमः । 'तिमिर' संज्ञकोऽपि असाध्यो नेत्र-रोगः अञ्जनादिना चिकित्स्यः, ऐश्वर्यतिमिरान्धत्वन्तु अञ्जनशलाकादिभिरपि
इस पित्त-प्रधान दाहज्वर का स्वरूप निम्नलिखित समझना चाहिए -तेज बुखार, बेचैनी, अनिद्रा, बमन, गला-ओठ-मुख-नाक आदि में जलन, अट-पट बकना, बेहोशी, प्यास, मल-मूत्र का पीला हो जाना आदि-'वेगस्तीक्ष्णोऽतिसारश्च निद्राल्पत्वं तथा वमिः ।
कण्ठौष्ठमुखनाशानां पाकः स्वेदश्व जायते ।। प्रलापो वक्त्रकटुता मूर्च्छा दाहों मदस्तृषा । पीतविण्मूत्रनेत्रत्वं पेत्ति के भ्रम एव च ॥
- माधवनिदान - ज्वरनिदान
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
७
अचिकित्स्यमेव । अन्यविधोष्मा सामान्योपचारैर्यः, वॉष्मा तु सक्चरदना-दिभिः शीतोपचारैरपि अहार्य एव ।
अनुवादः अन्यान्य मद कालक्रम से स्वयमेव शान्त हो जाते हैं; किन्तु धन का उन्माद तो मरते दम तक भी शान्त नहीं होता। 'तिमिर' नामक भयंकर नेत्ररोग भी अञ्जन आदि की चिकित्सा से दूर हो सकता है किन्तु ऐश्वर्य का अविवेक रूी गाढ़ अन्धत्व तो अञ्जनादिरूपी किसी भी उपदेशो-पचार से दूर नहीं होता। अन्य प्रकार के ज्वर का ताप तो सामान्य शीतोप-चार से भी दूर हो जाता है, किन्तु अहंकार रूपी ज्वर का ताप तो चन्दन आदि विशिष्ट शीतोपचार से भी शान्त नहीं होता है।
चूर्णक
सततममूलमन्त्रशम्यः विषमो विषयविषास्वादमोहः । नित्यम-स्नानशौचबाध्यः बलवान् रागमलावलेपः । अजस्रमुक्षपावसानप्रबोधा घोरा च राज्यसुखसन्निपातनिद्रा भवति, इत्यतः विस्तरेणाभिधीयसे ।
अन्वयः - विषयविषास्वादमोहः सततम् अमूलमन्त्रशम्यः (अत एव ) विषमः । रागमलावलेपः नित्यम् अस्नानशौचबाध्यः (अत एव) बलवान् । च राज्यसुखसन्निपातनिद्रा अजस्रम् अक्षपावसानप्रबोधा (अत एव ) घोरा । इति अतः (त्वम्) विस्तरेण अभिधीयसे (मया) ।
शब्दार्थः - विषय विषास्वादमोहः = विषयवासनारूपी विष के पान से उत्पन्न बेहोशी । सततम् = निरन्तर । अमूलमन्त्रशम्यः जड़ी-बूटी और झाड़-फूंक से भी नहीं उतरने वाला। (अथवा मूलमन्त्र परावाणी से भी दूर नहीं होने वाला) । (अतएव इसीलिए वह) विषमंः कुटिल (है)। रागमला-बलेपः = आसक्ति रूपी पंक का लेप । नित्यम् - सततम् । अस्तानशौचबाध्यः = स्नान आदि शुद्धियों से भी पवित्र नहीं होने लायक। (अतएव इसी लिये वह) बलवान् - प्रबल (है)। च और । राज्यमुखसन्निपातनिद्रा = आधिपत्यजनितमुखसमूह की निद्रा। अजस्रम् अनवरत्। अक्षनावमानप्रबोधा = रात्रि-शेष में भी नहीं टूटने वाली। (अतएव इसीलिये वह ) घोरा = गहन (है)। इति अतः इसीलिये। (त्वम् तुम) । विस्तरेण विस्तार-पूर्वक । अभिधीय से = कहे जाते हो (मया मेरे द्वारा)।
समासः - मूलं च मन्त्रं चं इति मूलमन्त्रे मूलमन्त्राभ्याम् शम्यः (अथ-
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
इति अमन्त्रम्य विषयाः एवं विषाः तेषां आस्वादः तेन यः मोहः काम परवाणी, तेन शम्यः इति मूलमन्त्रशम्यः न मूलमन्त्रयाम्यः विषयविषास्यादमोहः। राग एव मलम्, तस्य अवलेपः इति रागमलावलेपः । पायाः अवसानम् तस्मिन प्रबोधः यस्याम् साक्षपावसानप्रबोधा, इति अध्यायानप्रबोधा। राजस्य सुखानि तेषां सनिपातः स एव निद्रा इति राज्यसुणसक्रियातनिद्रा ।
सरलार्थः विषकन्या मूर्च्छा मन्त्रौषधिविशेषैः (मूलमन्त्रेण वा ) शमवि तुमसम्, किन्तु बानितादिविषयामनुरागेण जनितः मोहः पूर्वोक्तैः अन्यैरनि च साधनवियोयैः वामनपर्थ नावतरति । सामान्यपङ्कलेपनम् स्नानादिभिः प्रक्षाल नीयम् भवति, किन्तु प्रयतः अनुरागयङ्कावलेपः पानीयप्रभृतिभिरवि अप्रक्षालनीय एष। अन्दविधा निद्रा निशावसाने समापनीया भवति किन्तु साम्राज्यसुख-समूहत्याचे मैच कथमपि चैतन्योदयलाभः ।
अनुवादः- विषयरूपी विष के सेवन से उत्पन्न हुआ मोह ऐसा कठिन होता है कि यह जड़ी-बूटी और मन्त्रों से (अथवा मूलमन्त्र परावाणी से) भी नहीं उतरता है। बासनारूपी मल का अवलेप ऐसा प्रबल होता है कि यह नित्य स्नान आदि शुद्धिकायों से भी नहीं घुलता । राज्यसुखसमूहरूपी निद्रा ऐसी घोर होती है कि रात्रि के अन्त में भी उससे कभी प्रबोध नहीं होता । । इसलिए तुम्हें विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ।
गमेश्वरत्वमभिनवयौवन त्वमप्रतिम रूपत्वममानुषशक्तित्वञ्चेति' महतीय खत्वनर्थपरम्परा । सर्वाविनयानामेकैकमप्येषामायतनं किमुत समवायः ।
अन्वयः- गर्भेश्वरत्वम् अभिनवयौवनत्वम् अप्रतिमरूपत्वम् च अमानुष-
१. 'पञ्चतन्त्र' के एक नीतिश्लोक में भी ठीक इसी भाव को बताया गया है-
'यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता ।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ।।'
मित्रलाभ (पंचतंत्र )।
बलंकारः- यहाँ 'गर्भेश्वरत्वम्' से 'समवायः' तक 'हेत' अलंकार है।
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
९
दशक्तित्वम् इति इयम् खलु महती अनर्थपरम्परा । एषाम् एकैकम् अपि सर्वा-विनयानाम् आयतनम् किमुत समवायः ।
शब्दार्थः गर्भधव रत्वम् जन्मजातप्रभुता । अभिनवय। वनत्वम्- नव-यौवन । अप्रतिमरूपत्वम् अनुपम सौन्दर्य। च अमानुषशक्तित्वम् और दिव्य-शक्तिसम्पन्नता । इति ये वस्तुएँ। खलु निश्चितरूप से। महती = बहुत बड़ी। अनर्थपरम्परा = विपत्तियों की पंक्ति (है)। एषाम् इनमें से । एकैकम् अपि अलग-अलग रूप में एक-एक भी। सर्वाविनयानाम् समी प्रकार की उद्दण्डताओं का। आयतनम् = निवासस्थान है। किमुत समवायः = समष्टि रूप में इनके समूह का कहना ही क्या ?
समासः- गर्भतः एव ईश्वरः, तस्य भावः गर्भेश्वरत्वम् । अभिनवं यौवनं यस्य स अभिनवयौवनः, तस्य भावः अभिनवयौवनत्वम् । न विद्यते प्रतिमा यस्य तत् अप्रतिमम्, अप्रतिमुम् रूपम् यस्य स अप्रतिमरूपः, तस्य भावः अप्रतिमरूपत्वम् । मनुष्यस्य इयम् इति मानुषी, सा चासो शक्तिः, मानुषशक्तिः, न विद्यते मानुषशक्तिः यस्मिन् स अमानुषशक्तिः, तस्य भावः अमानुषशक्तित्वम् ।
सरलार्थः- यदा जन्मजातप्रभुत्वादिचतुष्टयेषु अनर्थमूलेषु पृथक् पृथक् रूपेण एकैकमपि सर्वविधानाम् अविनयादीनाम् निवासस्थानम्, तदा का कथा एषां समुदायस्य ?
अनुवादः 'जन्मजातप्रभुता', 'युवावस्था', 'अनुपमसौन्दर्य' और 'अलौ-
किक शक्तिसम्पन्नता'- यह अनर्थों की बहुत बड़ी शृङ्खला है। इनमें से अलग-अलग रूप में एक-एक भी, सभी प्रकार की उद्दण्डताओं की उत्पत्ति-भूमि है फिर एकत्र मिले हुए इनके समूह का कहना ही क्या ?
यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुप-याति बुद्धिः । अनुज्झितधवलतापि सरागैव भवति यूनां दृष्टिः ।
अलंकार - यहाँ 'शास्त्र जल' में 'रूपक' और 'निर्मलावि कालुष्पमुपयाति' में विरोधाभास है। इन दोनों में परस्पर अङ्गाङ्गिभाव होने से यहाँ पर 'संकर' अलंकार है। 'अनुज्झितधवलतापि सरागैव' में भी 'विरोधाभास' अलंकार है।
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
१० अन्वयः च प्रायः यौवनारम्भे शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मला अपि वृद्धि कालुष्यम् उपयाति । अनुज्झितधवलता अपि यूनां दृष्टिः सरागा एव भवति ।
= = जवानी चढ़ने पर। शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मला अपि बुद्धिः शास्त्ररूपी जल शब्दार्थः च और भी बातें हैं कि। प्रायः बहुधा । यौवनारमो से धूल जाने के कारण विमल बनी हई भी बुद्धि । कालक्ष्यम् उपयाति-मलिन हो जाती है। अनुज्झितधवलता अपि श्वेतिमा को छोडे बिना भी। यूनाम् = युवकों की दृष्टिः आँख । सरागा एव भवति अनुराग से युक्त ही रहती है।
समासः निर्गतः मलः यस्याः सा निर्मला, शास्त्रमेव जलम् तेन प्रक्षा-लनम्। तेन निर्मला इति शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मला । न उज्झिता अनुज्झिता, अनुज्झिता घवलता यया सा अनुज्झितधवलता ।
सरलार्थः - शास्त्रजलप्रक्षालनेन विगतमलापि विवेकशक्तिः तारुण्योद्गमे प्रायशः कलुषिता भवति । अपरित्यक्तधावल्यमपि तरुणानाम् दर्शनम् राग-सहितम् एव भवति ।
अनुधावः - शास्त्रों के मनन से उत्पन्न ज्ञानरूपी जल से घुल जाने के कारण युवकों की विशुद्ध बुद्धि भी जवानी चढ़ने पर बहुधा दूषित हो जाती है। सफेदी के नहीं छोड़ने पर भी युवकों की दृष्टि लालिमा से पूर्ण रहती है। अर्थात् नौजवानों की पवित्र दृष्टि भी वासना के मद से मतवाली हो जाती है।
H
अपहरति च वात्येव शुष्कपत्रं समुद्भूतरजोश्रान्तिरतिदूरम् आत्मेच्छया यौवनसमये पुरुषं प्रकृतिः ।
अन्वयः- च शुष्कपत्रम् समुद्भूतरजोभ्रान्तिः वात्या इव, (समुद्भूत रजोभ्रान्तिः) प्रकृतिः आत्मेच्छया यौवनसमये पुरुषम् अति अतिदूरम् अपह रति ।
से युक्त (पक्ष में समुत्पन्न रजोगुण के विभ्रम से युक्त) । वात्या इव बवंडर शब्दार्थःच और। समुद्भूतरजोभ्रान्तिः उठी हई धूलों के चक्कर के समान, प्रकृतिः यह चित्तवृत्ति । आत्मेच्छया स्वेच्छा से। यौवन
अलंकारः- यहाँ 'वात्येव शुष्कपत्रम्' में 'उपमा' अलंकार है।
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
११
समये युवावस्था में । पुरुषम् मनुष्य को। अतिदूरम् - बहुत दूर । अपह रति ले जाती है।
समासः- (वात्यापक्षे ) समुद्भूतानाम् रजसाम् (धूलिनाम्) भ्रान्तिः (भ्रमणम्) यस्यां (वात्यायाम्) सा समुद्भूतरजोभ्रान्तिः । (प्रकृतिपक्षे) समुद्भूतस्य रजसः (रजोगुणस्य) प्रान्तिः (विभ्रमः) यस्यां (प्रकृती) सा समुद्भूतरणोभ्रान्तिः ।
सरलार्थः - यथा भ्रमता रेणुराशिना समन्वितेन बातसमूहेन शुष्करुतूण-पुञ्जः दुस्तरं नीयते, तथैव पुरुषोऽपि युवावस्थायाम् संबंधितस्य रजोगुणस्य विभ्रमेण युक्त्या प्रकृत्या स्वेच्छया सुदूरमपनीयते ।
अनुवादः- जिस प्रकार चक्कर काटते हुए धूलिसमूह से भरा हुआ बबण्डर सूखे पत्तों को बहुत दूर उड़ा ले जाता है, उसी प्रकार रजोगुणजन्य विभ्राम को पैदा कर देने वाली प्रकृति भी युवावस्था में मनुष्य को अपने आप बहुत दूर खींच ले जाती है।
इन्द्रियहरिणहारिणी च सततमतिदुरन्तेयमुपभोगमृगतृष्णिका' नवयौवनकषायितात्मनश्च सलिलानीव तान्येव विषयस्वरूपाण्यास्वा-द्यमानानि मधुरतराण्यापतन्ति मनसः ।
अन्वयः च सततम् इन्द्रियहरिणहारिणी इयम् उपभोगमृगतृष्णिका अतिदुरन्ता (अस्ति)। च नवयौवनकशायितात्मनः (जनस्य) आस्वाद्य-मानानि सलिलानि इव, (आस्वाद्यमानानि) तानि एव विषयस्वरूपाणि मनसः मधुरतराणि आपतन्ति ।
१. रेतीले प्रदेशों में 'दुपहरिया' के धूप की चिलमिलाहट में ही प्यासे हरिण को पानी का भ्रम हो जाता है। उसे देखकर पानी के लिए वह इधर-उधर दौड़ लगाता रहता है। किन्तु उसे जल मिलता ही नहीं। इस प्रकार वह प्रान्त मृग दौड़ते-दौड़ते प्यास में ही अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है। इसी-(लिए मिव्यावस्तु की प्राप्ति के प्रयास को 'मृगतृष्णा' कैहा जाता है।
अलंकार-यहाँ 'सलिलानि इव तानि' में 'उपमा' अलंकार है। 'इन्द्रिय-हरिण' और 'उपभोगसगष्णिका' में 'परम्परित रूपक' अलंकार है।
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
१२ शब्दार्थ और। सततम् सर्वदा । इन्द्रियहरिणहारिणी इन्द्रिय रूपी हरिणों को हरने वाली। इयम्यह। उपभोगमूणतुष्णिका उपभोग को मृगतृष्णा अतिदुरन्ता अत्यन्त दुःख देने वाली (अस्ति=)। और नवयौवनकषायितात्मनः (जननस्य) अभिनव तारुण्य के कारण परिवर्तित बन्तःकरण वाले (मनुष्यों के आस्वाद्यमानानि सलिलानि इस =मस्यादित होते हुए जल के समान । (आस्वाद्यमानानि तानि एक विषयस्वरूपाणि (बास्वादित होते हुए) वे ही विषय-वासनासमूह। मनसः मन को । मधुरतराणि पहले से भी अधिक मधुर । आपतन्ति = हो जाते हैं।
समासः इन्द्रियाणि इव हरिणाः, तेषां हारिणी इति इन्द्रियहरिण हारिणी । नवं च तत् यौवनम् इति नवयौवनम्, तेन कषायितः आत्मा यात्र सः, तस्य नवयौवनकषायितात्मनः ।
सरखार्थः - निरन्तरम् चक्षुरादिकरण (इन्द्रिय) स्वरूपाणां मृगाणा हारिणी बङ्गनाद्युपभोगरूपा मृगमरीचिका परिणामेऽतिदुःखावहा। यह हरितक्यादिकवायद्रव्याणाम् उपभोगान्तरम् मधुराण्यपि जलानि मधुरतराषि प्रतीयन्ते, तथैव युवावस्थाजनितरागेण परिवर्तमानान्तःकरणस्य मानवस मानसम् । ज्ञातास्वादानि ललनादिविषयजातानि मधुरतराणि अनुभवति ।
अनुवादः - नयनादिरूप हारिणी को निरन्तर आकर्षण करने वाली अङ्ग नादि के उपभोगादिरूपी मृगतृष्णा अन्त में अत्यन्त दुःख देने वाली होती है। जिस प्रकार हरें आदि कसैले द्रव्यों के खाने के बाद जल और अधिक मीय लगने लगता है, उसी प्रकार युवावस्था के कारण ललनादि से अनुरक्त मानस् मन को विषय सुख अधिक मधुर लगने लगता है।
नाशयति च दिङ्मोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः पुरुषमत्यासङ्गो विषयेषु ।
و अन्वयः- च विषयेषु उन्मार्गप्रवर्तकः अत्यासङ्गः (अति + आसङ्गः अत्यासङ्गः) ( उन्मार्गप्रवर्तकः) दिमोहः इव पुरुषम् नाशयति ।
शब्दार्थः- च = और । विषयेषु = वासनात्मक विषयों में। उन्मार्गप्रक र्तकः = मार्गान्तर में बहका देने वाली। अत्यासङ्गः = अत्यधिक आसक्ति
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
1३
पहुंचा देने वाले) भ्रष्ट कर देती है। (उन्मार्गप्रवर्तकः) विमोहः इव (गलत रास्ते पर दिशाश्रम के समान । पुरुषम् मनुष्य को। नाशयति
समासः- उन्मार्ग प्रवर्तकः इति उन्मार्गप्रवर्तकः ।
सरलार्यः- यथा दिग्भ्रमः पथिकम् अपमार्गे प्रापयति, तथैव विरुद्धा-चरणकारयित्री वनितादिविषयासक्तिरपि पुरुषम् मर्यादितमार्गात् पातयति ।
अनुवादः- जिस प्रकार दिशाभ्रम पथिक को भटकाकर गलत रास्ते पर पहुंचा देता है, उसी प्रकार विपरीत आचरण कराने वाली वनितादि विषयों की वासना भी पुरुषों का पतन करा देती है।
भवादृशा एव भवन्ति भाजनानि उपदेशानाम् । अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव रजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखेन उपदेश-गुणाः ।
अन्वयः - भवादृशाः एव ( जनाः) उपदेशानाम् भाजनानि भवन्ति । हि (अपगतमले), स्फटिकमणौ रजनिकरगभस्तयः इव उपदेशगुणाः अपगतमले मनसि सुखेन विशन्ति ।
शब्दार्थः - भवादृशाः एव (जनाः) आप ही जैसे (लोग)। उपदेशा-नाम् = उपदेशों के । भाजनानि भवन्ति (उपयुक्त) पात्र होते हैं। हि क्योंकि । (अपगतमले) स्फटिकमणी (स्वच्छ) स्फटिकशिला में। रजनिकर-गभस्तयः इव - चन्द्रमा की किरणों के समान । उपदेशगुणाः गुणकारी उपदेश वचन । अपगतमले मनसि मलरहित मन में। सुखेन सरलता से। विशन्ति - अन्तः प्रविष्ट हो जाते हैं।
समासः - अपगतः मलः यस्मात् तत् अपगतमलम्, तस्मिन् अपगतमले । रजनीं करोति इति रजनिकरः, तस्य गभस्तयः इति रजनिकरगभस्तयः ।
सरलार्थः - भवत्सदृशाः एव (संयता) शिक्षाणाम् उपयुक्तानि पात्राणि सन्ति । यतः निर्मले स्फटिकमणौ शीतांशुरश्मयः यथा अनायासेनैव अन्तः-प्रविष्टाः भवन्ति, तथैव कलुषरहिते एव चेतसि हितावहाः उपदेशाः प्रवेष्टु-मर्हन्ति ।
अलंकारः- यहाँ 'दिङ्मोहः इव अत्यासंगः' तथा 'मनसि स्फटिकमणो इव, में 'उपमा' अलंकार है।
۱۷
कादम्बरी-धुकनासोपदेशः
जैसे संत और शीलवान् सज्जन ही उपदेशों के उप पात्र है। क्योंकि स्वास्फटिकमणि में चर-किरणों की छटा जैसे आसानी से प्रतिबिम्बित हो जाती है, वैसे ही निर्मल अन्तःकरण में ही गुरुजनों के सुसार उपदेशवचन सुखपूर्वक प्रवेश करते हैं।
भव्यस्य इतरस्य तु करिण इव शङ्खाभरणमाननशोभासमुदयमधिक. गरुवचनममलमपि सलिलमिव महदुपजनयति श्रवणस्थितं शूलम-तरमुपजनयति । हरति च सकलम् अतिमलिनमप्यन्धकारमिव दोषः जात प्रदोष समयनिशाकर इव ।
अन्वयः- (धवणस्थितं अमलम् ) सलिलम् इव, अभव्यस्य श्रवणस्थितं अमतम् अपि गुरुवचनम् महत् एलं उपजनयति । तु इतरस्य, करिणः शङ्खा-भरणम् इत्र, आननशोभासमुदयम् अधिकतरम् उपजनयति । प ( दोषजातं अन्धकारम् ) प्रदोषसमयनिशाकरः इव, अन्धकारम् इव, अतिमलिनम् अपि सकलं दोषजातं हरति ।
शब्दार्थः (श्रवणस्थितं अमलम्) सलिलम् इव (कान में गये हुए स्वच्छ) जल के समान । अभव्यस्य = अभद्र लोगों के । श्रवणस्थितम् अमलम् अपि गुरुवचनम् = कणंगोचर हुआ स्वच्छ भी गुरुजनोपदेश । महत् शूलं उप-जनयति = बहुत कष्ट, देता है। तु लेकिन। इतरस्य = इसके विपरीत (भद्र लोगों) के। करिणः हाथी के। शंखाभरणम् इव = शंखाभूषण के समान । बननशोभासमुदयम् मुखमण्डल के शोभा-सम्भार को। अधिक तरम् उपजनयति - अत्यधिक बढ़ा देता है। च और । (दोषजातम् अन्ध-कारम्) प्रदोषसमयनिशाकरः इव (रात के अंधेरे को) रजनीमुख के चन्द्रमा के समान । अन्धकारम् इव अतिमलिनम् अपि सकलं दोषजातं अन्धकार के समान अत्यन्त काली भी करतूत को। हरति दूर कर देता है। 1
१. रात्रि के प्रारम्भ को 'प्रदोष' कहते हैं। 'अमरकोष' में 'प्रदोष' को "रात्रि का मुख' कहा गया है 'प्रदोषो रजनीमुखम्' - अमरकोष ।
अलंकारः- यहाँ 'गुरुवचनम् सलिलम् इव,' 'इतरस्य करिणः इव', दोषजातम् अन्धकारम् इव,' 'गुरुवचनम् निशाकरः इव' सभी में उपमा
अलंकार है।
'उत्तमा" मालती 'व्याख्योपेतः
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समासः - शोभायाः समुदयः इति शोभासमुदयः, आननस्य शोभासमु-दयः, तम् आननशोभासमुदयम् । निशां करोति इति निशाकरः, प्रदोषश्वासौ समयः इति प्रदोषसमयः, प्रदोषसमये यः निशाकरः स प्रदोषसमयनिशाकरः ।
सरलार्थः यथा कर्णविवरस्थं स्वच्छमपि जलं जनान् दुःखीकरोति तथैव कर्णगोचरीभूतं निर्दुष्टमपि गुरुजनोपदेशवचनम् अतितरां पीडयत्यसाधून् । शंखालङ्करणं यथा हस्तिमुखशोभासमूहम् अधिकतरं वर्धयति, तथैव योग्यजनस्य हृदङ्गतं गुरूपदेशवचनं मुखमण्डलसुषमासमूहम् अत्यधिकं वर्धयति । (अर्थात् शंखाभरणेन यथा हस्तिनः मुखशोभा, तथैव रुचिपूर्वकं गुरुवचन-श्रवणेन आननमण्डले उल्लासोदयात् साधुजनस्य मुखशोभा समेधते)। यथा सायन्तनः क्षपाकरः सघनमपि रात्रिजं तिमिरम् अपाकरोति तथैव गुरूपदेशोऽपि अज्ञाना-दिसमस्तदोषाणामाकरं निराकरोति ।
अनुवादः- कान में गया हुआ साफ भी पानी जैसे लोगों को बहुत्त कष्ट पहुंचाता है, वैसे हो अयोग्य लोगों के कर्णकुहर में प्रविष्ट सर्वथा निर्दुष्ट भी गुरुङ्खचन, उन्हें बड़ी पीड़ा पहुंचाते हैं। परन्तु शंख का गहना जिस प्रकार मतंगों के मुखमण्डल की चारुता को और अधिक बढ़ा देता है, उसी प्रकार गुरु के उपदेश सत्पुरुषों के श्रवणगोचर होने पर उनकी मुखशोभा को बढ़ाते ही हैं। जिस प्रकार प्रदोषकाल का उदीयमान चन्द्रमा रजनी के समस्त घना-न्धकार को क्षीण कर देता है, उसी प्रकार गुरुजनों के शान्तिप्रद उपदेश भी अज्ञानादि समस्त दोषसमूह को दूर कर देते हैं।
गुरूपदेशः प्रशमहेतुर्वयःपरिणाम इव पलितरूपेण शिरसिजजाल-ममलीकुर्वन् गुणरूपेण तदेव परिणमयति । अयमेव चानास्वादितविषय-रसस्य ते काल उपदेशस्य । कुसुमशर-शरप्रहारजर्जरिते हि हृदये जलमिव गलत्युपदिष्टम् ।
गल जाते है
अन्वयः - प्रशमहेतुः गुरूपदेशः (प्रशमहेतुः) वयःपरिणामः इव शिरसिज-जालम् पलितरूपेण अमलीकुर्वन् तत् एव गुणरूपेण परिणमयति । च
अलंकारः - 'गुरूपदेशः बयःपरिणाम इव' और 'जलमिव उपदिष्टम्' में 'उपमा' अलंकार है।
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कादम्बरी-सुकनासोपदेशः
अमरसियरसस्य से, उपदेशस्य अयम् एव कालः । हि कुमारवर प्रहारशर्वरिते हुये उपदिष्टम् जलमित्र गलति ।
वार्थ: प्रम अन्तरन्द्रिय की शान्ति का मूलकारण। रामरको अमली सफेद करता हुआ। तत एवं उन्हीं (बालों को कोशिश कर देने वाली वृद्धावस्था के समान । शिरसिजजालम्केश अनास्थायिमस्य ते उपदेशस्य विषय-वासनारूपी रस से अनभिज गुणरुपेण गुणों के रूपों से (में)। परिणमयति बदल देता है।और। तुम्हारे (तुमको) उपदेश का (उपदेश देने का ) । अयम् एव कालः = यही समय है। हि क्योंकि। कुसुमशर-शरप्रहारजर्जरिते हृदये कामदेव के बाणों के बहार से जर्जर हृदय में। उपदिष्टम् उपदेश के रूप में कहा गया वचनसमूह। जतमिव गलति = पानी के समान वह (निकल) जाता है।
समासः शिरसि जायन्ते इति शिरसिजाः, तेषां जालम् इति शिरसिज-जालम् । विषयानां रसः इति विषयरसः, न आस्वादितः विषयरसः येन सः अनास्थादितविषयरसः, तस्य अनास्वादितविषयरसस्य । कुसुमानि एव शराः यस्य स कुसुमशरः, तस्य शराः, तेषां प्रहाराः, तैः जर्जरिते इति कुसुमशरशर प्रहारजर्वरिते ।
सरलार्थः यथा इन्द्रियाणां शैथिल्यापादकं वार्द्धक्यं कृष्ण केशसमू योतीकुर्वन् तमेव गुणरूपेण परिपाकं नयति, तथैव अन्तरिन्द्रियस्य प्रशमन कारकः सद्नुरूपदेशः निखिलमपि पुरुषस्थदोषसमूहं गुणीकरोति । अतमेव व अननुभूतविषयदासतारसस्य ते उपदेशावसरः । यतः कन्दर्पशराघातेन सहला सच्हीभूते हृदये उपदेशवचस्तथैव न तिष्ठति, यथा छिद्रमये 'चलनी' नाम्लि पदा सहिहम्।
अनुबारः- जिस प्रकार वृद्धावस्था शिर के बालों को सफेदी में रंगकर स्वच्छ बना देती है, उसी प्रकार इन्द्रियों के निग्रह में समर्थ गुरु के उपदेश भी मुख्यों में स्थित समस्त दोषों को ही गुणरूप में परिणत कर देते हैं। विषमरस के शास्वादन के अनभिज्ञ तुम्हारे लिए उपदेश का यही उचित
'उत्तमा "मालती' व्याश्योपेतः
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समय है। वयोंकि कामदेव के तीरों के प्रहार से टकड़े-टुकड़े किये हुए हृदय में गुरुजन के उपदेश वैसे ही नहीं टिकते, जैगे चलनी में पानी नहीं टिकता ।
अकारणञ्च भवति दुष्प्रकृतेरन्वयः श्रुतं वा विनयस्य ।
चन्दनप्रभवो न दहति किमनलः ? कि वा प्रामहेतुनापि न प्रचण्ड-तरीभवति वडवानलो वारिणा ?
अन्वयः इष्प्रकृतेः (जनस्य) अन्वयः वा श्रतं विनयस्य कारणं भवति । चन्दनप्रभवः अनलः न दहति किम् ? वा प्राणमहेतुना अपि वारिणा वडवानलः न प्रचण्डतरीभवति किम् ?
शब्दार्थः - दुष्प्रकृतेः (जनस्य) - दुष्ट स्वभाववाले (मनुष्य का)। अन्वयः वंश । वा अथवा श्रुतं शास्त्र (शिक्षा)। विनयस्य नम्रता का। अकारणं भवति = कारण नहीं होता है। चन्दनप्रभवः अनलः चन्दन से उत्पन्न अग्नि । न दहति किम् = क्या नहीं जलाता ? वा = अथवा । प्रशम-हेतुना अपि वारिणा = आग बुझाने के साधन भी जल से । वडवानलः = बडवाग्नि । न प्रचण्डतरीभवति किम् = क्या और अधिक प्रदीप्त नहीं होती है ?
समासः - न कारणम् इति अकारणम् । चन्दनात् प्रभवः (जन्म) यस्य स चन्दनप्रभवः । प्रशमस्य हेतुः इति प्रशमहेतुः, तेन प्रशमहेतुना ।
सरलार्थः - विशुद्धवंशसमुद्भूतानामपि दुर्जनानां दुविनीतत्वं शान्ति-प्रदेनापि उपदेशेन वर्धते एव । यतः शीतस्वभावादपि चन्दनात् समुत्पन्नः अनलः दहत्येव । अथ च अनलोमशमकारकादपि जलात् वडवानलः वर्द्धते एव ।
अनुवादः- उच्च वंश में पैदा होने पर भी, अच्छी शिक्षा प्राप्त करने पर भी दृष्ट लोगों की दुविनीतता घटने के बजाय बढ़ती ही रहती है। क्योंकि ठंडे लगने वाले चन्दन-काष्ठ से उठी हुई आग भी जलाती ही है और
१. तात्पर्य यह है कि मनुष्य के दुष्टस्वभाव में उसके सद्वंश और शास्त्र-ज्ञान का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, क्योकि 'स्वभावो हि दुरतिक्रमः' । 'अतीत्य हि गुणान् सर्वान् स्वभावो मूध्नि वर्तते' । रही शास्त्रज्ञान की बात, सो तो-'न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणम्, न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनाम् ।'
अलंकारः - 'अकारण' से 'वारिणा' तक अर्थान्तरन्यास अलंकार है ।
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कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
शीतल जल के अन्दर रहने वाली बड़वाग्नि भी बुझने के बजाय उत्तेजित हो होती रहती है।
गुरूपदेशश्च नाम पुरुषाणामखिलमलप्रक्षालनक्षममजलं स्नानम्, 'अनुपजातलिता दिवं रूप्यमजरं वृद्धत्वम, अनारोपितमेदोदोष गरु करणम, असुवर्णविरचनमग्राम्यं कर्णाभरणम्, अतीतज्योतिरालोकः *नोद्वेगकरः प्रजागरः ।
अन्वयः च गुरूपदेशः नाम पुरुषाणाम् अखिलमलप्रक्षालनक्षमम् अजल-स्नानम् (अस्ति । अनुपजातपलितादिवरूप्यम् अजरम् वृद्धत्वम् । अना-रोपितमेदोदोषः गुरूकरणम् । असुवर्णविरचनम् अग्राम्यं कर्णाभरणम् । अतीत-ज्योतिः आलोकः । न उद्वेगकरः प्रजागरः (वर्तते ) ।
१. मानवशास्त्र (मनुस्मृति) में भी बताया गया है कि कोई आदमी बाल पकने से ही बुड्ढा (पूज्य) नहीं हो सकता। ऋषिगण और देवताओं ने गुरूपदेश प्राप्त करने वाले अध्ययनाध्यापन करने वाले को ही वृद्ध (पूज्य) बतलाया है, भले ही वे अल्पवयस्क ही क्यों न हों। देखिये :-
'न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ।।'
मनु० अध्या० २, श्लोक १५६
'न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।
ऋषश्वक्रिरे धर्म योऽनूचानः स नो महान् ।।'
मनु० अध्या० २, श्लोक १५४
'विप्राणां ज्ञानतो ज्येष्ठघं ।' मनु० अध्या २, १५५
भोजन करते हैं एवं व्यायाम यह रोग होता है। इस रोग मोह, नींद, क्वथन, तथा शरीर से दुर्गन्ध परिश्रम और सुरति २. जो कफकारक, मधुरप्राय और स्निग्ध नहीं करते, उन्हीं की चर्बी अधिक बढ़ जाने से में तोंद निकल आता है। इसमें क्षुद्रश्वास, प्यास, अवसाद, भूख अधिक लगना, पसीना ज्यादा निकलना, आना आदि उपद्रव अधिक होते हैं। मेदस्वी अधिक नहीं कर
सकता। यह मेदोरोग एक ही प्रकार का होता है :-
'मेदोदोषस्तथा चैकः' । शाङ्गधरसंहिता, श्लोक ६५.
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्यतः
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पुरुषा शब्दार्थः और। गुरुपदेशनाम गुरु का उपदेश तो। नाम् - मनुष्यों के। अप्रिक्षालनक्षम् समस्त विकारों को धो देने में समर्थ (है)। (इसीलिये उसे अजलं स्नानम् बिना जल का ही स्नान ( कहा गया है)। अनुरजातपलितादिर्वकाम् वालों की सफेदी आदि परि-बर्तन से रहित (है)। (अतएव अजरं वृद्धलम् (इसीलिए उसे) बिना बुढ़ापे को बुजुर्गी (कहा गया है)। अनारोपितमेदोदोर्ष वीं में (वृद्धि आदि) दोषों के आरोपण से मुक्त (है)। (फिर भी उसे गुस्करणम् = (गुरुता) (भारीपन या महत्ता) प्रदान करते वाला (बताया गया है)। असुर्णविरचनं सोने आदि (द्रव्य) से बनाया गया हो, ऐसी बात नहीं है। (इसीलिये उसे) अग्राम्यं कर्णाभरणम् उत्कृष्ट ( अलौकिक) कर्णभूषण ( कहा गया है)। अतीतज्योतिः (सामान्य) चमक-दमक से शून्य (है)। (इसीलिये उमे) आलोकः सम्यक् रूप से (सभी पदार्थों को दिखला देते बाला. (विशाल) प्रकाश (कहा गया है)। न उद्वेगकरः उद्विग्नता (अशान्ति) को नहीं पैदा करता है। (इसीलिए उसे) प्रजानरः जागृत कर देने वाला प्रकृष्ट (पदार्थ) कहा गया (है)।
समासः- अखिलाच ते मलाः इति अखिलमलाः, तेषां प्रक्षालनम् इति अखिलमलप्रक्षालनं तस्मिन् क्षमम् इति अखिलमलप्रक्षालनक्षमम् । विगतं रूपं यस्मात् इति विरूपम्, तस्य भावः वैरूप्यम्। न उपजातम् अनुपजातम् अनुप-जातं पलितादिवैरूप्यं यस्मिन् तत् अनुपजातपलितादिवैरूप्यम् । मेदमो दोषः इति मेदोदोषः, न आरोपितः मेदोदोषः येन तत् आनारोपितमेदोदोषम् । सुवर्णन विरचनम् इति सुवर्णविरचनं, न सुवर्णविरचनं, यस्मिन् तत् असुवर्णविस्वनम् । अतीतं ज्योतिः यस्मात् असौ अतीतज्योतिः । आ समन्ताद्भावेन लोकयति पदार्थान् इति आलोकः। प्रकृष्टः जागरः इति प्रजागरः ।
सरलार्थः यथा जलेन स्नाने कृते सति शरीरलग्नाः सर्वे मलाः प्रक्षालिताः भवन्ति तथैव गुरूपदेशेन देहिनां दोषजातानि दूरीभवन्ति । अतएव गुरूपदेशः पुरुषाणां जलव्यतिरेकेणापि स्नानम् ।
केशादीनाम् पलितत्वादिना जरया वार्धक्यम् आयाति किन्तु गुरूपदेशेन
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कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
कचादेः पाण्डुरत्वमन्तरेणैव वृद्धत्वम् (पूज्यत्वम्) आयाति । अतएव गुरुपदेशः पुरुषाणां जराव्यतिरेकेणैव वृद्धत्वम् ।
स्थूलत्वेऽवयं मेदोदोषाः हेतवो भवन्ति किन्तु गुरूपदेशेन मेदोदोषं (स्थूल-त्वम् विमेव गुरुत्वम् (महत्त्वम्) आयाति । अत एव गुरूपदेशः पुरुषार्णा मेदोदोषव्यतिरेकेणैव गुरुत्वमिति ।
कर्णभूषणं प्रायेण कनकनिमितं भवति, गुरूपदेशस्तु अहेममेव प्रशस्तं (बन्नुत्तमम् ) कर्णभूषणम् ।
आलोकः ज्योतिर्मयो भवति, गुरूपदेशस्तु ऋते चाकचिक्यादेव प्रकाश-पुञ्जः ।
जागरणं सन्तापजनकं भवतिः गुरूपदेशस्तु खेदरहितः प्रबोधः ।
अनुबादः - जिस प्रकार जल से स्नान करने पर शरीर के समस्त विकार घुल जाते हैं, उसी प्रकार गुरु के उपदेश से मनुष्य के बाह्याभ्यन्तर समस्त दोष दूर हो जाते हैं। इसीलिये गुरूपदेश को बिना जल का स्नान कहा गया है।
साधारणतया बाल सफेद होने पर लोग बुड्ढे समझे जाते हैं किन्तु गुरू-पदेश से तो बालों की सफेदी के बिना ही लोग वृद्ध (बुजुर्ग, पूज्य) माने जाते हैं। इसीलिये गुरूपदेश को बुढ़ौती के बिना ही वृद्धत्व कहा जाता है।
मेदा (चर्बी) में विकार होने से मनुष्य स्थूल हो जाता ( उसकी तोंद निकल आती) है किन्तु गुरूपदेश से मेदोदोष के बिना ही लोग गौरवान्वित (बजनदार) हो जाते है। (अतएव गुरूपदेश को बिना मोटेपन के ही गुरुत्व कहा गया है)।
यों तो स्वर्ण-रचित अलंकार ही कानों को अलंकृत करते हैं किन्तु गुरू-पदेश तो स्वर्ण निर्मित नहीं होते हुए भी श्रवण विभूषण है।
प्रकाश में जगमगाहट होती है, किन्तु गुरूपदेश तो जगमगाहट के बिना ही प्रकाशस्वरूप है।
शयन के मध्य में जंगा देने से उसे बेचैनी हो जाती है किन्तु गुरूपदेश तो बिना तकलीफ दिये ही जगाने वाला उत्तम साधन है।
विशेषेण राज्ञाम् । विरला हि तेषामुपदेष्टारः । प्रतिशब्दक इव
अलंकारः- 'प्रतिशब्दकः इव जनः' में 'उपमा' अलंकार है। 'दर्पश्व-
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
वयथु
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राजवचन्मनुगच्छति जनो भयात् । उद्दाम 'दर्पश्वयथुस्थगितश्रवण-विवराश्चोपदिश्यमानमपि ते न श्रृण्वन्ति, शृण्वन्तोऽपि च गजनिमी-लितेनावधीरयन्तः खेदयन्ति हितोपदेशदायिनो गुरून् ।
अन्वयः - राज्ञाम् विदशेषेण (गुरूपदेशः उपादेयः) । हि तेषाम् उपदेष्टारः बिरलाः (भवन्ति)। ( यतः) जनः प्रतिशब्दकः इव राजचनम् भयात् अनुच्छति । (अथ) च ते ( राजानः) उद्दामदर्पश्वयथुस्थगितश्रवणविवराः (सन्तः) उपदिश्यमानम् अपि न शृण्वन्ति । अपि च शृण्वन्तः ते, हितोपदेश-दायितः । गुरून् गजनिमीलितेन अवधीरयन्तः खेदयन्ति ।
शब्दार्थः - राज्ञाम् विशेषेण (गुरूपदेशः उपादेयः) राजाओं का (के लिये) विशेषरूप से (गुरूपदेश उपयोगी है)। हि क्योंकि । तेषाम्
ययु' में 'निरङ्गरूपक' अलंकार है। 'गज-निमीलितेन इव' में 'उपमेयलुप्ता उपमा' अलंकार है।
१. सन्निपाव ज्वर के अन्त में कर्णमूल में एक भयंकर शोथ हो जाता है, इससे शायद ही कोई रोगी बचता है :-
सन्निपात-ज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारणः । शोथः सञ्जायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते ।।'
माधवनिदान-ज्वरनिदान, श्लोक २५.
यह शोथ 'कर्णमूलिक' नामक रोगियों में यह शोथ हो जाता है। लालग्रन्थि में होता है। अधिक क्षीण कभी-कभी पक भी जाता है। 'वाग्भट, उत्तर स्थान के १७वें अध्याय के छठे श्लोक' में इसका निम्नलिखित स्वरूप बताया गया है-
'कण्डः श्वयथुरुष्णेच्छा पाकात् श्वेतघना स्रुतिः । करोति श्रवणे शूलमभिघातादिदूषितम् ।।'
यह शोथ कर्णमूलिक ज्वर में होने वाले कर्णमूल शोथ से भिन्न है। कर्णमूलिक ज्वर का शोथ साध्य होता है, जब कि यह असाध्य होता है :-
ज्वरादितो वा ज्वरमध्यतो वा ज्वरान्ततो वा स्रुतिमूलशोथः । क्रमेण साध्यन्त्वथ कृच्छ्रसांध्यस्तथाप्यसाध्यः कथितो मुनीन्द्रः ।।
- तन्त्रान्तर
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कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
उपदेष्टारः उनके (को) उपदेश देने वाले विरलाः (भवन्ति) कम (लोग) होते हैं। (यतः क्योंकि जनः लोग। प्रतिशब्दकः इव प्रतिध्वनि के समान राजवचनम् राजा की बातों को। भयात् डर से । अनुगच्छति अनुगमन करता है। अथ च और दूसरी बात यह भी है कि) । ते (राजानः) वे (राजे-महाराजे)। उद्दामदर्पश्वयथुस्थगितश्रवणविवराः जाने से) । उपदिश्यमानम अपि उपदेश दी जाती हई बातों को भी । न ( सन्तः) उत्कट बहङ्कार रूप सूजन से अवरुद्ध कर्णविवरवाले हो शृष्यन्ति = नहीं सुनते हैं। अपि च, शृण्वन्तः ते और (यदि) वे सुनते हुए भी ( हैं तो)। हितोपदेशदायिनः गुरून् - कल्याणकारी उपदेश प्रदान करने बाले गुरुओं को। गजनिमीलितेन अवधीरयन्तः खेदयन्ति - हाथी के (मतबाली) निगाहों से तिरस्कार करते हुए (वे उन्हें) खिन्न कर देते हैं।
समासः- उहामश्चासौ दर्पः, स एव श्वयथुः, तेन स्थगिते श्रवणविवरे येषां ते उद्दामदपेश्वयथुस्थगितश्रवणविवराः । गजस्य यत् निमीलितम्, तद्वत् यत् निमीलितम्, तेन गजनिमीलितेन ।
सरलार्थः- एषः उपदेशः प्राधान्येन महीपतीनाम् कृते उपादेयः । यतो हि राज्ञां उपदेशदातारः अल्पसंख्यकाः एव सन्ति । यतः, प्रतिध्वनिः यथा ध्वनिमनुसरति तथैव भयवशात् लोकः नृपवचनानुगो भवति (प्रत्युत्तरमपि दातुं नोत्सहते)। अपरं च अहंकारेण अवरुद्धकर्णाः बधिरप्रायाः राजानः गुरुजनानाम् हितोपदेशमपि नाकर्णयन्ति । कथमपि आकर्णयन्ति चेत्र्ताह -उन्मत्तमतङ्गवत् नेत्रनिमीलनेन गुरुपदेशम् उपेक्षमाणाः राजानः तिरस्कुर्वन्ति हितभाषिणो गुरुजनान् ।
अधिक आवश्यक है। इसका कारण वैसे ही सभी होते हैं। करती है, अनुवादः- राजाओं के लिये तो गुरूपदेश और बयोंकि उनको उपदेश देने वाले (लोग) बहुत कम यह है कि जैसे प्रतिध्वनि मूलध्वनि का अनुगमन लोग डर से राजा की बातों का अनुसरण करने लगते हैं। जिस प्रकार कान में सूजन हो जाने से उसके छेद बन्द हो जाते हैं उसी प्रकार उत्कट अहंकार से राजाओं के कान बन्द हो जाते हैं। (फलस्वरूप उसके कानों में उपदेश-वचन प्रविष्ट ही नहीं हो पाते हैं।) और यदि किसी तरह गुरु
'नत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
२३
की बात उनके कानों में चली ही गई तो, मतवाले हाथी के समान मस्तानी नजरों से अनसुनी करते हुए हितैषी गुरुजनों को कष्ट ही पहुंचाते हैं।
अहंकार' दाहज्वरमूर्च्छान्धकारिता विह्वला हि राजप्रकृतिः । अलीकाभिमानोन्मादकारीणि धनानि, राज्य विपविकारतन्द्राप्रदा राजलक्ष्मीः ।
अन्वयः- हि राजप्रकृतिः अहंकारदाहज्वरमूर्च्छान्धकारिता (अतएव ) बिह्वला (भवति)। धनानि अलीकाभिमानोन्मादकारीणि (भवन्ति ) । राजलक्ष्मीः राज्यविषविकारतन्द्राप्रदा (भवति ) ।
शब्दार्थः हि क्योंकि। राजप्रकृतिः राजाओं की चित्तवृत्ति । अहंकारदाहज्वरमूर्च्छान्धकारिता अभिमानरूपी तीव्रताप के कारण उत्पन्न मोह से अन्धीभूत । (अतएव विह्वला (इसलिये) व्याकुल (होती है) । धनानि = सम्पत्तिसमूह । अलीकाभिमानोन्मादकारीणि मिथ्याहंकार और उन्मत्तता को उत्पन्न करने वाले (भवन्ति होते हैं)। राजलक्ष्मीः = राज्यश्री । राज्यविषविकारतन्द्राप्रदा = राज्यरूपी गरल के विकार से उत्पन्न आलस्य को देनेवाली (भवति होती है)।
समासः- अन्धकार इव आचरिता इति अन्धकारिता, अहंकार एव दाह-ज्वरः, तेन या मूर्च्छा, तया अन्धकारिता इति अहंकारदाहज्वरमूर्च्छान्धकारिता । अभिमानश्च उन्मादश्व इति अभिमानोन्मादौ, अलीको अभिमानोन्मादो कर्तु शीलं येषां तानि अलीकाभिमानोन्मादकारीणि । राज्यमेव विषम् इति राज्य-विषम्, तस्मात् यः विकारः, तेन या तन्द्रा सा, ताम् प्रददाति इति राज्यविष-विकारतन्द्राप्रदा ।
सरलार्थः- यथा तीव्रतापजनितया मूच्र्छया मनुष्याः अचेतनाः भवन्ति तथैव अहंकारेण भूपतीनां चित्तवृत्तयः विभ्रान्ताः भवन्ति । सम्पन्द्भिः मिथ्या-भूतौ एव मदाहंकारी जायेते । यथा विषविकारेण शैथिल्योत्पत्तिः तथैव राज्यलक्ष्मीः राज्यमदेन प्रमादोत्पादिका ।
अनुवादः- जिस प्रकार दाहज्वर की मूर्च्छा से मनुष्य संज्ञाहीन हो जाते हैं, उसी प्रकार अहंकार से राजाओं की प्रकृति में भ्रान्ति उत्पन्न हो
१. अलंकारः- यहाँ 'अहंकार-दाहज्वर' में 'निरंगरूपक' अलंकार है।
२४
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
आती है। धन तो झुठे अभिमान और मत केही होते हैं। जित प्रकार वध का नशा मनुष्यों में रारती पैदा कर देता है उसी प्रकार राज्य लक्ष्य भी राज्य के मद से राजाओ में प्रभाव उत्व करा देती है।
आलोकयत् तावत् कल्याणाभिनिवेशी लक्ष्मीमेव प्रथमम् । इयं हि सुभटखड्गमण्डलोत्पलवनविभ्रमभ्रमरी लक्ष्मीः क्षीरसागरात्-पारिजातपल्लवेभ्यो रागर, इन्द्रकलादेकान्तवक्रतार, उच्चैःश्रवस अन्चलता कालकटान् मोहशक्ति, मदिराया मदं, कौस्तुभमणे-रतिष्ठ्यंग इत्येतानि सहवासपरिचयवशाद्विरहविनोदचिह्नानि गृही-त्वेबोदगतो ।
अन्वयः- कल्याणाभिनिवेशी (भवान् ) तावत् प्रथमम्, लक्ष्मीम् एव आलोक्यतु । सुभटखड्गमण्डलोत्पलवनविभ्रमभ्रमरी, इयम्, लक्ष्मीः, हि सह-यासपरिचयवशात्, पारिजातपल्लवेभ्यः रागम्, इन्दुशकलात् एकान्तवक्र-ताम्, उच्चैःधवसः चञ्चलताम्, कालकूटात् मोहशक्तिम्, मदिरायाः मदम्, कौस्तुभमणेः अतिनैष्ठुर्यम्, इत्येतानि विरविनोदचिह्नानि, गृहीत्वा, क्षीर-सागरात् उद्गता इव ।
शब्दार्यः - कल्याणाभिनिवेशी (भवान्) मंगल के पक्षपाती (आप)। ताबद्= तब तक । प्रथमम् = पहले। लक्ष्मीम् एव लक्ष्मी को ही। आलोक-यतु = देखें । सुभटखड्गमण्डलोत्पलवन विभ्रम भ्रमरी = बहादुर सैनिकों के कृपाणकलाप रूपी कमलवन में भ्रमण करने वाली भ्रमरी (भौरी)। इयं लक्ष्मीः = यह लक्ष्मी। हि निश्चितरूप से। सहवासपरिचयवशात् = साथ रहने के कारण से। पारिजातपल्लवेभ्यः रागम् - मन्दार के किसलयों से अनुराग को। इन्दुशकलात् एकान्तवक्रत। म् चन्द्रमा की कला से अत्यन्त कुटिलता को। उच्चैःश्रवसः चञ्चलताम् (इन्द्र के घोड़े) उच्चैःश्रवा से चंचलता को। फालकूटात् = विप से। मोहशक्तिम् मोहित करने की शक्ति को। मदिरायाः मदम् = मद्य से उन्मादकता को। कौस्तुभमणेः = कौस्तुभमणि से। अतिनैष्ठ्यंम् = एकान्त निर्दयता को। इति एतानि विरहविनोद-
अलकारः- यहाँ 'सुभटखड्ग' से 'गृहीत्वेवोद्गता' तक रूपक, अति-शयोक्ति और क्रियोत्प्रेक्षा के परस्पर 'अङ्गाङ्गिभाव से 'संकर' अलङ्कार है।
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
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चिह्नाति वियोग के समय मन बहलाने के इन उपर्युक्त प्रतीकों को। गृही-वाग्रहण करके (ही)। क्षीरसागरा श्रीर समुद्र से उदगता इव-मानो निकली हुई हो ।
समासः कल्याण अभिनिवेष्टुं शीलं यस्य स कल्याणाभिनिवेशी । सङ्गानां मण्डलम् इति वङ्गमण्डलं शोभना ते भटाः इति सुमटाः, तेषां सङ्गमण्डलम् इति सुभटखङ्गमण्डलम् उत्पलानां वनम् इति उत्पल-वनं, सुभटलङ्गमण्डलम् एव उत्पलवनम् इति गुमटखङ्गमण्डलोत्पलवन, तत्र विभ्रमः (भ्रमणम्) यस्याः सा चासो भ्रमरी इति सुनटखङ्गमण्डलो-वलवनविभ्रमभ्रमरी ।
सरलार्थः - कल्याणकामो भवान् लक्ष्मीमेव तावद् विभावयतु । यथा मधुकरी कमलवनेऽनवरतं विहरति तथैवेयं लक्ष्मीः सुभटानां खड्गमण्डलेषु विलसति । इयं हि लक्ष्मीः सहवासजनितसम्बन्धवशात् वियोगकाले मनो विनोदनार्थम् मन्दारद्रुमार्णा किसलयेभ्यः अनुरार्ग, चन्द्रकलायाः कौटिल्यम्, उच्चैःश्रवसः चाञ्चल्यम् हलाहलेभ्यः मौग्ध्यम् मदिरायाः उन्मादम्, कौस्तु-भमणेः काठिन्यम् (= निष्करुणत्वं) च आदाय एव दुग्धाम्बुधः प्रादुर्भूता इव ।
अनुवादः- मंगल के अभिलाषी आप लक्ष्मी को ही पहले देखें। जिस
प्रकार भ्रमरी (भौरी) कमलवन में अनवरत भ्रमण करती रहती है, उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी वीरों की असिधारा में विलास करती रहती है। यह लक्ष्मी एक साथ रहने से परिचय बढ़ जाने के कारण वियोग के समय में मनोविनोद के चिह्न के रूप में पारिजात के पल्लवों से अनुराग, चन्द्रमा की कला से कुटिलता और उच्चैःश्रवा से अस्थिरता, हलाहल से सम्मोहनशक्ति, मदिरा से मादकता, और कौस्तुभमणि से कर्कशता आदि को लेकर ही क्षीर-
सागर से सानो बाहर निकली है। *न ह्य वंविधमपरमपरिचितमिह जगति किञ्चिदस्ति, यथेयमनार्या लब्धापि खलु दुःखेन परिपाल्यते । दृढगुणपाशसन्दान निष्पन्दीकृतापि
अलंकारः- यहाँ 'लब्धापि' से 'नक्ष्यति' तक्र विभावना' और 'विशे-पोक्ति' के सन्देह से 'सन्देह संकर' अलंकार हुआ। और उसका निरङ्ग रूपक के साथ संकर होने से 'संकर' अलङ्कार है 'उद्दाम' से 'प्रपलायते' तक
3 का० श०
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
२६ मति । मदजल दुदिनान्धकारगजघटितघनघटापरिपालितापि प्रपला नश्यति । उहामदर्पभटसहस्रोल्लासिता सिलतापञ्जरविधताप्यपका यते ।
हरित यथा इयम् अनार्या। यतः इयम् लब्धा अपि खल दुःखेन परि यह जगति न हि एवंविधम् अपरं किन्वित अपरिचितम पात्यते। गुणपाशसन्दान निष्पत्यीकृता अपि नश्यति । उद्दामपंटसहस्रो स्वासितासितारविधुता अपि अपक्रामति । मदजलदुदितान्धकार टिटापरिपालिता अपि प्रपलायते। FR
शब्दार्थः इह जगति इस संसार में। नहि एवंविधम् अपरम अपरिचितम् किति अस्ति उस तरह परिचय को भी नहीं रखने वाला दूसरा कोई नहीं है। यथा इयम् अनार्या जिस तरह (कि) यह दुःशीला (सहमी है)। (यतः इयम् = क्योंकि यह लक्ष्मी तो) लब्धा अपि खलु = निश्चित रूपसे प्राप्त हो जाने पर भी। दुःखेन मुश्किल से । परिपाल्यते ठहराई जाती है। दृढगुणपाशसन्दाननिष्पन्दीकृता अपि राज़ोजित गुणगण के दृढ बन्धन से निश्चल की जाने पर भी। नश्यति नष्ट हो जाती है। रहमदपंघटसहस्रोल्लासितासिलतापञ्जरविधूता अपि - उत्कट अहंकार बाले हजारों योद्धाओं में चमकाये जाने वाले खड्गमण्डल के पिंजरे में पकड़ रखी जाने पर भी। अपक्रामति = निकल भागती है। मदजलदुदिनान्धकार-गजघटितषनघटापरिपालितापि दान-वारि (की अजस्र वर्षा) से अन्ध-
'विभावना' बौर 'विशेषोक्ति' से 'सन्देह संकर' और 'परम्परित रूपक' बलकार के परस्पर अङ्गाङ्गिभाव के कारण 'संकर अलङ्कार' है गील
राजधर्म प्रसंग में मनु ने सन्धि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और वैधीभाव इन छः गुणों का उल्लेख किया है:-
'सन्धि च विग्रहं चैव यानमासेनमेव च।। वैधीभावं संश्रयं च बहुगुणाश्चिन्तये सदा
'मनुस्मृति, अध्या० ७, श्लो० १६०
१. पटानों से घिरे हुए दिन को 'दुदिन' कहते हैं'की
मिषच्छन्नेऽह्नि इदिनम् - अमरकोष में क
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
२७
कार कर देने वाले गजराजाओं के द्वारा निष्पादित सपनसमूह से सुरक्षित रखी जाने पर भी । प्रपलायते भाग खड़ी होती है।
* समासः- गुणाः एव पाशाः इति गुणपाशाः, तल्लक्षणं यत् सन्दानम् ( बन्धनम् ) तत् गुणपाशसन्दानम् वृद्धं यद् गुणपाशसन्दानम् तत्, तेन निष्पन्दीकृता इति दृढगुणपाशसन्दाननिष्पन्दीकृता। उद्दामः दर्पः येषों ते, ते एव भटाः, तेषाँ सहस्रम्, तेन उल्लासिता असिलता एव पिञ्जरम्, तत्र बिधुता इति उद्दामदर्पभटसहस्रोल्लासितासिलतापिञ्जरविघृता । मदजलेन दुदिनम्, तस्य अन्धकाराः, ते एव गजाः, तैः घटिताः या घनानां (मेघानां ) घटाः, ताभिः परिपालिता इति मदजलदुदिनान्धकारगजघटितघनघटापरि-
सरलार्थः - संसारेऽस्मिन् एतादृशं दाक्षिण्यरहितं किञ्चिदप्यपरम् नास्ति यथा इयं दुःशीला लक्ष्मीः वर्तते । महता प्रयासेन प्राप्ताऽपि इयं कष्टेन खलु सुचिरं रक्ष्यते । गुणगणानाम् दृढबन्धनेन निगडिताऽपि पलायते । उत्कटाभि-मानिनाम् योधानाम् सहस्रेण ऊर्ध्वाकृते खड्गमण्डलरूपे पिञ्जरे स्थापितापि लक्ष्मीः अपसरति । दानवारिणाम् अजस्रधाराभिः दुदिनविधायकैः गजानां घनसमूहैः रक्षितापि सा पलायनं करोति
अनुबादः- समस्त संसार में इस अनार्या के समान दूसरा कोई भी ऐसा नहीं है जो अपने परिचय की कुछ भी चिन्ता न करे। अत्यधिक परिश्रम के अनन्तर प्राप्त होने पर भी यह ठहर नहीं पाती गुणरूपी फन्दे में मजबूती से बाँधकर निश्चल की जाने पर भी यह निकल भागती है। उद्दाम अहङ्कार वाले सहस्रसंख्यक वीरों से संचालित खड्गलताओं के पिंजरे में सावधानी से रखी जाने पर भी यह गायब हो जाती है। मदजल की अवि-रल धारा से मेघाच्छन्न करनेवाले हाथियों की घनश्शृङ्खला से निगड़ित रखो जाने पर भी यह निकल भागती है ।
न परिचयं रक्षति । नाभिजनमीक्षते । न रूपमालोकयते । न कुलक्रममनुवर्तते । न 'शीलं पश्यति । न वैदग्ध्यं गणयति । नः श्रुतमा-कर्णयति । न धर्म मनुरुध्यते । न त्यागमाद्रियते । न विशेषज्ञतां
१. अमरकोष में शील शब्द का अर्थ स्वभाव और सदाचार है:-
१८
कादम्बरी-शुकनासोपवेशः
णीकरोति । गन्धर्वनगरलेखेव पश्यत एव नश्यति । विचारयति । नाचारं पालयति । न सत्यमवबुध्यते । न लक्षणं प्रमा
अन्ययः अनार्या इयं लक्ष्मीः परिचयं न रक्षति, अभिजनं न ईक्षते, रूपं न आलोकयते, कुलक्रमं न अनुवर्तते; शीलं न पश्यति वैदर न विचारयति, आचारं न पालयति, सत्यं न अवबुध्यते, लक्षणं न प्रमाणीकरोति न गणयति श्रुतं न आकर्णयति धर्म न अनुध्यते, त्यागं न आद्रियते, विशेषज्ञतां गन्धर्वनगरलेखा इव पश्यतः (जनस्य अग्रतः) एव नश्यति ।
शब्दार्थः यह नीच लक्ष्मी) परिचयं न रक्षति परिचय को नहीं रखती है। अभिजनं न ईक्षते अच्छे कुल को भी नहीं देखती है। रूपं न बालोकयते = सौन्दर्य को नहीं आलोकन करती है। कुलक्रमं न अनुवर्तते = वंश परम्परा का भी नहीं अनुसरण करती है। शीलं न पश्यति = शील को
'शील स्वभावे सदृत्ते' - अमरकोष ।
'शीलनिरूपणाध्याय' में शील का लक्षण है:- सभी प्राणियों के प्रति मनसा, वाचा, कर्मणा द्रोह नहीं करना, दया और दान करना । مر
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते ।।'
१. सामुद्रिक शास्त्र में छत्र, चामर, शंख, चक्र, कमल आदि के शरीर
पर बने हुए चिह्नविशेष को सुखी-सम्पन्न होने का लक्षण कहा गया है। ये लक्षण राजाओं और विशेषकर चक्रवर्ती राजाओं में पाये जाते हैं।
२. आकाश मण्डल में कभी-कभी दृष्टिभ्रम से नगर के रूप में दीख पड़ने वाली रेखापंक्ति को 'गन्धर्व-नगर' कहते हैं। इसे अमंगल और विप्लव का सूचक माना गया है :-
गन्धर्वनगरमुत्थितमापाण्डुरमशनिपातवातकरम् । दीप्ते नरेन्द्र मृत्युमेिऽरिभयं जयः संख्ये ।।
- बृहत्संहिता
यही रेखा-पंक्ति देखते-देखते गायब हो जाती है जिस प्रकार यह रेखा-पंक्ति बिनाशसूचिका और तुरन्त गायब हो जाने वाली होती है, उसी प्रकार लक्ष्मी भी विपत्ति की द्योतिका और देखते-देखते ही गायब हो जाने वाली होती है।
र
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
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नहीं देखती (है)। वैदग्ध्यं न गणयति प्राण्डित्य का नहीं विचार करती है। श्रुतं न आकर्णयति शास्त्र को नहीं श्रवण करती है। धर्मम् न अनुरुध्यते = धर्म को नहीं अनुरोध करती है। त्यागम् न आद्रियते = दान को नहीं सम्मान करती है। विशेषज्ञतां न विचारयति विशेष जानकारी को नहीं विचार करती है। आचारं न पालयति सदाचार को नहीं पालन करती है। सत्यम् न अवबुध्यते = सत्य को नहीं जानती है। लक्षणं न प्रमाणीकरोति - सामुद्रिक बिह्नों को नहीं मान्यता प्रदान करती है। गन्धर्वनगरलेखा इव भ्रम से दौल पड़नेवाली नगराकार रेखा के समान। पश्यतः (जनस्य अग्रतः) एव = (मनुष्य के सामने से) देखते (देखते) ही। नश्यति नष्ट हो जाती है।
समासः- गन्धर्वाणां नगराणि इति गन्दर्वनगराणि, तेषाम् लेखा इति गन्धर्वनगरलेखा ।
सरलार्थः - दुःशीलेयं लक्ष्मीः स्वजन-सम्बन्धमपि न स्मरति, उन्नतकुल-मपि नावलोकयति, सौन्दर्यमपि दृष्टिपथे नावतारयति, न च वंशपरिपाटीमनु-गच्छति, नाचारमाचरति, न वैदुष्यं विचारकोटिमानयति, न खलु शास्त्रोक्त-विधानमपि स्वीकरोति, न धर्मानुरोधनमनुसृत्य प्रवर्तते, न दानं प्रति आदर-भावं प्रकटयति, नापि विशेषेण सर्वार्थवेतृताम् गणयति, न च शिष्टानुचरितम् मार्ग रक्षति, नहि याथाध्यंमवगच्छति, मसी-तिलकादिसामुद्रिक चिह्नविशेष-मपि नैकान्ततः प्रमाणयति, दृष्टिभ्रमात् गगने दृश्यमाना नगराकारा लेखा इव इयम् अवलोकयतः पुरुषस्य अग्रतः एव विनश्यति ।
अनुवादः- यह अनार्या लक्ष्मी न तो स्वजनों से सम्बन्ध का निर्वाह करती है (अर्थात् चिरकाल तक कहीं रह कर भी चल देती है), अच्छे-अच्छे कुलों का भी ध्यान नहीं रखती; न सौन्दर्य को दृष्टिपथ में लाती है, न वंशपरम्परा का ही अनुसरण करती है, (वंशपरम्परा से चली आती हुई भी उसे छोड़ देती है)। न तो शील का मूल्याङ्कन करती है, न विद्वत्ता का विचार करती है (रूपवान्, कुलीन, शीलवान् और विद्वान् के पास भी नहीं देखी जाती) और न शास्त्रोक्त विधियों का ही आदर करती है (अर्थात् शास्त्रोक्त उपाय से बुलाने पर भी नहीं आती), न तो धर्म के अनुरोध पर
३०
कादम्बरी-शुकनासोपदेषाः
ही चलती है (धर्मनिष्ठ व्यक्ति के पास भी नहीं रहती, न वान का सम्मान करती है (दानी के पास नहीं रहती), विशिष्टज्ञान को प्रश्रय नहीं देती (शानी के पास नहीं रहती), शिष्ट जनों के द्वारा निदिष्ट मार्गों पर भी नहीं चलती सन्मार्ग पर चलने वालों के पास नहीं रहती, यथार्थ वस्तुओं का ज्ञान नहीं रखती सच्चाई से अलग रहती है), और न सामुद्रिकशास्त्र प्रतिपादित तिलकादिचिह्नविशेषों को ही सार्थक बनाती है, और दृष्टि के श्रम से आकाशमण्डल में दिखाई पडने वाले गन्धर्वनगर के समान देखते-देखते ही मनुष्यों के नेत्रों से ओझल हो जाती है।
अद्यापि आरूढमन्दरपरिवर्तावर्त भ्रान्तिजनितसंस्कारेव परिघ्र-मति । कमलिनीसञ्चरणव्यतिकरलग्ननलिननालकण्ठकक्षतेव न किचि-दपि निर्भरमाबध्नाति पदम् । চাঁয় আ
E161718
अन्वयः - अद्य अपि आरूढमन्दरपरिवर्तावर्त भ्रान्तिजनितसंस्कारा (सा) परिभ्रमति इव । कमलिनीसंचरणव्यतिकरलग्नन लिननालकण्टकक्षता (सा) यथा स्यात्तथा) पदम् न आबध्नाति इव किन्चित् अपि निर्भरं (यथा
शब्दार्थः अद्य अपि आज भी । आरूढमन्दरपरिवर्तावर्तभ्रान्तिजनित् संस्कारा इव (सा) - मन्दराचल के द्वारा किये गए मत्थन से जनित भंवर के चक्कर से उत्पन्न भ्रमणशीलता नाम के संस्कार से युक्त (वह लक्ष्मी) परिश्रमति इव मातो घूमती रहती है। कमलिनीसञ्चरणव्यतिकरलग्न-नलिननालकण्टकक्षताः (साः) कमलवन में घूमते रहते के कारण मृणाल काँटों के मानो चुभ जाते से (ही) वह लक्ष्मी)। किञ्चिदपि - कहीं पर भी। निर्भरम् = निर्भरतापूर्वक । | पदम् पदम् = (अपने) अपने पैरों को। न आबध्नाति इव = मानो नहीं जमा पाती है।
1155 समासः- मन्दरेण परिवर्तः इति रेवतः इति मन्दरपरिवर्तः, आरूढः यः मन्दरपरि
वर्तः, तस्मात् यः आवर्तः तस्मात् या भ्रान्तिः, तया जनितः संस्कारः यस्याः सा आरूढमन्दरपरिवर्तावतंभ्रान्तिजनितसंस्कारा। कमलिनीषु सञ्वरणस्य
व्यतिकरः इति कमलिनीसंचरणव्यतिकरः; नलिनानां नालानि, तेषाँ कण्टकानिः कमलिनीसंचरणव्यतिकरेण लग्नानि नलिननालकण्टकानि इति
काल সতি (চিসছ ভিট कारः प्रहाँ व्यापिसे 'पदम्' तक 'क्रियोत्प्रेक्षा' अलंकार है।
'उत्तमा " मालती' व्याख्योपेतः
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कमलिनी संचरणव्यतिकरलग्नत लिननीलकण्टकानितैक्षता इति कर्मलिती-संवरणब्यतिकरलग्ननलिनतालकण्ठकक्षता
उत्पन्नस्य ऑवर्तस्य प्रमितया सरलार्थः मन्दराचलकृतमन्यनेन जायमानात् भ्रमणशीलतास्यसंस्कारादेव साः अनवरत भ्रमणं करोति । अय चपद्मम्दम-सब्रिवासहेतुना लग्नः नलिनीलकण्ठको क्षती इयं चश्चला पंचा न स्वापि स्थिरं पदं छत्तो। एप्रिली के
अनुवादः यह लक्ष्मीः इस प्रकार घूमती रहती है मातो मन्दराचल के भ्रमण से उत्पन्न भँवर के चक्कर काटने का संस्कार उसमें अब तक बना ही हो। चंचला यह लक्ष्मी इसीलिए अपने पैरों को स्थिरतापूर्वक नहीं जमा पाती, मानो कमलिनी में विचरण के सम्पर्क से पाँव में कमलदण्ड के काँटे
चुभ गये हों अतिप्रयत्नविधृतापि परमेश्वरगृहेषु विविधगन्धगजगण्डमधुपान-मत्तेव परिस्खलति । पारुष्यमिवोपशिक्षितुमसिधारासु निवसति ।
अन्वयः परमेश्वरगृहेषु अतिप्रयत्न विघृता अपि विविधगन्धगजगण्ड-मधुपानमत्ता परिस्वलति इव । पारुष्यम् उपश्चिक्षितुम् असिधारासु निवसति ਕਿ ਸੀਬ= ( APP ) TEPARE 1 7F1 ਨੂੰ ਲੀ ਨੂੰ
(शब्दार्थः परमेश्वर गृहेषु राजा के महलों में अतिप्रयत्न विघृताः अपि सावधानी से पकड़ी जानेपर भी विविधगन्धगजगण्डमधुपानमत्ता (सा) - बहुतायत मदस्रीवी गजराजों के गण्डस्थल का मधुपान करते से उत्सत्तः (वह)। प्ररिस्खलति इव लड़खड़ाती-सी रहती है। पारुष्यम् उपशिक्षितुम् = कठोरता को सीखने के लिए। असिधारासु तिवसति इव= तलवार की धार पर मानो जमी रहती है की PRF-BIPE
समासः अतिशयः प्रयत्नः इति अतिप्रयत्नः तेन विधूता इति अति-प्रयत्नविघृता । विविधाः ये गन्धगजाः, तेषां गण्डाः, तेषां मधु, तस्य पानेन मत्ता इति विविधगन्धगजगण्डमधुपानमत्ता
सरलार्थः - राजभवनेषु महता प्रयासेत् निगृहीतापि इयम् अनेकगन्ध-
अंककारी यहाँ 'अतिप्रयत्न' संनिवसति तक 'क्रियोत्प्रेक्षा अलं-कार है। । गला 'ए' 'प्रगती।সফ
कादम्बरी-घुरुनासोपदेशः
गजकोटा तो दानवारिणः वान उन्मत्ता इव इतस्ततः पतति । काठिन्यस्य शिक्षामादातुमिव कृशवजलधारा आवासं निधत्ते ।
अनुवाद: हे राजाओं के महलों में अति प्रयत्नपूर्वक रक्षी जाने पर भी यह इस प्रकार सहसहाती रहती है मानो मदजलसावी मतंगों के पोल प्रदेश से चूते हुए मजल के पान से वह उन्मत्त हो गई हो। कठोरता की शिक्षा पाने के लिए ही मानो यह सड़गों की धारा में अपना निवास स्थान बनाती है ( अर्थात् जूनतराबी से ही यह प्राप्त होती है)।
विश्वरूपत्वमिव ग्रहीतुमाश्रिता नारायणमूर्तिम् । अप्रत्ययबहुला च दिवसान्तकमलमिव समुपचित मूलदण्डकोशमण्डलमपि मुञ्चति भूभुजम।
अन्वयः- विश्वरूपत्वम् ग्रहीतुम् नारायणमूर्तिम्' आश्रिता इव । ५ अप्रत्ययबहुला (इयम् ) ( समुचितमूलदण्डकोशमण्डलमपि) दिवासान्तकमलम् इव समुपचितमूलदण्डकोषमण्डलमपि भूभुजम् मुञ्चति ।
शशब्दार्थः - विश्वरूपत्वम् ग्रहीतुम् = अनेकरूपता को ग्रहण करने के लिए । नारायणमूतिम् बाधिता इव = विराट् पुरुष भगवान् विष्णु को मानो बाधय ले लिया है। च = और। अप्रत्ययबहुला (इयम् ) = तनिक भी किसी का विश्वास नहीं करने वाली (यह)। (समुपचित-मूल-दण्ड-कोशमपि ) दिवसान्तकमलम् इव = (पूर्णविकसित कन्द, नाल, और कोश के आकार बाले) सायंकालीन कमल के समान । समुपचित-मूल-दण्ड-कोश-मण्डलम् अपि भूभुजम् = बढ़े हुए मित्रगण, कर, खजाने और साम्राज्य आदि वाले राजा को भी। मुश्वति छोड़कर चल देती है।
समासः- न प्रत्ययः इति अप्रत्ययः, अप्रत्ययः बहुलः यस्या सा अप्रत्यय-
बहुला । सम्यक् उपचितम् इति समुपचितम् मूलं च ( मित्र, मूल) दण्डश्च (कर, नालदण्ड) कोशश्च (खजाना, कोश) मण्डलं च (साम्राज्य, घेरा) इति मूलदण्डकोशमण्डलं समुपचितं मूलदण्डकोशमण्डलं यस्य, तं समुप-चितमूलदण्डकोशमण्डलम् ।
अलंकार। - यहाँ 'विश्वरूपत्वमिव' से 'मूर्तिम्' तक 'क्रियोत्प्रेक्षा' अलं-कार है। 'दिवसान्तकमलमिव भूभुजम्' में 'उपमा' अलंकार है।
"उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
३३
सरलार्थः - विविधरूपाणां धारणार्थमेव विराट्रूपधारिणं विष्णुम्
अधिगता । प्रत्ययविहीना इयं यथा परिणत-कन्द-नाल-कोश-मण्डलादिकं सायन्तनं कमलं विसूजति । तथैव समृद्धकर-कोश-देश-शालिनमपि भूपति समुत्सृजति ।
अनुवादः - तरह-तरह के वेश बनाने के लिए ही मानो विराट् रूप धारी भगवान् विष्णु का इसने आलम्बन किया है। विश्वास के अभाव के कारण ही अपने समृद्ध मित्रमण्डल, कर, खजाना और साम्राज्य आदि वाले राजाओं को भी समय पर छोड़कर यह लक्ष्मी उसी तरह चल देती है जिस तरह पूर्ण विकसित कन्द, नालदण्ड, कोश और पारिमाण्डल्य आदि से युक्त अपने आश्रय कमल को सायंकाल में छोड़कर चल देती है।
लैतेव 'विटपकानध्यारोहति । गङ्गव वसुजनन्यपि तरङ्गबुद्बुद-
१. विटप (क) वृक्ष की शाखा । (पक्ष में- विट = धूर्त कामी,) बिटानां पतिः इति विटपः, विटप एव विटपकः विटों का सरदार। 'विट'
का लक्षण:-
'सभोगहीनसम्पद् विटस्तु धूर्तः कलैकदेशज्ञः ।
वेशोपचारकुशलो वाग्मी मधुरोऽथ बहुमतो गोष्ठथाम् ।।'
साहित्यदर्पण ३।४९
२. पुराने समय में एक बार आठ वसुओं (आप, ध्रुव, सोम, धव अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रभास) में से एक वसु ने किसी ऋषि की गाय चुरा ली, ऋषि ने सामान्यतः संभी वसुओं को पृथ्वी पर मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। तदनन्तर चोरी नहीं करने वाले सात वसुओं ने उस ऋषि से अपनी-अपनी अपराधहीनता को बतला कर 'जन्म लेते ही छुट्टी पा जाने' का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया ।
वशिष्ठ के शाप से मनुष्य-योनि में आई हुई गंगा ने, शान्तनु की पत्नी बन कर उन्हीं आठ वसुओं को, बारी-बारी से जन्म दिया। जन्म के साथ ही एक-एक करके सात शिशुओं को गंगा ने पानी में फेंक दिया। फलतः वे सात जन्म लेने के साथ ही मुक्ति हो गये। लेकिन आठवें लड़के को फेंकने की जब बारी आई तो शान्तनु ने गंगा को रोक दिया। फलतः आठवाँ
कादम्बरी-शुकनासोपशेशः
३४ चन्चला। दिवसकरगतिरिव प्रकटितविविधसंक्रान्तिः । पातालगुहेव समोबहुला ।
अन्य लता इव इयम्) विटपकान् अध्यारोहति । वसुजननी अपि ( इयम्) ( बसुजननी गंगा इव तरङ्गबुदबुद चञ्चला। दिवसकरगतिः इव प्रकटितविविधसङ्क्रान्तिः । पातालगुहा इव तमोबहुला ।
स्वार्थः लता इव इयम्) लतिका के समान यह लक्ष्मी । बिटपकान् अध्यारोहति नीचपुरुषों पक्ष में वृक्षों को आलिंगन करने लगती है। बसूजननी अपि धन की उत्पादिका (पक्ष में भीष्म की माता) लक्ष्मी) । तरङ्ग बुदबुद-होकर भी। गंगा इव = गंगा के समान (यह चञ्चला लहरों और बुलबुले के समान चंचल (पक्ष में लहरों और बुलबुले
लड़का न फेंका गया, न मुक्त ही हुआ। बल्कि दीर्घकाल तक मनुष्य शरीर का सुख-दुःख भोगता रहा। इसी लड़के ने पूर्व जन्म में वसु के रूप में गाय सुराई थी। इसीलिये इसे ही ऋषि के शाप से ग्रस्त होना पड़ा। शाष भोगता हुआ यही बसु इस जन्म में 'भीष्म' के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी-लिये यहाँ गंगा को 'वसुजननी' (भीष्म की माता) कहा गया है। देखिये-
महाभारत-भीष्मपर्वम्াসান রিনাচ ভিক্যালরির্চ
१. मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन ये बारह राशियां होती हैं। प्रगत
इन राशियों में सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना ही 'संक्रान्ति' (संक्रमण) कहलाती है। इसीलिये एक वर्ष में बारह संक्रमण से बारह
'संक्रान्ति' होती है। চিক
धनु, मिथुन, कन्या और मीन राशि की संक्रान्ति को तुला और मेष की संक्रान्ति को 'विषुव' सिह, वृश्चिक, वृष संक्रान्ति को 'विष्णुपद' कहते हैं मीर-एक के उगी षडशीतिमुख तथा कुम्भ की
'षडशीत्याननं चापनृयुक्कन्या झषे भवेत् । पত ক্লিচ ১৯
तुलाजी विषुवं विष्णुपदं सिहालिगोघटे ।।' हाल करत प्र-कप ि
কিট কি করত না मुहर्त्तचिन्तामणि, संक्रान्तिप्रकरण, श्लोक ०४
अलंकारः- यहाँ 'लता इव' से 'तमोबहुला' तक पूर्णोपमा अलंकार है।
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
३५
से आन्दोलित) (है)। दिवसकरगतिः इव सूर्य की गति के सदृश । प्रकटित विविधसंक्रान्तिः बहुविध व्यक्तियों (पक्ष में अनेक राशियों) में संचरण करने वाली (यह लक्ष्मी है) । पातालगुहा इव = पाताल की कन्दरा के समान । तमोबहुला अत्यधिक तमोगुण (पक्ष में-अन्धकार) बाली (यह लक्ष्मी है)।
समासः - तरङ्ग-बुद्बुदवत् चश्वला (पक्ष में तरंगबुद्बुदाभ्यां चनाला ) इति तरंग-बुद्बुद-चश्वला । प्रकटिता विविधेषु संक्रान्तिः यया सा प्रकटित-विविधसंक्रान्तिः ।
सरलार्थः - यथा लतिका वृक्षान् आरोहति तथैवेयं नीचपुरुषान् बालिङ्गति । यथा भीष्मजननी गंगा तरङ्गबुद्बुदाभ्यां चश्वला अस्ति तथैव द्रव्योत्पादिका सत्यपि इयं तरङ्गबुद्बुदवत् अस्थिरा । यथा दिनकरः भिन्न-भिन्न-राशिषु संचरति तथैव इयमपि भिन्न-भिन्न-पुरुषेषु व्यभिचरति । यथा रसा-तलकन्दरा तिमिराच्छन्ना भवति तथैवेयं तमोगुणप्रधाना भवति ।
अनुवादः - जिस प्रकार लतिकाएँ वृक्षों का आलिंगन करती हैं उसी प्रकार लक्ष्मी भी नीच पुरुषों को अपनाती है। जैसे भीष्म की माता गंगा लहरों और बुलबुलों ये सतत अस्थिर रहती है वैसे ही सम्पदाओं की जननी लक्ष्मी भी जलतरंगों एवं बुद्बुद के सदृशं अस्थिर होती है। जिस तरह रसा-तल की गुफा तिमिराच्छन्न रहती है वैसे ही यह भी तमोगुण-प्रधान होती है।
हिडिम्बेव' भीमसाहसैकहार्यहृदया। प्रावृडिवाचिरद्युतिकारिणी । दुष्टपिशाचीव दर्शितानेकपुरुषोच्छाया स्वल्पसत्त्वमुन्मत्तीकरोति ।
अन्वयः- (इयं लक्ष्मीः) हिडिम्बा इव भीमसाहसैकहार्यहृदया (अस्ति)। (इयं) प्रावृट् इव अचिरद्युतिकारिणी (अस्ति ) । दुष्टपिशाची इव दशि तानेक पुरुषोच्छाया (इयम्) स्वल्पसत्त्वम् उन्मत्तीकरोतिरकार
१. हिडिम्बा नाम की राक्षसी पाण्डुपुत्र भीम के पराक्रम को देख कर ही उस पर मुग्ध हो गई थी और उसकी पत्नी बन गई थी। भीम की इसी राक्षसी पत्नी से 'घटोत्कच' नाम के पुत्र का जन्म हुआ था। कथा महाभारत में
द्रष्टव्य है। Pliण्ट्र का 'চীচিকাচিমন্ট' ও 'ফনিশ্চয়ী'-সভ
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
१६ शस्यार्थः इयं लक्ष्मीः यह लक्ष्मी) हिडिम्बा इव भीम की राक्षसी पत्नी) हिडिम्बा के समान । भीमसाहसे कहार्य हृदया एकमात्र प्रचण्ड साहस (पक्ष में 'भीम' के साहस से मोहित होने वाली है)। (अस्ति) = क्षण मात्र के लिये शोभा (पक्ष में बिजली को उत्पन्न करने वाली ( इयम् यह लक्ष्मी प्रावृट् इव वर्षाऋत के समान । अचिरद्युतिकारिणी ( है ) । दुष्टपिशाची इव क्रूरपिशाचिनी के समान । दशिताने कपुरुषोच्छाया ( इयम्) विविध पुरुषों की समृद्धि पक्ष में अनेक पुरुषों के बराबर कमजोर व्यक्ति को। उन्मत्तीकरोति = उन्मत्त (पक्ष में - भयभीत ) बना नाप की ऊंचाई) को व्यक्त करने वाली यह लक्ष्मी)। स्वल्पसत्त्वम्=
देती है। समासः- भीमश्वासौ साहसः (पक्षे 'भीमस्य' साहसः) इति भीमः साहसः, तेन एकेन हार्य हृदयं यस्याः सा भीमसाहसैकहार्यहृदया । अचिराम् द्युतिम् कत्तु शीलम् अस्य इति अचिरद्युतिकारिणी । दर्शितः अनेकपुरुषाणाम् उच्छ्रायः यया सा दर्शितानेकपुरुषोच्छाया ।
सरलार्थः - यथा राक्षसी हिडिम्बा केवलं भीमस्यैव साहसेन आकृष्टा अभूत् तथैवेयमपि केवलं प्रचण्डसाहसेनैव आहरणीया भवति । यथा वर्षा कालः क्षणमात्रं विद्युल्लतां विद्योतयति तथैवेयमपि क्षणभङ्गुरामेव शोभो जनयति । यथा क्रूरपिशाचिनी आत्मनि अनेकपुरुषपरिमितां उच्चतां प्रदश्ये अल्पसाहसं पुरुषं भयात् उन्मत्तीकरोति तथैवेयमपि अनेकजनानामभ्युदयं प्रदश्य अल्पज्ञं अपरं जनं उन्मादपथं प्रापयति ।
अनुवादः- जिस प्रकार राक्षसी हिडिम्बा एकमात्र भीम के साहस पर मुग्ध हो गई, उसी प्रकार लक्ष्मी भी प्रचण्ड साहस से वशीभूत होती है। जिस प्रकार वर्षाऋतु क्षणमात्र के लिये ही चपला को चमका देती है, उसी प्रकार लक्ष्मी भी क्षणिक छवि को छिटका देती है। जिस प्रकार भयंकर पिशाचिनी अनेक पुरुषों के बराबर नाप की ऊँचाई को दिखला कर दुर्बल व्यक्तियों को भय से पागल बना देती है, उसी प्रकार लक्ष्मी भी अनेक पुरुषों के अभ्युदय को दिखाकर अन्य अल्पज्ञजनों को उन्मत्त बना देती है।
अलंकार-'हिडिम्बेव' से 'उन्मत्तीकरोति' तक पूर्णोपमा अलंकार है।
R
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
३७
सरस्वतीप्रिगृहीतमीष्यंयेव' नालिङ्गति जनम् । गुणवन्तमपवित्र-मिव न स्पृशति । उदारसत्त्वममङ्गलमिव न बहु मन्यते । सुजनम-निमित्तमिव न पश्यति ।
अन्वयः (इयं) सरस्वतीपरिगृहीतं जनम् ईष्यैया इव न आलि-
१. इस उक्ति से सरस्वती और लक्ष्मी सपत्नीभाव का संकेत मिलता है।
२. ज्योतिष में यह बताया गया है कि-
बाँझ स्त्री, चमड़ा, भूसा, हड्डी, साँप, लवण, अङ्गारक, इन्धन, नपुंसक (हिजरा), विष्ठा, तेल, पागल, चर्बी, औषधि, शत्रु, जटाधारी संन्यासी, घास, रोगी, नङ्गा मनुष्य, उबटन लगाये मनुष्य, खुले केश वाले मनुष्य, जाति से बहिष्कृत, अंगहीन, भूख से पीड़ित, रुधिर, स्त्री का ऋतु, गिरगिट, अपने घर का जलना, बिलाव का युद्ध, छींक, गेरुआ वस्त्र वाला, गुड़, मठा, कीचड़, विधवा स्त्री, कुबड़ा मनुष्य, परिवार में झगड़ा, शरीर के ऊपर से वस्त्रों का गिरना, भैंसे की लड़ाई, काले धान, कपास, बमन, दाहिनी ओर गधे का शब्द, अधिक क्रोधी, भिणी स्त्री, बाल कटाया हुआ मनुष्य, भींगा वस्त्र, दुर्वाक्य ( गाली या शाप), अन्धा, बहिरा और रजस्वला स्त्री-ये यात्रा के समय दीख पड़ें तो अशुभ होता है। देखिये :-
'बन्ध्याचर्मतुषास्थिसर्पलवणा ङ्गारेन्धनक्लीबविट् तैलोन्मत्तवसौषधारिजटिलप्रव्रातृणव्याधिताः ।
नग्नाभ्यक्तविमुक्तकेशपतिता व्यङ्गक्षुधार्ता असूक्
स्त्रीपुष्पं सरठः स्वगेदहनं मार्जारयुद्धं क्षुतम् ।।
काषायी गुडतक्रपंकविधवाकुब्जाः कुटुम्बे कलि-
वैस्त्रादेः स्खलनं लुलायसमरं कृष्णानि धान्यानि च ।
कार्पासं वमनं च गर्दभ-रवो दक्षेऽतिरुड् गभिणी मुण्डार्द्राम्बरदुर्वचोऽन्धबधिरोदक्यों न दृष्टाः शुभाः ।।'
मुहूर्तचिन्तामणि, यात्राप्रकरण, श्लोक - १०२, १०३
अलंकारः- 'सरस्वती' से 'जनम्' तक 'गुणोत्प्रेक्षा' और 'समासोक्ति' का 'संकर' है। 'गुणवन्तम्' से 'पश्यति' तक 'उपमा' अलंकार है।
१८
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
गति । इयं गुणवन्तं जनं अपवित्रम् इव न स्पृशति । ( इयं) उदार-सत्यं (जनं) अमङ्गलम् इव बहन मन्यते । (इयं) सुजनम् अनिमित्तम् इव न पश्यति ।
दाम्दार्थः इयं यह लक्ष्मी सरस्वतीपरिगृहीतम् जनम् सरस्वती के द्वारा वरण किये हुए विद्वान को ईष्या इव न आलिगति मानो डाह से अंगीकार नहीं करती है। इयं लक्ष्मी गुणवत्तम् जनम् दया-दाक्षिण्यादिगुणों से अलंकृत (पुरुष) को। अपवित्रम् इव न स्पृशति = मानो अछूत समझ कर स्पर्म ही नहीं करती है। (इयम् = यह लक्ष्मी) उदारसत्वं (जनं) = उदार प्रकृति के (प्राणी) को। अमङ्गलम् इव बहु न मन्यते = मानो अमंगल समझ कर अधिक सम्मान नहीं करती है। सुजनम् = सज्जन मनुष्य को। अनिमित्तम् इव न पश्यति मानो अपशकुन समझ कर देखती ही नहीं है।
समासः - सरस्वत्या परिगृहीतः इति सरस्वतीपरिगृहीतः, तम् सरस्वती-परिगृहीतम् ।
सरलार्थः- शारदया अनुकम्पितं विद्वज्जनं मत्सरवशादिव इयं न श्लिषति । दयाधीरतादिगुणगणमण्डितं मानवम् अपावनं मन्यमाना तस्य स्पर्शमपि परिहरति इव । दाक्षिण्यगुणोपेतं पुरुषम् अशुभमिव नैवादरभाजनं विदधाति । अपशकुनमिव मत्वा सत्पुरुषस्य दर्शनादपि पलायते ।
लक्ष्मी अनुवादः- सरस्वती की जिस पर अनुकम्पा हो जाती है उसको मानो डाह से यह आलिंगन नहीं करती है। दया, धीरता प्रभृति गुणों से समन्वित पुरुष को अछूत समझ कर स्पर्श भी नहीं करती। उदारस्वभाव के पुरुष को अशुभ मानकर उसके दर्शन से भी बचती है (अर्थात् इन लोगों के पास স लक्ष्मी, जावी ही नहीं होगी 15111 अभिजातमहिमिव लेङ्घयति । शूरं कण्टकमिव परिहरति । दातारं दुःस्वप्नमिव नै स्मेरेति । विनीतं पातकिनमिव नोपसर्पति । मनस्विन-
मुन्मत्तमिवोपहसति ।।51111151811
अलंकारः - यहाँ 'अभिजातं' से 'उपहसति' तक 'उपमा' अलंकार है।
विशेषः-पिछले गद्य-खण्ड के 'गुणवन्तम्' से इस गद्य-खण्ड के अन्त में
'उत्तमा 'मालती' व्याख्योपेतः
३९
अन्वयः- (इयम् लक्ष्मीः) अभिजातम् (जनम् ) अहिम् इव लङ्घ यति । शूरं कण्टकम् इव परिहरति । दातारं दुःस्वप्नम् इयन स्मरति । विनीतं पातकिनम् एव न उपसर्पति। मनस्विनम् उन्मत्तम् इव उपहसति ।
शब्दार्थः (इयम् लक्ष्मीः यह लक्ष्मी)। अभिजातम् (जनम् ) = उच्चकुल में उत्पन्न 'मनुष्य' को । अहिम् इव लंघयति - साँप के समान उल्लंघन कर जाती है। शूरं वीर पुरुष को कण्टकम् इव परिहरति = काँटे के समान परिहृत कर देती है। दातारम् = दानी को। दुःस्वप्नम् इव - अशुभ स्वप्न के समान । न स्मरति स्मरण भी नहीं करती है। विनीतम् - नम्र पुरुष को । पातकिनम् इव पापी के समान । न उपसर्पति (उसके) पास भी नहीं फटकती। मनस्विनम् - मनस्वी (पुरुष) को । उन्मत्तमिव = पागल समझ कर । उपहासति उपहास करती है।
समासः- दुष्टः स्वप्तः इति दुःस्वप्तः, तम् दुःस्वप्नम् ।
सरलार्थः - उच्चवंशसमुद्भूतं जनं सर्पमिव अतिक्रामति । शौर्यसम्पन्नं जनं कण्टकमिव मुश्वति । दानशीलं पुरुषम् अशुभस्वप्नमिव स्मरणपथमपि नानयति । विनयगुणोपेतं जनं पापिनं मत्वा तस्य पाश्र्वेऽपि न प्रयाति । मन-स्विजनं प्रमत्तं मन्यमाना तम् उपहासविषयीकरोति ।
अनुवादः - उच्चकुल में उत्पन्न पुरुष को सर्प के समान उल्लंघन कर
जाती है। वीर पुरुष को कांटा मानकर उससे दूर ही रहती है। दान परा-यण पुरुष को अशुभ स्वप्न मानकर स्मरण भी नहीं करती। विनीत व्यक्ति को पापी समझकर उसके पास नहीं फटकती। मनस्वी मनुष्य को पागल
करार देकर उसकी खिल्ली उड़ाती है।
- परस्परविरुद्धञ्चेन्द्रजालमिव' दर्शयन्ती प्रकटयति जगति निजं चरितम् । तथाहिÉP
'उपहसति' तक अधिकतर संस्कृत टीकाकारों ने 'उपमा' अलंकार माना है किन्तु प्रस्तुत स्थल में वक्ता के अभिप्राय को अधिक स्पष्ट करने के लिये 'उत्प्रेक्षा' अलंकार का औचित्य प्राप्त है।
15 आजकल इन्द्रजाल' को 'जादू का खेल' कहते हैं। 'अमरकोष' में। इन्द्र-जाल को 'माया' (जादू) कहा गया है: स्यात्माया शाम्बरी - अमरकोष ।
४०
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
सततम् ऊष्माणमारोपयन्त्यपि जाडद्यमुपजनयति । उन्नतिमाद धाना अपि नीचस्वभावतामाविष्करोति ।
अन्वयः- (सा) इन्द्रजालं दर्शयन्ती इव जगति परस्परविरुद्धं नित्र चरितं प्रकटयति । तथाहि-
ऊष्माणम् आरोपयन्ती अपि सततम् जाडघम् उपजनयति । उन्नतिम् आदधाना अपि नीचस्वभावताम् आविष्करोति ।
शब्दार्थः (सा) इन्द्रजालं दर्शयन्ती इव (वह लक्ष्मी) मानो जादू को दिखलाती हुई। जगति = संसार में। परस्परविरुद्धं निजं चरितम् = परस्पर विरोधी अपने वृत्तान्त को प्रकटयति = व्यक्त करती है। तथाहि = जैसे कि-
ऊष्माणम् आरोपयन्ती अपि गर्मी का आरोप करती हुई भी (ताव चढ़ाती हुई) सततम् = निरन्तरम् । जाडयम् उपजनयति = शीतलता को उत्पन्न करती है। उन्नतिम् आदधाना अपि अभ्युदय को देती हुई भी। नीचस्वभावताम् आविष्करोति नीच प्रवृत्ति को प्रकट करती है।
समासः - स्पष्टम् ।
सरलार्थः- मायाजालं प्रदर्शयन्ती इव संसारेऽस्मिन् अन्योन्यविपर्यय-
भूतं स्वकीयं वृत्तं उद्घाटयति । तथा हि-
तापं प्रवर्तयन्ती अपि शीतलतामुत्पादयति (घनदर्परूपमूष्माणम् उद् भाव्य जने सदसद्विवेकरहितत्वरूपं जाड्यं करोतीति भावः । इयं लक्ष्मीः
पौराणिक कथा यह है कि दानवगण अपनी माया से भाँति-भाँति का
रूप ग्रहण करके इन्द्र को परेशान करने के लिये नाना प्रकार के जाल (= कृत्रिम उपाय) रचा करते थे। 'इन्द्र' को परेशान करने के लिये किये जाने वाले 'जाल' = विविध प्रपंचों को ही 'इन्द्रजाल' (= मायाजाल) कहा जाने लगा। तब से 'इन्द्रजाल' शब्द 'मायाजाल' या 'जादू के खेल' के अर्थ में प्रसिद्ध हो गया ।
अलंकारः- यहाँ 'परस्पर' से 'चरितम्' तक 'उत्प्रेक्षा' अलंकार है। 'सततं' से 'आविष्करोति' तक 'विरोधाभास' अलंकार है।
'उत्तमा" मालती' व्यास्योपेतः
४१ तमारोहयन्ती अपि अधोगति प्रापयति ( पदोन्नति सम्पाद्य अपि निरं-कर्तव्ये कर्मणि प्रेरयति जनमिति भावः ।
अनुवादः यह लक्ष्मी मानो मायाजाल का प्रदर्शन करती हुई इस हर में अपने परस्पर विरोधी चरितों का नाटय करती रहती है। उदा-के लिये -
गर्मी का आरोप करती हई भी यह लक्ष्मी शीतलता उत्पन्न करती है ।
दमनुष्य में धन का अभिमान उत्पन्न करके उसको उचित अनुचित के किसे रहित कर देती है। यह लक्ष्मी उन्नति के शिखर पर पहुंचाकर भी वसति के गर्त में गिरा देती है, अर्थात् प्रशंशित पद पर आसीन करके
बायको निषिद्ध कर्म में प्रवृत्त करा देती है ।
तोयराशिसम्भवापि तृष्णां संवर्द्धयति । ईश्वरतां दधानापि अशिव-प्रकृतित्वमातनोति । बलोपचयमाहरन्त्यपि लघिमानमापादयति ।
अन्वयः तोयराशिसम्भवा अपि (इयम्) तृष्णां संवर्द्धयति । ईश्वरतां स्थानः अपि ( इयम् ) अशिवप्रकृतित्वम् आतनोति । बलोपचयम् आहरन्ती अपि (इयम्) लधिमानम् आपादयति ।
शब्दार्थः - तोयराशिसम्भवा अपि (इयम्) जलनिधि से उत्पन्न हुई हो (यह लक्ष्मी)। तृष्णां संवर्धयति = प्यास को बढ़ाती है। ईश्वरतां दधाना अपि (इयम् ) = शिवत्व को देती हुई भी (यह लक्ष्मी)। अशिव-प्रकृतित्वम् = शिवेतर स्वभाव को। आतनोति - प्रसार करती है। बलोप-वयम् = शक्ति की वृद्धि को। आहरन्ती अपि करती हुई भी । लधिमानम् = शुद्रता को । आपादयति = देती है।
समासः - तोयानां राशिः इति तोयराशिः, तस्मात् सम्भवति इति तोय-राशिसम्भवा । बलानां उपचयः इति बलोपचयः, तम् बलोपचयम् ।
सरलार्थः- जलनिधेः जायमानापि इयं जलजा पिपासां वर्धयति
(वनं धनलोलुपं करोतीति भावः) । शिवतां धारयन्ती अपि शिवेतर-स्वभावतां विस्तारयति (प्रभुतां प्रापयन्ती अपि लोकोत्पीडनादिना अमंगल-
अलंकारः - यहाँ 'तोयराशि' से 'आपादयति' तक विरोधाभास अलं-बार है।
४२
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
कारिणं विदधाति जनम् इति भावः शक्ति वर्धयन्ती अवि लघुत्वमुत्वादयति ( सैन्यसम्पन्नतां सम्पाद्य जनेषु कार्पण्यभावमाविष्करोति ) ।
अनुवादः जलधि से जन्म ग्रहण करके भी यह लक्ष्मी प्यास को बढ़ाती है अर्थात लोगों में धन की लालच पैदा करती है। शिवत्व को प्राप्त कराकर भी शिव से भिन्न स्वभाव का प्रसार करती है अर्थात शासक बनाकर उनको जनता का शोषक बना देती है। शक्ति का संवर्धन करती हई भी लक्ष्मी मनुष्य को अकिचन बना देती है अर्थात सैन्यादि बल से सम्पन्न करके भी पुरुष को कृपण बना देती है।
अमृतसहोदरापि कटुविपाका । विग्रहवत्यपि अप्रत्यक्षदर्शना ।'
पुरुषोत्तमरतापि खलजनप्रिया ।
१. भगवद्गीता में भगवान् ने अर्जन को समझाया कि इस लोक में क्षर और अक्षर ये दो पुरुष हैं। सभी नाशवान् प्राणी क्षर हैं और उनकी जड़ में रहने वाले को अक्षर कहते हैं :-
'द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।।'
- गीता, अ० १५, दलो० १६
किन्तु उत्तम पुरुष जो परमात्मा कहलाता है, कुछ और ही है। वही अव्यय ईश्वर तीनों लोक में रमा हुआ उनका पोषण करता है :-
'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।।'
- गीता, अ० १५, श्लो० १७
चूंकि मैं क्षर से परे और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए मैं लोक और वेद में 'पुरुषोत्तम' नाम से प्रसिद्ध हूँ:-
तस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।।' - गीता, अ० १५, श्लो० १८
अलंकारः - 'अमृत' से 'प्रिया' तक विरोधाभास अलंकार है।
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
४३
अन्य अमृतसहोदरा अपि (इयं) कटुविपाका । विग्रहवती अवि पुरुषोत्तमरता अपि खलजनप्रिया ।
शब्दार्थः अमृतसहोदरा अपि अमृत की सगी बहन होकर भी यह मी कटुविपाका अन्त में कड़वी लगने वाली (होती है)। विग्रह-अपिपरीरधारिणी होकर भी यह लक्ष्मी)। अप्रत्यक्षदर्शना सों को नहीं दिखाई देने वाली ( है ) पुरुषोत्तमरता अपि भगवान् विष्णु में आसक्त होकर भी। खलजनप्रिया अधमपुरुषों से प्रेम करती है।
समासः- समानं उदरं यस्याः सा सहोदरा, अमृतस्य सहोदरा इति अमृतसहोदरा । कटुः विपाकः यस्याः सा कटुविपाका । अक्ष्णोः समीपम् प्रत्यक्षम्, न प्रत्यक्षम् अप्रत्यम्, अप्रत्यक्षं दर्शनं यस्याः सा अप्रत्यक्षदर्शना । सलाच ते जना इति खलजना तेषां प्रिया इति खलजनप्रिया ।
सरलार्थः - अमृतेन सह जायमानापि कटुरसावसाना समनुभूयते (परि-शामे दुःखप्रदा इति भावः) । शरीरभावहन्ती अपि साक्षात्कर्तुमशक्येयं साक्ष्मीः। श्रेष्ठपुरुषेषु अनुरागं भजन्ती अपि दृष्टपुरुषैः सह रमते (पुरुषोत्तमेन विष्णुना रममाणा अपि अधमजनरञ्जनं विधत्ते इति भावः) ।
अनुवादः - यह लक्ष्मी सुधारस के साथ जन्म लेकर भी स्वाद से कड़वी लगती है अर्थात् अन्त में दुःख देने वाली होती है। शरीर को धारण करके भी बाँखों में ओझल ही रहती है। श्रेष्ठ पुरुषों में अनुरक्त रहकर भी दुष्टों के साथ रमण करती है अर्थात् भगवान् विष्णु की सहगामिनी होकर भी दुष्टों का मनोरञ्जन करती है।
रेणुमयीव स्वच्छमपि कलुषीकरोति । यथा यथा चेयं चपला दीप्यते तथा तथा दीपशिखेव कज्जलमलिनमेव कर्म केवलमुद्वमति । तथा हि-
अन्वयः - रेणुमयी (इयम् ) स्वच्छमपि (जनम् ) कलुषीकरोति इव ।
अलंकार 'रेणुमयीव' में क्रियोत्प्रेक्षा और विरोधाभास का अङ्गाङ्गि भाव संकर है। 'यथा' से 'उद्द्वमति' तक पूर्णोपमा अलंकार है।
YY
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
इयम् चपला यथा यथा दीप्यते तथा तथा दीपशिखा केवलेकरज मलिनम् एव कर्म उद्वमति ।
शब्दार्थः रेणुमयी ( इयम्) रजोमयी ( यह लक्ष्मी)। स्वच्छ (जनम् ) = निर्मल (पुरुष) को भी। कलुषीकरोति मलिन कर देती यथा यथा च = जितना-जितना । इयम् चपला यह चंचल लक्ष्मी। दीद = बढ़ती जाती है। यथा यथा वैसे-वैसे। दीपशिखा इव दीये की की तरह। केवलं कज्जलमलिनम् एव कर्म काजल की तरह सिर्फ काली क तूतों को हो। उद्यमति = उगलती रहती है। तथाहि क्योंकि -
समासः - कज्जलवद् मलिनम् इति कञ्जलमलिनम्, तत् ।
सरकार्थः - रजोभिनिमिता इव इयं अमलमपि जनं मलिनीकर ( रजोगुणमयी इयं रागद्वेषादिशून्यमपि जनं रागद्वेषादिभिः संयोजयति । भावः)। यथा दीपशिखा प्रवर्धमाना कज्जलाधिक्यं उत्पादयति तथैव वि ल्लतावत् चञ्चलेयं लक्ष्मीः यथा यथा विद्योतते तथा तथा केवलं मलीमस कर्म-समाचरति (अर्थात् स्वाश्रयेण जनेन कारयतीति भावः) ।
अनुवादः- मानो रजोमयी (धूलिनिर्मिता) होने के कारण निग पुरुष को भी कलुषित कर देती हैं अर्थात् रजोगुण की प्रधानता के कारण लक्ष्मी रागद्वेष आदि से मुक्त पुरुष को भी राग-द्वेष आदि से युक्त कर दे है। बिजली के समान चश्वल यह लक्ष्मी जैसे-जैसे प्रकाश करती है, वै वैसे ही दीये की लौ के समान काजल की भाँति सिर्फ काली करतूतें दिखलाती है। क्योंकि -लता
इयं संवर्द्धनवारिधारा तृष्णाविषवल्लीनाम् । व्याधगीतिरिन्द्रि मृगाणाम् । परामर्शधूमलेखा सच्चरितचित्राणाम् । विभ्रमशय्या मो दीर्घनिद्राणाम् । निवासजीर्णवलभी धनमदपिशाचिकानाम् । ति रोङ्गतिः शास्त्रदृष्टीनाम् ।
अन्वयः - इयं तृष्णाविषवल्लीनाम् संवर्धनवारिधारा । इन्द्रियमृगाण
असंकारः- 'संवर्धन' से 'दृष्टीनाम्' तक रूपक अलंकार है।
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
४५ । मोहद्दीर्घनिद्राणां व्याधगीतिः । सच्चरितचित्राणां परामर्शधूमलेखा विभ्रमराम्या । धनमदपिशाचिकानां निवासजीर्णवलभी। शास्त्रदृष्टीना हिमिरोङ्गतिः ।
शम्वार्थ:- इयं तृष्णाविषवल्लीनाम् यह लक्ष्मी, लालसारूपी विष-महाबों की। संवर्धनवारिधारा पोषण करने वाली जल की धारा ( है ) । इन्द्रियमृगाणाम् इन्द्रियरूपी हरिणों का (के लिए) । व्याधगीतिः = शिकारियों का संगीत । सच्चरितचित्राणाम् सज्जनों के चरित्ररूपी चित्रों का (को)। परामर्शधूमलेखा ढक देने वाली धुएँ, की रेखा (है)। मोह-दीर्घनिद्राणाम् = मूढतारूपी गाढ़ निद्रा का । विभ्रमशय्या = विलास की इन्या (है)। धनमदपिशाचिकानाम् = सम्पत्ति के अभिमानरूपी पिशाचि-नियों का, निवासजीर्ण वलभी रहने की पुरानी अटारी (है)। शास्त्र-दृष्टीनाम् = शास्त्ररूपी चक्षुओं का । तिमिरोद्गतिः 'तिमिर' नाम के नेत्रः रोग की उत्पत्ति (है)।
समासः- वारीणां धारा इति वारिधारा, संवर्धनाय वारिधारा इति संवर्धनवारिधारा । विषस्य वल्ल्यः इति विषवल्ल्यः, तृष्णा एव विषवल्ल्यः इति तृष्णाविषवल्ल्यः, तासां तृष्णाविषवल्लीनाम् । व्याधस्य गीतिः इति व्याघ्रगीतिः । इन्द्रियाण्येव मृगाः इति इन्द्रियमृगाः, तेषां इन्द्रियमृगाणाम् । परामर्शाय धूमलेखा इति परामर्शधूमलेखा । सतां चरितानि इति सच्चरितानि तान्येव चित्राणि, तेषां सच्चरितचित्राणाम् । मोहाः एव दीर्घनिद्राः इति मोहदीर्घनिद्राः तासां मोहदीर्घनिद्राणाम् । जीर्णा चासौ वलभी इति जीर्ण-बलभी, निवासाय जीर्णवलभी इति निवासजीर्णवलभी। धनानां मदाः त एवं पिशाचिकाः, तासां धनमदपिशाचिकानाम् । शास्त्राण्येव दृष्टयः, तासाम् शास्त्रदृष्टीनाम् ।
सरलार्थः (अत्र प्रकरणे सर्वत्र 'लक्ष्म्याम्, वारिधारात्वादीनाम् बारोपोऽवगन्तव्यः । )
यतो हि-जलधाराभिः सेचिताः विषवल्लयः यथा समेधन्ते, अनया उरुम्या अपि ललिताः लालसाः तथैव समेधन्ते । यथा व्याधानां वंशीरवः मृगान् सम्मोह्यति तथैव इयमपि आकर्षति चक्षुरादिकरणजातानि । यथा
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
यथा सुरम्यं शयनीयं सुनिद्रायाः स्थानं तथैव इयमपि मोहस्य शयनम् । पण लिम्पन्ति तथैव इयमपि सत्पुरुषार्णा चरितानि आवृणोति। यथा जर्जरितः ग्रहोपरिभागः पिशाचाङ्गनानाम् आवासः तचैव यमरि ऐश्वर्याभिमानस्य निकेतनम् । यथा तिमिराख्यो रोगविशेषः नयनयोर्नाशकः तथैव इयमपि बेडस्मृत्यादिशास्त्राणाम् अवरोधिका ।
अनुवादः- क्योंकि -
जिस प्रकार जल की धाराओं से विष की लताओं का पोषण होता है. उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी मनुष्य की लालसा को आगे ही बढ़ाती रहती
है। जैसे बहेलियों का संगीत हरिणों को आकृष्ट कर लेता है, वैसे ही यह सक्ष्मी भी मनुष्यों की इन्द्रियों को मोह लेती है। जिस प्रकार घूम-रेखा से बाच्छादित होने पर चित्र दूषित हो जाते हैं, उसी प्रकार इस लक्ष्मी के दुष्प्रभाव से सज्जनों के चरित कलंकित हो जाते हैं। जिस प्रकार मुलायम बिछावन गाढ़ निद्रा की सहायिका है उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी मोह की साधिका है। जिस प्रकार जर्जर बलभी राक्षसियों का निवासस्थान कहा जाता है, उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी सम्पदाओं के घमण्ड का आगार है। जिस प्रकार 'तिमिर' नाम का रोग विशेष दर्शनशक्ति का संहारक है उसी प्रकार लक्ष्मी भी वेद-स्मृति अदि शास्त्रमर्यादा की निरोधक है।
पुरःपताका सर्वाविनयानाम् । उत्पत्तिनिम्नगा क्रोधावेगग्राहाणाम्। आपानभूमिः विषयमधूनाम् । संगीतशाला भ्रूविकारनाटधानाम् ।
आवासदी दोषाशीविषाणाम्।
अन्वयः- (इयं हि) सर्वाविनयानाम् पुरः पताका (अस्ति)। क्रोधावेग ग्राहाणाम् उत्पत्तिनिम्नगा (अस्ति। विषयमधूनाम् आपानभूमिः (अस्ति)। ब्रूविकारनाटधानां संगीतशाला (अस्ति। दोषाशीविषाणाम् अवासदरी ( अस्ति ) ।
शब्दार्यः- (इयं हि - यह लक्ष्मी) सर्वाविनयानाम् = सभी प्रकार की उच्छृङ्खलताओं के । पुरःपताका आगे (आगे) फहराने वाला झण्डा (है)। क्रोधा वेगग्राहाणाम् - क्रोध के आवेशरूपी घड़ियालों का । उत्पत्तिनिम्नगा
अलकारः- यहाँ 'पुरः' से 'विषाणाम्' तक रूपक अलङ्कार है।
'उत्तमा "मालती' व्याश्योपेतः
४७जन्म देनेवाली उपजीव्य) नदी है)। विषयमधूनाम् रूपी मदिरा का आपानभूमिः मधुशाला या पानगोष्ठी केन्द्र (1)। विकारनाटयानाम् भौहों के परिवर्तनरूवी अभिनय का । रुप की आवासदरी रहने की गुफा है। अस्ति गान गृह या संगीत सदन है। दोषाशीविषाणाम्
समासः सर्वच ते अविनयाः, तेर्षा सर्वाविनयानाम्। निम्नं गच्छति निम्नगा नदी), उत्पत्तेः निम्नगा इति उत्पत्तिनिम्नगा । क्रोधस्य विषयमधूनाम्। वोः विकाराः इति प्रविकाराः, ते एव नाटधानि तेषां बाया, ते एवं ग्राहाः, तेषां क्रोधावेगग्राहाणाम् । विषया एवं मधुनि, तेषां रिकारवाटधानाम् । आशी: दंष्ट्रा), तस्यां विषं येर्पा ते आशीविषाः (= दोषा एवं आशीविषाः तेषां दोषाशीविषाणाम् ।
सरलार्थः यथा अग्रगामी ध्वजः अनुगामिनां रथादीनां सूचकः तथैवेयं हामीः अपि सकलानां दुराचाराणां संकेतिका । यथा नदी ग्राहादिजलजन्तूनां इनरभूमिः तथैवेयं लक्ष्मीः अपि क्रोधादिदोषाणां जन्मस्थानम् । यथा मदिरा-कथाः मद्यानां पानगृहं तथैवेयमपि वनितादिभोग्यवस्तूनां केलिभवनम् । यथा संशीतादिकलामन्दिरं ध्रुकुटधाद्यगानों कलात्मकप्रशिक्षणस्य केन्द्रं तथैवेयमपि धूमङ्ग्यकोपादिजनितोत्यानपतनादीनाम् उत्पत्तिस्थानम् । यथा कन्दरा भुजङ्ग-शानां भवनं तथैवेयं लक्ष्मीः अपि कामादिदोषाणां निकेतनम् ।
अनुवादः- जिस प्रकार आगे-आगे फहराते चलने वाले झण्डे अपने पीछे-पीछे आने वाले रथ आदि वस्तुओं का संकेत करते हैं, उसी प्रकार यह सडमी भी दुराचरण आदि कुकृत्यों की संकेतिका है, जैसे, नदियाँ घडियाल बादि जलजन्तुओं की उत्पत्तिस्थान हैं वैसे ही यह लक्ष्मी भी कोप की परं-परा की स्रोत है। जिस प्रकार मदिरालय मद्यपान का अड्डा है। उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी इन्द्रियों के वनितादि भोग्यपदार्थों का केलि-भवन है। जिस तरह संगीतशाला भौंहों के अभिनय का शिक्षण केन्द्र है, उसी तरह यह सड़मी भी धनहीनों के प्रति धनाभिमानियों की त्योरी चढ़ाने वाली है। दिस प्रकार गुफाएँ साँपों के रहते की जगह है, उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी कामावि दोषों का निवासस्थान है ।
YC
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
उत्सारणवेत्रलता सत्पुरुषव्यवहाराणाम्। 'अकालप्रावृट् गुणकल-हंसकानाम् । 'विसर्पणभूमिर्लोकापवादविस्फोटकानाम्।
अन्वयः इयं सत्पुरुषव्यवहाराणाम् (कृते) उत्सारणवेत्रलता गुणकलहंसकानाम् ( कृते) अकालप्रावृट् । लोकापवादविस्फोटकानाम् । (कृते) विसर्पणभूमिः ।
१. यदि पूस, माघ, फागुन और चैत्र में वर्षा हो तो वह 'अकालवर्षा' कहलाती है। देखिये :-
'यदि मास्सु चतुर्ष पौषमासादिषु वृष्टिहि भवेदकालवृष्टिः ।
पशुमत्येपदाङ्किता न यावद्वसुधा स्यान्नहि तावदत्र दोषः ।।' - मुहूर्तचिन्तामणि, यात्राप्रकरण, श्लोक-९८
सामान्यतः वर्षा ऋतु के आने पर हंस इधर के जलाशयों को छोड़ कर मानसरोबर चले जाते हैं। इसके अतिरिक्त अकाल में (असमय में) भी यदि जमकर पानी बरसता है तो हंसों को सामयिक वर्षाऋतु का ही भ्रम हो जाता है। फलतः इस भ्रम के कारण, इधर के जलाशयों से वे फिर गायब हो जाते है और उत्तरापथ की ओर चले जाते हैं।
अलंकारः- 'उत्सोरण' से 'विस्फोटकानाम्' तक रूपक अलंकार है।
२-३. विसर्प और विस्फोटक महाभयंकर रोग है। चरक ने कुष्ठाध्याय में इनका वर्णन किया है। वैद्यक में खुजली और दद्द्रु से लेकर अतिकष्टप्रद 'काकणक कुष्ठ' तक को चर्मरोग ही कहा गया है। यह क्यों, कैसे और कहाँ होता है :-
'अग्निवेश' ने 'आत्रेय' ऋषि से प्राणियों के शरीर में सर्पविष के समान शरीर के एक देश से दूसरे देश तक फैलने वाले दारुण विसर्प रोग के विषय में पूछा-
'भगवन् ! दारुणं रोगमाशीविषविषोपमम् विसर्पन्तं शरीरेषु देहिनामुपलक्षते ॥'
- चरक, अध्याय २१, श्लोक ५
उन्होंने सविस्तार बताया कि-
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
४९
शब्दार्थः- (यह लक्ष्मी) सत्पुरुषव्यवहाराणाम् = शिष्टजनों के आचरणों को (के लिये)। उत्सारण वेत्रलता - भगानेवाली बेंत की छड़ी (है)। गुणकलहंसकानाम् - गुणरूपी हंसों को (के लिये)। अकालप्रावृट् - असा-मयिक वर्षा (है)। लोकापवादविस्फोटकानाम् = लोकनिन्दारूपी भयंकर फोड़ों का (के लिये)। विसर्पभूमिः फैलने का स्थान (है)।
समासः- वेत्रस्य लता इति वेत्रलता; उत्सारणाय वेत्रलता इति उत्सा-रणबेत्रलता । सन्तश्च ते पुरुषाः इति सत्पुरुपाः, तेषां व्यवहाराः, तेर्पा सत्पुरुष -व्यवहाराणाम् । अकाले प्रावृट् इति अकालप्रावृट् । गुणाः एव कलहंसकाः तेषामु गुणकलहंसकानाम् । विसर्पणस्य भूमिः इति विसर्पणभूमिः । लोकेषु अपवादाः, ते एव विस्फोटकाः, तेषाम् लोकापवादविस्फोटकानाम् ।
विसर्प-
'विविधं सर्पति यतो विसर्पस्तेन स स्मृतः ।
परिसर्पोऽथवा नाम्ना संर्वतः परिसर्पणात् ।।' चरक २१।१०
विविध प्रकार से सर्पण करने से उसे विसर्प कहते हैं और चारों ओर दोनों नामों से यह भी ज्ञात फैलता है और कभी-कभी रोग के ऊपर, नीचे, तिर्यक् सर्पण करने से उसे परिसर्प भी कहते हैं। इन होता है कि यह रोग कभी-कभी दो ओर ही चारों ओर फैलता है। अथवा 'विविध' कहने से गति ये तथा शोथ और विस्फोटक आदि के साथ फैलने का भी ग्रहण है।
कारण- दूषित आहार विहार, पापाचरण आदि-आदि :-'मिथ्याहारविहारेण विशेषेण विरोधिना । पाप्मभिः कर्मभिः सद्यः प्राक्तनेः प्रेरिताः मलाः।।'
सहायक कारण-रक्त, लसीका, त्वचा, और मांस ये चार दृष्य और वात, पित्त, कफ ये तीन मूलभूत दोष मिलकर सात धातु विसर्पों की उत्पत्ति में सहायक कारण होते हैं।
प्रकार-यह वातिक पैत्तिक, कफज और सान्निपातिक ये चार और बात, पित्त से उत्पन्न आग्नेय विसर्प कफ वात से ग्रन्थिविसर्प और पित्त-कफ से घोर कर्दमक नाम के तीन विसर्प मिलकर सात प्रकार के विसर्प होते है :-
'स च सप्तविधो दोविज्ञेयः सप्तधातुकः ।'
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
५० सरलार्थः यथा द्वाःस्थानाम् वेतसयष्टिः जनान उत्सारयति तथैवेयमवि हंसा उत्सारयति तथैवेयम् लक्ष्मीः दयादानादिगुणान् अपसारयति । यथा शिष्टजनानाम् आचारान अपसारयति । यथा असामयिकः वर्षासमयः कल
स्वरूप बातिक विसर्प रोग में जहाँ पर यह रोग फैलता है वह देश श्याम और अरुण आभा वाला होता है, शोथ होता है। यह देश व्यथा शुल आयास, संकोच और स्फुरण इनमे अत्यधिक पीड़ित होता है।
विस्फोट- यदि इस विसर्प की चिकित्सा न की जाय तो ये ही क्रमशः बढ़ते-बढ़ते उस आक्रान्त देश में पतले अरुण और श्याम आभावाले एवं शीघ्र फूट जाने बाले स्फोट (फोड़े) हो जाते हैं। इन फोड़ों में से पतला, विषम, दारुण और अल्प-अल्प स्राव चलता है। इसी प्रकार -
पैत्तिक विसर्प - में जिस स्थान पर विसर्प फैलता है वह स्थान ताँबे का सा लाल, हरा, नीले वर्ण का अत्यन्त लाल हो जाता है। ऊँचे उठे हुए, दाह और भेदन सदृश पीड़ा से युक्त फोड़े से यह स्थान अधिक आक्रान्त हो जाता है। जिस वर्ण के फोड़े होते हैं उसी वर्ण का स्राव होता है। ये पक जाते हैं।
कर्दम विसर्प- जहाँ होता है वहाँ पर फोड़े हो का मांस सड़ जाता है। इसमें स्राव नहीं होता है। जाता है। यदि अंगुली से दबाया जाय तो कीचड़ की जाते हैं। इसमें रोगी छूने से ही विदीर्ण हो तरह दब जाता है।
इन्हीं फोड़ों को 'विस्फोट' और उसके फैलने को 'विसर्प' या 'विसर्पण'
कहते हैं।
विसर्पण भूमि - विस्फोट की विसर्पण भूमि त्वचा ही है। किन्हीं भी कारणों से संजात यह रोग त्वगाश्रित ही फैलता है। शरीर की सात त्वचाएँ होती हैं। ये ही उसका स्थान विसर्पणभूमि है :-
'बातश्लेष्मोद्भवा श्लेष्मपित्तादृदुशतारुणी ।
पुण्डरीकं सविस्फोटं पामाचर्मदले तथा ।।'
निष्कर्ष - जैसे त्वचा पर ही फोड़े चारों ओर फैलते हैं। वैसे ही त्वचारूपी लक्ष्मी के आश्रित ही विस्फोट रूपी लोकापवाद विसर्पण करता है (फैलता है)।
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
५१
त्वक् वृहद्मणानां विस्तारभूमिः तथैवेयम् लक्ष्मीः अपि लोकप्रवादानाम् प्रसार-মুমিः।
अनुवादः- जिस प्रकार द्वारपालों के वेंत का डडा लोगों को तितर-बितर कर देता है, उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी शिष्टजनों के आचरणों को दूर भगा देती है। जिस प्रकार असामयिक वर्षा-समय (वर्षाऋतु) कलहंसों को दूर भगा देता है उसी प्रकार लक्ष्मी के आने पर दयादानादि गुण गायब हो जाते हैं। जिस तरह त्वचा फोड़े आदि चर्मरोगों के फैलने का आधार है उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी लोकनिन्दा को फैलाने की आधारभूमि है ।
'प्रस्तावना कपटनाटकस्य । कदलिका कामकरिणः । वध्यशाला साधुभावस्य । राहुजिह्वा धर्मेन्दुमण्डलस्य ।
अन्वयः- (इयं) कपटनाटकस्य प्रस्तावना (अस्ति)। कामकरिणः कदलिका (अस्ति)। साधुभावस्य वध्यशाला (अस्ति)। धर्मेन्दुमण्डलस्य राहुजिह्वा (अस्ति ) ।
शब्दार्थः (इयं) कपटनाटकस्य (यह लक्ष्मी) कपटरूपी नाटक का प्रस्तावना = आमुख है। कामकरिणः कामदेव रूपी गजराज का । कदलिका - केले का बगीचा है। साधुभावस्य सुजनता का (को)। वध्य-शाला (अस्ति) = बध करने का स्थान (है)। धर्मेन्दुमण्डलस्य = धर्मरूपी-चन्द्रमण्डल का (के लिये)। राहुजिह्वा = राहु की जीभ है।
१. नाटक में जहाँ सूत्रधार नटी, मार्ष (पारिपाश्विक ) या विदूषक के साथ बात करते हुए विचित्र उक्ति के द्वारा कथावस्तु का संकेत कर अपने कार्य का वर्णन करता है, उसे 'प्रस्तावना' कहते हैं। इस प्रस्तावना के कथोद्घात, प्रवृत्तक और प्रयोगातिशय ये तीन भेद होते हैं:-
'सूत्रधारो नटीं ब्रूते मार्ष वाथ विदूषकम् ।
स्वकार्य प्रस्तुताक्षेपिचित्रोक्त्या यत्तदामुखम् ।।
प्रस्तावना वा तत्र स्युः कथोद्घातः प्रवृत्तकम् ।
प्रयोगातिशयश्चाथ वीथ्यंगानि त्रयोदश ।।
- दशरूपक, प्रकार- ३, श्लोक ७,८ ।
अलंकारः- यहाँ 'प्रस्तावना' से 'मण्डलस्य' तक रूपक अलंकार है।
५२
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
समासः कपटम् एव नाटकम् इति कपटनाटकम् । तस्य कपटनाटकस्य । काम एव करी, तस्य कामकरिणः । इन्दोः मण्डलम् इति इन्दुमण्डलम् धर्म एव इन्दुमण्डलम् इति धर्मेन्दुमण्डलम् तस्य धर्मेन्दुमण्डलस्य ।
सरलार्थः यथा नाटक प्रस्तावनया प्रारभ्यते तथैव कूटव्यवहारोऽवि लक्ष्म्यानमा उपस्थाप्यते । यथा करीन्द्रः कदलीकानने स्वरं विहरति तथैव कामदेवोऽपि सत्यां लक्ष्म्यां स्वेच्छं विलसति । यथा वध्यभूमिः हन्यमानान् जन्तून गतासुन कुरुते तथैवेयमपि सौजन्यं हिनस्ति । यथा राहोः रसनया रजनिपतिले लिह्यते तथानयापि धर्मो ग्रस्यते ।
अनुबादः- जिस प्रकार सूत्रधारादिप्रवेशात्मक प्रस्तावना से नाटक का प्रारम्भ होता है, उसी प्रकार लक्ष्मी से छलनाओं का श्रीगणेश होता है। जिस प्रकार मत्त गजेन्द्र केले के वन में विहार करते हैं उसी प्रकार कामदेव जिस प्रकार बध्यशाला प्राणियों को लक्ष्मी भी रसना से भी लक्ष्मी की छाया में ही पलता है। मौत के घाट उतार देती है उसी प्रकार समाप्त कर देती है। जिस प्रकार राहु की है, उसी प्रकार लक्ष्मी भी धर्म को निगल जाती है। मनुष्य के सौजन्य को राकेश ग्रस्त हो जाता
नहि तं पश्यामि । यो ह्यपरिचितयानया न निर्भरमुपग्गूढ़ः, यो वा न विप्रलब्धः । (यतो हि) नियतमियमालेख्यगतापि चलति । 'पुस्त-मय्यपि इन्द्रजालमाचरति । उत्कीर्णापि विप्रलभते श्रुतापि अभि-सन्धत्ते । चिन्तितापि वञ्चयति ।
अन्वयः- तं नहि पश्यामि, यो हि अनया अपरिचिंतया निर्भरं (यथा
१. मिट्टी, लकड़ी, वस्त्र, चर्म अथवा लोहरत्न की बनी हुई स्त्री-मूर्ति पुतली या गुड़िया को 'पुस्त' कहते हैं ('पुस्त' की मूर्ति वाली को पुस्तमयी कहेंगे )-
मृदा वा दारुणा वाथ वस्त्रेणाप्यथ चर्मणा ।
लोलरत्नैः कृतं वापि पुस्तमित्यभिधीयते ।।'
- रामाश्रमी टीका- अमरकोष
'पुस्त' स्त्री हस्तनियंत्... वाग्भट ।
'पुस्तं लेप्यादिकर्मणि' अमरकोष ।
अलकारः- यहाँ 'नहि तं' से 'वञ्चयति' तक विरोधाभास अलङ्कार है।
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
५३
स्यात्तथा) न उपगुकः, वा यः न विप्रलब्धः । यतो हि) आलेल्यगता अपि इयम् नियतम् चलति । पुस्तमयी अपि (इयम्) इन्द्रजालम् आचरति । उत्कीर्णा अपि (इयम्) विप्रलभते। श्रुता अपि अभिसन्धत्ते चिन्तिता अपि ( इयम्) वञ्चयति ।
शब्दार्थः- नहि तं पश्यामि ऐसे (किसी व्यक्ति को नहीं देखता हूँ। यो हि-जो कि। अनया अपरिचितया परिचय नहीं रखनेवाली (कृतघ्न) इस (लक्ष्मी) के द्वारा। निर्भरं न उपगूढः = कस कर आलिंगित न हुआ हो। वा = अथवा । यः जो कि। न विप्रलब्धः = नहीं ठगा गया हो। आलेख्यगता अपि इयम् - चित्र में लिखित होने पर भी यह। नियतम् -निश्चितरूप से । चलति = चल देती है। पुस्तमयी अपि (इयम् (= मिट्टी या लकड़ी की) गुड़िया बनी रहने पर भी ( यह लक्ष्मी) । इन्द्रजालम् बाचरति - जादू का खेल दिखलाती है। उत्कीर्णा अपि = पत्थर में खुदी हुई भी (यह लक्ष्मी)। विप्रलभते धोखा दे देती है। श्रुतापि सुनी हुई भी (सुनाई दे जाने पर भी यह लक्ष्मी)। अभिसन्धत्ते छल करती है। चिन्तिता अपि (इयम्) = ध्यान की जाने पर भी (यह)। वञ्चयति = ठगती है।
समासः- स्पष्टम् ।
सरलार्थः- अज्ञातयाप्यनथा सुदृढमनाश्लिष्टोऽवञ्चितो वा न कश्चन सज्जनः दरीदृश्यते । चित्रलिखितापि पलायते । मृष्काष्ठादिनिर्मिता पुत्तलि-कारूपापि मायाजालमातनोति । उत्कीरितापि वंचयति । आकणितापि संशय-मुत्पादयति प्राप्त्याशया ध्यानपथमानीतापि विप्रलभते ।
(चञ्चलेयम् लक्ष्मीः कपटव्यवहारादिना सर्वथा वश्वयत्येव लोकान् इति भावः) ।
अनुवादः- ऐसा कोई भी नौजवान नहीं होगा जिसने बिना जान-पहचान की मेहमान बनने वाली इस मायाविनी लक्ष्मी के द्वारा दृढ़ता से आलिगित होकर धोखा न खाया हो। क्योंकि निश्चय ही यह लक्ष्मी चित्रलिखित होने पर भी चल देने वाली है। मिट्टी और लकड़ी आदि की गुड़िया बनी हुई भी यह जादू का खेल दिखाने वाली है। पत्थर में खुदी हुई भी धोखा दे देने वाली है। सुनी हुई भी यह छलनेवाली है। प्राप्त होने की आज्ञा से ध्यान की हुई भी ठगती है।
५४
एवंविधयापि चानया दुराचारया कथमपि दैववशेन परिगृहीताः शिवन्त राजानः सविनयाधिष्ठानताञ्च गच्छन्ति । तया हि-
अभिषेकसमय एवैषां मङ्गलकलशजलैरिव प्रक्षाल्यते दाक्षिण्यम्, 'अग्निकार्यधुमेनेव मलिनीकियते हृदयम् पुरोहितकुशाग्र-सम्मार्जनी-भिरिवापनीयते शान्तिः, उपकोषपट्टबन्नेवावच्छायते जरागमनस्म-रणम, आतपत्रमण्हलेनैवापवार्यते परलोकदर्शनम, चामरपवनैरिवाप-हियते सत्यवादिता, बेश्दरोत्सान्ते गुणाः जयशब्दकलकलै-रिव तिरस्क्रियन्ते साधुवादाः, ध्वजपटपस्लवैरिव परामृश्यते यशः ।
एरिया यदि अनया दुराचारया कथमपि दैववशेन परिता राकार विस्वसविनयाधिष्ठानतां गच्छन्ति । तथा हि-
भए मकताः एषां दाक्षिण्यं प्रक्षाल्यते इव, अग्नि-कार्यमेन (एषाम्) हृदयं मलिनीक्रियते इव, पुरोहितकुशाग्रसम्मार्जनीभिः (एयाम्) शान्तिः अपनीयते इव उष्णीषपट्टबन्धेन (एषाम्) जरागमन-स्मरच्यते इव, आतपत्रमण्डलेन (एषाम्) परलोकदर्शनम् अपवार्यते हय, चामरपवनैः (एषाम्) सत्यवादिता अपहियते इव, वेत्रदण्डैः (एषाम् ) गुणाः उत्साम्यंन्ते इय, जयशब्दकलकलः (एषाम्) साधुवादाः तिरस्क्रियन्ते इस, ध्वजपटयलयैः (एषाम्) यशः परामृश्यते इव ।
शब्दार्थःच और। एवंविधया अपि अनया दुराचारया- इस प्रकार से भी इस दुराचारिणी (लक्ष्मी) के द्वारा। कथमपि किसी प्रकार । विवशेन संयोग से। परिगृहीताः राजानः वरण किये गये राजा लोग ।
१. प्रत्येक शुभ कार्य क प्रारम्भ में हवन होता है। पलाश आदि को समिधाओं में अग्नि जलाकर मन्त्रोच्चारण-पूर्वक घी, तिल, तण्डुल और जौ आदि हवन सामग्रियों से हवन करने का नाम हीं अग्निकार्य है ।
अलंकारः- यहाँ पर 'अभिषेक' से 'परामृश्यते यज्ञः' तक क्रियोत्प्रेक्षा अहङ्कार है।
५५
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
विक्लवाः भवन्ति = विह्वल हो जाते हैं। च और । सर्वाविनयाधिष्ठानताम् गच्छन्ति सभी प्रकार के दुराचरणों के आश्रय बन जाते हैं। तथा हि-जैसे कि-
अभिषेकसमये एव - राज्याभिषेक के अवसर पर ही। मङ्गलकलशजलैः = मङ्गल-घट के जल से । एषां दाक्षिण्यं इन (राजाओं) की अनुकूलता । प्रक्षाल्यते इव मानो धो दी जाती है। अग्निकार्यधूमेन = राज्याभिषेक विधि के अंगभूत हवन-कर्म के धुएँ से। (एषां इन राजाओं का ) हृदयम् = अन्तःकरण । मलिनीक्रियते इव = मानो मलिन कर दिया जाता है। पुरोहित-कुशाग्रसम्मार्जनीभिः = पुरोहित की कुशाओं के अग्रभागरूपी झाडू से । (एषां = इन राजाओं का ) क्षान्तिः = क्षमागुण । अपनीयते इव = मानो दूर कर दिया जाता है।
उष्णीषपट्टबन्धेन = रेशमी पगड़ी के बाँधने से। (एषां = इन राजाओं को)। जरागमनस्मरणं = अपनी बुढ़ौती के आने की याद । अवच्छाद्यते इव = मानो ढाँक दी जाती है। आतपत्रमण्डलेन राजछत्र के घेरे से (एषां - इन राजाओं की)। परलोकदर्शनं दूसरे लोक का देखना। अपवार्यते इव मानो रोक दिया जाता है। चामरपवनैः चंवर की हवा से । (एषां इन राजाओं को)। सत्यवादिता = सच बोलने की आदत । अपह्रियते इव मानो दूर कर दी जाती है। वेत्रदण्डैः बेंत की छड़ी से। (एषां इन राजाओं के), गुणाः = दयादाक्षिण्यादि गुण । उत्सार्य्यन्ते इव मानो दूर हटा दिये जाते हैं। जयशब्दकलकलैः - जय-जयकार के शोरगुल से । (एषां इन राजाओं के, साधुवादाः = हितकारी वचन तिरस्क्रियन्ते इव मानो उपेक्षित कर दिये जाते हैं। ध्वजपटपल्लवैः = ध्वजदण्ड के वस्त्र के पल्ले से । (एषां इन राजाओं की)। यशः = कीति । परामृश्यते इव मानो पोंछ दी जाती है।
समासः- स्थाने इति अधिष्ठानम्, सर्वे च ते अविनयाः इति सर्वावि-नयाः, तेषां अधिष्ठानं, तस्य भावः सर्वाविनयाधिष्ठानता, ताम् सर्वाविन-याधिष्ठानताम् । मंगलार्थं कलशाः इति मंगलकलशाः, तेषां जलम्, तैः मंगलकलशजलैः । अग्निकार्यं ( होमादि), तस्य धूमः इति अग्निकार्यधूमः ।
१६
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
कुणानां अग्राणि इति कुशाग्राणि, पुरोहिताना कुशाग्राणि एव सम्मार्जन्यः, ताभिः पुरोहितकुशाग्रसम्मार्जनीभिः । उष्णीषस्य पट्टबन्धः तेन उष्णीषपट्ट-बन्धेन । जरायाः आगमनं जरागमनम्ः तस्य स्मरणं इति जगरागमनस्म-रणम् । आतपात् त्रायते इति आतपत्रम्, तस्य मण्डलम्, तेन आतपत्रमण्डलेन । जय एब शब्दः इति जयशब्दः, तस्य कलकलाः, तैः जयशब्दकलकलैः । ध्वजानां पटाः इति ध्वजपटाः, तेषां पल्लवैः इति ध्वजपटपल्लवैः ।
चञ्चल। यामस्यां लक्ष्म्यां कथं सरलार्थः- उपर्युक्तलक्षणलक्षितायां कथमपि प्राप्तायामपि राजानः विह्वलाः भवन्ति, सर्वविधदुराचारादीनामा-स्पदता च प्राप्नुवन्ति । एवमवगम्यते यत् राज्याभिषेककाले एवं मंगलघटानां जलानि भूभुजाम् आनुकूल्यं प्रक्षालयन्ति इव । अभिषेकाङ्गभूतात् हवनात् उत्थितः घूमः तेषां अन्तःकरणं कलुषीकरोति इव । पुरोधसां दर्भरूपाः अपसारयन्ति इव क्षमाभृताम् क्षमागुणम् । क्षौमवसनरचितं शिरोवेष्टनमा-वृणोतीव राज्ञा वृद्धावस्थागमनस्मृतिम् । राजच्छत्रस्य मण्डलेन लोकान्तर-दृष्टिनिवार्यते इव । व्यजनवायुभिरुद्धयते इव याथार्थ्यम् । वेतसयष्टिभिरपसा-र्यन्ते इव शौर्यादयो गुणाः । जयशब्दकोलाहलैस्तिरोभूयन्ते इव हितप्रदानि वचांसि । पताकावस्त्रोपान्तैः प्रोच्छयते इव कीतिः ।
अनुवादः- उपर्युक्त सभी दुर्गुणों से युक्त होने पर भी, लक्ष्मी भाग्यवश यदि किन्हीं किन्हीं राजाओं को स्वीकार भी करती है तो वे राजा विह्वल और पाप-परायण हो जाते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि राजगद्दी मिलने के अवसर पर ही मंगलकलश के जल से राजाओं की सारी उदारता मानो धो दी जाती है। अभिषेक के अंगभूत हवन-कर्म के धुएँ से उनका अन्तःकरण मानो मलिन कर दिया जाता है। पुरोहित के कुश की झाड़ से राजाओं का क्षमागुण बटोर कर मानो फेंक दिया जाता है। रेशमी वस्त्र की बनीं हुई पगड़ी का बन्धन ही उनकी वृद्धावस्था के आने की स्मृति को मानों ढंक देता है।
राज छत्र के घेरे से लोकान्तर का देखना मानो रोक दिया जाता है। पंखे की हवा से सच्चाई मानो दूर फेंक दी जाती है। बेंत की छड़ी से उनसे दयादाक्षिण्यादि गुण मानों हटा दिये जाते हैं। जय-जयकार के
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
५७
शोरगुल में भलाई की बातें मानो विलीन हो जाती हैं। ध्वजा छोर से फीति मानो पोंछ दी जाती है। के कपड़े के
केचित् श्रम-वश-शिथिल-शकुनि-गल-पुट-चपलाभिः खद्योतोन्मेष-मुहूर्त मनोहराभिर्मन स्विजन गहिताभिः सम्पद्भिः प्रलोभ्यमानाः, धन-लवलाभावलेपविस्मृतजन्मानोऽनेकदोषोपचितेन' दुष्टासृजेव रागा-बेणेन बाध्यमानाः, विविधविषयग्रासलालसैः पञ्चभिरप्यनेकसहस्र-संख्यैरिवेन्द्रियै रायास्यमानाः, प्रकृतिचञ्चलतया लब्धप्रसरेण एके-नापि सहस्रतामिवोपगतेन मनसा आकुलीक्रियमाणा विह्वलतामुप-यान्ति ।
अन्वयः- स्पष्टम् ।
शब्दार्थः- श्रमवशशिथिलशकुनिगलपुटचपलाभिः (दूर तक उड़ने के )
श्रम से थके हुए पक्षियों की (काँपती हुई) गर्दन के समान चञ्चल । खद्यो-तोन्मेषमुहूर्तमनोहराभिः - जुगनू के प्रकाश के समान क्षण भर के लिए चित्त को हरनेवाली । मनस्विजनहिताभिः ज्ञानी लोगों के द्वारा निन्दित । सम्पद्भिः सम्पत्तियों से। प्रलोभ्यमानाः लालची बनाये गये । धनलव-लाभावलेपविस्मृतजन्मानः थोड़े से भी धनः के पा जाने के घमंड से जन्म को भूल जाने वाले (अपने को अजर-अमर समझनेवाले)। अनेकदोषोपचितेन = 'त्रिदोष' के कारण बढ़े हुए। दुष्टासृजेव= दूषित रुधिर के समान। रागा-
अलंकारः- यहाँ 'श्रमवश' से 'प्रलोभ्यमानाः' तक लुप्तोपमा तथा पदार्थहेतुकाव्यलिग के परस्पर निरपेक्ष रहने के कारण संसृष्टि अलंकार है। 'धनलव' से 'बाध्यमानाः' तक पूर्णोपमालंकार है। 'विविध' से 'आयास्य-मानाः' तक गुणोत्प्रेक्षालंकार और 'प्रकृति' से 'उपयान्ति' तक क्रियोत्प्रेक्षा-लंकार है।
१. रक्त स्वतः कुपित नहीं होता। दोष कुपित होते हैं। इसी से रक्त कुपित होता है और दोषों की शान्ति से शान्त होता है :-
'यस्माद्रक्तं विना दोषैर्न कदाचित्प्रकुप्यति ।
तस्मात्तस्य यथादोषं कालं विद्यात्प्रकोपनम् ।।'
- शाङ्गधरसंहिता, श्लोक १२ ।
५८
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
वेशेन = विषयाभिलाष की उत्तेजना से। बाध्यमानाः सताये जानेवाले। विविध विषयग्रासलालसः अनेक प्रकार के विषयों के उपभोग की कामना वाले। पश्चभिरपि संख्या में पाँच रहने पर भी। अनेक सहस्रसंख्यैः इव कई हजार के समान मालूम पड़ने वाली। इन्द्रियैः इन्द्रियों से । आयास्य मानाः = (विविध प्रकार के) उद्योग में प्रेरित किए गए। प्रकृतिचश्वलतया = स्वाभाविक चञ्चलता के कारण। लब्धप्रसरेण एकेनापि सहस्रतामुपगतेन इव मनसा = मौका पा जाने वाले एक होते हुए भी मानो हजारों की संख्या-वाले मन के द्वारा आकुलीक्रियमाणाः बेचैन किये गए। केचित् = कुछ ( राजा लोग) । विह्वलतामुपयान्ति = छटपटाने लगते हैं।
समासः- श्रमवशेन शिथिलः शकुनीनां गलपुटः, तद्वत् चपलाभिः इति श्रमवशशिथिलशकुनीगलपुटचपलाभिः । मनांसि हरन्ति याः ताः मनोहाः, खद्योतानां उन्मेषवत् मुहूर्त मनोहराः, ताभिः खद्योतोन्मेष मुहूर्त मनोह राभिः । मनस्विनश्च ते जनाः इति मनस्विजनाः, तैः गहिताः ताभिः मन-स्विजनहिताभिः । धनलवस्य लाभः। तेन अवलेपः, तेन विस्मृतानि जन्मानि
रक्त के दूषित होने से पीड़ा, पाक, दाह, लाल चकत्ते, खुजली, शोथ, फोड़े, फुन्सी आदि समस्त शरीर या किसी अङ्गविशेष में रक्त के दूषित होने के स्थान तथा प्रमाणानुसार उत्पन्न होते हैं।-
'रक्ते दुष्टे वेदना स्यात्पाको दाहश्च जायते ।
रक्तमण्डलता कण्डूः शोथश्च पिटिकोद्गमः ।।' - शाङ्ग० सं०, अध्या० १२, श्लो० ५।
रक्त में कफ, वात, पित्त से दोष आते हैं। रक्त एक दोष, दो दोष या तीनों दोषों के दोष से दूषित हो सकता है।
दो दोषों से दूषित रक्त उपर्युक्त दोषों के लक्षणों से युक्त होता है, तथा त्रिदोषदुष्ट रक्त (अनेकदोषोपचितेन दुष्टासृजा = दूषित रक्त इव) उपर्युक्त तीनों दोषों के लक्षणों से युक्त तथा कांजी का-सा होता है :-
'द्विदोषदुष्टं संसृष्टं पूतिगन्धकम् । सर्वलक्षणसंयुक्तं काञ्जिकाभं च जायते ।।' - शाङ्ग० सं०, अध्या० १२, श्लो० ११।
५९
'उत्तमा "मालती' व्याश्योपेतः
ताले विस्मृतजन्मानः । अनेकैः दोषः उपचितेन इति अनेक-दोषोचिते । दुष्टेन असृजा इति दुष्टासृजा। विविधानां विषयांणां ग्रासेषु मासः इति विविश्वविषयग्रासलालसः । प्रकृत्या चचलम्, तस्य भावः, तया कृषिचतया । सम्धः प्रसरः येन तेन लब्धप्रसरेण ।
हरकार्थ ड्ररोडूयनेन परिश्रान्तपक्षिणां
ग्रीवाप्रदेशवञ्चञ्चलाभिः होताषभासद् अणं मनोहराभिः विद्वज्जनैः निन्दिताभिश्च विभूतिभिः विमुह्यमानाः अल्पेश्वर्यस्यापि प्रातिगवण स्मृतिपथापनीताः 'का में जननी को हातः कोऽहं सम्प्रति कुत आयातः' इत्याकारजन्मवृत्तान्ताः, कफ-पित्त-वात-विकृतिभिः, वृद्धि गतेन दूषितेन रुधिरेण इव कामादिदोषैः प्रवृद्धवनितादिविष-बाबुरामैः पौडद्यमानाः, पञ्चसंख्यकैरपि शब्दस्पर्शादिबहुविध रसलोलुपत्वात् अनेकसहस्रसंख्यकैरिव इन्द्रियैरजसं व्याप्रियमाणाः चापल्येन हेतुना लब्धाव-कायोग एकेनापि चित्तेन सहस्रसंख्यकत्वमुपगतेन इव व्यग्रीभूताः सन्तः केचन महाराजाः व्याकुलतामुपगच्छन्ति ।
अनुबाबः- दूर तक उड़ते रहने के परिश्रम से थके हुए पक्षियों के ग्रीवा-प्रदेश के समान चन्चल, जुगनू की रोशनी के समान क्षणमात्र के लिए चित्ता-कर्षक, अतएव विवेकशील पण्डितों के द्वारा तिरस्कृत समृद्धि से लालची बनाये गाये, थोड़े से भी धन के मिल जाने के अहंकार से जन्मकालीन वृत्तान्त को भूल जाने वाले, कफ-पित्त-वात के विकार से बढ़े हुए और इसलिये बिगड़े हुए शोणित के समान काम-क्रोध-लोभादि विकारों से पीड़ित होनेवाले, शब्द, स्पर्ण बादि अनेक विषयों के रसास्वादन की इच्छा के कारण पाँच होने पर भी हजारों इन्द्रियों से दिन-रात प्रयत्नों में लगे रहने वाले, स्वाभाविक बस्थिरता के कारण ही अबसर पा जाने वाले, अकेला होने पर भी हजारों के जैसे मन के द्वारा कुछ राजा लोग विकल हो जाते हैं।
ग्रहैरिव' गृह्यन्ते । भूतैरिवाभिभूयन्ते । मन्त्रैरिवावेश्यन्ते । सत्त्वैरिवावष्टभ्यन्ते । वायुनेव विडम्ब्यन्ते । पिशाचैरिव ग्रस्यन्ते ।
१. सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु ये नौ ग्रह होते हैं।
२. यों तो 'भूत' शब्द के 'प्राणी' 'पंचमहाभूत' आदि कई अर्थ होते हैं किन्तु यहाँ पर भूत का तात्सर्य देवयोनिविशेष है। अमरकोष में भूत का अर्थ देवयोनिविशेष है-'भूतोऽमी देवयोनयः' ।
६०
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
अन्वयः एते हि राजानः ग्रहैः गृह्यन्ते इव । भूतैरभिभूयन्ते इव । मन्त्रः आवेश्यन्ते इव । सत्त्वैः अवष्टभ्यन्ते इव । वायुना विडम्व्यन्ते इव । पिशाचैः गम्यन्ते इव ।
शब्दार्थः एते हि राजानः ये राजा लोग ग्रहैः शनेश्चर आदि ग्रहगणों से, गृह्यन्ते इव मानो गृहीत हो जाते हैं। भूतैः प्रेतों से। अभि-भूयन्ते इव = मानो आक्रान्त होते हैं। मन्त्रः = मन्त्रों से । आवेश्यन्ते इव मानो आविष्ट कर दिये जाते हैं। सत्त्वैः = हिंसक जन्तुओं से । अवष्टम्यन्ते इव = मानो हठात् पकड़ लिये जाते हैं। वायुना पवन के द्वारा। विडम्व्यन्ते इव = मानो चंचल बना दिये जाते हैं। पिचाचैः = पिशाचों के द्वारा । ग्रस्यन्ते इव - मानो पकड़ लिये जाते हैं।
समासः - स्पष्टम् ।
सरलार्थः- एते हि राजानः शनैश्वरादिग्रहैः गृहीता इव, प्रेतैः आक्रान्ता इव, तान्त्रिकाणां मन्त्रः आविष्टभूता इव । बलशालि हिसकजन्तुभिः बलादाकृष्य बाध्यमाना इव, प्रभञ्जनैः इतस्ततः विक्षिप्यमाणा इव, पिशाचेः गृह्यमाणा इव लक्ष्यन्ते ।
अनुवादः - ये राजे शनि-राहु आदि ग्रहगणों से मानो गृहीत हो जाते हैं। देवयोनि-विशेष भूत, प्रेत आदि से मानो आक्रान्त हो जाते हैं। तांत्रिकों के मंत्र से मानो भूताभिभूत हो जाते हैं। बलवान् हिसक प्राणियों से बरजोरी खींच कर मानो पकड़ लिये जाते हैं। वायु के वेग से मानो अव्यवस्थित कर दिये जाते हैं और पिशाचों से मानो निगृहीत हो जाते हैं।
मदनशरैर्मर्माहता इव मुखभंगसहस्राणि कुर्वते । धनोष्मणा पच्य-माना इव विचेष्टन्ते । गाढप्रहाराहता इव अंगानि न धारयन्ति ।
अन्वयः- ( एते हि राजानः) मदनशरैः मर्माहताः मुखभङ्गसहस्राणि कुर्वते इव । धनोष्मणा पच्यमानाः विचेष्टन्ते इव । गाढप्रहाराहताः अङ्गानि न धारयन्ति इव ।
शब्दार्थः - मदनशरैः = कामदेव के तीरों से । मर्माहताः = बुरी तरह
अलंकारः- यहाँ 'ग्रहैः' से 'ग्रस्यन्ते' तक क्रियोत्प्रेक्षा अलंकार है। यहाँ 'मदनशरैः' से लेकर 'न धारयन्ति' तक क्रियोत्प्रेक्षा अलंकार है।
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
६१
घायल हुए । मुखभंगसहस्राणि कुर्वते इव मातो हजारों प्रकार की मुल-भंगिमा प्रदशित करते हैं। धनोष्मणा ऐश्वर्य की गर्मी से। पच्यमानाः = तपाये जाते हुए । विनेष्टन्ते इव मानो विविध चेष्टाएँ करते हैं। गाड-प्रहाराहताः- (साठी आदि की गहरी चोट से बेहोश हुए। अङ्गानि न धारयन्ति इव - मानो अपने बङ्गों को स्वयं धारण नहीं करते हैं।
समासः मुखभंगानाम् सहस्राणि इति मुखभंगसहस्राणि । प्रहारेण आहता इति गाढप्रहाराहताः । गाडेन
सरलार्थः मन्मथबाणैः ताडितमर्मदेशाः ते राजानः आननविकृतिसह-स्राणि घटयन्ति इव । सम्पदुष्मणा पाकविषयीक्रियमाणाः ते विविधां चेष्टां कुर्वन्ति इव । लगुडादीनाम् तीव्राघातेन परिक्षताः सन्तः स्वकीयान्यपि हस्तपादादीनि स्वयमपि बोढुं न शक्नुवन्ति इव ।
अनुवादः कन्दर्प के बाणों से मर्मस्थान के छिद जाने के ही कारण ये प्रकार की मुखभंगिमा प्रदर्शित करते रहते हैं। तपकर मानो ये अनेक प्रकार की चेष्टाएँ करते सजा लोग मानो हजारों धनाभिमान की गर्मी से रहते हैं। लाठी आदि की गहरी चोट से बेहोश हो जाने के कारण मानो अपने बङ्गों का भार भी वहन नहीं कर पाते हैं।
ॐ कुलीरा इव तिर्य्यक् परिभ्रमन्ति । अधर्मभग्नगतयः 'पङ्गव इव परेण सञ्चार्य्यन्ते । मृषावाद-विष-विपाक-सञ्जात-मुखरोगा इवा-तिकृच्छे ण जल्पन्ति ।
१. यदि वायु कटि-प्रदेश में आश्रित होकर एक टाँग की कण्डरा में बाक्षेप (कर्महीनता या विचेष्टता) उत्पन्न कर देता है तो व्यक्ति खञ्ज पा लंगड़ा हो जाता है। किन्तु जिस अवस्था में यह दोनों टाँगों में बकर्मण्यता उत्पन्न करता है, तो उसे 'पङ्गु' कहते हैं-
'वायु कटयाश्रितः सक्थ्नः कण्डरामाक्षिपेद्यदि ।
खञ्जस्तदा भवेज्जन्तुः पङ्गुः सक्थ्नोर्द्वयोर्वधात् ।।
- माधवनिदान, वातव्याधिनिदान, श्लो. ५९ ।
२. कफ, पित्त, वायु इन तीनों दोषों के पृथक् पृथक् कुपित होने या दो के मिलकर या तीनों के एक साथ मिलकर कुपित होने से नाना प्रकार के
६२
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
अन्वयः- स्पष्टम् ।
शम्यार्थः- कुलीरा इव केकड़े के समान। तिर्यक् परिभ्रमन्ति = देखें-मेढ़े चलते हैं। अधर्मभग्नगतयः पाप के कारण गतिहीन । पङ्गवः इव लंगडों के समान । परेण सञ्चाम्यंन्ते दूसरों से संचालित होते हैं। मुषावाद-मुख रोग उत्पन्न हो जाते हैं। जैसे:- दन्तरोग, ओष्ठरोग, दन्तमूलरोग, जिल्ह्यारोग, कंठरोग, तालुरोग और सर्वमुखब्यापी रोग (मुख के इन सात स्थानों में इस रोग के होने से वे सात नाम पड़े हैं)।
कुद्धाः श्लेष्मोल्बणा दोषाः कुर्वन्त्यन्तर्मुखे गदान्'
- वाग्भट, उत्तर स्थान, अध्या० २१, श्लो० ३।
उपर्युक्त सभी रोगों में जिल्ह्वारोग और उससे भी अधिक सर्वमुखब्यापी रोग से बोलने में अत्यधिक कष्ट होता है। मुख के समग्र अन्तः प्रदेश को व्याप्त कर होनेवाले रोगों को महर्षियों ने ८ प्रकार के कहे हैं - वातिक-मुखपाक, पैत्तिक-मुखपांक, श्लेष्मिक-मुखपाक, रक्तज-मुखपाक, सन्निपातज-मुखपाक, पूत्यास्य, ऊध्वंगद और अर्बुद ।
मुखान्तःसम्भवा रोगा अष्टौ ख्याता महर्षिभिः । मुखपाको भवेद्वातात्पित्तात्तद्वत्कफादपि ।। रक्ताश्च सन्निपाताश्च पूत्यास्योर्ध्वगदावपि । अर्बुदं चेति मुखजाश्वतुःसप्ततिरामयाः ।।
- शाङ्गधरसंहिता, अध्याय ७, श्लो० १४० ।
इस तरह से मुख के रोगों की संख्या चौहत्तर है। ओष्ठरोग-११ + दन्तरोग-१० + दन्त मूलगतरोग-१३ जिल्ह्वा रोग-६ + तालुरोग - ८ +
गलरोग-१८ + एवं सर्वमुखगतरोग-८ = ७४ ।
'चतुःसप्ततिसंख्याका मुखरोगास्तथोदिताः ।
- शाङ्ग्ध र संहिता - अध्याय ७, श्लो० १२७।
अलंकारः- यहाँ 'कुलीराः' से 'परिभ्रमन्ति' तक पूर्णोपमाऽलंकार है। 'अधर्म' से 'संचार्य्यन्ते' तक पूर्णोपमा और पदार्थहेतु काव्यलिग का संकर अलंकार है। 'मृषावाद' से 'जल्पन्ति' तक में निरंगरूपक अलंकार से संकीर्ण क्रियोत्प्रेक्षाऽलंकार है।
'उत्तमा" मालती' व्याख्योपेतः
६३
विषयविपाकसंजातमुखरोगाः इव मिथ्याभाषण रूपी विष के उत्पन मुखरोग के रोगियों के समान । अतिकृच्छ्रेण बहुत अल्पन्ति = बोलते हैं। विकार से कष्ट से ।
समासः- अधर्मेण भग्ना गतिः येषां ते अधर्ममग्नगतयः। मृषावादाः एव विषाणि, तेषां विपाकेन सब्जातः मुखरोगः येषां ते मृषावादविषपाकर्स-जातमुखरोगाः ।
सरलार्थः यथा कर्कटाः वक्रीभूय गच्छन्ति तथैव राजानोऽपि सर्वेः सह कौटिल्यं व्यवहन्ति । यथा पापेन विनष्टगमनशक्तयः खञ्जाः बन्धुवर्गाणां हस्तालम्बना दिसाहाय्येन गमनं कुर्वन्ति, तथैव विधेयमार्गे दुष्कर्मणा नष्टप्रवृ-त्तयः सन्तः तेऽपि अन्यः सन्चाल्यन्ते । यथा विषविकारजनितेन मुखरोगेण हेतुना लोकाः महता कष्टेन निगदन्ति तथैव मिथ्याभाषणेन हेतुना राजानोऽपि कष्टेन बदन्ति ।
अनुवादः- जिस प्रकार केकड़े टेढ़े-मेढ़े चलते हैं उसी प्रकार राजा लोग भी सभी के साथ टेढ़ापन ही दिखलाते हैं। जिस प्रकार अधर्म के कारण चलने की शक्ति से शून्य लंगड़े दूसरों के सहारे चलते हैं उसी प्रकार अपने कुकर्म के कारण पथभ्रष्ट राजा लोग भी दूसरों के इशारे पर चलते हैं। जिस प्रकार 'निनावा' आदि मुख रोग के कारण लोग रुक-रुक कर अस्पष्ट बोलते है, उसी प्रकार राजा लोग भी झूठी होने के कारण अपनी बातों को सकु-चाते-सकुचाते कहते हैं।
'सप्तच्छदतरव इव कुसुम रजोविकारैरासन्नत्तिनां शिरःशूल-मत्पादयन्ति । आसन्नमृत्यव इव बन्धुजनमपि नाभिजानन्ति ।
१. सप्तपर्ण या सतौने या छतिवन के पत्ते सेमर के समान होते हैं और एक-एक डाली में सात-सात पत्ते लगते हैं। इसीलिए इसे सप्तच्छद या सप्तपर्ण कहा जाता है। देखिये- 'सप्तपर्णो विशालत्वक् शारदो विषमच्छदः, अमरकोष । सप्तपर्ण की गन्ध बड़ी उग्र होती है। उससे सिरदर्द पैदा होता है, बतएव इस पेड़ का घर के पास होना अच्छा नहीं समझा जाता। जैसा कि जायसी ने लिखा है-
६४
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
अन्वयः - स्पष्टम् ।
शब्दार्थः - सप्तच्छदतरव इव 'सप्तपर्ण' के वृक्षों के समान । कुसुमर-जोविकारैः = फूलों के पराग के द्वारा (पक्ष में नेत्ररोगरूपी रजोगुणजनित विकार से)। आसनवतिनां = समीप में रहने वालों के। शिरःशूलं = सिरदर्द (पक्ष में असन्तुष्टि) उत्पादयन्ति उत्पन्न कर देते हैं। आसन्न-मृत्यव इव = नजदीक मृत्यु वाले लोगों के समान । बन्धुजनमपि = अपने परि-जनों को भी । नाभिजानन्ति नहीं पहचानते ।
समासः - कुसुम रजसां - पुष्पपराणां विकारैः इति कुसुमरजोविकारैः, ( पक्ष में- कुसुमानि नेत्ररोगाः, तैः कुसुमरजोविकारैः) आसन्नः मृत्युः येषां ते आसन मृत्युवः ।
सरकार्थः - यथा सप्तपर्णद्रुमाः स्वपुष्पपरागविकृतिभिः शीर्षवेदनामुत्पाद्य समीपस्थान् जनान् व्यथयन्ति तथैव राजानोऽपि रजोगुणजनितनयनभंगीभिः समीपस्थायिनो लोकान् क्लेशयन्ति । यथा सद्यःसम्भावितप्राणवियोगाः जना स्वजनानपि बुद्धिविनाशात् न परिचिन्वन्ति, तथैव राजानोऽपि अहंकारात् आत्मीयजनं नापेक्षन्ते ।
अनुवादः- जिस प्रकार सप्तपर्ण के वृक्ष अपने पुष्पपराग से उत्पन्न विकार से निकटवर्ती लोगों' के सिर में दर्द पैदा कर देते हैं, उसी प्रकार राजागण भी अपने रजोगुण-जनित अवज्ञासूचक नेत्र-भंगिमा से पास में बैठने वालों को दुःखी कर देते हैं। कुछ ही क्षणों में काल-कवलित होने वाले के समान ही राजा भी अहंकार के कारण अपने बान्धवों को पहचान नहीं पाते हैं।
'जाकर छतिबनु बाहर छावा । सो उजार घर को रे बसाया ।।'
(पद्मावत ५९२।३)
वैद्यक के द्रव्यगुणविज्ञान में भी इसको तेज गन्धवाला बताया गया है।
इसके गुण - 'सप्तपर्णो व्रणश्लेष्मवात कुष्ठास्रजन्तुजित् । दीपनः श्वासगुल्मष्नः स्निग्धोष्णस्तुवरः सरः ॥ BSP FRE
अलंकारः - यहाँ 'सप्तच्छदतरव इव' से 'नाभिजानन्ति' तक पूर्णोपमाऽ-लङ्कार है।
'उत्तमा' 'मालती 'व्याश्योपेतः
६५
उत्कुपितलोचना' इव तेजस्विनो नेक्षन्ते । कालदष्टा इव महा-मन्त्रैरपि न प्रतिबुध्यन्ते । जातुषाभरणानीव सोष्माणं न सहन्ते ।
अन्वयः स्पष्टम् ।
शब्दार्थः उत्कुपितलोचना इव आंत आये हुए लोगों के समान । तेजस्विनः प्रतापी लोगों को (पक्ष में सूर्य आदि चमकीले पदार्थों को)। नेक्षन्ते नहीं देखते हैं। कालदष्टा इव भयंकर साँपों से हंसे हुए लोगों के समान । महामन्त्रैरपि विषवैद्यों के गरुड़-सम्बन्धी मन्त्रों से भी (पक्ष में-उचित्र मन्त्रणाओं से भी। न प्रतिबुध्यन्ते होश में नहीं आते (पक्ष में-नहीं समझते हैं)। जावुषाभरणानि इव - लाह से बने गहनों के समान । सोष्माणं तेजस्वी लोगों को (पक्ष में जलती हुई आग को)। न सहन्ते = बर्दाश्त नहीं करते हैं।
समासः-उत्कुपिते लोचने येषां ते उत्कुपितलोचनाः । कालेन दष्टाः इति कालदृष्टाः । जतुषा रचितानि इति जातुषाणि, तानि आभरणानि इति जातुषाभरणानि । ऊष्मणा सहितं सोष्माणम् ।
सरलार्थः - यथा नेत्रपीडापीडिताः जनाः सूर्यादिकं तैजस्विपदार्थ बीक्षितुं न शक्नुवन्ति, तथैव राजानोऽपि ईर्ष्यावशात् प्रतापवतः पुरुषान् नावलोकयन्ति । यथा भीषणभुजङ्गमेन कवलिता जना विषवैद्यानां गारुड-मन्त्रैरपि चैतन्यं नाप्नुवन्ति तथैव राजानोऽपि षाड्गुण्याद्युत्तममन्त्रणाभिरपि बुद्धिविपर्ययात् नानुजानन्ति विधेयादिकम् । यथा लाक्षानिमितभूषणानि उद्दीप्तमनलं विगलनवशात् न मृष्यन्ति तथैव राजानोऽपि ईर्ष्यावशात् तेजस्विनं पुरुषं न सहन्ते ।
१. 'अष्टांगहृदय' के उत्तरस्थान में, दृष्टिरोगविज्ञानीय १२वें अध्याय ( वाग्भट) में विशद विवेचनपूर्वक यह बताया गया है कि 'उत्कुपित-लोचन' बात-प्रधान होता है। इस अवस्था में चमकीले पदार्थों को देखने से नेत्र की ज्योति, दर्शनशक्ति त्रस्त ही नहीं, अपितु समाप्तप्राय हो जाती है :-
'भास्वरं भास्करादि वा वाताद्या नयनाश्रिताः ।
कुर्वन्ति तेजः संशोष्य दृष्टि मुषितदर्शनाम् ।।३१।। अलंकारः - 'उत्कुपित' से 'सहन्ते' तक पूर्णोपमाऽलंकार है ।
६६
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
अनुवादः जिस प्रकार आँख आ जाने से कोई व्यक्ति चमकते हुए सूर्य आदि को देख नहीं सकता, उसी प्रकार राजा भी डाह के कारण प्रतापी पुरुयों को देखने में सर्वथा असमर्थ हो जाते हैं। जिस प्रकार भयंकर सर्प के हँस लेने पर कोई व्यक्ति 'ओक्षा-गुणियों' के विष उतारने वाले मन्त्रों से भी होश में नहीं आता, उसी प्रकार राजा लोग भी मन्त्रियों की उचित और अनुकूल मन्त्रणाओं से भी बुद्धि के विपरीत हो जाने के कारण अपने कर्तव्यों को समझ नहीं पाते। जिस प्रकार लाह से बने हुए आभूषण गल जाने के कारण जलती हुई आग को बर्दाश्त नहीं कर पाते, उसी प्रकार राजा लोग भी ईर्ष्या के कारण तेजस्वी पुरुषों के तेज को नहीं सह सकते ।
दुष्टवारणा एव महामानस्तम्भनिश्चलीकृताः न गृह्णन्त्युपदेशम् । तृष्णाविषमूच्छिताः कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ति ।
अन्वयः - महामानस्तम्भनिश्चलीकृताः दुष्टवारणा इव उपदेशं न गृह्णन्ति । तृष्णाविषमूच्छिता सर्वं कनकमयमिव पश्यन्ति ।
शब्दार्थः - महामानस्तम्भनिश्चलीकृताः = अत्यधिक अहंकाररूप स्तब्धता से सत्-असत् के विवेक से शून्य किये गये (राजा लोग)। दुष्टवारणा इव = (बड़े परिमाण के खूंटे में दृढ़ता से बंधे हुए) मदोन्मत्त हाथियों के समान । उपदेशम् = हितैषियों के वचन को (पक्ष में - महावत के संकेत को)। न गृह्णन्ति = ग्रहण नहीं करते हैं। तृष्णाविषमूच्छिताः = धनलोलुपता के मद से मुग्ध (राजे)। सर्वम् = सभी को। कनकमयम् इव स्वर्णमय ही । पश्यन्ति = देखते हैं ।
समासः- महांश्चासौ मानः, तेन स्तम्भवत् निश्चलीकृताः इति महामान-स्तम्भनिश्चलीकृताः । (पक्ष में- महत् दीर्घ, मानं = प्रमाणं यस्य, स चासौ स्तम्भः = आलानस्तम्भः, तेन तद्वन्धनेन निश्चलीकृताः इति महामानस्तम्भ-निश्चलीकृताः) तृष्णा एव विषम्, तेन मूच्छिताः इति तृष्णाविषमूर्माच्छता ।
सरलार्थः यथा मदोन्मत्ताः गजाः दीर्घण आलानेन सन्नद्धाः सन्तोऽपि
अलंकारः- यहाँ 'दुष्टवारणा' से 'उपदेशम्' तक पूर्णोपमाऽलंकार है और 'तृष्णा' से 'पश्यन्ति' तक निरङ्गरूपक और गुणोत्प्रेक्षा के परस्पर अंगाङ्गिभाव से 'संकर' अलंकार है।
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
६७
हस्तिपकवचनं नावगणयन्ति तथैव महता अहंकारेण स्तब्धतां गताः सन्तः राजानः शिक्षावाक्यं नाङ्गीकुर्वन्ति । धनलिप्सायाः मदेन भ्रान्ताः भूमुजः सर्वं वस्तुजातं सुवर्णमयमिव सम्भावयन्ति ।
अनुवादः - जिस प्रकार मतवाला हाथी विशाल खम्भे में बाँध रखने पर भी पोलवान् की बातों को नहीं मानता, उसी प्रकार अत्यधिक अहंकार से निस्तब्ध राजे गुरुजनों के उपदेश पर ध्यान नहीं देते हैं। धन-प्राप्ति की लालसारूपी विष की मूर्च्छा से प्रत्येक पदार्थ को सुवर्णमय देखते हैं।
तीर इषव इव पानवद्धिततैक्ष्ण्याः परप्रेरिता विनाशयन्ति । दूरस्थि-तान्यपि फलानीव दण्डविक्षेपैर्महाकुलानि शातयन्ति ।
अन्वयः परप्रेरिताः पानवद्धिततैक्ष्ण्या इषवः इव विनाशयन्ति । दण्ड-विक्षेपैः दूरस्थितान्यपि महाकुलानि फलानि इव शाप्तयन्ति । नते हैं
शब्दार्थः - परिप्रेरिताः = धूर्तजनों से उकसाये गये (पक्ष में - धनुर्धारियों से चलाये गये)। पानवद्धिततैक्ष्ण्याः मदिरा-पान के कारण बढ़ी हुई क्रूरता बाले (राजा लोग) (पक्ष में शान चढ़ाये जाने के करण अधिक तेज धार वाले)। इषवः इव तीरों के समान । विनाशयन्ति नष्ट कर देते हैं। दण्डविक्षेपैः जुर्माना लगाकर (पक्ष में-डंडे को फेंक कर)। दूरस्थि-तानि अपि - सुदूर में रहने वाले भी। महाकुलानि उच्च कुलों को । फलानि इव = फलों के समान । शातयन्ति नष्ट कर देते हैं (पक्ष में-तोड़ डालते हैं)।
समासः- पानेन वद्धितं तैक्षण्यं येषां ते पानर्वाद्धततैक्ष्ण्याः ।
सरलार्थः- यथा प्रस्तरोपरि घर्षणेन तीक्ष्णतां गताः बाणाः धनुर्धारिभि-राक्षिप्ताः सन्तः लक्ष्यभूतान् गतासून् कुर्वते, तथैव मद्यपानेन प्रचण्डतरीभूताः भुवनपतयः वञ्चकानां दुष्प्रेरणाभिः प्रजादीन् पीडयन्ति । यथा सुदूरेऽपि विद्य-मानानि फलानि जना लगुडादिप्रक्षेपेण पातयन्ति तथैव सीमाबहिर्भूतान्यपि सम्भ्रान्तकुलानि करग्रहणादिभिः जर्जरीकुर्वन्ति राजानः ।
अनुवादः - शान चढ़ाये गये तीर, तीरन्दाजों से चलाये जाने पर जिस प्रकार अपने लक्ष्य को (निशाने को) धराशायी कर देते हैं, उसी
अलंकारः - यहाँ 'इषवः' से 'शातयन्ति' तक पूर्णोपमालंकार है ।
१८
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
प्रकार मद्यपान से उन्मत्त राजमण्डल धूतों की प्रेरणा से प्रजाओं को नष्ट कर देता है। जिस प्रकार वृक्षों पर लटकते हुए दूरवर्ती फलों को डण्डे फेंक कर लोग तोड़ डालते हैं। उसी प्रकार दूर में भी बसे हुए सम्भ्रान्त कुल को राजा लोग करग्रहणादि के द्वारा क्षीण कर देते हैं।
'अकालकुसुमप्रसवा इव मनोहराकृतयोऽपि लोकविनाशहेतवः । श्मशानाग्नय इवातिरौद्रभूतयः तैमिरिका इवादूरदर्शिनः ।
अन्वयः मनोहराकृतयोऽपि अकालकुसुमप्रसवा इव लोकविनाशहेतवः । श्मशानाग्नयः इव अतिरौद्रभूतयः । तैमिरिकाः इव अदूरदर्शिनः (भवन्ति इति दोषः)।
शब्दार्थः - मनोहरा कृतयोऽपि = मनमोहक रूप को लेकर भी । अकाल-कुसुमप्रसवा इव = पुष्पों के असामयिक विकास के समान । लोकविनाश-हेतवः - जनसंसहार के कारण हो जाते हैं। श्मशानाग्नयः इव श्मशान की आग के समान । अतिरौद्रभूतयः अत्यन्त भयावने भस्म वाले (पक्ष में-ऐश्वर्य वाले )। तैमिरिकाः इव नेत्र-रोगियों के समान (पक्ष में - तमो-गुण से अभिभूत होने वाले के समान)। अदूरदर्शिनः दूर की चीजों को न देखने वाले (पक्ष में सम्भावित दोष अथवा परलोक को नहीं देखने बाले) होते हैं।
समासः - कुसुमानां प्रसवः, अकाले कुसुमप्रसवाः इति अकालकुसुम-प्रसवाः मनोहरा आकृतिः येषां ते मनोहराकृतयः । लोकानां विनाशस्य हेतवः इति लोकविनाशहेतवः । अतिशयेन रौद्रा भूतिः येषां ते अतिरौद्रभूतयः ।
सरलार्थः - पुष्पाणाम् असामयिकानि प्रस्फुटनानि शोभनानि अपि यथा महोत्पातानां द्योतकानि भवन्ति, तथैव शोभनरूपा अपि भूपाः लोको-न्मूलनमूलाः भवन्ति । यथा परेतभूमिवह्नयः अन्येषां कृते भयोत्पादकभस्म-
१. यद्यपि फूल देखने में सुन्दर होते हैं किन्तु समय से पहले उनका खिलना लोकविनाश कारणं माना जाता है। देखिये-
'द्रुमौषधिविशेषाणामकाले कुसुमोदङ्गमः । फलप्रसवयोर्वेत्धं महोत्पातं विदुर्बधाः ।।'
अलंकारः - यहाँ पर 'अकाल' से 'दूरदर्शिनः' तक पूर्णोपमालंकार है।
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
६९
बत्तो भवन्ति तथैव भूमिपतयोऽपि प्रजानां कृते क्रूरैश्वर्यशालिनो भवन्ति । यथा 'तिमिराख्य नेत्ररोगाभिभूताः जनाः दूरवतिवस्तुविलोकनेऽसमर्थाः भवन्ति, तथैव तमोगुणबाहुल्येन अन्धीभूताः क्षितिपतयोऽपि सम्भावितदोषदर्शने परलोकदर्शने वाऽशक्ताः भवन्ति ।
अनुवादः - जिस प्रकार देखने में सुन्दर लगने पर भी असमय में फूलों का खिलना बड़े-बड़े उत्पातों का द्योतक है, उसी प्रकार राजाओं की आकृति सुन्दर होने पर भी प्रजा के विनाश का कारण होती है। जिस प्रकार तिमिर-रोग से पीड़ित लोग दूर की चीजों की नहीं देख सकते हैं, उसी प्रकार तमोगुण की प्रबलता से राजा भी अदूरदर्शी हो जाते हैं।
उपसृष्टा इव क्षुद्राधिष्ठितभवनाः, श्रूयमाणा अपि 'प्रेतपटहा इवोद्वेजयन्ति, चिन्त्यमाना अपि "महापातकाध्यवसाया इवोपद्रव-मुपजनयन्ति ।
अन्वयः उपसृष्टा इव क्षुद्राधिष्ठितभवनाः (भवन्ति ) । प्रेतपटहाः इव श्रूयमाणा अपि उद्देजयन्ति । महापातकाध्यवसाया इव चिन्त्यमाना अपि उपद्रवम् उपजनयन्ति ।
शब्दार्थः - उपसृष्टा इव - रति-संलग्न वेश्या के समान । क्षुद्राधिष्ठित-भवनाः = नीचपुरुषों से युक्त राजप्रसाद वाले (पक्ष में विट आदि से युक्त कोठे बाली)। प्रेतपटहाः इव मृतकों के समीप बजाये जाने वाले बाजे की भाँति । श्रूयमाणाः अपि सिर्फ सुनाई दे जाने से ही। उद्देजयन्ति =
१. कहीं-कहीं पर मृतकों के आगे ढोल, बाजे बजाते हुये उन्हें श्मशान तक ले जाने की प्रथा है। उसी अवसर पर बजाये जाने वाले बाजे को 'प्रेतपटह' कहते हैं ।
२. शास्त्र में ब्रह्महत्या, मद्यसेवन, चोरी, गुरुपत्नी के साथ समागम और इनको करने वालों से संसर्ग-ये पाँच महापातक कहे गये हैं-
'ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः । महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्वापि तैः सह ।।'
- मनु०, अ० ११, श्लो० ५४ ।
अलंकारः- यहाँ 'उपसृष्टा' से 'उपजनयन्ति' तक पर्णोपमा अलंकार है।
७०
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
के प्रयास के समान चिन्त्यमानाः अपि विचार मात्र में लाये जाने पर उद्विग्न कर देते हैं। महापातकाध्यवसाया इव ब्रह्महत्या आदि महापातकों भी। उपद्रवम् उपजनयन्ति = चित्त को अशान्त बना देते हैं।
समासः क्षुद्रः नीचैः पक्षे विटैः) अधिष्ठितं भवनं येषां (पक्षे-यासाम् ताः) ते क्षुद्राधिष्ठितभवनाः । महर्ता पातकानाम् अध्यवसायाः इति महापातकाध्यवसायाः ।
सरलार्थः यथा वेश्यानां भवनं विटादिभिरापूरितं भवति तथैव राज्ञां प्रासादोऽपि नीचजनैराच्छादितो भवति । यथा शवानां पुरस्तात् वाद्यमानाः पटहादयः अन्येषां कर्णगोचरीभूताः अपि भयमुत्पादयन्ति तथैव प्रजानां श्रव-णपचगताः अपि राजानः उद्वेगं जनयन्ति । यथा स्त्रीगवादीनां हत्याभि-प्रायाः चेतसि स्मर्यमाणाः अपि अशान्ति निष्पादयन्ति तथैव राजानः ध्यान-पथमानीताः अपि भयमुत्पादयन्ति ।
अनुवादः - जिस प्रकार वेश्याओं के घर विट आदि से भरे रहते हैं, उसी प्रकार राजाओं के महल भी नीच पुरुषों से परिव्याप्त रहते हैं। जिस प्रकार मृतकों के आगे बजाये जाने वाले बाजे की आवाज सुनकर ही लोग हर जाते हैं उसी प्रकार कान में पड़ने बाले राजाओं के नाम से भी लोग भय खाते हैं। जिस तरह स्त्रीहत्या आदि महापातकों के विचार भी लोगों के हृदय में अशान्ति उत्पन्न कर देते हैं उसी प्रकार राजाओं का स्मरण भी लोगों का दिल दहला देता है।
अनुदिवसमापूर्यमाणाः पापेनेवाध्मातमूर्तयो भवन्ति, तदवस्थाश्व 'व्यसनश्तशरव्यतामुपगताः वल्मीकतृणाग्रावस्थिताः जलबिन्दवः इव पतितमप्यात्मानं नावगच्छन्ति ।
अलंकारः - यहाँ 'अनुदिवसम्' से 'भवन्ति' तक क्रियोत्प्रेक्षा है और 'तदवस्थां' से 'नावगच्छन्ति' तक उपमाऽलंकार है ।
१. मनुस्मृति में काम और क्रोध से उत्पन्न व्यसन बतलाये गये हैं। काम से उत्पन्न व्यसन ये हैं- शिकार खेलना, जुआ खेलना, दिन को सोना, दूसरों की निन्दा करना, स्त्री-संभोग, मदिरापान से उत्पन्न विकार, नृत्य-गीत-वाद्य आदि में आसक्ति बेकार घमना ।
'उत्तमा" मालती' व्यास्योपेतः
७१
अन्वयः अनुवदिवसं पापेन आपूर्यमाणाः आध्मातमूर्तयो भवन्ति इव, शामीकतृणाग्रावस्थिताः जलबिन्दवः इव व्यसनशतशरव्यतामुपगताः तदवस्थाः (राजानः) पतितमपि आत्मानं न अवगच्छन्ति ।
शब्दार्थः अनुदिवसम् = प्रतिदिन। पापेन अधर्म से । आपूर्यमाणाः -
परिपूरित होते हुए । आध्मातमूर्तयः भवन्ति इव मानो फूल जाते हैं (तोंद निकल आती है)। वल्मीकतृणाग्रावस्थिताः = दीमक के ऊपरी हिस्से की घासों पर गिरी हुई। जलबिन्दवः इव जल की बूंदों के समान। पतितमपि बात्मानम् = गिरी हुई भी बनी आत्मा को। न अवगच्छन्ति समझ नहीं पाते हैं।
समासः- ताः एव अवस्थाः येषां ते तदवस्याः । व्यसनानां शतम् इति व्यसनशतम्ः तस्य शरव्यं, तस्य भावः, तां व्यसनशतशरव्यताम् । वल्मीकेषु जातानि तृणानि, तेषाम् अग्राणि, तत्र अवस्थिता इति वल्मीकतृणाग्रावस्थिताः ।
सरलार्थः- प्रतिदिनं पापेनापूरिताः ते राजानः पृयुलतरशरीराः भवन्ति इव । एवं विधाश्च ते कामक्रोधादिभिः सपुत्पन्नस्य शताधिकस्य दोषजातस्य लक्ष्यीभूताः सन्तः वल्मीकोपरि संस्थितेषु तृणप्रान्तेषु संलग्नाः जललवा इब स्वलितमपि बात्मानं मोहात् न जानन्ति ।
अनुवादः- प्रतिदिन बढ़ते हुये पापों के कारण मानो वे मोटे हो जाते
देखिये- 'मृगयाक्षो दिवास्वापः परिवादः स्त्रियो मदः । तोर्यत्रिकं वृयाटया च कामजो दशको गणः ।।' - मनु०, अ० ७, श्लो० ४७ ।
क्रोध से उत्पन्न व्यसन-
चुगली, छिपे दोष को प्रकट करना, सज्जनों को सताना, छल से मारना, ईर्ष्या करना, दूसरों के गुणों में दोष निकालना, घन का अपहरण, देय वस्तुओं को न देना, कठोर वचन बोलना और मार-पीट करना ।
देखिये- 'पंशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्यासूयार्थदूषणम् । वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः ।।'
- मनु०, अ० ७, श्लो० ४८ ।
२. (पिछले पृष्ठ से सम्बद्ध) चींटी और दीमक आदि से बनायी गयो मिट्टी की ढेर को वल्मीक कहते हैं।
1
७२
कादम्बरी-घुरुतातोपदेशः
है। और ऐसी दशा में सैकड़ों बुरी आदतों के आदी हो जाने से दीमक के ऊपरी भाग की घासों पर जल की गिरी हुई बूंदों की भाँति, पापकमों के च्युत अपनी आत्मा को भूल जाते हैं।
अपरे तु स्वार्थनिष्पादनपरंर्धन पिशितग्रासगुधै रास्थाननलिना-बकैः' घृतं विनोद इति, परदाराभिगमनं वैदग्ध्यमिति, मृगया श्रम इति, पानं विलास इति, प्रमत्तता शौर्य्यमिति, स्वदारपरित्यागः अव्यसनितेति, गुरुवचनावधीरणमपरप्रणेयत्वमिति, अजितभृत्यता मुखोपसेव्यत्वमिति, नृत्य-गीत-वाद्य-वेश्याभिसक्तिः रसिकतेति, महा-पराधानाकर्णनं महानुभावतेति, परिभवसहत्वं क्षमेति, स्वच्छन्दता प्रभुत्वमिति, देवाबमाननं महासत्त्वतेति, वन्दिजनख्यातिः यश इति, तरलता उत्साह इति, अविशेषज्ञता अपक्षपातित्वमिति, दोषानपि गणपक्ष मध्यारोपयद्भिरन्तः स्वयमपि विहसद्भिः प्रतारणकुशलैर्धूर्तेर-मानुषोचिताभिः स्तुतिभिः प्रतार्य्यमाणा, वित्तमदमत्तचित्ता निश्च -तनतया तथैवेत्यात्मन्यारोपितालीकाभिमानाः, दिव्यांशावतीर्णमिव मर्त्यधर्माणोऽपि सदैवतमिवातिमानुषमात्मानमुत्प्रेक्षमाणाः
१. जिस प्रकार बगुले कमल के पत्तों की आड़ में छिप कर सरोवर की मछलियों की ताक में बैठे रहते हैं और मौका पाते ही उन्हें चट कर जाते हैं, उसी प्रकार धूर्त भी राज-दरबार में अपनी स्वार्थ पूर्ति की ताक में लगे रहते हैं और अवसर पाते ही राजाओं को धोखा देकर अपना मतलब पूरा कर लेते हैं। 'बगुला भगती' का यही रहस्य है।
२. मनुस्मृति में राजा को देवताओं के अंश से उत्पन्न माना गया है-
'इन्द्रानिलयमार्कानामग्नेश्व वरुणस्य च।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निहृत्य शाश्वतीः ।।
यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः ।
तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा ।।' मनु० ७।४-५।
अलंकारः- यहाँ पर 'स्वार्थनिष्पादनपरैः' से 'बकैः' तक प्रम्परित-रूपक अलंकार है और 'अवतीर्णमिव' में क्रियोत्प्रेक्षा और 'सदैवतमिव' में गुणोत्प्रेक्षाऽलंकार है।
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
७३
प्रारब्धदिव्योचितचेष्टानुभावाः सर्वजनस्यौपहास्यतामुपयान्ति ।
अन्ययः- अपरे तु (राजानः 'यूतं विनोद इति' इत्यतः आरभ्य 'अवि-होषज्ञता अपक्षपातित्वमिति' इत्यन्ताम् दोषान् अपि गुणपक्षम् अध्यारोपयद्भिः स्वार्थनिष्पादनपरैः धनविषितग्रासगृधैः नलिनीवकः अन्तः स्वयमपि विहसद्भिः प्रतारणकुशलैः धूर्तः अमानुषोचिताभिः स्तुतिभिः प्रतार्यमाणाः सर्वजनंस्य उपहास्यताम् उपयान्ति, इति दूरेण सम्बन्धः । एवमेव वित्तमदमत्तचित्ताः निश्चेतनतया तथा इव इति बात्मनि आरोपितालीकाभिमानाः मर्त्यधर्माणः (सन्तः) अपि आत्मानं दिव्यांशावतीर्णम् इव (अतएव ) सदैवतम् इव अतिमानुषम् उत्प्रेक्षमाणाः, प्रारब्धदिव्योचितचेष्टानुभावाः (राजानः) सर्वजनस्य उपहास्यताम् उपयान्ति ।
शब्दार्थः- अपरे तु (राजानः) कुछ (राजा) तो। द्यूतं = जुआ खेलना। विनोदः इति मनोरञ्जन है। परदाराभिगमनम् = दूसरों की स्त्रियों के साथ संभोग करना। वैदग्ध्यम् इति कुशलता है। मृगया = शिकार खेलना । श्रमः इति व्यायाम है। पानम् मद्य का पान करना । विलासः इति = विलासिता है। प्रमत्तता उन्मत्तता । शौर्य्यमिति = वीरता है। स्वदारपरित्यागः = अपनी पत्नी का परित्यागं करना। अव्यसनिता इति = अनासक्ति है। गुरुवचनावधीरणम् - गुरुओं की आज्ञा का उल्लंघन करना । अपरप्रणेयत्वम् इति = स्वाधीनता है। अजितभृत्यता भृत्याधीनता अर्थात् गलती करने पर भी नौकरों पर शासन नहीं करना । सुखोपसेव्यत्वमिति = सुखपूर्वक सेवा (बिना हुज्जत की सेवा करना) है। नृत्य-गीत-वाद्य-वेश्याभि-सक्तिः- नाचना, गाना, बाजे बजाना और वेश्या में आसक्त रहना। रसिकेता इति = रसास्वादकता है। महापराधानाकर्णनम् = बड़े-बड़े अपराधों को नहीं सुनना । महानुभावता इति बड़प्पन है। परिभवसहत्वम् = अपमान को बर्दाश्त कर लेना। क्षमा इति सहनशीलता है। स्वच्छन्दता स्वेच्छा-चारिता । प्रभुत्वम् इत्=ि ईश्वरता है। देवावमाननम् - देवताओं का अनादर करना। महासत्त्वत्ता इति - बृहत् शक्ति-सम्पन्नता है। वन्दिजनख्यातिः =
विशेषः - इस गद्यखण्ड के 'अपरे' का सम्बन्ध इस गद्यांश के अन्त में शाने वाली 'उपयान्ति' इस मुख्य क्रिया के साथ है।
७४
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
भाँटों से की जाने वाली प्रशंसा। यशः इति कीति है । तरलता = बश्चलता। उत्साहः इति = उल्लास है। अविशेषज्ञता विशेष बातों की जानकारी नहीं रखना। अपक्षपातित्वम् = निष्पक्षता है। दोषानपि दोषों को भी । गुण-पक्षम् = गुणों के रूप में। अध्यारोपयद्भिः = आरोपित करने वाले । अन्तः स्वयमपि विहसद्भिः - अपने मन ही मन स्वयं (उन राजाओं पर) हँसने वाले । स्वार्थनिष्पादनपरैः = अपने मतलब को पूरा करने में लगे रहने वाले । धन-पिशित-ग्रास-गृधैः = धन रूपी मांस को ग्रहण करने में गीध के समान । आस्थाननलिनीबकैः = राजपरिषद् रूपी कमलिनीकानन में रहने वाले बगुले की भाँति । प्रतारणकुशलैः ठगने में निपुण। धूर्तेः = लम्पटों के द्वारा । अमानुषोचिताभिः स्तुतिभिः अलौकिक स्तोत्रों से । प्रतार्य्यमाणाः ठगे गये। वित्तमदमत्तचित्ताः = धन के घमंड से मतवाले। निश्चेतनतया -अज्ञानता के कारण । तथैव उसी प्रकार। इति आरोपितालीकाभिमानाः = अपने मन में झूठे अभिमान को आश्रय देने वाले । मर्त्यधर्माणोऽपि जन्म-मरण आदि मनुष्य धर्म से युक्त होकर भी। दिव्यांशावतीर्णम् इव मानो देवताओं के अंश से उत्पन्न। सदैवतमिव मानो देवी भाव से युक्त । अति-मानुषम् - देवता । आत्मानम् अपने को। उत्प्रेक्षमाणाः संभावना करने वाले । प्रारब्धदिव्योचितचेष्टानुभावाः = (और इसीलिये) देवताओं के समान क्रिया-कलापों के प्रदर्शन से अपनी महत्ता को व्यक्त करने वाले (राजा लोग)। सर्वजनस्य = सभी लोगों की। उपहास्यताम् उपयान्ति-हँसी के पात्र बन जाते हैं।
समासः - स्वस्य अर्थस्य निष्पादनम्, तत्र परैः इति स्वार्थनिष्पादनपरैः । धनानि एव पिशितानि, तेषां ग्रासे गुत्रः इति धनपिशितग्रासगृधैः । आस्था-= नमेव नलिनी, तस्यां बकैः इति आस्थाननलिनीबकैः । गुरूणां वचनानि, तेषाम् अवधीरणम् इति गुरुवचनावधीरणम् । जितः भृत्यः येन स जितभृत्यः तस्य भांवः जितभृत्यता, न जितभृत्यता इति अजितभृत्यता । सुखेन उपसेव्यः तस्य भावः इति सुखोपसेव्यत्वम् । नृत्यं च गीतश्च वाद्यं च वेश्या च इति नृत्यगीतवाद्यवेश्याः, तासु अभिसक्तिः इति नृत्यगीतवाद्यवेश्याभिसक्तिः । महताम् अपराधानां न आकर्णनम् इति महापराधानाकर्णनम् । वदन्ते इति
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
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बन्दिनः ते च जनाः तैः स्यातिः इति वन्दिजनाख्यातिः। प्रतारणेषु कुशलाः इति प्रतारणकुशलाः, तैः प्रतारणकुशलैः । मानुषेभ्यः उचिता इति न मानु-षोचिता, ताभिः अमानुषोचिताभिः । वित्तस्य मदेन मत्तं चित्तं येषाम् ते वित्तमदमत्तचित्ताः निर्गता चेतना यस्मात् असौ निश्चेतनः, तस्य भावः निश्चे-तनता, तया निश्चेतनतया । आरोपितम् अलीकम् अभिमानं यैः ते आरो पितालीकाभिमानाः । न मानुषोचिता इति अमानुषोचिताः । मत्र्त्यस्य धर्माः येषां ते मत्यधर्माणः । दिव्याः येः अंशाः, तेभ्यः अवतीर्णम् इति दिव्यांसाव-तीर्णः, तम् । प्रारब्धाः याः दिव्योचितचेष्टाः ताभिः अनुभावः = माहात्म्यं येषां ते प्रारब्धदिव्योचितचेष्टानुभावाः ।
सरलार्थः - इतरान् क्षितीशान् तु स्वप्रयोजन-सम्पादन-तत्पराः द्रव्य-रूपमांसग्रहणे गृधभूताः कमलिनीवनसदृशस्य नृपोपवेशनसदनस्य बकरूपाः केचन बंचकाः, अग्रेतनरूपेण निन्दितमपि द्यूतादिकर्म वैपरीत्येन एवं बोध-यन्ति यत्- द्यूतस्य क्रीडनं मनोरञ्जनम्, अतएव तस्य विधाने न कश्चिद्दोषः इति । परस्त्रीसंभोगः चातुर्य न तु व्यभिचारः इति । आखेटः व्यायामः इति; अतएव जीवहिंसायां न किञ्चित् पातकम् इति । सुरासेवनम् उप-भोगविशेषः । अनवधानता शूरकर्म । निजभार्यायाः परित्यागः आसक्ति-राहित्यम् । गुरुवचनानाम् अतिक्रमणम् स्वच्छन्दतेति । परमार्थतः अपराध-भाजामपि भृत्यानां मोचनम् अनायाससेवायोग्यता । नर्तनगायनवाद्य-वार-वनितादिषु आसंगः रसाभिज्ञता । महतामपि अपराधानाम् उपेक्षणम् महाश-यता इति । तिरस्कारसहनं क्षमाशीलतेति । निरंकुशतया वर्तनं विभुत्व-मिति । इन्द्रादिदेवानां तिरस्करणं महत् शक्तिशालित्वमिति । अस्थैर्यं प्रागल्भ्य-मिति । विशेषाविशेषानभिज्ञत्वं माध्यस्थ्यमिति एवं प्रकारेण दोषजातेषु गुणगणानारोप्य चेतसि स्वयं उपहसन्तः वञ्चनानिपुणाः लम्पटाः अलौकिकैः प्रशंसावचनैः वञ्चयन्ति । एवं प्रकारेण धूर्तजनैः समुपस्थापितं गुरुरूपेण समारोपितदोषजातम् अवितंथं मन्यमानाः सन्तोऽपि मरणशीलाः ते राजानः स्वस्मिन् देवांशावतरणम् आरोपयन्तः आत्मनि दिव्यभावं कल्पन्ते । अथ च देवसदृशान् क्रियाकलापान् अभिनीय स्वकीयं माहौत्म्यं प्रदर्शयन्तः राजानः समेषां लोकनां हास्यविषयतां गच्छन्ति ।
अनुवादः - केवल अपने ही प्रयोजन को पूरा करने के फेर में रहनेवाले,
७६
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
सम्पत्ति रूपी मांस को खाने में गीध के समान, राजसभा रूपी कमलवन में बगुले के समान बने हुए कुछ धूर्त लोग कुछ राजाओं को इस प्रकार समझाते है कि-'जूआ खेलना मनोरंजन है। दूसरों की स्त्रियों के साथ सहवास करना पीना विलासिता है। मत-चतुरता है। शिकार खेलना कसरत है। शराब बालापन वीरता है। अपनी पत्नी को छोड़ देता वैराग्य है गुरुओं की आज्ञा का उल्लंघन करना स्वतन्त्रता है। वास्तविक अपराध करने वाले नौकरों को भी छूट देते रहना सुखपूर्वक सेवा करने देना है। मुख्य करना, गीत गाना, बाजे बजाना और वेश्याओं में अनुरक्त रहना रसिकता है (सहृदयता है)। बड़े-बड़े अपराधों पर भी ध्यान नहीं देना हृदय की उदा-रता है और अपमान को भी पी जाना सहिष्णुता है। मनमाना काम करना प्रभुता है। इन्द्रादि देवताओं का अपमान करना शक्तिमत्ता है। चारणगणों से की जाने वाली राजाओं की प्रशस्ति कीति है। चित्त की चपलता उमंग है। सामान्य एवं विशेष की विवेचना नहीं करना पक्षपातहीनता है।' इस प्रकार दोषों को भी गुणों के रूप में दिखला कर मन ही मन उन पर (राजाओं पर) हँसते हुए धोखा देने में होशियार, चालबाज झूठी तारीफ का पुल बाँध कर राजाओं को धोखा देते हैं। पूर्वोक्त विधि से धूर्त लोगों के द्वारा समझाये जाने पर राजा लोग धन के अहंकार से उन्मत्त हो जाते हैं और अज्ञानता के कारण उन सभी को सच मानकर अपने' में मिथ्याभिमान का आरोप करते हैं। मनुष्य के जन्म-मरण आदि लक्षणों से युक्त होकर भी अपने को । देवताओं के अंश से उत्पन्न, देवताओं से अधिष्ठित और अलौकिक मानते हैं। इस प्रकार देवोपयुक्त शौर्यादि के नाटक से अपनी महत्ता को प्रर्दाशत करने वाले राजा लोग लोगों के उपहास के विषय बन जाते हैं।
आत्मविडम्बनाञ्चानुजीविना जनेन क्रियमाणम्भिनन्दन्ति । मनसा देवताध्यारोपणप्रतारणासम्भूतसम्भावनोहताश्चान्तः प्रविष्टा-परभुजद्द्यमिवात्मबाहुयुगले सम्भावयन्ति । त्वगन्तरिततृतीयलोचनं स्वललाटमाशङ्कन्ते ।
अन्वयः- च अनुजीविना जनेन क्रियमाणाम्
आत्मविडम्बनाम्
अलंकारः- यहाँ 'अपरभुजद्वयम् इव' में क्रियोत्प्रेक्षा अलंकार है।
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
७७
अभिनन्दन्ति । 'देवताध्यारोपण प्रतारणासम्भूतसम्भावनोपहता' (सन्तः) मनसा आत्मबाहुयुगलम् अन्तप्रविष्टम् अपरं भुजद्वयम् इव सम्भावयन्ति, स्वललाटं त्वगन्तरिततृतीयलोचनम् आशङ्कन्ते ।
शब्दार्थः - अनुजीविना जनेन सेवक लोगों के द्वारा। क्रियमाणाम् आत्मविडम्बनाम् = की जाने वाली अपनी नकल को। अभिनन्दन्ति -स्वागत करते हैं। देवताध्यारोपणप्रतारणासम्भूतसम्भावनोपहताः = देवत्व के आरोप रूपी वंचना के द्वारा असंभावित दुराशाओं से विनष्ट बुद्धिवाले । मनसा = अपने मन से । आत्मबाहुयुगलम् अपनी दो भुजाओं को । अन्तः-प्रविष्टाप र भुजद्वयमिव = मानों अन्दर में और दो भुजाएँ घुस गयी हों, (ऐसा ) । संभावयन्ति = समझते हैं। त्वगन्तरिततृतीयलोचनं स्वललाटम् = चमड़े के भीतर छिपे हुए तीसरे नेत्र से युक्त अपने भालप्रदेश को । आशङ्कन्ते = मानते हैं।
समासः- आत्मनः विडम्बना इति आत्मविडम्बना, तां आत्मविड-म्बनाम् । देव एव देवताः तस्याः अध्यारोपणम्; तदेव प्रतारणा तया अस-म्भूता या सम्भावना, तया उपहताः इति देवताध्यारोपणप्रतारणासम्भूत-सम्भावनोपहताः । भुजयोः द्वयम् इति भुजद्वयम्, अपरं च तत् भुजद्वयम् इति अपरभुजद्वयम्, अन्तःप्रविष्टम् अपरभुजद्वयम् यस्मिन् इति अन्तःप्रविष्टापर-भुजद्वयम् । त्वचा अन्तरितं तृतीयं लोचनं यस्मिन्, तं त्वगन्तरिततृतीय-लोचनम् ।
सरलार्थः- किश्च परिजनवर्गः विधीयमानाम् आत्मनि अविद्यमान-गुणारोपणरूपामपि अनुकृति प्रशंसन्ति राजानः । एवमेव अविद्यमानानामपि देवत्वादिगुणानाम् आरोपणरूपया वञ्चनया असम्भवताम् उपगताभिरपि सम्भा-वनाभिः विकृतबुद्धयः राजानः मध्येऽन्तरितं बाहुयुगलान्तरमिव स्वकीयं भुजयुगं कल्पयन्तः चतुर्भुजमिव आत्मानम् अवगच्छन्ति । निजनिटिलतट चर्मणा अन्र्तार्हतेन तृतीयनेत्रेण समन्वितमिव मन्यमानाः आत्मानं शिवं कल्पन्ते ।
अनुबादः और वे राजे अपने में नहीं रहने वाले भी गुणों का अभि-नय करने वाले परिजनों के नाटक की प्रशंसा करते हैं। अपने अन्दर नहीं
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कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
रहने बाले देवत्व आदि गुणों की स्थापना रूपी धूतों की चालबाजी से झूठी आशा में पड़ कर अपने दिमाग को खाली कर बैठने वाले राजालोग भीतर घुसे हुए मानों और दो भुजाओं से युक्त अपने बाहुयुगल को सोचते हुए अपने को चतुर्भुज विष्णु मान बैठते हैं। अपने भालप्रदेश को चर्म से आच्छादित तृतीय नेत्र से युक्त मान कर मानों वे अपने को त्रिनेत्रधारी भगवान शंकर समझते हैं।
दर्शनप्रदानमपि अनुग्रहं गणयन्ति । दृष्टिपातमपि उपकारपक्षे स्थापयन्ति । सम्भाषणमपि संविभागमध्ये कुर्वन्ति । आज्ञामपि वर-प्रदानं मन्यन्ते । स्पर्शमपि पावनमाकलयन्ति ।
अन्वयः- स्पष्टम् ।
दर्शन देने को भी। अनुग्रहं गणयन्ति = शब्दार्थः - दर्शनप्रदानम् अपि आँख लोगों के ऊपर अपनी अनुकम्पा समझते हैं। दृष्टिपातमपि अ उठाकर देखने को भी। उपकारपक्षे स्थापयन्ति लोगों के ऊपर अपना उपकार मानते हैं। सम्भाषणम् अपि बातचीत करने को भी । संविभागमध्ये कुर्वन्ति पुरस्कार के रूप में दिये गये दान समझते हैं। आज्ञाम् अपि = अपने आदेश को भी। वरप्रदानं मन्यन्ते प्रजाओं की मनोवाञ्छित सिद्धि देना मानते हैं। स्पर्श मपि = छू देने को भी। पावनम् आकलयन्ति = उसको पवित्र कर देना समझते हैं।
समासः- दृष्टघाः पातम् इति दृष्टिपातम्, तत् दृष्टिपातम् । संविभागः ( = पारितोषिकदानम्), तस्य मध्ये इति संविभागमध्ये ।
सरलार्थः- ते हि राजानः लोकानां कृते आत्मसाक्षात्कारमपि प्रसादं विभावयन्ति । प्रजाजनेषु निजकटाक्षनिक्षेपमपि उपकृतिपक्षे निक्षिपन्ति । जनसमूहेन सह संलापमपि तेषां कृते पुरस्कारपङ्क्तौ पातयन्ति । निज-निदेशमपि प्रजानां कृते समीहितफलप्रदाने जानन्ति । संस्पर्शमपि जनानां कृते पवित्रमवधारयन्ति ।
सनुवावः- ये राजे प्रजाजनों को अपना दर्शन देना भी उन पर मानों
अलंकारः- यहाँ 'दर्शनप्रदानमपि...' से लेकर 'आकलयन्ति' तक प्रतीयमानोत्प्रेक्षा अलंकार है।মা
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
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अपनी कृपा मानते हैं। अपनी आँख उठाकर देखना भी मानों लोगों का उप-कार करना समझते हैं। किसी के साथ वार्तालाप करना भी उसके लिये मानो पुरस्कार देना समझते हैं। अपने आदेश को भी प्रजाओं के लिए मानो वर-दान मानते हैं। प्रजाओं का स्पर्श करना भी उनको पवित्र करना समझते हैं। मिथ्यामाहात्म्यगर्वनिर्भराश्च न प्रणमन्ति देवताभ्यः, न पूजयन्ति द्विजातीन्, न मानेयन्ति मान्यान्, नार्चयन्त्यर्चनीयान्, 'नाभिवाद-यन्त्यभिवादनार्हान् 'नाभ्युत्तिष्ठन्ति गुरून् ।
अन्वयः च मिध्यामाहात्म्यगर्वनिर्भराः (ते राजानः) देवताभ्यः न प्रणमन्ति, द्विजातीन् न पूजयन्ति, मान्यान् न मानयन्ति, अर्चनीयान् न अर्चयन्ति, अभिवादनार्हान् न अभिवादयन्ति, गुरून् न अभ्युत्तिष्ठन्ति ।
शब्दार्थः - मिध्यामाहात्म्यनिर्भराः झूठे बड़प्पन के घमण्ड में चूर राजा लोग । देवताभ्यः देवताओं को। न प्रणमन्ति नमस्कार नहीं करते
१. अभिवादन के योग्य लोगों का अभिवादन करने से आयु, विद्या और शक्ति की वृद्धि होती है-
'अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुविद्या यशो बलम् ।।
- मनुस्मृति, अ० २, श्लो० २२१ ।
२. गुरु के आने पर उनका उठ कर अभिवादन करना चाहिये-'शय्यासनस्थश्चैवैन मित्युत्थायाभिवादयेत् ।।
- मनु०, अ० श्लो० ११९ ।
आसन से उठ कर गुरुओं की अभ्यर्थना करने का रहस्य यह है कि गुरु-जन के आने पर अवस्था और शिक्षा में न्यून लोगों के प्राण शरीर से निकल कर बाहर हो जाना चाहते हैं, किन्तु गुरुजनों के प्रति अभ्युत्थान और अभि-वादन से वे ही प्राण पुनः स्थिर हो जाते हैं। अतः गुरुओं के आने पर आसन से उठ कर अभिवादन करने का यही मनोवैज्ञानिक रहस्य है:-
'ऊध्वं प्राणा ह्यत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान् प्रतिपद्यते ।।
- मनु०, अ० २, श्लो० १२० ।
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कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
है। द्विजातीन् = ब्राह्मणों को। न पूजयन्ति नहीं पूजते हैं। साभ्यान् माननीय लोगों को। न मानयन्ति सम्मान नहीं करते हैं। अर्चनीयान् पूजनीय लोगों को। नार्चयन्ति पूजा नहीं करते हैं। अभिवादनार्हान् प्रणम्य जनों को। नाभिवादयन्ति = प्रणाम नहीं करते हैं। गुरुओं को नाभ्यु त्तिष्ठन्ति खड़े होकर स्वागत नहीं करते हैं।
समासः - महांश्वासो आत्मा; तस्य भावः माहात्म्यम्, मिथ्यामाहात्म्यस्य गवण निर्भराः इति मिध्यामाहात्म्यगर्वनिर्भराः ।
सरलार्थः अपि च मिध्याभूतस्य महत्त्वस्य अभिमानेन आपूरिताः भूपालाः न देवान् नमस्कुर्वन्ति, वस्त्रपात्रादिप्रदानेन न सत्कुर्वन्ति श्रोत्रियान्, नादरविषयं कुर्वन्ति मानार्हान्, न पूजयन्ति पूजनीयजनान्, व्यस्तपाणिभ्यां न प्रणमन्ति प्रणम्यपादान् (गुरुजनान्) । नोत्थाय स्वागतं विदधते गुरु-चरणानाम् ।
अनुवादः और आत्मगौरव के मिथ्याभिमान से अभिभूत भूपति देव-ताओं का नमस्कार नहीं करते हैं, भोजन, वस्त्र आदि का दान देकर ब्राह्मणों की पूजा नहीं करते हैं। माननीय जनों का आदर नहीं करते हैं। पूजनीय लोगों की पूजा नहीं करते हैं, प्रणम्य लोगों के चरणों का स्पर्श नहीं करते हैं, गुरुजनों के आने पर उठ कर उनका स्वागत नहीं करते हैं।
अनर्थकायासान्तरित विषयोपभोग सुखमित्युपसन्ति विद्वज्जनम्, जरावैक्लव्यप्रलपितमिति पश्यन्ति वृद्धजनोपदेशम्, आत्मप्रज्ञापरिभव
इत्यसूयन्ति सचिवोपदेशाय, कुप्यन्ति हितवादिने ।
अन्वयः - अनर्थकायासान्तरितविषयोपभोगसुखम् इति ( अस्मादेव कारणात् ) विद्वज्जनम् उपहसन्ति, जरावैक्लव्यप्रलपितम् इति कृत्वा वृद्धजनो, पदेशं पश्यन्ति, आत्मप्रज्ञापरिभवः इति कृत्वा सचिवोपदेशाय असूयन्ति, ( तथा ) हितवादिने कुप्यन्ति ।
शब्दार्थः - अनर्थ कायासान्तरितविषयोपभोगसुखम् = व्यर्थ परिश्रम से व्यवहित विषय-वासना के आनन्दवाले । विद्वज्जनम् = पण्डितों को। उप-हसन्ति = उपहास करते हैं। जरावैक्लव्यप्रलपितम् = वृद्धावस्था की विकलता के कारण निरर्थक वचन के रूप में। वृद्धजनोपदेशम् = वृद्धजनों के उपदेश
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
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को। पश्यन्ति देखते हैं। आत्मप्रज्ञापरिभवः इति कृत्वा 'अपनी बुद्धि की निन्दा' ऐसा समझ कर । सचिवोपदेशाय मन्त्रियों की सलाह से । असूयन्ति = ईर्ष्या करते हैं। हितवादिने कल्याणकारी वचन बोलने वालों के ऊपर । कुप्यन्ति - क्रोध करते हैं।
समासः अनर्थकेन आयासेन अन्तरितं विषयाणाम् उपभोगसुखं येन, तं अनर्थकायासान्तरितविषयोपभोगसुखम् । जरायाः यत् वैक्लब्धं तेन प्रलपितं, तदं । वृद्धाश्च ते जनाः, तेषाम् उपदेशः, तं वृद्धजनोपदेशम् । आत्मनः प्रज्ञायाः परिभवः इति आत्मप्रज्ञापरिभवः ।
सरलार्थः- राजानः निष्फलेन विद्याभ्यासादिप्रयासेन व्यवहितांगनादि-
जनितसुखस्य विबुधजनस्य उपहासं कुवन्ति । स्थविराणाम् उपदेशवचनं वार्धक्यजनितेन शैथिल्येन कृतं प्रलापं मत्वा उपेक्षन्ते । निजबुद्धिपराभवम् बवगत्य निन्दन्ति महामन्त्रिणां मन्त्रणाम् । कल्याणवचनविधायिनो जनान् कोपाग्नौ भस्मीकुर्वन्ति ।
अनुवादः- राजा लोग पण्डितों को वनितादि विषयभोग का सुख छोड़कर विद्याभ्यासादि में वृथा श्रम करने वाला समझ कर उनका उपहास करते हैं। बड़े-बूढ़ों के उपदेश को बुढ़ौती की बकवास समझ कर उसकी उपेक्षा कर देते हैं। अपनी बुद्धि का अपमान समझ कर मन्त्री के परामर्श से द्वेष करते हैं और राज्य के हित के लिए यथार्थ बोलने वालों को अपनी क्रोधाग्नि में भस्मसात् कर देते हैं।
सर्वथा तमम्भिनन्दन्ति, तमालपन्ति, तं पाश्र्वे कुर्वन्ति, तं संवर्द्ध-यन्ति, तेन सह सुखमवतिष्ठन्ते, तस्मै ददति, तं मित्रतामुपनयन्ति, तस्य वचनं शृण्वन्ति, तत्र वर्षन्ति, तं बहु मन्यन्ते, तमाप्ततामापाद-यन्ति, योऽहनिशमनवरतमुपरचिताञ्जलिरधिदैवतमिव विगतान्य-कर्तव्यः स्तौति, यो वा महात्म्यमुद्भावयति ।
अन्वयः- (इमे राजानः) तं सर्वथा अभिनन्दन्ति, तं पाश्र्वे कुर्वन्ति, तं सम्बर्द्धयन्ति, तेन सह सुखम् अवतिष्ठन्ते, तस्मै ददति, तं मित्रताम् उपन-यन्ति, तस्य वचनं शृण्वन्ति, तत्र वर्षन्ति, तं बहु मन्यन्ते, तन् आप्तताम् बापादयन्ति, यः विगतान्यकर्तव्यः (सन् ) अनिशम् अनवरतम् उपरचिता-
८२
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
जलिः अधिदेवतम् इव (तम्) स्तौतिः वा यः (तस्य) माहात्म्यम् उसाययति ।
काव्यार्थः इमे राजानः ये राजा लोग तम् उसको। सर्वथा-सभी प्रकार से अभिनन्दन्ति अभिनन्दन करते हैं। पादवें बगल में तं कुर्वन्ति उसको बैठाते हैं। तम् - उसको । सम्वर्धयन्ति बढ़ाते हैं। तेन सह उसके साथ । सुखम् अवतिष्ठन्ते - सुखपूर्वक रहते हैं। तस्मै ददति = उसको देते हैं। तम् = उसको । मित्रताम् उपनयन्ति = मित्र बना लेते हैं। तस्य वचनम् - उसके वचन को। शृण्वन्ति सुनते हैं। तत्र वर्षन्ति = उसी में (धन आदि की वर्षा करते हैं। तं बहु मन्यन्ते = उसको अधिक सम्मान प्रदान करते हैं। तम् उसको । आप्तताम् आपादयन्ति विश्वासपात्र बना लेते हैं। यः जो (आदमी)। विगतान्यकर्तव्यः (सन् ) = अन्य सभी कार्यों को छोड़कर। अहर्निशम् = दिन-रात । अनवरतम् = निरन्तर । उपरचिताञ्जलिः = हाथ जोड़कर। अधिदैवतम् इव तं स्तौति = इष्टदेवता के समान उनकी प्रार्थना करता रहता है। यो वा अथवा जो । (तस्य) माहात्म्यम् = (उसकी) बड़प्पन को । उद्भावयति = प्रकट करता रहता है।
समासः- उपरचितः अञ्जलिः येन, स उपरचिताञ्जलिः । विगतं अन्यत् कर्तव्यं यस्य स विगतान्यकर्त्तव्यः ।
सरलार्थः - परित्यक्तेत रव्यापारः यः खलु रात्रिन्दिवं संयोजितकरपुटः सन् इष्टदेवमिव तान् निरन्तरं वन्दते, तेषां महिमानं वा प्रकटयति, राजप्रशंसा परस्य तस्यैव पुरुषस्य अभिनन्दनं कुर्वन्ति राजानः, तेनैव च पुरुषेण सह सम्भाषणं कुर्वते, तमेव समीपे उपवेशयन्ति, तवेव सर्वविधसाहाय्येन उन्न-मयन्ति, तेनैव सह सुखपूर्वकमवस्थानं विदधते, तस्मै एव प्रयच्छन्ति, तमेव सख्यं प्रापयन्ति, तस्यैव वावयं श्रवणपथातिथि कुर्वन्ति, तस्मिन्नेव पात्रे पौनः पुन्येन प्रदानं कुर्वन्ति' तमेव पुरुषं सर्वोत्कृष्टतया जानन्ति, तमेव पुरुषं प्रति शिष्टतां सम्पादयन्ति च ।
अनुवादः - राजाओं की प्रशंसा में निरत उसी प्रियंवद का राजा लोग अभिनन्दन करते हैं, उसी के साथ बातचीत करते हैं, उसको ही अपने पास
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
बैठाते हैं, विविध सहायता प्रदान करके उसी को समृद्ध बनाते हैं, उसके साथ ही सुखपूर्वक निवास करते हैं, उसको ही बार-बार दान देते हैं, उसको ही अपना मित्र बनाते हैं, उसी की बातों को सुनते हैं, उसी के यहाँ घन की वर्षा करते हैं, उसको ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और उसी को अपना विश्वास-पात्र बना लेते हैं, जो लोग अन्य सभी कार्यों को छोड़कर दिन-रात हाथ जोडे अपने आराध्यदेव की भाँति निरन्तर राजाओं का यशोगान करते रहते हैं, अथवा उनके बड़प्पन को और अधिक बढ़ा-चढ़ा कर व्यक्त करते रहते हैं।
कि वा तेषां साम्प्रतम् येषामतिनृशंसप्रायोपवेशनिघृणं कौटिल्य-शास्त्रं प्रमाणम्, अभिचारक्रियाक्रूरैकप्रकृतयः पुरोधसो' गुरवः परा-भिसन्धानपरा मन्त्रिण उपदेष्टारः, नरपतिसहस्रभुक्तोज्झितायां लक्ष्म्यामासक्तिः, मारणात्मकेषु शास्त्रेषु अभियोगः, सहजप्रेमार्द्रहृदया-नुरक्ताः भ्रातरः उच्छेद्याः ।
अन्वयः- वा तेषां कि साम्प्रतम्, अतिनृशंसप्रायोपदेशनिघृणं कौटिल्य-शास्त्रं (येषां) प्रमाणम् अभिचारक्रियाक्रूरैकप्रकृतयः पुरोधसः (येषां ) गुरवः, पराभिसन्धानपराः मन्त्रिणः (येषां ) उपदेष्टारः, नरपतिसहस्रभुक्तो-ज्झितायां लक्ष्म्याम् (येषां ) आसक्तिः मारणात्मकेषु शास्त्रेषु (येषां) अभियोगः, सहजप्रेमाईहृदयानुरक्ताः भ्रातरः (येषां) उच्छेद्याः ।
शब्दार्थः - वा = अथवा । तेषां कि साम्प्रतम् ? उनका क्या ठीक है ? अतिनृशंसप्रायोपदेशनिष्घ्घृणं कौटिल्यशास्त्रम् अत्यन्त निष्ठुर उपदेशों के कारण निष्करुण कौटिल्यशास्त्र (ही) येषां प्रमाणम् जिनका आदर्श (है) । अभिचारक्रियाक्रूरैकप्रकृतयः पुरोधसः = मारण क्रिया से एकमात्र नृशंस स्वभाववाले पुरोहित लोग ही। (येषां) गुरवः (जिन राजाओं के)
१. शुक्रनीति के अनुसार मन्त्रिमण्डल के दस मन्त्रियों में से एक का नाम 'पुरोधस्' होता है।
अलकारः- यहाँ कि वा तेषाम्' से 'भ्रातरः उच्छेद्याः' तक राजाओं के सभी प्रकार के अनुचित कार्य के प्रति अनेक प्रकार के कारणों के प्रदर्शन से 'समुच्चय' अलंकार है।
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
शिक्षक है। पराभिसन्धानपराः मन्त्रिणः दूसरों को धोखा देने में लगे रहने बाले मन्त्री लोग। येषां उपदेष्टारः (जिनको उपदेश देने वाले हैं। मरपतिसहस्रभुक्तोज्झितायाम् लक्ष्म्याम् हजारों राजाओं के द्वारा उपभोग करके छोड़ दी गई लक्ष्मी में। (येषां ) आसक्तिः (जिन लोगों का) अनुराग रहता है। मारणात्मकेषु शस्त्रेषु मार करने वाले हथियारों में। (येषां) अभियोगः = (जिनका) आग्रह रहता है। सहजप्रेमाई हृदयानु-रक्ताः भ्रातरः = स्वाभाविक प्रेम के कारण स्निग्ध हृदय बाले अतएव अनु-राग करनेवाले भ्रातृवर्ग हों । ( येषां ) उच्छेद्याः (जिन राजाओं के द्वारा) समूल नष्ट किये जाते हैं।
समासः- अतितृशंसप्रायेण उपदेशेन निघूणम् इति अतिनुशंसप्रायोपदेश-निषूणम् । अभिचारक्रियया क्रूरा एका प्रकृतिः येषां ते अभिचारक्रियाक्रूरैक-प्रकृतयः । परेषाम् अभिसन्धानेषु पराः इति पराभिसन्धानपराः । नरपतीनां सहस्रम् इति नरपतिसहस्रम्, तेन पूर्वं भुक्ता पश्चात् उज्झिता इति नरपति-सहस्रभुक्तोज्झिता, तस्यां नरपतिसहस्रभुक्तोज्झितायाम् । सहजं यत् प्रेम, तेन सहजेन प्रेम्णा आर्द्र हृदयं येषां, अतएव अनुरक्ता इति सहजप्रेमार्द्रहृदयानुरक्ताः ।
सरलार्थः- येषां हि राज्ञां क्रूरशिक्षया नितान्तं निष्करुणं चाणक्य-प्रणीतं नीतिशास्त्रमेव आदर्शः, श्येनयागादिरूप-प्राणिवधात्मकनृशंसा चरणेन निष्करुणस्वभावाः पुरोहिताः एव येषां धर्मोपदेशकाः, अन्यजनवञ्चनातत्पराः सचिवाः एव येषां शिक्षादायकाः, दशशताधिकेन भूभुजा चिरमुपभुज्य परि त्यक्तायां लक्ष्म्यामेव येषाम् अनुरक्तिः, व्यापादनविधायकेषु शस्त्रेषु एव येषाम् आग्रहः, स्वाभाविकेन सौन्दर्येण स्निग्धान्तःकरणाः सानुरागाः सहोदरा एव येषां समूलमुन्मूलनीयाः, न खलु तेषां किश्चिदपि समीचीनम् । (वा न खलु तेषां कृते किश्चिदपि असमीचीनम् ।
अनुबादः - उम राजाओं के लिये क्या उपयुक्त है जो प्रायः अतिदूषित शिक्षाओं से युक्त होने के कारण अत्यन्त कठोर चाणक्यरचित नीतिशास्त्र को ही प्रमाण मानते हैं, जो बलि-प्रधान क्रूर यज्ञ-क्रियाओं के कारण निर्दय स्वभाववाले पुरोहितों को ही अपना उपदेशक मानते हैं; जो दूसरों को ठगने में कुशल मन्त्रियों को ही अपना सलाहकार मानते हैं, जो हजारों राजाओं
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'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
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के द्वारा उपयोग करने के बाद छोड़ दी गई लक्ष्मी में ही आसक्त रहते हैं, जो हिंसा-साधक शास्त्रों में ही दत्तत्वित्त रहते हैं और जो स्वाभाविक प्रेम के कारण हृदय से अनुराग करने वाले भाइयों को ही समूल नष्ट कर देते हैं।
तदेवंप्रायेऽतिकुटिलकष्टचेष्टासहस्रदारुणे राज्यतन्त्रे, अस्मिन्
महामोहान्धकारिणि च यौवने, कुमार ! तथा प्रयतेथाः यथा नोपह-स्यसे जनैः, न निन्द्यसे साधुभिः न धिक्क्रियसे गुरुभिः, नोपलभ्यसे सुहृद्धिः, न शोच्यते विद्वद्भिः, यथा च न प्रकाश्यसे विटैः, न प्रहस्यसे कुशलैः, नास्वाद्यसे भुजङ्गः, नावलुप्यसे सेवकवृकैः, न वश्वसे धूर्तेः, न प्रलोभ्यसे वनिताभिः, न विडम्व्यसे लक्ष्म्या, न नत्त्र्यसे मदेन, नोन्मत्तीक्रियसे मदनेन, नाक्षिप्यसे विषयैः, नावकृष्यसे रागेण, नाप-ह्रियसे सुखेन ।
अन्वयः- कुमार ! तत् एवंप्राये अतिकष्टचेष्टासहस्रदारुणे राजतन्त्र, अस्मिन् च महामोहान्धकारिणि यौवने (त्वम् ) तथा प्रयतेथाः यथा जनैः न उपहस्यसे, साधुभिः न निन्द्यसे, गुरुभिः न धिक् क्रियसे, सुहृद्भिः न उपलभ्यसे, विद्वद्भिः न शोच्यसे । यथा च विटैः न प्रकाश्यसे, कुशलैः न प्रहस्यसे, भुजङ्गः न आस्वाद्यसे, सेवकवुकैः न अवलुप्यसे, धूर्तेः न वञ्च्यसे, वनिताभिः न प्रलोभ्यसे, लक्ष्म्या न विडम्व्यसे, मदेन न नत्त्र्यसे, सुखेन न अपह्रियसे ।
शब्दार्थः- कुमार ! हे राजकुमार । तत्- इसलिये । एवंप्राये अति-कुटिलकष्टचेष्टासहस्रदारुणे राज्यतन्त्रे इस प्रकार के अत्यन्त निन्दनीय बौर दुःखदायी सहस्राधिक व्यापारों से भीषण राज्यशासन में, अस्मिन् च महामोहान्धकारिणि यौवने और इस परम अज्ञान रूपी अन्धकार को फैलानेवाली युवावस्था में। तथा प्रयतेथाः ऐसा प्रयत्न करें। यथा = जिससे । जनैः लोगों के द्वारा। न उपहस्य से उपहसित न हों। साधुभिः गुरुभिः गुरुजनों के मित्रों के द्वारा । न पण्डितों के द्वारा । और जिससे प्रकट न किये निन्दित न हों। = सज्जनों के द्वारा । न निन्द्यसे द्वारा । न धिक्रियसे फटकारे न जायें। सुहृद्भिः उपालभ्यसे - उलाहना के पात्र न बनाये जायें। विद्वद्भिः न शोच्यसे - आलोचना के विषय न बनाये जायें। यथा च कि । विटैः = लम्पट कामी पुरुषों के द्वारा। न प्रकाश्यसे प्रकट न किये
कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
जायें। कुशलः चतुर लोगों के द्वारा। न प्रहस्यसे हंसी के पात्र बनावे जायें। भुजङ्ग लम्पटों के द्वारा। न आस्वाद्यसे उपभोग न किये जायें। सेवककै सेवकरूपी भेडियों के द्वारा। न अवलप्यसे लूटे न जायें। घर्ते: द्वारा। न प्रलोभ्यसे लभाये न जायें। लक्ष्म्या राज्यश्री के द्वारा । न = ठगों के द्वारा। न वच्यसे ठगे न जायें। वनिताभिः रमणीजनों के विडम्व्यसे छोड़ न दिए जायें। मदेन अहंकार के द्वारा। न नत्त्र्यसे नचाये न जायें। मदनेन कामदेव के द्वारा। न उन्मत्तीक्रियसे उन्मक्त न किये जायें। विषयैः इन्द्रियों के विषयभूत सांसारिक पदार्थों के द्वारा । न बाक्षिप्यसे वशीभूत न किये जायें। रागेण आसक्ति के द्वारा। न अवकृ व्यते = खीचे न जायें । सुखेन = सुख के द्वारा। न अपहियसे = बश्चित न किये जायें।
1 समाराः- चेष्टायाः सहस्रम् इति चेष्टासहस्रम्, अतिशयेन कुटिलः इति अतिकुटिलः, तेन अतिकुटिलेन कष्टेन चेष्टासहखेण दारुणे इति अतिकुटिल-कष्टचेष्टासहस्रदारुणे । महांश्चासौ मोह इति महामोहः, महामोहेन बन्धं कर्तुं शीलं यस्य सः महामोहान्धकारी, तस्मिन् महामोहान्धकारिणि । सेवका एव वृका इति सेवकवृकाः तैः सेवकवृकैः ।
सरलार्थः- अतएव है युवराज । पूर्वोक्तलक्षणलक्षिते वक्रतरेण क्लेश कारिणा सहस्राधिककार्यव्यापारेण भीषणे राज्यशासनव्यवहारे अत्यन्ताज्ञानेन बन्धीकरणशीले पुरोर्वार्तनि तारुण्ये च समये त्वया तथाविधः प्रयत्नो विधेय येन जनाः त्वां नोपहतेयुः सत्पुरुषाः न निन्देयुः, 'धिक् त्वाम्' इत्यादि वाक्यैः न भर्त्सनां कुर्युः, गुरुचरणाः नोपालम्भपथं पातयेयुः, सखायः न आलोच्य विषयतया स्मरेयुः, सुधियः न शोचयेयुः, विटजना (नीचपुरुषाः) न प्रकटयेयुः, हास्यविषयं नानयेयुनिपुणाः, परिचारकरूपेण प्रविश्य छलेन न अपश्रेयुः तव धनं धूर्त्ताः, परिचारकवृकाः सारमेयान् इव न लुण्ठेयुः, न वन्वयेयुः वश्वकाः, प्रलोभनादिभिः न मोहयेयुः मोहिन्यः (कामिन्यः), न मुञ्चेत् राजलक्ष्मीः त्वाम्, नाऽहंकारो नर्त्तयेत्, न उन्मादं जनयेन्मदनः, इन्द्रियविषयीभूताः पदार्थाः न आकर्षयेयुः, न अनुरञ्जयेत् स्रक्चन्दनवनितादीनाम् अनुरागः, न आनन्दः त्वाम् उत्सृजेंद् ।
अनुबादः - इसलिये हे युवराज ! उपर्युक्त दुर्गुणों की खान, हजारों
'उत्तमा "मालती' व्याख्योपेतः
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कुटिल और दुःखदायी व्यवहारों के कारण भयंकर इस राजशासन की प्रक्रिया में तथा ऐसी महामोहकारी युवावस्था में आप ऐसा प्रयत्न करें जिससे लोग आपका उपहास न करें, सज्जनवृन्द आपकी निन्दा न करें, आप गुरुजनों की फटकार न सुनें, मित्रगण आपको उलाहना न दें, पण्डितसमाज आपकी आलोचना न करें, कामी पुरुष आपके रहस्य का उद्घाटन न करें, कार्यनिपुण पुरुष आपकी हँसी न उड़ायें, लम्पट लोग आपके धन का दुरुपयोग न करें, भेड़िये के समान आपके परिचारक आप पर टूट न पड़ें, धोखेबाजों से आप धोखा न खायें, ललनाएँ आपको लुभा न सकें, राजलक्ष्मी आपको छोड़ने न पाये, अहंकार आपको नचाने न पाये, कामदेव आपको उन्मत्त न बना दे, इन्द्रियों के उपभोग्य पदार्थ आपको कुमार्ग में न ले जायें, चन्दन, माला और वनिता आदि की आसक्ति आपको अपनी ओर न खींच ले और जीवन के वास्तत्रिक आनन्द से कहीं आप वंचित न हो जायें ।
कामं भवान् प्रक्कृत्यैव धीरः, पित्रा च महता प्रयत्नेन समारोपित-संस्कारः । तरलहृदयमप्रतिबुद्धिश्च मदयन्ति धनानि । तथापि भवद्-गुणसन्तोषो मामेवं मुखरीकृतवान् ।
१. मनुस्मृति के अनुसार इहलोक तथा परलोक के हित के लिए पवित्र वैदिक कर्मों से द्विजातियों को गर्भाधान आदि पावन शारीरिक संस्कार कग्ने चाहिये-
'वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैनिषेकादिद्विजन्मनाम् । कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च' ।।'
मनु ०, अ० २, श्लो० २६ ।
प्राचीन काल में द्विजातियों के बहुत से संस्कार होते थे । किन्तु व्यास-स्मृति में मुख्य रूप से गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुण्डन, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, केशान्त, स्नान, विवाह और अन्त्येष्टि - ये सोलह संकार बताये गये हैं-
गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो जातकर्म च ।
नामक्रिया निष्क्रमणोऽन्नप्राशनवपन क्रिया ।।
कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भक्रियाविधिः ।
केशान्तः स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रहः ।। चिताग्निसंग्रहश्चैव संस्काराः षोडश स्मृताः ।। व्यासस्मृति ।
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कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
अन्वयः - भवान् प्रकृत्या एव कामं धीरः । च पित्रा महता प्रयत्नेन समारोपितसंस्कारः (अस्ति)। धनानि तरलहृदयं च अप्रतिबुद्धं (जनम् ) मदयन्ति । तथापि भवद्गुणसन्तोषः माम् एवं मुखरीकृतवान् ।
शब्दार्थः- भवान् - आप । प्रकृत्या एव स्वभाव से ही। कामं धीरः = पर्याप्त गम्भीर (हैं)। च पित्रा और (उस पर भी) पिता के द्वारा । महता प्रयत्नेन = बहुत प्रयत्न से। समारोपितसंस्कारः किये गये संस्कारवाले (है)। धनानि धन तो। तरलहृदयं च अप्रतिबुद्धम् (जनम्) चंचल हृदयवाले और अज्ञानियों को। मदयन्ति उन्मत्त कर देते हैं। तथापि = तो भी। भवद्गुणसन्तोषः आपके (विद्याविनयादि) गुणों से उत्पन्न (मेरे मानसिक) सन्तोष ने ही। माम् मुझको। एवम् = इस प्रकार (उपदेश के लिए)। मुखरीकृतवान् = वाचाल बना दिया ।
समासः - सम्यक् आरोपितः संस्कारः यस्य स समारोपितसंस्कारः । भवतः गुणा इति भवद्गुणाः, तैः सन्तोष इति भवद्गुणसन्तोषः ।
सरलार्थ:- यद्यपि श्रीमानिसर्गत एव गम्भीरः पितृपादानां प्रबलतमेन प्रयासेन समधिगतसकलशास्त्रः, चंचलत्व-राज्यशासनादिवलेशाभिज्ञत्वयोः राहित्येन चंचलयापि श्रिया संचालयितुमशक्यश्च भवान्नोपदेशार्हः, तथापि ते विद्याविनयादिगुणगणैः समुत्पन्नास्मदीया सन्तुष्टिरेव पूर्वोक्तप्रकारेण उप-देशपरे वाग्व्यापारे मां प्रावर्त्तयत् ।
अनुवादः- यद्यपि आप स्वभाव से ही अत्यन्त धीर और अपने पिता के प्रबल प्रयत्न से सकल शास्त्र के मर्म को जानने वाले हैं। धन तो चंचल हृदय वाले मूर्ख को ही उन्मत्त करते हैं (सर्वथा सुयोग्य रहने के कारण आपको उपदेश की कोई आवश्यकता नहीं। फिर भी आपके विनय आदि गुणगण से उत्पन्न सन्तोष ने ही मुझे इस प्रकार के उपदेश देने में प्रवृत्त किया है।
इदमेव च पुनः पुनरभिधीयसे- विद्वांसमपि सचेतनमपि महा-सत्त्वमपि अभिजातमपि धीरमपि प्रयत्नवन्तमपि पुरुषमियं दुबिनीता खलीकरोति लक्ष्मीरिति ।
अन्वयः- च पुनः पुनः इदम् एव अभिधीयसे (यत्) विद्वांसम् अपि, सचेतनम् अपि, महासत्त्वम् अपि, अभिजातम् अपि, धीरम् अपि, प्रयत्न-वन्तम् अपि पुरुषम्, इयं दुविनीता लक्ष्मीः खलीकरोति ।
*
મનનમy કિવતાં (ટીતાંરી ? - મમરાન ભુતગત
'उत्तमा "मालती'व्यास्योपेतः
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शब्दार्थः ष और। पुनः पुनः बार-बार। इदम् एवं अभिधीयसे - (मुझ से) यही कहे जाते हों (मैं यही करता हूँ)। (यत्- कि) विद्वांसम् अपि पण्डित को भी। सचेतनम् अपि ज्ञानी को भी। महा-सत्त्वम् अपि अत्यधिक साहसी को भी। अभिजातम् अपि - कुलीन को भी। घोरम् अपि गंभीर को भी। प्रयत्नवन्तम् अपि पुरुषम् = यत्नशील पुरुष को भी। इयं दुविनीता लक्ष्मीः यह उद्दण्ड लक्ष्मी । खलीकरोति = दुष्ट बना देती है।
समासः- स्पष्टम् ।
सरलार्थः- एतदेव मुहुर्मुहुर्मया निगद्यसे त्वं यत् पण्डितोऽपि, ज्ञानवान् अपि, परमशक्तिमान् अपि, कुलीनोऽपि धैर्यवानपि, यत्नवानपि पुरुषः दुःशोलयानया सत्पथात् परिभ्रश्यते ।
अनुबादः और इतना ही तुमझे बार-बार कहता हूँ कि विद्वान्, साबधान, शक्तिशाली, कुलीन, धैर्यवान् और उद्यमी पुरुष भी इस दुरा-चारिणी लक्ष्मी के प्रभाव से दूषित बना दिये जाते हैं।
सर्वथा कल्याणैः पित्रा क्रियमाणमनुभवतु भवान्नवयौवराज्याभिषेक मंङ्गलम् । कुलक्रमागतामुद्वहपूर्वपुरुषैरूढां धुरम् । अवनमय द्विषतां शिरांसि । उन्नमय स्ववन्धुवर्गम् ।
अन्वयः- पित्रा सर्वद्या कल्याणैः क्रियमाणं नवयौवराज्याभिषेकमङ्गलं भवान् अनुभवतु । कुलक्रमागताम्, पूर्वपुरुषैः ऊढां घुरम् उद्वह। द्विषतां शिरांसि अवनमय, स्वबन्धुवर्गम् उन्नमय ।
शब्दार्थः पित्रा = पिता के द्वारा। सर्वथा कल्याणैः सभी प्रकार के मंगलाचारों से । क्रियमाणं नवयौवराज्याभिषेकमङ्गलम् = किये जाने वाले नवीन युवराजपद के लिए अभिषेकरूपी मंगल को। भवान् आप । अनु-भवतु अनुभव करें। कुलक्रमागतां पूर्वपुरुषैः ऊढां धुरम् = वशपरंपरा से प्राप्त, पूर्वजों के द्वारा वहन किये गये राज्यभार को। उद्वह वहन करें। द्विषतां शिरांसि = शत्रुओं के मस्तकों को। अवनमय झुकाएँ । स्वबन्धुवर्गम् - अपसे बान्धवों को । उन्नमय ऊपर उठाएँ ।
समासः - यौवराज्याय अभिषेक इति यौवराज्याभिषेकः; नवः यौव-राज्याभिषेकः, स एव मङ्गलम् इति नवयौवराज्याभिषेकमङ्गलम् तत् ।
सरलार्थः - भवत्तातपादेन मंगळाचारपुरस्सर म्विधीयमानं नूतनं युव-
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कादम्बरी-शुकनासोपदेश:
राजपदप्रतिष्ठा सुचिरमास्वादयतु भवान् । पूर्वजैगृहीतस्य वंशपरम्परा-गतस्य राज्यभारस्य बहनं विधेहि । शत्रूणाम् उत्तमाङ्गानाम् अवति विधाय बान्धवानाम् उन्नति विधेहि ।
अनुवादः अपने पुश्यपिता के द्वारा मंगलमय विधानपूर्वक अभी-अभी की जाने वाली युवराज पद की प्रतिष्ठा के सुखों का चिरकाल तक अनुभव करो। अपने पूर्वजों से अभी तक धारण किये गये वंशपरम्परा से प्राप्त, राज्य के भार का वहन करो। शत्रुओं के मस्तक को नीचे झुकाओ और अपने बान्धवों को ऊपर उठाओ ।
अभिषेकानन्तरं च प्रारब्धदिग्विजयः परिभ्रमन् विजितामपि तव पित्रा सप्तद्वीप' भूषणां पुनविजयस्व वसुन्धराम् ।
अन्वयः च अभिषेकानन्तरम् (एव) प्रांरब्धदिग्विजयः (त्वम्) परिभ्रमन् (सन् ) तव पित्रा विजिताम् अपि सप्तद्वीपभूषणां वसुन्धराम् पुनः बिजयस्व ।
शब्दार्थः च = अपि च । अभिषेकानन्तरम् = राज्याभिषेक के बाद ।
प्रारब्धदिग्विजयः = दिग्विजय को प्रारम्भ करने वाले । परिभ्रमन् - सर्वत्र घूमते हुए। तब पिता = तुम्हारे पिता के द्वारा । विजिताम् अपि = ( पहले से ही) अधिकार में की गयी। सप्तद्वीपभूषणां वसुन्धराम् = सात द्वीपों के बाभूषण वाले पृथिवीमण्डल को। पुर्नावजयस्व फिर से जीतो ।
समासः - अभिषेकस्य अनन्तरम् इति अभिषेकानन्तरम् । दिशां विजय इति दिग्विजयः, प्रारब्धः दिग्विजयः येन सः प्रारब्धदिग्विजयः । सप्तद्वीपाः भूषणानि यस्याः सा सप्तद्वीपभूषणा तां सप्तद्वीपभूषणाम् ।
१. पुराणों में मनीषियों ने निम्नलिखित सात द्वीपों को गिनाया है-जम्बूद्वीप, कुशद्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कोच्चद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप ।
२. यहाँ पर शुकनास ने राजकुमार को अपने पूर्वजों के द्वारा जीती गयी पृथ्वी को फिर से जीतने की सलाह इसलिए दी है कि- वंश-परम्परा प्राप्त-राजशक्ति की अपेक्षा अपनी शक्ति प्रबल होती है। अतः अपने पौरुष से ही शत्रुओं का दमन करना श्रेयस्कर होता है, क्योंकि -
'स्ववीर्याद्राजवीर्याच्च स्ववीर्यं तस्मात् स्वेनैव वीर्येण निगृह्मीयादरीन् द्विजः ।।' बलवत्तरम् । मनु०, अ० ११, श्लो० २३।
'उत्तमा' 'मालती' व्याख्योपेतः
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सरलार्थः - भवत्तातपादेनायत्तीकृतापि सप्तद्वीपमर्ती वसुमती राज्या-भिषेकानन्तरमेव समारब्धविश्वविजयेन प्रतिदिशमाक्रमता भवता भूयोऽपि बेतम्या ।
अनुवादः राज्याभिषेक महोत्सव के बाद ही विश्वविजय के लिए उद्यत, सभी दिशाओं में भ्रमण करते हुए आप अपने पिता के द्वारा जीती हुई सात द्वीपों से अलंकृत बसुधा पर फिर से विजय प्राप्त करें ।
अयं च ते कालः प्रतापमारोपयितुम् । आरूढप्रतापो हि राजा त्रैलोक्यदर्शीव सिद्धादेशो भवति ।' इत्येतावदभिधायोपशशाम ।
अन्वयः- च ते प्रतापम् आरोपयितुम् अयम् (एव) कालः । हि आरूढ-प्रतापः राजा त्रैलोक्यदर्शी इव सिद्धादेशो भवति । इति एतावत् अभिधाय उपशशाम ।
शब्दार्थः- च = अथ च । ते प्रतापम् आरोपयितुम्= तुम्हारे प्रराक्रम को दिखाने के लिये। अयम् (एव) कालः (अस्ति) = यही समय (है)। हि क्योंकि । आरूढप्रतापः राजा अपने प्रताप को पूर्ण प्रतिष्ठित कर त्रिकालदर्शी योगी के समान । सिद्धा-लेने वाला राजा । त्रैलोक्यदर्शी इव देशो भवति = सफल आज्ञावाला होता है। इति एतावत् = इस तरह इतनी बातें कहकर । उपशशाम (शुकनास) चुप हो गये ।
समासः- आरूढः प्रतापः यस्य स आरूढप्रतापः। सिद्ध आदेशो यस्य स सिद्धादेशः ।
सरलार्थः - एष एव भावत्कः समयः कोशदण्डजेन तेजसा लोकान् अभि-भावयितुम् । स्थिरविक्रमो हि भूपः सिद्धयोगीव अनुल्लङ्घनीयादेशो भवति । एतावन्तं समुपदिश्य शुकनासो मौनमासादयामास ।
अनुवादः - यही तो आपके पराक्रम के विस्तार का समय है। क्योंकि प्रारम्भ में जिस राजा का प्रताप सुदृढ़ हो जाता है, आगे चलकर उसके बादेश त्रिकालदर्शी सिद्धयोगियों के वचनों के समान अमोघ होते हैं। इतना कहकर मन्त्रिवर शुकनास ने अपने उपदेश को समाप्त कर दिया ।
उपशान्तवचसि शुकनासे चन्द्रापीडस्ताभिरमलाभिः उपदेशवाग्भिः प्रक्षालित इव, उन्मीलित इव, स्वच्छीकृत इव, निर्मृष्ट इव,
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कादम्बरी-शुकनासोपदेशः
अभिषिक्त इव, अभिलिप्त इव, अलङ्कृत इव, पवित्रीकृत इव, उदद्मा-सित इव प्रीतहृदयो मुहूर्त स्थित्वा स्वभवनमाजगाम ।
अन्वयः- शुकनासे उपशान्तवचसि (सति) अमलाभिः ताभि उपदेश-बाग्भिः प्रक्षालित इव, उन्मीलित इव, स्वच्छीकृत इव, निमूष्ट इव, अभि-चिक्त इव, अभिलिप्त इव, अलंकृत इव, पवित्रीकृत इव, उद्ासित इव, चन्द्रा-पीकः प्रीतहृदयः (सन् ) मुहूर्त (तत्र) स्थित्वा स्वभवनम् आजगाम ।
शब्दार्थः- शुकनासे उपशान्तवचसि (सति) = शुकनास के चुप हो जाने पर । बमलाभिः ताभिः उपदेशवाग्भिः उन विमल उपदेशवचनों से। प्रक्षालित इव = मानो धोया हुआ। उन्मीलित इव मानो विकसित हुआ। स्वच्छीकृत इव = मानो स्वच्छ किया हुआ। निर्मुष्ट इव मानो परिमा-जित हुमा। अभिषिक्त इव = मानो अभिषेक किया हुआ । अभिलिप्त इक् = मानो (चन्दन आदि) लगाया हुआ । अलङ्कृत इव मानो (आभूषणों से) सजाया हुआ । पवित्रीकृत इव मानो पवित्र किया हुआ। उन्झासित इव = मानो उज्ज्वल किया हुआ। चन्द्रापीडः प्रीतहृदयः सन् = प्रसन्न अन्तः करण से युक्त चन्द्रापीड । मुहूर्त (तत्र) स्थित्वा क्षण भर ठहर कर। स्वभवनम् - अपने महल को। आजगाम चला आया ।
समासः- उपशान्तं वचः यस्य, तस्मिन् उपशान्तवचसि । प्रीतं हृदयं यस्य सः प्रीतहृदयः ।
सरलार्थः मौनमासादिते मन्त्रिवरे शुकनासे पूर्वोक्ताभिविमलाभिः उपदेशसरस्वतीभिः धौत इव, प्रस्फुटित इव, विमलीकृत इव, परिमृष्ट इव, अभिषेकीकृत इव, चन्दनादिभिरनुलिप्त इव, भूषणैविभूषित इव, पावनीकृत इव, प्रकाशित इव, प्रसन्नमानसश्चन्द्रापीडः क्षणं विरम्य ततः स्वसदनम् आजगाम ।
अनुवादः- इस प्रकार उपदेश देकर शुकनास के मौन हो जाने पर उनके पवित्र उपदेश की सरस्वती से मानो धुलकर, मानो प्रफुल्लित होकर, मानो स्वच्छ होकर, मानो आभूषणों से सुसज्जित होकर, मानो पवित्र होकर, मानो चमत्कृत होकर, प्रसन्नमन से युक्त चन्द्रापीड कुछ देर तक रुक कर वहाँ से खुशी-खुशी अपने महल को लौट आया ।
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